Srividya Sadhana Center-Nasik, श्रीविद्या साधना केंद्र-नासिक

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🍁 पुष्पदंत–शिव महिमन्स्तोत्र के रचियता 🍁✍️ प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट ---------------------------------पुष्पद...
08/08/2026

🍁 पुष्पदंत–शिव महिमन्स्तोत्र के रचियता 🍁
✍️ प्रस्तुत: संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट
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पुष्पदंत नाम का एक गंधर्व था। गंधर्व वर्ग भी देव-तुल्य शक्ति से संपन्न हुआ करते हैं| वे उड़ सकते तथा अदृश्य भी हो सकते थे। पुष्पदंत भगवान शिव का भक्त था साथ ही विद्वान और कवि भी था। उसके गायन कौशल के कारण देवराज इंद्र के दरबार में दिव्य गायक के रूप में नियुक्त किया गया था। भगवान शिव का भक्त होने के कारण पुष्पदंत को विभिन्न फूलों से भगवान शिव की पूजा करना पसंद था।

एक बार पुष्पदंत भ्रमण करते हुए राजा चित्रार्थ के राज्य में पहुंचा। राज्य की सुंदरता को देखकर पुष्पदंत आश्चर्यचकित हो गया। धीरे धीरे जैसे उसने राज्य का भ्रमण किया वह यह देखकर अचंभित हो गया कि राज्य सुन्दर बगीचों और फूलों से घिरा हुआ है। वह चित्रार्थ के महल में गया और वहां और भी अधिक सुन्दर फूलों को देखकर आश्चर्यचकित रह गया। जब पुष्पदंत ने बगीचे को देखा तो वह स्वयं को रोक नहीं पाया। उसने जितने संभव हो सके उतने फूल तोड़ लिए यद्दपि पुष्पदंत को बुरा लगा कि वह फूलों की चोरी कर रहा है परन्तु जब उसने फूलों को देखा तो वह स्वयं को रोक नहीं पाया।

राजा चित्रार्थ जिनका बगीचा था, वे भी भगवान शिव के भक्त थे। उन्होंने यह बगीचा इसलिए बनवाया था कि वे उसमें से रोज़ फूल तोड़कर उन फूलों से भगवान शिव की पूजा करें। हालाँकि जब उस दिन वे भगवान की पूजा करने के लिए बगीचे में पहुंचे तो वे उदास हो गए क्योंकि अधिकाँश फूल तोड़ लिए गए थे। राजा चित्रार्थ ने अपने सैनिकों को बुलाया और पूछा, “फूलों को क्या हुआ?”

सैनिक घबराकर एक दूसरे की ओर देखने लगे तथा फिर राजा की ओर देखकर बोले, “महाराज! हमें नहीं पता...हमने नहीं लिए....हम तो महल की रक्षा के लिए चक्कर लगा रहे थे। सैनिक ने अपना सिर हिलाते हुए कहा...जब हम आए तो फूल गायब थे महाराज!” राजा चित्रार्थ ने सैनिकों की ओर देखा और महसूस किया कि वे सच बोल रहे हैं। उन्होंने त्योरियां चढ़ाई और दयनीय तरीके से पेड़ से कुछ फूल तोड़े। उन्होंने उस दिन की पूजा समाप्त की तथा दूसरे दिन बगीचे की रखवाली के लिए अधिक सैनिक नियुक्त किये।

हालंकि उन्हें आश्चर्य तब हुआ जब उन्होंने सैनिकों के शर्म से झुके हुए चेहरे देखे और देखा कि आज भी बहुत से फूल गायब थे।! राजा चित्रार्थ को गुस्सा आ गया। पूजा करने के बाद उन्होंने कुछ समय विचार किया। उन्होंने बगीचे को देखा तथा एक के बाद एक सारे पेड़ों को देखा। उन्होंने गुस्से से अपने सैनिकों को बुलाया और बेलपत्र के पेड़ की ओर इशारा करते हुए कहा, “ उन पत्तियों को पेड़ के चारों तरफ बिछा दो।“ सैनिकों ने सिर हिलाते हुए पेड़ के चारो ओर पत्तियां बिछा दी। अगले दिन सुबह पुष्पदंत अदृश्य होकर बगीचे के अंदर आया। जैसे ही वह पेड़ों की ओर बढ़ा उसने अनजाने ही बेलपत्र की पत्तियों पर अपना पैर रख दिया।

ऊपर कैलाश में भगवान शिव की साधना में विघ्न पड़ा। बेलपत्र का उपयोग भगवान शिव की पूजा के लिए किया जाता है तथा उनकी प्रिय पत्तियां हैं। भगवान शिव को गुस्सा आ गया क्योंकि अहसास हुआ कि कोई व्यक्ति इन पत्तियों पर चल रहा है...भगवान शिव ने अपनी आँखें बंद की तथा पता लगाया कि बेलपत्र पर कौन चल रहा है? जैसे ही उन्हें महसूस हुआ कि वह तो पुष्पदंत है, उन्होंने अपनी आँखें खोल ली।

भगवान शिव ने विचार किया...अगर किसी मनुष्य ने यह गलती की होती तो, उसे क्षमा कर देता....परन्तु एक गंधर्व...वे तो स्वर्ग के प्राणी हैं.....उन्हें यह सब पता होना चाहिए। यह आदमी गंधर्व होने के योग्य नहीं है...और यह दूसरों के फूल चुरा रहा है...वह ऐसा इसलिए कर रहा है क्योंकि वह अदृश्य है...ठीक है! मैं इसकी अदृश्य होने की शक्ति और उड़ने की शक्ति वापस ले लेता हूँ।

इधर पृथ्वी पर पुष्पदंत पेड़ों की ओर जा रहा था। जब सैनिकों ने पत्तों की सरसराहट की आवाज़ सुनी तो वे उस आवाज़ की ओर भागे। उन्होंने देखा कि एक ऊंचा गंधर्व पेड़ की ओर आ रहा है तथा बिना किसी डर के फूल तोड़ रहा है! उन्होंने गंधर्व पर आक्रमण कर दिया। पुष्पदंत बहुत आश्चर्यचकित हुआ कि मानव उसे देख सकते थे तथा वह अपने आप को बचा नहीं पा रहा था। सैनिकों ने उसे पकड़ लिया और उसे राजा के पास ले गए। राजा चित्रार्थ ने पुष्पदंत को कारागार में डाल दिया।

जब पुष्पदंत बंदीगृह में था तब वह सोचने लगा कि वह अचानक से कैसे दिखने लगा? ....बेलपत्रों के कारण...पुष्पदंत जान गया कि उसने भगवान शिव को बहुत क्रोधित किया है। अपनी शक्तियों को पुन: प्राप्त करने के लिए उत्सुक पुष्पदंत ने भगवान शिव की प्रशंसा में एक स्त्रोत्र लिखा। यह स्त्रोत्र सुनने में बहुत अच्छा था...जब भगवान शिव ने इस स्त्रोत्र का गायन, पुष्पदंत से सुना तो वे प्रसन्न हुए और तुरंत ही गंधर्व को क्षमा कर दिया। इस श्लोक को महिमन्स्त्रोत्र कहा जाता हैं, जो शिव के गुणानुवाद से परिपूर्ण हैं। यह श्लोक सुन्दर विचारों और अर्थों से परिपूर्ण था।

प्रभु ने पुष्पदंत को क्षमादान दिया। भगवान बोले कि तुमने जिस श्लोकसंग्रह से मेरी प्रार्थना की मुझे सर्वदा प्रिय रहेगा तथा आगे जाकर श्री शिवमहिम्न स्तोत्र के नाम से प्रचलित होगा। तुम्हारे द्वारा निर्मित यह शिवलिंग पुष्पदंतेश्वर शिवलिंग के नाम से जाना जाएगा, जो भी इसका दर्शनमात्र करेगा उसके सारे दुख दूर होंगे तथा स्तोत्रपाठ से वह पुण्य का भागी होगा।

शिवमहिम्न स्तोत्र के अंतिम श्लोक में लिखा है:--

श्री पुष्पदन्त-मुख-पंकज-निर्गतेन।
स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण।।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन।
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः।।

अर्थात्, श्री पुष्पदंत के कमल के समान मुख से निकला यह स्तोत्र सारे दुखों को दूर करने वाला है तथा शिव का प्रिय है। जो भी जन इसे सुनेंगे, पढ़ेंगे और धारण करेंगे, भगवान शिव उन्हें जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्त कर देंगे।

प्रभासक्षेत्र के पुष्पदंतेश्वर के दर्शन से सारे कष्ट जाते हैं तथा शिवमहिम्नस्तोत्र केवल एक स्थान पर नहीं अपितु पूरे भारतवर्ष में प्रचलित है।

पुष्पदंत को क्षमादान मिलने पर उसकी शक्तियां वापस मिल गई। पुष्पदंत राजा चित्रार्थ से मिला तथा उनसे क्षमा की प्रार्थना की। उसने वादा किया कि अब वह कभी चोरी नहीं करेगा। राजा भी यह जानकार आश्चर्यचकित हुआ कि पुष्पदंत ने शिवजी के लिए अद्भुत स्त्रोत्र की रचना की हैं और वह भी शिव भक्त हैं राजा ने भी उसे क्षमा कर दिया।

पुष्पदंत की कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती। पुष्पदंत को बहुत घमंड हो गया... उसने सोचा कि उसने एक ऐसे अद्भुत स्त्रोत्र की रचना कर ली हैं, जिसे भगवान शिव ने स्वयं सराहा हैं। शेष अगले पोस्ट में ............

शिवमहिम्न स्तोत्र में 43 श्लोक हैं, श्लोक तथा उनके भावार्थ निम्नांकित हैं।

पुष्पदन्त उवाच -

महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी।
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।।
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्।
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः।। १।।

भावार्थ: पुष्पदंत कहते हैं कि हे प्रभु ! बड़े बड़े विद्वान और योगीजन आपके महिमा को नहीं जान पाये तो मैं तो एक साधारण बालक हूँ, मेरी क्या गिनती? लेकिन क्या आपके महिमा को पूर्णतया जाने बिना आपकी स्तुति नहीं हो सकती? मैं ये नहीं मानता क्योंकि अगर ये सच है तो फिर ब्रह्मा की स्तुति भी व्यर्थ कहलाएगी। मैं तो ये मानता हूँ कि सबको अपनी मति अनुसार स्तुति करने का अधिकार है। इसलिए हे भोलेनाथ! आप कृपया मेरे हृदय के भाव को देखें और मेरी स्तुति का स्वीकार करें।

अतीतः पंथानं तव च महिमा वांमनसयोः।
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि।।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः।
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः।। २।।

भावार्थ: आपकी व्याख्या न तो मन, न ही वचन द्वारा संभव है। आपके सन्दर्भ में वेद भी अचंभित हैं तथा 'नेति नेति' का प्रयोग करते हैं अर्थात ये भी नहीं और वो भी नहीं। आपकी महिमा और आपके स्वरूप को पूर्णतया जान पाना असंभव है, लेकिन जब आप साकार रूप में प्रकट होते हो तो आपके भक्त आपके स्वरूप का वर्णन करते नहीं थकते। ये आपके प्रति उनके प्यार और पूज्यभाव का परिणाम है।

मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः।
तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम्।।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः।
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता।। ३।।

भावार्थ: हे वेद और भाषा के सृजक! आपने अमृतमय वेदोंकी रचना की है। इसलिए जब देवों के गुरु, बृहस्पति आपकी स्तुति करते है तो आपको कोई आश्चर्य नहीं होता। मैं भी अपनी मति अनुसार आपके गुणानुवाद करने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं मानता हूँ कि इससे आपको कोई आश्चर्य नहीं होगा, मगर मेरी वाणी इससे अधिक पवित्र और लाभान्वित अवश्य होगी।

तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्।
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु।।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं।
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः।। ४।।

भावार्थ: आप इस सृष्टि के सृजनहार है, पालनहार है और विसर्जनकार है। इस प्रकार आपके तीन स्वरूप है – ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा आप में तीन गुण है – सत्व, रज और तम। वेदों में इनके बारे में वर्णन किया गया है फिर भी अज्ञानी लोग आपके बारे में उटपटांग बातें करते रहते है। ऐसा करने से भले उन्हें संतुष्टि मिलती हो, किन्तु यथार्थ से वो मुँह नहीं मोड़ सकते।

किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं।
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च।।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर दुःस्थो हतधियः।
कुतर्कोऽयं कांश्चित् मुखरयति मोहाय जगतः।। ५।।

भावार्थ: मूर्ख लोग अक्सर तर्क करते रहते है कि ये सृष्टि की रचना कैसे हुई, किसकी इच्छा से हुई, किन वस्तुओं से उसे बनाया गया इत्यादि। उनका उद्देश्य लोगों में भ्रांति पैदा करने के अलावा कुछ नहीं है। सच पूछो तो ये सभी प्रश्नों के उत्तर आपकी दिव्य शक्ति से जुड़े है और मेरी सीमित बुद्धि से उसे व्यक्त करना असंभव है।

अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां।
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति।।
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो।
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे।। ६।।

भावार्थ: हे प्रभु, आपके बिना ये सब लोक (सप्त लोक – भू: भुव: स्व: मह: जन: तप: सत्य) का निर्माण क्या संभव है? इस जगत का कोई रचयिता न हो, ऐसा क्या संभव है?आपके अलावा इस सृष्टि का निर्माण भला कौन कर सकता है ?आपके अस्तित्व के बारे केवल मूर्ख लोगों को ही शंका हो सकती है।

त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति।
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च।।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।। ७।।

भावार्थ: हे परमपिता!!! आपको पाने के लिए अनगिनत मार्ग है – सांख्य मार्ग, वैष्णव मार्ग, शैव मार्ग, वेद मार्ग आदि। लोग अपनी रुचि के अनुसार कोई एक मार्ग को पसंद करते है। मगर आखिरकार ये सभी मार्ग, जैसे अलग अलग नदियों का पानी बहकर समुद्र में जाकर मिलता है, वैसे ही, आप तक पहुंचते है। सचमुच, किसी भी मार्ग का अनुसरण करने से आपकी प्राप्ति हो सकती है।

महोक्षः खट्वांगं परशुरजिनं भस्म फणिनः।
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्।।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां।
न हि स्वात्मारामं विषय मृगतृष्णा भ्रमयति।। ८।।

भावार्थ: आपके भृकुटी के इशारे मात्र से सभी देवगण एश्वर्य एवं संपदाओं का भोग करते हैं। पर आपके स्वयं के लिए सिर्फ कुल्हाडी, बैल, व्याघ्रचर्म, शरीर पर भस्म तथा हाथ में खप्पर (खोपड़ी)! इससे ये फलित होता है कि जो आत्मानंद में लीन रहता है वो संसार के भोगपदार्थो में नहीं फँसता।

ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं।
परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये।।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव।
स्तुवन् जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता।। ९।।

भावार्थ: इस संसार के बारे में विभिन्न विचारकों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कोई इसे नित्य जानता है तो कोई इसे अनित्य समझता है। लोग जो भी कहें, आपके भक्त तो आपको हमेंशा सत्य मानते है और आपकी भक्ति में आनंद पाते है। मैं भी उनका समर्थन करता हूँ, चाहे किसी को मेरा ये कहना धृष्टता लगे, मुझे उसकी परवाह नहीं।

तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिंचिर्हरिरधः।
परिच्छेतुं यातावनिलमनलस्कन्धवपुषः।।
ततो भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश यत्।
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति।। १०।।

भावार्थ: जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद हुआ की दोनों में से कौन महान है, तब आपने उनकी परीक्षा करने के लिए अग्निस्तंभ का रूप लिया। ब्रह्मा और विष्णु – दोनों नें स्तंभ को अलग अलग छोर से नापने की कोशिश की मगर वो सफल न हो सके। आखिरकार अपनी हार मानकर उन्होंने आपकी स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर आपने अपना मूल रूप प्रकट किया। सचमुच, अगर कोई सच्चे दिल से आपकी स्तुति करे और आप प्रकट न हों एसा कभी हो सकता है भला?

अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं।
दशास्यो यद्बाहूनभृत-रणकण्डू-परवशान्।।
शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणाम्भोरुह-बलेः।
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम्।। ११।।

भावार्थ: आपके परम भक्त रावण ने पद्म की जगह अपने नौ-नौ मस्तक आपकी पूजा में समर्पित कर दिये। जब वो अपना दसवाँ मस्तक काटकर अर्पण करने जा रहा था तब आपने प्रकट होकर उसको वरदान दिया। इस वरदान की वजह से ही उसकी भुजाओं में अटूट बल प्रकट हुआ और वो तीनो लोक में शत्रुओं पर विजय पाने में समर्थ रहा। ये सब आपकी दृढ भक्ति का परिणाम है।

अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगतसारं भुजवनं।
बलात् कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः।।
अलभ्यापातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि।
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः।। १२।।

भावार्थ: आपकी परम भक्ति से रावण अतुलित बल का स्वामी बन बैठा मगर इससे उसने क्या करना चाहा ? आपकी पूजा के लिए हर रोज कैलाश जाने का श्रम बचाने के लिए कैलाश को उठाकर लंका में गाढ़ देना चाहा। जब कैलाश उठाने के लिए रावण ने अपनी भूजाओं को फैलाया तब पार्वती भयभीत हो उठीं। उन्हें भयमुक्त करने के लिए आपने सिर्फ अपने पैर का अंगूठा हिलाया तो रावण जाकर पाताल में गिरा और वहाँ भी उसे स्थान नहीं मिला। सचमुच, जब कोई आदमी अनधिकृत बल या संपत्ति का स्वामी बन जाता है तो उसका उपभोग करने में विवेक खो देता है।

यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं।
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः।।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः।
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः।। १३।।

भावार्थ: आपकी कृपा मात्र से ही बाणासुर दानव इन्द्रादि देवों से भी अधिक ऐश्वर्यशाली बन गया तथा तीनो लोकों पर राज्य किया। हे ईश्वर ! जो मनुष्य आपके चरण में श्रद्धाभक्तिपूर्वक शीश रखता है उसकी उन्नति और समृद्धि निश्चित है।

अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षयचकित-देवासुरकृपा-
विधेयस्याऽऽसीद् यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः।।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो।
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय-भंग-व्यसनिनः।। १४।।

भावार्थ: जब समुद्रमंथन हुआ तब अन्य मूल्यवान रत्नों के साथ महाभयानक विष निकला, जिससे समग्र सृष्टि का विनाश हो सकता था। आपने बड़ी कृपा करके उस विष का पान किया। विषपान करने से आपके कंठ में नीला चिन्ह हो गया और आप नीलकंठ कहलाये। परंतु हे प्रभु, क्या ये आपको कुरुप बनाता है ? कदापि नहीं, ये तो आपकी शोभा को और बढाता है। जो व्यक्ति औरों के दुःख दूर करता है उसमें अगर कोई विकार भी हो तो वो पूजा पात्र बन जाता है।

असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे।
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः।।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्।
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः।। १५।।

भावार्थ: कामदेव के वार से कभी कोई भी नहीं बच सका चाहे वो मनुष्य हों, देव या दानव हों। पर जब कामदेव ने आपकी शक्ति समझे बिना आप की ओर अपने पुष्प बाण को साधा तो आपने उसे तत्क्षण ही भष्म कर दिया। श्रेष्ठ जनो के अपमान का परिणाम हितकर नहीं होता।

मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं।
पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुज-परिघ-रुग्ण-ग्रह-गणम्।।
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-ताडित-तटा।
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता।। १६।।

भावार्थ: जब संसार के कल्याण हेतु आप तांडव करने लगते हैं तब समग्र सृष्टि भय के मारे कांप उठती है, आपके पदप्रहार से पृथ्वी अपना अंत समीप देखती है ग्रह नक्षत्र भयभीत हो उठते हैं। आपकी जटा के स्पर्श मात्र से स्वर्गलोग व्याकुल हो उठता है और आपकी भुजाओं के बल से वैंकुंठ में खलबली मच जाती है। हे महादेव! आश्चर्य ही है कि आपका बल अतिशय कष्टप्रद है।

वियद्व्यापी तारा-गण-गुणित-फेनोद्गम-रुचिः।
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते।।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति।
अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः।। १७।।

भावार्थ: गंगा नदी जब मंदाकिनी के नाम से स्वर्ग से उतरती है तब नभोमंडल में चमकते हुए सितारों की वजह से उसका प्रवाह अत्यंत आकर्षक दिखाई देता है, मगर आपके शिर पर सिमट जाने के बाद तो वह एक बिंदु समान दिखाई पडती है। बाद में जब गंगाजी आपकी जटा से निकलती है और भूमि पर बहने लगती है तब बड़े बड़े द्वीपों का निर्माण करती है। ये आपके दिव्य और महिमावान स्वरूप का ही परिचायक है।

रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो।
रथांगे चन्द्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर इति।।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर विधिः।
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः।। १८।।

भावार्थ: आपने (तारकासुर के पुत्रों द्वारा रचित) तीन नगरों का विध्वंश करने हेतु पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी, सूर्य चन्द्र को दो पहिये मेरु पर्वत का धनुष बनाया और विष्णुजी का बाण लिया। हे शम्भू ! इस वृहत प्रयोजन की क्या आवश्यकता थी ? आपके लिए तो संसार मात्र का विलय करना अत्यंत ही छोटी बात है। आपको किसी सहायता की क्या आवश्यकता? आपने तो केवल (अपने नियंत्रण में रही) शक्तियों के साथ खेल किया था, लीला की थी।

हरिस्ते साहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः।
यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम्।।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः।
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम्।। १९।।

भावार्थ: जब भगवान विष्णु ने आपकी सहस्र कमलों (एवं सहस्र नामों) द्वारा पूजा प्रारम्भ की तो उन्होंने एक कमल कम पाया। तब भक्ति भाव से विष्णुजी ने अपनी एक आँख को कमल के स्थान पर अर्पित कर दिया। उनकी इसी अदम्य भक्ति ने सुदर्शन चक्र का स्वरूप धारण कर लिया जिसे भगवान विष्णु संसार रक्षार्थ उपयोग करते हैं। हे प्रभु, आप तीनों लोक (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) की रक्षा के लिए सदैव जाग्रत रहते हो।

क्रतौ सुप्ते जाग्रत् त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां।
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते।।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदान-प्रतिभुवं।
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः।। २०।।

भावार्थ: यज्ञ की समाप्ति होने पर आप यज्ञकर्ता को उसका फल देते हो। आपकी उपासना और श्रद्धा बिना किया गया कोई कर्म फलदायक नहीं होता। यही वजह है कि वेदों में श्रद्धा रखके और आपको फलदाता मानकर हर कोई अपने कार्यो का शुभारंभ करते है।

क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां।
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-गणाः।।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व्यसनिनः।
ध्रुवं कर्तुं श्रद्धा विधुरमभिचाराय हि मखाः।। २१।।

भावार्थ: यद्यपि आपने यज्ञ कर्म और फल का विधान बनाया है तद्यपि जो यज्ञ शुद्ध विचारों और कर्मो से प्रेप्रित न हो और आपकी अवहेलना करने वाला हो उसका परिणाम कदाचित विपरीत और अहितकर ही होता है इसीलिए दक्षप्रजापति के महायज्ञ यज्ञ को जिसमें स्वयं ब्रह्मा तथा अनेकानेक देवगण तथा ऋषि-मुनि सम्मिलित हुए, आपने नष्ट कर दिया क्योंकि उसमें आपका सम्मान नहीं किया गया। सचमुच, भक्ति के बिना किये गये यज्ञ किसी भी यज्ञकर्ता के लिए हानिकारक सिद्ध होते है।

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं।
गतं रोहिद् भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा।।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममु।
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः।। २२।।

भावार्थ: एक बार प्रजापिता ब्रह्मा अपनी पुत्री पर ही मोहित हो गए। जब उनकी पुत्री ने हिरनी का स्वरुप धारण कर भागने की कोशिश की तो कामातुर ब्रह्मा भी हिरन भेष में उसका पीछा करने लगे। हे शंकर ! तब आप ने व्याघ्र स्वरूप में धनुष-बाण ले ब्रह्मा को मार भगाया। आपके रौद्र रूप से भयभीत ब्रह्मा आकाश दिशा में अदृश्य अवश्य हुए परन्तु आज भी वह आपसे भयभीत हैं।

स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्।
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि।।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत-देहार्ध-घटनात्।
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः।। २३।।

भावार्थ: जब कामदेव ने आपकी तपश्चर्या में बाधा डालनी चाही और आपके मन में पार्वती के प्रति मोह उत्पन्न करने की कोशिश की, तब आपने कामदेव को तृणवत् भस्म कर दिया। अगर तत्पश्चात् भी पार्वती ये समझती है कि आप उन पर मुग्ध है क्योंकि आपके शरीर का आधा हिस्सा उनका है, तो ये उनका भ्रम होगा। सच पूछो तो हर युवती अपनी सुंदरता पे मुग्ध होती है।

श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः।
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः।।
अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं।
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मंगलमसि।। २४।।

भावार्थ: आप श्मशान में रमण करते हैं, भूत - प्रेत आपके मित्र हैं, आप चिता भष्म का लेप करते हैं तथा मुंडमाल धारण करते हैं। ये सारे गुण ही अशुभ एवं भयावह जान पड़ते हैं। तब भी हे श्मशान निवासी ! उन भक्तों जो आपका स्मरण करते है, आप सदैव शुभ और मंगल करते है।

मनः प्रत्यक् चित्ते सविधमविधायात्त-मरुतः।
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमद-सलिलोत्संगति-दृशः।।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये।
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान्।। २५।।

भावार्थ: आपको पाने के लिए योगी क्या क्या नहीं करते ? बस्ती से दूर, एकांत में आसन जमाकर, शास्त्रों में बताई गई विधि के अनुसार प्राण की गति को नियंत्रित करने की कठिन साधना करते है और उसमें सफल होने पर हर्षाश्रु बहाते है। सचमुच, सभी प्रकार की साधना का अंतिम लक्ष्य आपको पाना ही है।

त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः।
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च।।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रतु गिरं।
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत्वं न भवसि।। २६।।

भावार्थ: आप ही सूर्य, चन्द्र, धरती, आकाश, अग्नि, जल एवं वायु हैं। आप ही आत्मा भी हैं। हे देव!! मुझे ऐसा कुछ भी ज्ञात नहीं जो आप न हों।

त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरान्।
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति।।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः।
समस्त-व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम्।। २७।।

भावार्थ: (हे सर्वेश्वर! ॐ शब्द अ, ऊ, म से बना है। ये तीन शब्द तीन लोक स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल; तीन देव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा तीन अवस्था – स्वप्न, जागृति और सुषुप्ति के द्योतक है। लेकिन जब पूरी तरह से ॐ कार का ध्वनि निकलता है तो ये आपके तुरीय पद (तीनों से पर) को अभिव्यक्त करता है।

भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहान्।
तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्।।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि।
प्रियायास्मैधाम्ने प्रणिहित-नमस्योऽस्मि भवते।। २८।।

भावार्थ: वेद एवं देवगण आपकी इन आठ नामों से वंदना करते हैं भव, सर्व, रूद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम, एवं इशान। हे शम्भू! मैं भी आपकी इन नामों की भावपूर्वक स्तुति करता हूँ।

नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमः।
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः।।
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः।
नमः सर्वस्मै ते तदिदमतिसर्वाय च नमः।। २९।।

भावार्थ: आप सब से दूर हैं फिर भी सब के पास है। हे कामदेव को भस्म करनेवाले प्रभु ! आप अति सूक्ष्म है फिर भी विराट है। हे तीन नेत्रोंवाले प्रभु! आप वृद्ध है और युवा भी है। आप सब में है फिर भी सब से पर है। आपको मेरा प्रणाम है।

बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ, भवाय नमो नमः।
प्रबल-तमसे तत् संहारे, हराय नमो नमः।।
जन-सुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ, मृडाय नमो नमः।
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये, शिवाय नमो नमः।। ३०।।

भावार्थ: मैं आपको रजोगुण से युक्त सृजनकर्ता जान कर आपके ब्रह्मा स्वरूप को नमन करता हूँ। तमोगुण को धारण करके आप जगत का संहार करते हो, आपके उस रुद्र स्वरूप को मैं नमन करता हूँ। सत्वगुण धारण करके आप लोगों के सुख के लिए कार्य करते हो, आपके उस विष्णु स्वरूप को नमस्कार है। इन तीनों गुणों से पर आपका त्रिगुणातीत स्वरूप है, आपके उस शिव स्वरूप को मेरा नमस्कार है।

कृश-परिणति-चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं।
क्व च तव गुण-सीमोल्लंघिनी शश्वदृद्धिः।।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्।
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम्।। ३१।।

भावार्थ: मेरा मन शोक, मोह और दुःख से संतप्त तथा क्लेश से भरा पड़ा है। मैं दुविधा में हूँ कि ऐसे भ्रमित मन से मैं आपके दिव्य और अपरंपार महिमा का गान कैसे कर पाउँगा ? फिर भी आपके प्रति मेरे मन में जो भाव और भक्ति है उसे अभिव्यक्त किये बिना मैं नहीं रह सकता। अतः ये स्तुति की माला आपके चरणों में अर्पित करता हूँ।

असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-पात्रे।
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं।
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति।। ३२।।

भावार्थ: यदि समुद्र को दवात बनाया जाय, उसमें काले पर्वत की स्याही डाली जाय, कल्पवृक्ष के पेड की शाखा को लेखनी बनाकर और पृथ्वी को कागज़ बनाकर स्वयं ज्ञान स्वरूपा माँ सरस्वती दिनरात आपके गुणों का वर्णन करें तो भी आप के गुणों की पूर्णतया व्याख्या करना संभव नहीं है।

असुर-सुर-मुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दु-मौलेः।
ग्रथित-गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य।।
सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः।
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार।। ३३।।

भावार्थ: आप सुर, असुर और मुनियों के पूजनीय है, आपने मस्तक पर चंद्र को धारण किया है और आप सभी गुणों से परे है। आपकी इसी दिव्य महिमा से प्रभावित होकर मैं, पुष्पंदत गंधर्व, आपकी स्तुति करता हूँ।

अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्।
पठति परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान् यः।।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र।
प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च।। ३४।।

भावार्थ: पवित्र और भक्तिभावपूर्ण हृदय से जो मनुष्य इस स्तोत्र का नित्य पाठ करेगा, तो वो पृथ्वीलोक में अपनी इच्छा के अनुसार धन, पुत्र, आयुष्य और कीर्ति को प्राप्त करेगा। इतना ही नहीं, देहत्याग के पश्चात् वो शिवलोक में गति पाकर शिवतुल्य शांति का अनुभव करेगा। शिवमहिम्न स्तोत्र के पठन से उसकी सभी लौकिक व पारलौकिक कामनाएँ पूर्ण होंगी।

महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः।
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्।। ३५।।

भावार्थ: शिव से श्रेष्ठ कोइ देव नहीं, शिवमहिम्न स्तोत्र से श्रेष्ठ कोइ स्तोत्र नहीं है, भगवान शंकर के नाम से अधिक महिमावान कोई मंत्र नहीं है और ना ही गुरु से बढकर कोई पूजनीय तत्व।

दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।। ३६।।

भावार्थ: शिवनहिम्न स्तोत्र का पाठ करने से जो फल मिलता है वो दीक्षा या दान देने से, तप करने से, तीर्थाटन करने से, शास्त्रों का ज्ञान पाने से तथा यज्ञ करने से कहीं अधिक है।

कुसुमदशन-नामा सर्व-गन्धर्व-राजः।
शशिधरवर-मौलेर्देवदेवस्य दासः।।
स खलु निज-महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्।
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्य-दिव्यं महिम्नः।। ३७।।

भावार्थ: पुष्पदन्त गंधर्वों का राजा, चन्द्रमौलेश्वर शिव जी का परम भक्त था। मगर भगवान शिव के क्रोध की वजह से वह अपने स्थान से च्युत हुआ। महादेव को प्रसन्न करने के लिए उसने ये महिम्नस्तोत्र की रचना की है।

सुरवरमुनिपूज्य स्वर्ग-मोक्षैक-हेतुं।
पठति यदि मनुष्यः प्रांजलिर्नान्य-चेताः।।
व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः।
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्।। ३८।।

भावार्थ: जो मनुष्य अपने दोनों हाथों को जोड़कर, भक्तिभावपूर्ण, इस स्तोत्र का पठन करेगा, तो वह स्वर्ग-मुक्ति देनेवाले, देवता और मुनिओं के पूज्य तथा किन्नरों के प्रिय ऐसे भगवान शंकर के पास अवश्य जायेगा। पुष्पदंत द्वारा रचित यह स्तोत्र अमोघ और निश्चित फल देनेवाला है।

आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम्।
अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम्।। ३९।।

भावार्थ: पुष्पदंत गन्धर्व द्वारा रचित, भगवान शिव के गुणानुवाद से भरा, मनमोहक, अनुपम और पुण्यप्रदायक स्तोत्र यहाँ पर संपूर्ण होता है।

इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छंकर-पादयोः।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां में सदाशिवः।। ४०।।

भावार्थ: वाणी के माध्यम से की गई मेरी यह पूजा आपके चरणकमलों में सादर अर्पित है। कृपया इसका स्वीकार करें और आपकी प्रसन्नता मुझ पर बनाये रखें।

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः।। ४१।।

भावार्थ: हे शिव!! मैं आपके वास्तविक स्वरुप् को नहीं जानता। लेकिन आप जैसे भी है, जो भी है, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः।
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते।। ४२।।

भावार्थ: जो इस स्तोत्र का दिन में एक, दो या तीन बार पाठ करता है वह सर्व प्रकार के पाप से मुक्त हो जाता है तथा शिव लोक को प्राप्त करता है।

श्री पुष्पदन्त-मुख-पंकज-निर्गतेन।
स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण।।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन।
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः।। ४३।।

भावार्थ: पुष्पदंत के कमलरूपी मुख से उदित, पाप का नाश करनेवाली, भगवान शंकर की अतिप्रिय यह स्तुति का जो पठन करेगा, गान करेगा या उसे सिर्फ अपने स्थान में रखेगा, तो भोलेनाथ शिव उन पर अवश्य प्रसन्न होंगे।

।। इति श्री पुष्पदन्त विरचितं शिवमहिम्नः स्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

कल्याण वृष्टि स्तोत्रम।।श्रीगणेशाय नमः! श्री त्रिपुरसुन्दरीये नमः।।                ॥ क॥कल्पान्तोदित-चण्डभानु-विलसद्-देह-...
01/08/2026

कल्याण वृष्टि स्तोत्रम।।
श्रीगणेशाय नमः! श्री त्रिपुरसुन्दरीये नमः।।
॥ क॥
कल्पान्तोदित-चण्डभानु-विलसद्-देह-प्रभामण्डिता
कालाम्भोद-समान-कुन्तल-भरा कारुण्यवारां निधिः।
काद्यर्णाङ्कित-मन्त्रराज-विलसत्-कूट-त्रयोपासिता
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी॥१॥

॥ ए॥
एतत्-प्राभव-शालिनीति निगमैरद्याप्यनालोचिता
हेमाम्भोज-मुखी चलत्-कुवलय-प्रस्पर्धमानेक्षणा।
एणाङ्कांश-समान-फाल-फलक-प्रोल्लासि-कस्तूरिका
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥२॥

॥ ई॥
ईषत्-फुल्ल-कदम्ब-कुण्डल-महा-ईषत्-फुल्ल-कदम्ब-कुण्डल-महालावण्य-गर्वागर्वापहा स्निग्ध-स्वच्छ-सुदन्त-कान्ति-विलसन्मन्द-स्मिताऽलंकृता।
ईशित्वाद्यखिलेष्ट-सिद्धि-फलदा भक्त्या नतानां सदा
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराजराजेश्वरी॥३॥

॥ ल॥
लक्ष्यालक्ष्यावलग्न-देश-विलसद्-रोमावली-वल्लरी वृत्त-स्निग्ध-फल-द्वय-भ्रम-करोत्तुङ्ग-स्तनी सुन्दरी।
रक्ताशोक-शुभ-प्रपाटल-दुकूलाच्छादिताङ्गी मुदा
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराजराजेश्वरी॥४॥

॥ ह्रीं॥
ह्रींङ्कारी सुर-वाहिनी जल-गभीरावर्तनाभिर्धन-
श्रोणी-मण्डल-भार-मन्द गमना-काञ्ची-कलापोज्ज्वला ।
शुण्डादण्ड-सुवर्ण-वर्ण-कदली-काण्डोपमोरु-द्वयी
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराजराजेश्वरी॥५॥

॥ ह॥
हस्त-प्रोज्ज्वलदिक्षु-कार्मुक-लसत्-पुष्पेषु-पाशांकुशा
ह्याद्यर्णाङ्कित-मन्त्रराज-निलया हारादिभिर्भूषिता।
हस्त-प्रान्त-रणत्-सुवर्ण-वलया हर्यक्ष-सम्पूजिता
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी॥६॥

॥ स॥
संरक्ताम्बुज-पाद-युग्म-विलसन्मञ्जु-क्वणन्नूपुरा संसारार्णव-तारणैक-तरणिर्लावण्य-वारां निधिः ।
लीला-लोल-तमं शुकं मधुरया संलालयन्ती गिरा
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी॥७॥

॥ क॥
कल्याणी करुणा-रसार्द्र-हृदया कल्याण-सन्दायिनी काद्यर्णाङ्कित-मन्त्र-लक्षित-तनुस्तन्वी तमो-नाशिनी ।
कामेशाङ्क-विलासिनी कल-गिरामावास-भूमिः शिवा
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ ८॥

॥ ह॥
हन्तुं दानव-पुङ्गवं रण-भुवि प्रोच्चण्ड-भण्डाभिधं
हर्यक्षाद्यमरार्थिता भगवती दिव्यां तनूमाश्रिता ।
श्रीमाता ललितेत्यचिन्त्य-विभवैर्नाम्नां सहस्रैः स्तुता
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ ९॥

॥ ल॥
लक्ष्मीर्वाग-गजादिभिर्बहु-विधैः रूपैः स्तुताऽपि स्वयं
नी-रूपा गुण-वर्जिता त्रि-जगतां माता च चिद्-रूपिणी ।
भक्तानुग्रह-कारणेन ललितं रूपं समासादिता
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ १०॥

॥ ह्रीं॥
ह्रीङ्कारैक-परायणार्त-जनता-संरक्षणे दीक्षिता
हार्दासं तमसं व्यपोहित-मलं भूष्णुर्हर-प्रेयसी ।
हत्यादि-प्रकटाघ-सङ्घ-दलने दक्षा च दाक्षायणी
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ ११॥

॥ स॥
सर्वानन्द-मयी समस्त-जगतामानन्द-सन्दायिनी
सर्वोत्तुङ्ग-सुवर्ण-शैल-निलया सा सार-साक्षी सती ।
सर्वैर्योगि-चयैः सदैव विचिता साम्राज्य-दान-क्षमा
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ १२॥

॥ क॥
कन्या-रूप-धरा गलाब्ज-विलसन्मुक्ता-लताऽलंकृता
कादि-क्षान्तमनु-प्रविष्ट-हृदया कल्याण-शीलान्विता ।
कल्पान्तोद्भट-ताण्डव-प्रमुदिता श्रीकाम-जित्-साक्षिणी
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ १३॥

॥ ल॥
लक्ष्या भक्ति-रसार्द्र-हृत्-सरसिजे सद्भिः सदाऽऽराधिता
सान्द्रानन्द-मयी सुधाकर-कला खण्डोज्ज्वलन्मौलिका ।
शर्वाणी शरणागताऽऽर्ति-शमिनी सच्चिन्मयी सर्वदा
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ १४॥

॥ ह्रीं॥
ह्रीङ्कार-त्रय-सम्पुटाऽति-महता मन्त्रेण सम्पूजिता
होत्री चन्द्र-समीरणाऽग्नि-जल-भू-भास्वन्नभो-रूपिणी ।
हंसः सोहमिति प्रकृष्ट-धिषणैराराधिता योगिभिः
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ १५॥

॥ श्रीं॥
श्रीङ्काराम्बुज-हंसिकाऽऽश्रित-जन-क्षेमङ्करी शङ्करी
श‍ृङ्गारैक-रसाकरस्य मदनस्योज्जीविका-वल्लरी ।
श्रीकामेशरहः-सखी च ललिता श्रीमद्-गुहाऽऽराधिता
श्रीचक्राधि-निवासिनी विजयते श्रीराज-राजेश्वरी ॥ १६॥

🌹 ्रीसूक्त_वैदिक_श्रीसूक्त_से_भिन्न_एक_पौराणिक_स्तुति_है🌹जिसका प्रयोग विशेष रूप से महालक्ष्मी के अभिषेक, पूजन, प्रतिष्ठा...
29/07/2026

🌹 ्रीसूक्त_वैदिक_श्रीसूक्त_से_भिन्न_एक_पौराणिक_स्तुति_है🌹

जिसका प्रयोग विशेष रूप से महालक्ष्मी के अभिषेक, पूजन, प्रतिष्ठा तथा श्रीलक्ष्मी यज्ञ में किया जाता है। इसमें कुल पंद्रह मुख्य श्लोक हैं और अंत में एक फलश्रुति दी गई है, जिसमें कहा गया है कि जो साधक प्रतिदिन इसका पाठ और घृत से हवन करता है, वह श्री, ऐश्वर्य और समृद्धि प्राप्त करता है।

इसमें माँ लक्ष्मी के अनेक स्वरूपों का वर्णन है, जैसे—

हिरण्यवर्णा (स्वर्णमयी)

चन्द्रप्रभा

पद्मासना

मृगीरूपधरा

अश्वपूर्वा

हस्तिनादप्रबोधिनी

सुवर्णावरणा

पद्मरूपा

पद्ममाला

पुष्करिणी

पिङ्गला

सूर्यप्रकाशा

हिरण्यरूपा

साथ ही इसमें प्रार्थना की गई है कि

अलक्ष्मी का नाश हो,

धन, धान्य, गौ, अश्व, सेवक, पुत्र-पौत्र और कीर्ति की प्राप्ति हो,

सत्यवाणी, उत्तम बुद्धि और अन्न की समृद्धि मिले,

कुबेर एवं कीर्ति का आगमन हो,

घर और कुल में श्री का स्थायी निवास हो।

अंतिम फलश्रुति—

श्रियः पञ्चदशश्लोकं सूक्तं पौराणमन्वहम् ।
यः पठेज्जुहुयाच्चाज्यं श्रीयुतः सततं भवेत् ॥

अर्थात् जो व्यक्ति प्रतिदिन इस पंद्रह श्लोकों वाले पौराणिक श्रीसूक्त का पाठ करे और घृत से हवन करे, वह सदा लक्ष्मी एवं समृद्धि से युक्त रहता है।

देव्यभिषेके पौराणं श्रीसूक्तम्

हिरण्य-वर्णां
हिम-रौप्य-हारां
चन्द्रां त्वदीयां च हिरण्य-रूपाम् ।
लक्ष्मीं मृगी-रूप-धरां श्रियं त्वं
मदर्थम् आकारय जातवेदः ॥ १॥

यस्यां सु-लक्ष्म्याम् अहम् आगतायाम्
हिरण्य-गो-अश्व-आत्मज-मित्र-दासान् ।
लभेयम् आशु हि अनपायिनीं ताम्
मदर्थम् आकारय जातवेदः ॥ २॥

प्रति-आह्वये ताम् अहम् अश्व-पूर्वाम्
देवीं श्रियं मध्य-रथां समीपम् ।
प्रबोधिनीं हस्ति-सु-बृंहितेन
आहूता मया सा किल सेवताम् माम् ॥ ३॥

कांस-उष्मितां ताम् इह पद्म-वर्णाम्
आर्द्रां सुवर्ण-आवरणां ज्वलन्तीम् ।
तृप्तां हि भक्तान् अथ तर्पयन्तीम्
उपह्वये अहं कमल-आसन-स्थाम् ॥ ४॥

लोके ज्वलन्तीं यशसा प्रभासाम्
चन्द्राम् उदाम् उत देव-जुष्टाम् ।
तां पद्म-रूपां शरणं प्रपद्ये
श्रियं वृणे त्वं व्रजताम् अलक्ष्मीः ॥ ५॥

वनस्पतिः ते तपसः अधि-जातः
वृक्षः अथ बिल्वः तरुण-अर्क-वर्णे ।
फलानि तस्य त्वत्-अनुग्रहेण
माया अलक्ष्मीः च नुदन्तु बाह्याः ॥ ६॥

उपैतु माम् देव-सखः कुबेरः
सा दक्ष-कन्या मणिना च कीर्तिः ।
जातः अस्मि राष्ट्रे किल मर्त्य-लोके
कीर्तिं समृद्धिं च ददातु मह्यम् ॥ ७॥

क्षुत्-तृट्-कृशाङ्गी मलिनाम् अलक्ष्मीम्
तव अग्रजां ताम् उत नाशयामि ।
सर्वाम् अभूतिं हि असमृद्धिम् अम्बे
गृहात् च निष्कासय मे द्रुतं त्वम् ॥ ८॥

केन अपि अधर्षाम् अथ गन्ध-चिह्नाम्
पुष्टां गो-अश्व-आदि-युतां च नित्यम् ।
पद्म-आलये सर्व-जन-ईश्वरीं ताम्
प्रति-आह्वये अहं खलु मत्-समीपम् ॥ ९॥

लभेमहि श्री-मनसः च कामम्
वाचः तु सत्यं च सु-कल्पितं वै ।
अन्नस्य भक्ष्यं च पयः पशूनाम्
सम्पद् धि मयि आश्रयतां यशः च ॥ १०॥

मयि प्रसादं कुरु कर्दम त्वम्
प्रजा-वती श्रीः अभवत् त्वया हि ।
कुले प्रतिष्ठापय मे श्रियं वै
त्वत्-मातरं ताम् उत पद्म-मालाम् ॥ ११॥

स्निग्धानि च आपः अभिसृजन्तु अजस्रम्
चिक्लीत-वासं कुरु मत्-गृहे त्वम् ।
कुले श्रियं मातरम् आशु मे अद्य
श्री-पुत्र संवासयतां च देवीम् ॥ १२॥

तां पिङ्गलां पुष्करिणीं च लक्ष्मीम्
आर्द्रां च पुष्टिं शुभ-पद्म-मालाम् ।
चन्द्र-प्रकाशां च हिरण्य-रूपाम्
मदर्थम् आकारय जातवेदः ॥ १३॥

आर्द्रां तथा यष्टि-करां सुवर्णाम्
तां यष्टि-रूपाम् अथ हेम-मालाम् ।
सूर्य-प्रकाशां च हिरण्य-रूपाम्
मदर्थम् आकारय जातवेदः ॥ १४॥

यस्यां प्रभूतं कनकं च गावः
दासीः तुरङ्गान् पुरुषान् च सत्यम् ।
विन्देयम् आशु हि अनपायिनीं ताम्
मदर्थम् आकारय जातवेदः ॥ १५॥

श्रियः पञ्च-दश-श्लोकं
सूक्तं पौराणम् अन्वहम् ।
यः पठेत् जुहुयात् च आज्यं
श्री-युतः सततं भवेत् ॥ १६॥

इति पौराणीकं श्रीसूक्तं समाप्तम्।

१.
हिरण्य-वर्णां हिम-रौप्य-हारां चन्द्रां त्वदीयां च हिरण्य-रूपाम् ।
लक्ष्मीं मृगी-रूप-धरां श्रियं त्वं मदर्थम् आकारय जातवेदः ॥

(१. हिरण्यवर्णा, २. हिमरौप्यहारा, ३. चन्द्रा, ४. हिरण्यरूपा, ५. लक्ष्मी, ६. मृगीरूपधरा, ७. श्री)

२.
यस्यां सु-लक्ष्म्याम् अहम् आगतायाम्
हिरण्य-गो-अश्व-आत्मज-मित्र-दासान् ।
लभेयम् आशु हि अनपायिनीं ताम्
मदर्थम् आकारय जातवेदः ॥

(८. सुलक्ष्मी, ९. अनपायिनी)

३.
प्रति-आह्वये ताम् अहम् अश्व-पूर्वाम्
देवीं श्रियं मध्य-रथां समीपम् ।
प्रबोधिनीं हस्ति-सु-बृंहितेन
आहूता मया सा किल सेवताम् माम् ॥

(१०. अश्वपूर्वा, ११. देवी, १२. श्री, १३. मध्यरथा, १४. समीपा, १५. प्रबोधिनी)

४.
कांस-उष्मितां ताम् इह पद्म-वर्णाम्
आर्द्रां सुवर्ण-आवरणां ज्वलन्तीम् ।
तृप्तां हि भक्तान् अथ तर्पयन्तीम्
उपह्वये अहं कमल-आसन-स्थाम् ॥

(१६. कांसोष्मिता, १७. पद्मवर्णा, १८. आर्द्रा, १९. सुवर्णावरणा, २०. ज्वलन्ती, २१. तृप्ता, २२. भक्ततर्पयन्ती, २३. तर्पयन्ती, २४. कमलासनस्था)

५.
लोके ज्वलन्तीं यशसा प्रभासाम्
चन्द्राम् उदाम् उत देव-जुष्टाम् ।
तां पद्म-रूपां शरणं प्रपद्ये
श्रियं वृणे त्वं व्रजताम् अलक्ष्मीः ॥

(२५. ज्वलन्ती, २६. प्रभासा, २७. चन्द्रा, २८. उदा, २९. देवजुष्टा, ३०. पद्मरूपा, ३१. श्री)

६.
वनस्पतिः ते तपसः अधि-जातः
वृक्षः अथ बिल्वः तरुण-अर्क-वर्णे ।
फलानि तस्य त्वत्-अनुग्रहेण
माया अलक्ष्मीः च नुदन्तु बाह्याः ॥

(३२. तरुणार्कवर्णा, ३३. माया)

७.
उपैतु माम् देव-सखः कुबेरः
सा दक्ष-कन्या मणिना च कीर्तिः ।
जातः अस्मि राष्ट्रे किल मर्त्य-लोके
कीर्तिं समृद्धिं च ददातु मह्यम् ॥

(३४. दक्षकन्या, ३५. कीर्तिः, ३६. समृद्धि)

८.
क्षुत्-तृट्-कृशाङ्गी मलिनाम् अलक्ष्मीम्
तव अग्रजां ताम् उत नाशयामि ।
सर्वाम् अभूतिं हि असमृद्धिम् अम्बे
गृहात् च निष्कासय मे द्रुतं त्वम् ॥

(३७. अम्बा)

९.
केन अपि अधर्षाम् अथ गन्ध-चिह्नाम्
पुष्टां गो-अश्व-आदि-युतां च नित्यम् ।
पद्म-आलये सर्व-जन-ईश्वरीं ताम्
प्रति-आह्वये अहं खलु मत्-समीपम् ॥

(३८. अधर्षा, ३९. गन्धचिह्ना, ४०. पुष्टा, ४१. गोअश्वादियुता, ४२. पद्मालया, ४३. सर्वजनेश्वरी)

१०.
लभेमहि श्री-मनसः च कामम्
वाचः तु सत्यं च सु-कल्पितं वै ।
अन्नस्य भक्ष्यं च पयः पशूनाम्
सम्पद् धि मयि आश्रयतां यशः च ॥

(४४. श्री)

११.
मयि प्रसादं कुरु कर्दम त्वम्
प्रजा-वती श्रीः अभवत् त्वया हि ।
कुले प्रतिष्ठापय मे श्रियं वै
त्वत्-मातरं ताम् उत पद्म-मालाम् ॥

(४५. प्रजावती, ४६. श्री, ४७. माता, ४८. पद्ममाला)

१२.
स्निग्धानि च आपः अभिसृजन्तु अजस्रम्
चिक्लीत-वासं कुरु मत्-गृहे त्वम् ।
कुले श्रियं मातरम् आशु मे अद्य
श्री-पुत्र संवासयतां च देवीम् ॥

(४९. श्री, ५०. माता, ५१. श्रीपुत्रा, ५२. देवी)

१३.
तां पिङ्गलां पुष्करिणीं च लक्ष्मीम्
आर्द्रां च पुष्टिं शुभ-पद्म-मालाम् ।
चन्द्र-प्रकाशां च हिरण्य-रूपाम्
मदर्थम् आकारय जातवेदः ॥

(५३. पिङ्गला, ५४. पुष्करिणी, ५५. लक्ष्मी, ५६. आर्द्रा, ५७. पुष्टि, ५८. शुभपद्ममाला, ५९. चन्द्रप्रकाशा, ६०. हिरण्यरूपा)

१४.
आर्द्रां तथा यष्टि-करां सुवर्णाम्
तां यष्टि-रूपाम् अथ हेम-मालाम् ।
सूर्य-प्रकाशां च हिरण्य-रूपाम्
मदर्थम् आकारय जातवेदः ॥

(६१. आर्द्रा, ६२. यष्टिकरा, ६३. सुवर्णा, ६४. यष्टिरूपा, ६५. हेममाला, ६६. सूर्यप्रकाशा, ६७. हिरण्यरूपा)

१५.
यस्यां प्रभूतं कनकं च गावः
दासीः तुरङ्गान् पुरुषान् च सत्यम् ।
विन्देयम् आशु हि अनपायिनीं ताम्
मदर्थम् आकारय जातवेदः ॥

(६८. अनपायिनी)

अर्थ

१. श्लोक का अर्थ

हे जातवेद (अग्निदेव)! मेरे लिए उस देवी लक्ष्मी का आवाहन कीजिए जो स्वर्ण के समान तेजस्विनी हैं, हिम और रजत के समान शुद्ध एवं उज्ज्वल हार धारण करती हैं, चन्द्रमा के समान शीतल और सौम्य हैं, स्वर्णमयी दिव्य स्वरूप वाली हैं, मृगी के समान कोमल, चंचल और मनोहर हैं तथा स्वयं श्रीस्वरूपिणी हैं।

२. श्लोक का अर्थ

हे जातवेद! ऐसी सुलक्ष्मी, जो कभी अपने भक्त का साथ नहीं छोड़तीं, मेरे जीवन में पधारें। उनके आगमन से मुझे स्वर्ण, गौएँ, अश्व, सन्तान, सच्चे मित्र, सेवक तथा समस्त ऐश्वर्य शीघ्र प्राप्त हों।

३. श्लोक का अर्थ

मैं उस देवी श्री का आवाहन करता हूँ जो अश्वों से अग्रगामिनी हैं, दिव्य रथ के मध्य विराजमान हैं और हाथियों के मंगलमय गर्जन से अपने आगमन का संकेत देती हैं। वे मेरे समीप आकर सदैव मेरी सेवा और रक्षा करें।

४. श्लोक का अर्थ

मैं उस पद्मवर्णा देवी का आवाहन करता हूँ जो सौम्य तेज से प्रकाशित हैं, स्वर्णाभूषणों से विभूषित हैं, स्वयं तेजस्विनी हैं, अपने भक्तों को तृप्त करती हैं और कमलासन पर विराजमान रहती हैं।

५. श्लोक का अर्थ

मैं उस श्री का शरणागत हूँ जो सम्पूर्ण लोक में यशस्विनी, तेजोमयी, चन्द्रमा के समान शीतल, देवताओं द्वारा पूजिता और कमल के समान सुन्दर स्वरूप वाली हैं। वे मेरे जीवन में आएँ और दरिद्रता तथा अलक्ष्मी दूर चली जाए।

६. श्लोक का अर्थ

हे तरुण सूर्य के समान कांतिवाली देवी! आपके तप से उत्पन्न पवित्र बिल्ववृक्ष के फल आपके अनुग्रह से मुझे प्राप्त हों तथा बाहरी और भीतरी सभी प्रकार की दरिद्रता, अभाव और माया का नाश हो जाए।

७. श्लोक का अर्थ

देवताओं के मित्र कुबेर मेरे समीप आएँ। दक्षकन्या स्वरूपिणी देवी मुझे यश, कीर्ति और समृद्धि प्रदान करें, जिससे इस संसार में मेरा जीवन सम्मान, ऐश्वर्य और मंगल से परिपूर्ण हो।

८. श्लोक का अर्थ

हे अम्बे! क्षुधा, तृष्णा, दीनता, मलिनता और अलक्ष्मी रूपी आपकी अग्रजा का नाश कीजिए। मेरे घर से समस्त अभाव, दरिद्रता और असमृद्धि को शीघ्र बाहर कर दीजिए।

९. श्लोक का अर्थ

मैं उस पद्मालया, सर्वजनेश्वरी देवी का आवाहन करता हूँ जो पुष्टिदायिनी हैं, गौ, अश्व और समस्त ऐश्वर्य से युक्त हैं, दिव्य सुगन्ध से सम्पन्न हैं और सदैव अपने भक्तों का पालन करती हैं। वे मेरे समीप निवास करें।

१०. श्लोक का अर्थ

मुझे श्री की कृपा से श्रेष्ठ इच्छाओं की सिद्धि, सत्यवाणी, उत्तम विचार, अन्न, दूध, पशुधन, सम्पत्ति और स्थायी यश प्राप्त हो तथा ये सभी मेरे जीवन में सदैव बने रहें।

११. श्लोक का अर्थ

हे कर्दम! मेरे ऊपर प्रसन्न होइए। आपके प्रभाव से प्रजावती श्री मेरे कुल में प्रकट हों। कमलमाला धारण करने वाली माता लक्ष्मी मेरे वंश में स्थिर होकर सदैव निवास करें।

१२. श्लोक का अर्थ

जल सदा स्निग्धता और समृद्धि प्रदान करे। हे चिक्लीत! मेरे घर को मंगलमय बनाइए। माता श्री और देवी लक्ष्मी अपने पुत्रों सहित मेरे कुल में स्थायी रूप से निवास करें।

१३. श्लोक का अर्थ

हे जातवेद! मेरे लिए उस पिङ्गला, पुष्करिणी, लक्ष्मी, आर्द्रा, पुष्टिरूपिणी, शुभपद्ममाला धारण करने वाली, चन्द्रप्रकाश के समान उज्ज्वल तथा स्वर्णमयी देवी का आवाहन कीजिए।

१४. श्लोक का अर्थ

हे जातवेद! उस आर्द्रा, यष्टिधारिणी, सुवर्णमयी, यष्टिरूपा, हेममाला धारण करने वाली, सूर्य के समान प्रकाशमयी तथा स्वर्णमयी देवी को मेरे लिए यहाँ पधारने का निमंत्रण दीजिए।

१५. श्लोक का अर्थ

हे जातवेद! ऐसी अनपायिनी लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन कीजिए जिनके आगमन से मुझे प्रचुर स्वर्ण, गौएँ, सेवक, उत्तम घोड़े, योग्य मनुष्य तथा सभी प्रकार की स्थायी समृद्धि प्राप्त हो।

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