16/01/2026
दोनों की उम्र लगभग एक ही है।
दोनों इसी देश में पैदा हुए।
लेकिन देश ने दोनों के साथ बिल्कुल अलग सलूक किया।
एक तरफ़ अश्वमीत गौतम —
जिसने किताबों से निकली भाषा में सवाल पूछा।
शिक्षा चाहिए।
रोज़गार चाहिए।
सड़क, पानी, बिजली, साफ़ हवा चाहिए।
इनाम मिला —
FIR।
हिरासत।
जेल का डर।
दूसरी तरफ़ अभिनव अरोड़ा —
जिसने सवाल नहीं पूछे।
उसने सत्ता की भाषा बोली।
प्रोपेगेंडा परोसा।
अंधभक्ति बेची।
पाखंड को पुण्य बताया।
इनाम मिला —
मंच।
तालियाँ।
और मंत्री के हाथों पुरस्कार।
यह सिर्फ़ दो बच्चों की कहानी नहीं है।
यह भारत की बदलती हुई प्राथमिकता सूची है।
यहाँ
कलम से सवाल करना अपराध है,
और ज़ुबान से चापलूसी करना राष्ट्रसेवा।
यहाँ
सोचना खतरनाक है,
और मान लेना सुरक्षित।
यहाँ
जो भविष्य के लिए सवाल करेगा,
उसे सबक सिखाया जाएगा।
और जो वर्तमान की सत्ता को सही ठहराएगा,
उसे ही “आदर्श नागरिक” कहा जाएगा।
यही वजह है कि
देश में डर बढ़ रहा है,
और बुद्धि सिकुड़ रही है।
क्योंकि जिस दिन बच्चों को यह सिखा दिया जाए कि
सवाल मत पूछो, इनाम मिलेगा —
उस दिन लोकतंत्र स्कूल से निकलकर
सीधे जेल की ओर चल देता है।
आज मामला अश्वमीत और अभिनव का है।
कल मामला हमारे बच्चों का होगा।
फैसला हमें करना है —
हमें सोचने वाले नागरिक चाहिए
या तालियाँ बजाने वाले अनुयायी।