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IndiaN PoEtry Library Of Ghazal-kavita-nazam-sher by Indian Poets.

23/04/2017

Badi Tamanna Thi ki Koi Tarashta Mujhko..
Sari Umar maine ye khwab sajane me guzar di..

15/08/2016

Wo ab paani ko tarsenge,
Jo Ganga chhod aaye hai.n...
Hare jhande ke chakkar mai,
Tiranga chhod aaye hai.n....
- Rahat Indori

25/06/2016

मै दहशतगर्द था मरने पे बेटा बोल सकता है।
हुकूमत के इशारे पे तो मुर्दा बोल सकता है॥
यहाँ पर नफरतो ने कैसे-कैसे गुल खिलाये हैं।
लुटी अस्मत बता देगी दुपट्टा बोल सकता है॥
हुकूमत की तवज्जो चाहती है ये जली बस्ती।
अदालत पूछना चाहे तो मलबा बोल सकता है॥
कई चेहरे अभी तक मुँह जबानी याद है इसको।
कहीं तुम पूछ मत लेना ये गूँगा बोल सकता है॥
बहोत सी कुर्सिया इस मुल्क मे लाशों पे रक्खी है।
ये वो सच है जिसे झूठे से झूठा बोल सकता है॥
मुनव्वर राना

21/06/2016

Uss ki aankhain balaa ki taajer hain
Jis ko dekhain khareed leti hain.
(Unknown)

19/06/2016

Tumhara naam kisi ajnabi ke lab par tha
Zara si baat thi dil ko magar lagii hai bahut

19/06/2016

बदला न अपने-आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे

04/12/2015

पहले जैसा रंग नहीं है जीवन की रंगोली में।
जाने कितना ज़हर भरा है अब लोगों की बोली में।

सबको अपना जान के तुम सब पर विश्वास नहीं करना ,
दोस्त नहीं दुश्मन भी शामिल होते हैं हमजोली में।

मर के भी ज़िंदा रहने का कोई तो उपचार करो ,
सारा जीवन बीत न जाये यूँ ही आंखमिचौली में।

सागर को तालाब की सोहबत होती है स्वीकार नहीं ,
शामिल कोई हंस नहीं होता गिद्धों की टोली में।

दौरे नौ में हर भोली सूरत को फूल नहीं समझो ,
एक भयानक दृश्य छुपा होता है सूरत भोली में।

सारे त्योहारों की रौनक महंगाई की नज़्र हुई ,
पहले जैसा लुत्फ़ कहाँ अब ईद ,दिवाली,होली में।

फूल बिना पौधे की हर इक शाख " अनिल " यूँ लगती है ,
जैसे बिन भांवर ही दुल्हन बैठ गई हो डोली में।

अनिल रस्तोगी
बदायूँ ( उत्तर प्रदेश )

जिसे इश्क़ का तीर कारी लगेउसे ज़िन्दगी क्यूँ न भारी लगेन छोड़े महब्बत दम-ए-मर्ग लगजिसे यार-ए-जानीं सूँ यारी लगेन होए उसे...
22/07/2015

जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे
उसे ज़िन्दगी क्यूँ न भारी लगे
न छोड़े महब्बत दम-ए-मर्ग लग
जिसे यार-ए-जानीं सूँ यारी लगे
न होए उसे जग में हरगिज़ क़रार
जिसे इश्क़ की बेक़रारी लगे
हर इक वक़्त मुझ आशिक़-ए-पाक कूँ
पियारे तेरी बात प्यारी लगे
‘वली’ कूँ कहे तू अगर एक बचन
रक़ीबाँ के दिल में कटारी लगे

वली दक्कनी

24/05/2015

सर से चादर बदन से क़बा ले गई
ज़िन्दगी हम फ़क़ीरों से क्या ले गई
मेरी मुठ्ठी में सूखे हुये फूल हैं
ख़ुशबुओं को उड़ा कर हवा ले गई
मैं समुंदर के सीने में चट्टान था
रात एक मौज आई बहा ले गई
हम जो काग़ज़ थे अश्कों से भीगे हुये
क्यों चिराग़ों की लौ तक हवा ले गई
चाँद ने रात मुझको जगा कर कहा
एक लड़की तुम्हारा पता ले गई
मेरी शोहरत सियासत से महफ़ूस है
ये तवायफ़ भी इस्मत बचा ले गई
बसीर बद्र साहब

पहले इक शख़्स मेरी ज़ात बनाऔर फिर पूरी काएनात बनाहुस्न ने ख़द कहा मुसव्विर सेपाँव पर मेरे कोई हाथ बनाप्यास की सल्तनत नही...
12/05/2015

पहले इक शख़्स मेरी ज़ात बना
और फिर पूरी काएनात बना
हुस्न ने ख़द कहा मुसव्विर से
पाँव पर मेरे कोई हाथ बना
प्यास की सल्तनत नहीं मिट्टी
लाख दजले बना फ़ुरात बना
ग़म का सूरज वो दे गया तुझ का
चाहे अब दिन बना की रात बना
शेर इक मश्ग़ला था ‘कासिर’ का
अब यही मक्सद-ए-हयात बना
गुलाम मोहम्मद क़ासिर

मैं न मैं, तू न तू, लगा मुझको ऐसा क्या हो गया बता, मुझकोकम लगे आसमां भी उड़ने को तूने ये कह दिया है क्या मुझकोरात तेरी भी...
08/05/2015

मैं न मैं, तू न तू, लगा मुझको
ऐसा क्या हो गया बता, मुझको
कम लगे आसमां भी उड़ने को
तूने ये कह दिया है क्या मुझको
रात तेरी भी जागते गुज़री
रात भर ऐसा क्यूँ लगा मुझको
जब से तेरा करम हुआ मुझपे
बददुआ भी लगे दुआ मुझको
क्या बिछड़ने का वक़्त आया है
वो समझने लगा ख़ुदा मुझको
- डॉ प्रेम भंडारी

जब कोई उतरा नहीं मयार पर फैसला छोड़ा गया तलवार परआ रहें हैं फिर फरिश्ते शहर में लग गए हैं पोस्टर दीवार परबादबा का और हवा ...
03/05/2015

जब कोई उतरा नहीं मयार पर
फैसला छोड़ा गया तलवार पर
आ रहें हैं फिर फरिश्ते शहर में
लग गए हैं पोस्टर दीवार पर
बादबा का और हवा का एक मिजाज
अब भरोसा कीजिये पतवार पर
एक सुहागन आज फिर जल कर मरी
आँख से आंसू गिरे अखबार पर
खुश दिली से उनकी बातें मान ले
सर कलम हो जायेगा इनकार पर
पर लगा कर उड़ रही है कीमते
किस का साया पड़ गया बाजार पर
-मलिक् जादा जावेद

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