21/04/2023
ाता_पंचरत्न_देवी और पिता राजा साहबजादा सिंह के घर भोजपुर की मिट्टी पर एक शेर का जन्म 13 नवंबर 1777 को हुआ था। उस लाडले पुत्र का नाम माता-पिता ने #कुँवर रखा ।
उज्जैनी के महान सम्राट विक्रमादित्य के वंशावली में महान राजा भोज की वंश की वीरता की परंपरा को इन्हीं कुँवर ने आगे बढ़ाया और #इतिहास में वीर कुँवर सिंह के नाम से प्रसिद्धि पाई थी।
बचपन से ही #शस्त्रों और शिकार का शौख रखने वाले बाबू वीर कुँवर सिंह क्षत्रिय गुणों से भरे थे। अंग्रेज उनको कभी नहीं भाते थे,,इसलिए उनके पिता ने उन्हें #जगदीशपुर से राँची भेज दिया था।
परंतु जब 1846 से अंग्रजों के विरुद्ध भारतीय खड़े होने लगे। तभी वीर कुँवर सिंह ने भी अपनी तैयारी शुरू कर दी थी। जब 1857 में सिपाही विद्रोह बैरकपुर,,रामगढ़,,दानापुर में हुआ तो कुँवर सिंह ने उनका नेतृत्व किया था।
इस विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने सिख रेजिमेंट को भेजा था। जिसे बाबू वीर कुँवर सिंह ने करारी शिकस्त दी थी।
इस युद्ध के बाद बाबू वीर कुँवर सिंह का आरा शहर पर पूण नियंत्रण हो गया था। इसके बाद आरा लंबे समय तक स्वतंत्र रहा था। इस बीच अंग्रेजों ने बीबीगंज और बिहिया के रास्ते पुनः आरा को लेने की कोशिश की थी। परंतु यहाँ भी अंग्रजों के हाथ नाकामी लगी।
इस बीच बाबू वीर कुँवर सिंह ने पच्छिम(उत्तर प्रदेश) की तरफ विजय अभियान चलाया। रीवा,,बाँदा,, आजमगढ,,,बनारस,,बलिया,, गाजीपुर,,,गोरखपुर आदि में भी अंग्रेजों की सत्ता कमजोर पड़ गई।
परंतु इसी बीच मेजर जनरल विंसेंट आयर ने आरा सहित जगदीशपुर पर कब्जा कर लिया था।पूरे भोजपुर में भारी नरसंघार किया ।बाबू वीर कुँवर सिंह पुनः अपनी धरती पर लौटे और उन्होंने विंसेंट आयर को पराजित कर के उसे मार डाला और जगदीशपुर के किले से यूनियन जैक उतार कर फेंक दिया और अपना झंडा लहरा दिया था। परंतु इस घमासान युद्ध के तुरंत बाद ही जनरल लुग्गार्ट आ पहुँचा था।
घमासान युद्ध हुआ और सेना को कमजोर पड़ता देख,,सेना को पुनः गठित करने के उद्देश्य से कुँवर सिंह ने मोर्चा छोड़ने का निर्णय लिया। 80 वर्ष की आयु में लड़ते लड़ते थके हुए वीर कुँवर सिंह और लगातार युद्ध से सैनिक भी घायल हो चुके थे। उन्हें इकठ्ठा होने के लिए थोड़ा समय चाहिए था।
23 अप्रैल 1858 को गंगा नदी पार करते हुए एक #विषैला तोप का गोला उनके बाह से टकरा गया था। विष पूरे शरीर में न फैल जाए । इस कारण से उन्होंने अपना हाथ काटकर गंगा माता को भेंट में दे दिया।
कुछ इतिहासकार का मानना है कि 23 अप्रैल को ही बाबू वीर कुँवर सिंह ने अंतिम सांस ली थी। परंतु सर्वमान्य मान्यता के अनुसार 26 अप्रैल 1858 को उन्होंने अंतिम सांस ली थी।
प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहाकार ""हॉप्स"" ने लिखा कि ---
"""उस बूढ़े राजपूत ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अद्वितीय वीरता और आन-बान-शान की लड़ाई इस शान से लड़ी कि ये मनना होगा कि अगर वो 80 साल के विर्द्ध(बुजुर्ग) नहीं होकर अगर जवान होते तो ब्रिटिश सत्ता का अंत उसी समय हो जाता"""
महान स्वतंत्रता सेनानी,,,अदुतीय वीर और महान सेनानायक #बाबू_कुँवर_सिंह की याद में 23 अप्रैल को विजय उत्सव ट्विटर ट्रेंड में अवश्य सहयोग करें। अगर हम ही अपने लेजेंट को भुला देंगे तो कौन याद करेगा।
ट्विटर ट्रेंड सुबह 9 से 11(AM) है।
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जय वीर कुँवर सिंह💐💐🙏
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