Md Afjal Khan

Md Afjal Khan When you change your thoughts, remember to also change your world.”—

11/10/2024

खड़ा हूं आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए
सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझ को
-नज़ीर बाक़री

24/05/2024

पढ़ लो बच्चो math

23/01/2024

When you change your thoughts, remember to also change your world.”

01/08/2021

वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का
जो पिछली रात से याद आ रहा है

07/02/2021

यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है

आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया

05/02/2021

हाँ मुझे रस्म-ए-मोहब्बत का सलीक़ा ही नहीं,
जा किसी और का होने की इजाज़त है तुझे

28/12/2020

जो खैरात में मिलती कामयाबी तो हर शख्स कामयाब होता, फिर कदर न होती किसी हुनर की और न ही कोई शख्स लाजवाब होता।

09/12/2020

थक कर ना बैठ ऐ मंज़िल के मुसाफिर, मंज़िल भी मिलेगी और मिलने का मजा भी आयेगा !!

01/05/2020

ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ

हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते

उम्मीद फ़ाज़ली

14/04/2020

मंगलवार को जयंती के दिन यहां स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में बुद्घ वंदना की जाएगी। इस दिन यहां समिति से जुड़े बेहद कम लोग ही आ सकेंगे। मालूम हो, 14 अप्रैल 1991 को प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने स्मारक की आधारशिला रखी थी। कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, बसपा नेता कांशीराम, मायावती और कांग्रेस नेता माधवराव सिंधिया जैसे बड़े नेता मौजूद थे। स्मारक 2008 में बनकर पूरी तरह तैयार हुआ और इसका लोकार्पण लालकृष्ण आडवाणी ने किया। भव्य दो मंजिला संगमरमर की इमारत एक बौद्घ स्तूप की शक्ल में है।

महार रेजिमेंट में प्रशिक्षक थे आंबेडकर के पिता

डॉ. आंबेडकर के पिता सूबेदार रामजी सकपाल महार रेजिमेंट में प्रशिक्षक थे। वे यहां कालीपल्टन क्षेत्र में स्टाफ क्वार्टर में रहते थे। डॉ. आंबेडकर का जन्म इसी क्वार्टर में हुआ। हालांकि वे महू में केवल ढाई साल की उम्र तक रहे और फिर उनके पिता रिटायरमेंट के बाद महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में अपने गांव चले गए। आंबेडकर की जन्मस्थली खोजने का काम सेना में पदस्थ एक ब्रिगेडियर जीएस काले ने 1971 में शुरू किया। बाबा साहेब का जन्मस्थान तो मिल गया, लेकिन सैन्य भूमि होने के चलते इसे हासिल करना मुश्किल था, लेकिन प्रयासों के बाद वर्ष 1986 में 22 हजार 500 वर्गफुट की यह जमीन सेना द्वारा स्मारक समिति को लीज पर दी गई।



साल 2008 से यहां प्रदेश सरकार हर साल जयंती समारोह पर एक करोड़ रुपए खर्च करती है। हालांकि अब भी स्मारक के संघर्ष समाप्त नहीं हुए हैं। यहां अनुयायियों के लिए जमीन की कमी को पूरा करने के लिए पिछले 20 साल से एक आंदोलन जारी है। वहीं आंबेडकर के जन्मस्थान के बावजूद इस जगह को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा तक नहीं मिला है।

1942 में आए थे

महू से जाने के बाद डॉ. आंबेडकर केवल एक ही बार यहां लौटे। 1942 में इंदौर में सिविल कास्ट फाउंडेशन की बैठक में आने पर महार समाज के लोगों ने उनसे महू चलने का आग्रह किया था। वे कुछ घंटों के लिए महू आए थे। इस दौरान शहर में सात रस्ता स्थित चंद्रोदय वाचनालय पहुंचे और समाज के सदस्यों के साथ वैचारिक बैठक की थी। उस बैठक में विट्ठल दास कर्डक, हरीशचंद्र वाघमारे, सुरेश मजदे, सहित अन्य समाजजन मौजूद थे। हालांकि अब इनमें से कोई भी जीवित नहीं हैं

10/04/2020

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