पं.संतोष भारद्वाज Palmist

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भाग्य रेखा :: उन्नति और सफलता   Video linkhttps://youtu.be/3pInpu0pgu8 (1.1). यह मणिबन्ध से प्रारम्भ होती है। गहरा काला ...
20/07/2026

भाग्य रेखा :: उन्नति और सफलता
Video link
https://youtu.be/3pInpu0pgu8
(1.1). यह मणिबन्ध से प्रारम्भ होती है। गहरा काला रंग लिये हुए यह रेखा जक को उसके पूर्वजों द्वारा किये जाने वाले कार्य करवाती है। जातक मूर्तिकला आदि के माध्यम से अपना परिवार भली भाँति चला सकता है। हल्का गुलाबी रंग होने से जातक को अन्य कार्यों से भी सफलता मिल सकती है। सूर्य रेखा भी स्पष्ट रूप से होने पर जातक नाम और पैसा दोनों कमायेगा।
(1.2). यह केतु से प्रारम्भ होती है। इसका फल भी लगभग उपरोक्त ही होता है और जातक प्रारभ्ध से ही नियंत्रित होता है।
(1.3). यह जीवन रेखा से प्रारम्भ होती है। जातक हर किसी की मदद करने को तत्पर रहेगा।
(1.4). यह शुक्र पर्वत पर तारे से प्रारम्भ होती है। पिता की मृत्यु के बाद जातक का पालन-पोषण किसी करीबी रिश्तेदार द्वारा किया जायेगा।
(1.5). यह शुक्र पर्वत से प्रारम्भ होती है। जातक परिश्रम और किसी करीबी व्यक्ति के माध्यम से जीवन निर्वाह करेगा।
(1.6-7). यह जीवन रेखा से प्रारम्भ होने वाली उच्च वर्ती शाखाएं हैं और अक्सर जातक की उन्नति का वक्त निर्धारित करती हैं। जातक को इस समय पर विशेष लाभ होगा। नौकरी में होने पर पदोन्नति होगी।
(1.8). यह इंद्र क्षेत्र से प्रारम्भ होती है। जातक को जीवन में देर (35-50 वर्ष की आयु) से जीवन यापन का योग होगा।
(1.9). यह मस्तिष्क रेखा से प्रारम्भ होती है। जातक का भाग्य 35 वर्ष की आयु में जाग्रत होगा।
(1.10). यह निम्न मंगल से प्रारम्भ होती है। भाग्य देर से उदय होगा और जातक भूमि, शारीरिक परिश्रम, सेना, पुलिस आदि के माध्यम से धन अर्जित करेगा।
(1.11). यह ह्रदय रेखा से प्रारम्भ होती है। जातक को सफलता 50 की उम्र के बाद हासिल होगी। उसके मित्र, सम्बन्धी, जानने वाले सहयोग करेंगे।
(1.12). यह राहु क्षेत्र से प्रारम्भ होती है। जातक परिश्रम से धन लाभ प्राप्त करेगा।
(1.13). यह चंद्र से प्रारम्भ होती है। जातक की खुद की मेहनत उसे आगे बढ़ायेगी। (1.14). यह धर्म क्षेत्र अथवा उच्च मंगल से उदय होती है। जातक की रूचि धर्म-कर्म में होगी।
(1.15). यह बुध पर्वत से प्रारम्भ होती है। जातक अपनी बुद्धि बल से धन अर्जित करेगा।
(1.16). यह सूर्य पर्वत से प्रारम्भ होती है। जातक के प्रशंसनीय कार्य उसकी मदद करेंगे।
(1.17). यह बृहस्पति पर्वत से प्रारम्भ होती है। जातक पर गुरु की कृपा होगी। वह धार्मिक होगा।
अकेली भाग्य रेखा ही भविष्य का निर्धारण नहीं करेगी। यही पर्वत सामान्य या विकसित हैं तो भी वह सफलता अर्जित करेगा। हाथ चौकोर होने पर जातक को प्रशिक्षित कारीगर की तरह सफलता मिलेगी। राहु, निम्न मंगल, जीवन रेखा, केतु से निकली रेखा और मणिबंध से निकली रेख उसे सहयोग देंगी।
हाथ की बनावट यदि लम्बाई लिये हुई तो उसे कला, लेखन में सफलता मिलेगी बशर्ते उसकी मस्तिष्क रेखा चंद्र पर झुकी हो, उँगलियाँ पतली, नोंकदार हों।
गहरी काला रंग लिए हुए रेखा जातक को शरीरिक श्रम के माध्यम से धन कमाने में मदद करेगी। गुलाबी रंग की रेखाएं जातक को मस्तिष्क, बुद्धि के प्रयोग से धनार्जन में सहयोग करेंगी।
अंगूठा दृढ़ और 90 अंश का कोण बनाने पर जातक व्यवहार कुशल और दृढ़ निश्चयी होगा।
पर्वत की सामान्य स्थिति अंगुली के नीचे बाचों बीच होगी। दायें-बायें होने पर पड़ोसी पर्वत का प्रभाव होगा। अंगुली के पास या दूर होने से भी प्रभाव बदल जायेगा। पर्वत बहुत ज्यादा उठा हुआ या दबा हुआ होने पर विपरीत प्रभाव दिखायेगा।
(2.1). भाग्य रेखा केतु क्षेत्र से निकल कर शनि पर्वत पर जा रही है।
(2.2). यह रेखा चंद्र पर्वत से निकलकर मस्तिष्क रेखा के समांतर, मुख्य भाग्य रेखा में जुड़ गई है। जातक का विवाह बहुत अच्छे व्यक्ति से होगा। दोनों मिलकर जीवन को सुचारु रूप से चलायेंगे।
(2.3). मंगल से आने वाली रेखा विपरीत लिंगी से सम्बन्ध के कारण भाग्य में दोष उत्पन्न करेगी। अकसर घर की औरतें अपने पति और बच्चों के मार्ग की बाधा बन जाती हैं।
(2.4). विपरीत लिंगी से सम्बन्ध होगा।
(2.5). कोई आपको पसन्द करने वाला सम्बन्ध बनायेगा और भाग्य दोष भी उत्पन्न करेगा। सम्पत्ति का योग भी होगा।
(2.6). विपरीत लिंगी से सम्बन्ध बनेगा।
(2.5-5). के बीच की रेखा भाग्य रेखा, मश्तिश रेखा, ह्रदय रेखा, सूर्य रेखा को काटकर बुध क्षेत्र में विवाह रेखा की ओर अग्रसर हो रही है। यह हर तरीके से नुकसान पहुँचायेगी। विवाह रेखा को काटने पर सम्बन्ध विच्छेद करा देगी।
(2.3-3). के ऊपर से मंगल से शुरू होकर जाने वाली रेखा भी उपरोक्त प्रभाव दिखायेगी।
(3). यव चिन्ह, काटती हुई रेखाएं परेशानी व्यवधान पैदा करेंगी। वर्ग मुसीवत से बचायेगा। तारा और काटा गुणक चिन्ह जीवन को संकट में डालेगा। गाँधी हिटलर के हाथ में तारे का चिन्ह शनि पर्वत पर था।
शनि के ऊपर पड़ी हुई रेखा परेशानी पैदा करेगी।
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(1.1). यह मणिबन्ध से प्रारम्भ होती है। गहरा काला रंग लिये हुए यह रे...

20/07/2026

अप द्वारा मतीनां प्रत्ना ऋण्वन्ति कारवः। वृष्णो हरस आयवः॥
सोमदेव की स्तुति करने वाले याजक प्राचीन यज्ञ द्वारों को उद्घाटित करते हैं।[ऋग्वेद 9.10.6]
The Ritviz who worship-pray Som Dev, open the ancient Yagy doors.
समीचीनास आसते होतारः सप्तजामयः। पदमेकस्य पिप्रतः॥
सात बन्धुओं के समान सोम के स्थान को पूर्ण करने वाले सात होता यज्ञ कर्मानुष्ठान के लिए यज्ञमण्डप में उपस्थित होते हैं।[ऋग्वेद 9.10.7]
Seven Hotas completing the place of Som, present themselves like seven brothers to perform the Yagy procedurally in the Yagy Mandap.
नाभा नाभिं न आ ददे चक्षुश्चित्सूर्ये सचा। कवेरपत्यमा दुहे॥
नेत्र सूर्य देव पर निर्भर हैं। अपने यज्ञ एवं नाभि के लिए कवि के पुत्ररूप में हम सोम का दोहन करते हैं।[ऋग्वेद 9.10.8]
Eyes are dependent over Sury Dev. We extract Som for our Yagy, for Nabhi-nucleus (navel) like the son of Kavi
अभि प्रिया दिवस्पदमध्वर्युभिर्गुहा हितम्। सूरः पश्यति चक्षसा॥
बलशाली इन्द्र देव अपने नेत्रों से दिव्य लोक में प्रिय और अध्वर्युओं द्वारा हृदयस्थ सोम को (अपने नेत्रों से) देखते हैं।[ऋग्वेद 9.10.9]
Mighty Indr Dev see the Som present in his heart, in the divine abodes with his eyes, through the dear and priests.(06.07.2024)
RIG VED ऋग्वेद (9.1-114)
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20/07/2026

प्रलये भिन्न मर्यादा भवन्ति किल सागरा:।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेSपि न साधव:॥3.6॥
जब प्रलय का समय आता है तो समुद्र भी अपनी मर्यादा छोड़कर किनारों को छोड़ अथवा तोड़ जाते है, लेकिन सज्जन पुरुष प्रलय के समान भयंकर आपत्ति अवं विपत्ति में भी अपनी मर्यादा नहीं बदलते।
A gentleman always maintain his dignity irrespective of all troubles unlike the ocean which crosses its boundaries during vast devastation.
Steadfast (resolute, patient, persevering, calm, stable) and constant (self possessed, solemn grave, serious) person are considered-weighted to be better than the ocean, which forget all limits on the dooms day Ultimate devastation. The saintly, gentle person never forget-cross the limits in spite of hardship (trouble, difficulty).
Tsunamis, storms are quite common in the ocean in spite of its depth. They are synonym to destruction. The ocean takes over at least one centimetre of land under its possession, every year. A number of ancient cities are being discovered-found buried inside the ocean including Dwarka of Bhagwan Shri Krishan. The gentleman remains gentle under all circumstances. Human being should follow the gentle person as an ideal.
One should maintain his cool as and when there arises a difficulty; think and rethink and try to find a solution to it and come out of the trouble. Strike at the very first opportunity and come out of trouble. Leave it to God-destiny only when things go out of control.
#चाणक्य नीति
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20/07/2026

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥110॥
मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही उनका सबसे बड़ा शत्रु होता है। परिश्रम जैसा दूसरा कोई अन्य मित्र नहीं होता, क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दु:खी नहीं होता।
Laziness is the biggest enemy of a person. Labour is the best friend. One who make efforts never become sorry.
Manual labour is meant for the illiterate, ignorant, idiot. An educated, intelligent, prudent, skilled person has millions of avenues open for him.
Physical labour as hobby like gardening grant happiness. One who does digging, maintenance of roads etc. for social benefit is always happy since it grants him solace, tranquillity, peace, bliss.
Exercise, Yog, walking, playing, dancing are too good for both mental & physical health.
Aphorism-Quotes (1) सुभाषितानि
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20/07/2026

कृपणता, कंजूसी किये बगैर औलाद की उचित आवश्यकताएँ पूरी करो। वक्त जरूरत के लिये धन का संचय अवश्य करो, भले ही औलाद आज्ञाकारी, विनम्र हो। ना जाने कब, किस वक्त उसे आड़े वक्त में, पैसे की जरूरत पद जाये। अगर वह कोई नया काम करना चाहता है, उपक्रम लगाना चाहता है, तो पूरी तरह जाँच-पड़ताल करके, अच्छा-बुरा विचार करके उसकी मदद करो। पूत कपूत है तो धन संचय की जरूरत और भी ज्यादा हो जाती है। अपने साथ-साथ उसका भी ख्याल जो रखना है।
Fulfil your children's reasonable needs without being miserly. Save money for emergencies, even if your children are obedient. You never know when they might need financial help.
Meet Needs :- Provide for your children fairly without holding back.
Save for Hard Times :- Always keep money aside for the future. You never know when tough times will come.
Support New Ventures :- If they want to start a new business, help them. First, check all the risks and benefits carefully.
Prepare for the Worst :- If your child is irresponsible, saving money is even more important. You must always be ready to take care of them.
WISDOM सुविचार
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20/07/2026

Emerging feelings can be analysed and controlled by Vivek (discrimination, prudence) and Buddhi (intelligence) with loving understanding and insight, which heal and resolve avoiding harsh criticism or reproaches. Anahat Chakr allows the feelings to be extended infinity, while the Agya Chakr raise them to a higher level of consciousness.
Anhat Chakr can be opened in the spiritual sense, by the realisation of all-embracing divine love, free from the capriciousness of worldly emotions. Parmanand (bliss), experienced by the devotee has Sat (truth, reality) and Chit (consciousness). One is able to perceive inner reality and the beauty of the Self, in the heart, but is unable to maintain this state permanently. In these fleeting moments of bliss one is always conscious and still has not reached goal. However, one should not be disheartened as the day will certainly come when he will be permanently established in the divine Self, then he will not be frightened or hurt.
उभरती हुई भावनाओं का विश्लेषण और नियंत्रण विवेक (सही-गलत की परख) और बुद्धि (सूझ-बूझ) द्वारा प्रेम पूर्ण समझ और अंतर्दृष्टि के साथ किया जा सकता है, जो कठोर आलोचना या उलाहने से बचकर उन्हें ठीक और सुलझा देते हैं। अनाहत चक्र भावनाओं को अनंत तक फैलने की अनुमति देता है, जबकि आज्ञा चक्र उन्हें चेतना के उच्च स्तर तक ले जाता है। सांसारिक भावनाओं की चंचलता से मुक्त, सर्वव्यापी दिव्य प्रेम के एहसास से अनाहत चक्र को आध्यात्मिक अर्थों में खोला जा सकता है। भक्त द्वारा अनुभव किए जाने वाले परमानंद में सत् (सत्य, वास्तविकता) और चित् (चेतना) होते हैं। व्यक्ति हृदय में आंतरिक सत्य और अपनी आत्मा की सुंदरता को देखने में सक्षम होता है, लेकिन इस अवस्था को हमेशा के लिए बनाए रखने में असमर्थ होता है। आनंद के इन क्षणिक पलों में, व्यक्ति हमेशा सचेत रहता है और अभी तक अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाता है। हालाँकि, किसी को निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह दिन निश्चित रूप से आएगा जब वह दिव्य आत्मा में स्थायी रूप से स्थापित हो जाएगा, और तब वह कभी भयभीत या आहत नहीं होगा।
कुण्डलिनी जागरण YOG-योग
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20/07/2026

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌॥1.10॥
हमारी वह सेना पांडवों पर विजय प्राप्त करने में असमर्थ है, क्योकि उसके संरक्षक (उभय पक्षपाती) भीष्म पितामह हैं। भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना हमें जीतने में समर्थ है, क्योंकि इसके संरक्षक भीम हैं।
Achary Dron did not react to the utterances of Duryodhan-maintaining his cool, keeping quite, silence, which engulfed him with the feeling that his army protected and led by Bhishm is insufficient-incapable, since Bhishm is neutral, while Pandavs army can not be won, is beyond measure sufficient to defeat mine, since its headed-led by Bhim, its own commander.
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌ :: द्रोणाचार्य को चुप देखकर दुर्योधन के मन में अन्याय और अधर्म पर चलते हुए विचार आया कि हमारी सेना बड़ी होने पर भी पाण्डवों पर विजय पाने में असमर्थ है, क्योंकि इसमें मतभेद हैं, एकता का अभाव है, उतनी निर्भयता-नि:संकोचता नहीं है, जितनी कि पांडव सेना में है। भीष्म पितामह उभय पक्षपाती हैं, उनके हदय में कृष्ण भक्ति और युधिष्टर की लिए प्यार व सम्मान है। अर्जुन पर बड़ा स्नेह है और वे पाण्डवों का भला चाहते हैं। वे हमारी सेना के सेनापति होकर भी अंदरुनी तौर पर पाण्डवों के साथ हैं। ऐसी दशा में हमारी सेना पांडवों से ज़्यादा समर्थ नहीं हो सकती।
Silence of Dron forced Duryodhan to think of his irreligiosity-unlawfulness. He thought that his army was incapable of winning Pandavs since it lacks coordination, unity, internal freedom and has hesitation as compared to Pandavs army.
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ :: पाण्डवों की यह सेना जीतने में समर्थ है, क्योंकि इसमें मतभेद नहीं हैं, एकमत है, संगठित है, भीम द्वारा रक्षित है। भीमसेन बचपन से ही दुर्योधन को हराते आ रहे थे, वो उसे उसके 100 भाइयों के साथ मारने की प्रतिज्ञा कर चुका थे और उसके जहर पिलाने पर भी जिन्दा रहे, उनमें 10,000 हाथियों का बल है और शरीर वज्र के समान है। दुर्योधन बचपन से ही भीम के बल और पराक्रम से भयभीत रहता था। इसलिए उसने कहा कि पांडव सेना भीम से रक्षित है।
The army of Pandav's is capable of winning, as it has no differences, united and protected by Bhim Sen. Bhim Sen had been defeating Duryodhan from childhood and was under oath to kill-eliminate his 100 brothers (including him) and survived even after being poisoned by him. He had the strength-potential of 10,000 elephants and his body was as strong as Vajr. Duryodhan was afraid of Bhim Sen's might-power and suffered from inferiority complex. Therefore, he thought that Pandavs army was safe-protected under him.
Duryodhan was aware of his weaknesses and the sin he was involved in-committing. His commandeers too knew that they were fighting against divine entities supported by the God himself. They were fighting a already lost battle. They knew that they could not win. Their moral were low.
SHRIMAD BHAGWAD GEETA (1) GLOOM-SADNESS
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चिंता-परेशानी और समाधान   Video linkhttps://youtu.be/Vbn0ahRI6HE LL मंगल क्षेत्र से उत्पन्न होकर जीवन रेखा को काटने वाली...
19/07/2026

चिंता-परेशानी और समाधान
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https://youtu.be/Vbn0ahRI6HE
LL मंगल क्षेत्र से उत्पन्न होकर जीवन रेखा को काटने वाली रेखाएँ शारीरिक परेशानियाँ पैदा करती हैं। आगे बढ़कर भाग्य रेखा को काटने पर यही रेखाएँ काम-धंधे में रुकावट करती हैं। इन रेखाओं का कारण परिवार की महिलाएं अथवा मित्र-सम्बन्धी स्त्रियाँ हो सकती हैं।
MM ये रेखाएँ बुध-स्वास्थ्य रेखा को काटती हैं। इनकी वज़ह से जातक शारीरिक थकान, बीमारी अनुभव कर सकता है। स्वास्थ्य रेखा पर द्वीप यह समस्या जटिल कर सकता है।
HH मस्तिष्क रेखा को काटने वाली ये रेखा मानसिक व्यवधान, परेशानी, फिक्र को दर्शाती है।
SS मंगल से उत्पन्न यह रेखाएँ जातक को बदनामी दिला सकती हैं।
PP शुक्र पर्वत से शुरू होकर जीवन रेखा को काटने वाली रेखाएँ स्वास्थ्य के साथ-साथ धन-संपत्ति को लेकर उत्पन्न हुई फिक्र को दर्शाती हैं। ये रेखाएँ उन विपरीत लिंग वालों को भी दर्शाती हैं जिन्हें जातक में रूचि है।
TT ये रेखाएँ शुक्र से या जीवन रेखा से निकल कर यदि यात्रा रेखाओं को काटें तो यात्रा सम्बन्धी परेशानियों को प्रकट करती हैं।
1-1 राहु क्षेत्र से निकल कर यह रेखा यदि मस्तिष्क रेखा को काटती है, तो मानसिक परेशानी पैदा करेगी।
2-2 राहु क्षेत्र से निकल कर यदि ये रेखा हृदय रेखा को काटे मित्र, परिवार वालों के बीच दरार पैदा कर सकती है।
3-3 राहु क्षेत्र से निकलकर सूर्य रेखा को काटने वाली यह रेखा बदनामी, आर्थिक हानि जैसी चिंताएं दर्शाती है।
4-4 भाग्य रेखा को काटने पर राहु क्षेत्र की रेखा व्यवसाय, नौकरी आदि में उत्पन्न विपरीत परिस्थिति को दिखाती है।
5-5 ये रेखा राहु द्वारा स्वास्थ्य रेखा को काटने पर स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को दर्शाती है।
1-1 दूसरे लोगों द्वारा विघ्न पैदा किया जा सकता है।
2-2 शारीरिक कमजोरी-अक्षमता परेशानी का कारण बन सकती है।
3-3 पौरुष, बच्चे पैदा करने में असमर्थता, इसका कारण हो सकता है।
ये सभी रेखाएं प्रभाव रेखाओं के रूप में काम करती हैं। अतः जातक को अपनी कमजोरी को पहचान कर उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
चिंता फिक्र WORRY-CONCERN :: व्यथित या विचलित करने वाली कोई भावना, फ़िक्र, परेशानी, डर, अंदेशा, भय, ध्यान, ख़याल, सोच चिंता का कारण बन सकती है।
आत्म निरीक्षण-चिन्तन करें।
कहाँ कमी हुई, गलती हुई, क्या कमी रह गई, क्या साधन सही थे? क्या साधनों के इस्तेमाल की विधि सही थी?
क्या कार्य योजना और कार्यान्वयन सही थे?
क्या कर्मचारी, सहयोगी अनुभवी, योग्य, कार्य कुशल थे?
क्या परस्पर सहयोग की भावना थी?
क्या पूंजी की समुचित, उपयुक्त व्यवस्था थी?
क्या आपका उद्यम सरकारी नीतियों, कानून, व्यवस्था और सामाजिकता के अनुकूल है।
यदि ऋण लिया था क्या उसका भुगतान सही तरीके से करने की व्यवस्था थी? क्या ऋण के भुगतान के स्तोत्रों का सही आकलन किया गया था?
कहीं पूँजी का अपव्यय तो नहीं हुआ?
क्या आपको सम्बंधित विषय का पर्याप्त अनुभव था ?
क्या आप अपने उद्यम में भाग्य को महत्व देते हैं?
क्या आपकी शारीरिक और मानसिक अवस्था सही-उपयुक्त थी?
क्या अन्य समस्याएं आपको प्रभावित कर रही थीं?
क्या संचार-communication की समुचित व्यवस्था थी?
नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रहकर करो। यह जन्म हुआ किस अर्थ हुआ सोचो-समझो कुछ व्यर्थ न हो।
ईश्वर ने हाथ-पैर दिमाँग दिया है।
अपने भविष्य का अनुसन्धान करो।
चिंतामणि मंत्र सिद्धि ::
काव्येऽयं व्यगलन्नलस्य चरिते सर्गो निसर्गाज्ज्वलः। द्विधाभूतं रूपं भगवदभिधेयं भवति यत्। ⁠निराकारं शश्वज्जप नरपते!
ऊँ नमो भगवते विश्व चिन्तामणि लाभ दे जयदे जशदे जयदे आनय महेसरि मनवांछितार्थ पूरय-पूरय सर्व सिद्धि रिद्धि वृद्धि सर्वजन वश्यं कुरू कुरू स्वाहा।
विधि :- इस चिन्तामणि मंत्र को नित्य प्रभात-संध्या में जपें, धूप खेवें तो सर्व सिद्धि होगी।
तस्य द्वादश एष मातृचरणाम्भोजालिमौजेर्महा काव्येऽयं व्यगलन्नलस्य चरिते सर्गो निसर्गाज्ज्वलः। अवामा वामार्द्धे सकलमुभयाकारघटनाद् ⁠द्विधाभूतं रूपं भगवदभिधेयं भवति यत्। तदन्तर्मन मे स्मर हरमयं सेन्दुममलं ⁠निराकारं शश्वज्जप नरपते! सिध्यतु स ते।
[सर्ग 14.85]
इस श्लोक से प्रथम मंत्र मूर्ति भगवान् अर्द्धनारीश्वर की उपासना का अर्थ निकलता है; फिर, हल्ले खात्मक चिंतामणि मंत्र सिद्ध होता है; तदनंतर चिंतामणि-मंत्र के यंत्र का स्वरूप भी इसी से व्यक्त होता है।
चिंतामणि-मंत्र का स्वरुप ::
सर्वांगीणरसामृतस्तिमितया वाचा स वाचस्पतिः
⁠स स्वर्गीयमृगीदृशामपि वशीकाराय मारायते ;
यस्मै यः स्पृहयत्यनेन स तदेवाप्नोति, किं भूयसा ?
⁠येनायं हृदये कृतः सुकृतिना मन्मन्त्रचिन्तामणिः।
[सर्ग 14.86]
जो पुण्यवान पुरुष मेरे इस चिंतामणि मंत्र को हृदय में धारण करता है, वह शृंगारादि समस्त रसों से परिलु त अत्यंत सरस, वाग्वैदग्ध्य को प्राप्तकर के बृहस्पति के समान विद्वान हो जाता है; वह स्वर्गीय संदरी जनों को भी वश करने के लिये कामवत् सौंदर्यवान् दिखाई देने लगता है। अधिक कहने की कोई आवश्यकता नहीं; जिस वस्तु को जिस समय वह इच्छा करता है, उसके मिलने में किंचिन्मात्र भी देरी नहीं लगती।
पुष्पैरभ्यच्य गंधादिभिरपि सुभगैश्चारुहंसेन मां चे निर्यान्ती मन्त्रमूर्ति जति माय मति न्यस्य मय्येव भक्तः; सम्प्राप्ते वरसरान्ते शिरसि करमसौ यस्य कस्यापि धत्ते सोऽपि श्लोकानकाण्डे रचयति रुचिरान कौतुकं दृश्यमस्य।
[सर्ग 14.87]
सुंदर हंस के ऊपर गमन करनेवाली मंत्र मूर्ति मेरा पूजन, उत्तमोत्तम पुष्प-गंधादि से, करके और अच्छी तरह मुझ में मन लगाकर जो मनुष्य मेरे मंत्र का जप करता है, उसकी तो कोई बात ही नही; एक वर्ष के अनंतर वह और जिस किसी के ऊपर अपना हाथ रख देता है, वह भी सहसा सैकड़ों हृदय हारी श्लोक बनाने लगता है। मेरे इस मंत्र का कौतुक देखने योग्य है।
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19/07/2026

ऋग्वेद संहिता, नवम मण्डल सूक्त (10) :: ऋषि :- असित, कश्यप या देवल; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- गायत्री।
प्र स्वानासो रथाइवार्वन्तो न श्रवस्यवः। सोमासो राये अक्रमुः॥
जिस सोमरस को अश्वों एवं रथों के समान वेगपूर्वक शोधित किया गया है, वह सोमरस हमें धन-सम्पदा और वैभव प्रदान करें।[ऋग्वेद 9.10.1]
Let the Somras which has been extracted speedily like the horses and charoites, grant us wealth and grandeur.
हिन्वानासो रथाइव दधन्विरे गभस्त्योः। भरासः कारिणामिव॥
यज्ञ की ओर रथ के सदृश जाने वाले सोमरस को शोधित किया जा रहा है। भारवाहक द्वारा दोनों हाथों में उठाए भार के समान याजकगण सोमरस को धारण करते हैं।[ऋग्वेद 9.10.2]
Somras which moves like the charoites towards the Yagy is extracted. Ritviz establish Somras like the loaders who carry it in their raised hands.
राजानो न प्रशस्तिभिः सोमासो गोभिरञ्जते। यज्ञो न सप्त धातृभिः॥
यज्ञ की प्रतिष्ठा जिस प्रकार राजा और याजकों द्वारा होती है, उसी प्रकार गौ-घृतादि से यह सोम शोधित होता है।[ऋग्वेद 9.10.3]
The way Yagy is glorified by the kings and Ritviz, Somras is purified with the cows Ghee.
परि सुवानास इन्दवो मदाय बर्हणा गिरा। सुता अर्षन्ति धारया॥
अमृत के समान मधुर, ज्ञानर्धक सोमरस निचोड़े जाने के उपरान्त साधकों के द्वारा स्तुतिगान करते हुए छाना जाता है।[ऋग्वेद 9.10.4]
Intelligence boosting Somras as sweet as the nectar-elixir, is filtered after being squeezed by the devotees reciting prayers.
आपानासो विवस्वतो जनन्त उषसो भगम्। सूरा अण्वं वि तन्वते॥
उषाकाल का वह समय बहुत ही भाग्यशाली होता है, जब इन्द्र देव के पान के लिए सोमरस शब्द करता हुआ नीचे आता है।[ऋग्वेद 9.10.5]
The time span of Usha Kal-dawn is very fortunate when Somras flows down making sound to be drunk by Indr Dev.
RIG VED ऋग्वेद (9.1-114)
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19/07/2026

एतदर्थ कुलीनानां न्रपा: कुर्वन्ति संग्रहम्।
आदिमध्याSवसानेषु न त्यजन्ति च ते न्रपम्॥3.5॥
राजा लोग अपने आस पास अच्छे कुल के लोगों को इसलिए रखते हैं, क्योंकि ऐसे लोग ना आरम्भ में, ना बीच में और ना ही अंत में साथ छोड़कर जाते हैं।
The king normally keep those people around him who are from established noble clan-families since they seldom ditch the royalty.
When people like Xi Jinping-a brick cline worker, Putin-a spy & taxi driver, Sonia-bar waiter, Khadge-a labourer rise to the higher echelons of power they torture the public.
As a policy matter, the imperial-royalty appoint the nobles (respected, honourable) people to the government services (jobs, high positions); because they seldom desert-ditch the king due to their high cultural, moral, ethical values (family trends, education, inclination).
In today scenario the MLA, MP, Councillors are generally from low status-origin families, uneducated and possess a dirty tag-image of a criminal. No ethics, values, morals, culture. Highly educated, talented officers from noble clan are made to obey-serve them.
People from noble-respected, revered, honoured find the prosperity-progress of the nation-country as their own. They remain loyal under the difficult situations as well. Their lives are devoted to the emperor-state.
It has been observes that the king appoints the decedents-progeny of the out going ministers-counsels in their place. Such people are groomed-trained for the coveted jobs from the very beginning. Their family environment, also makes the learning easier. Their support is pledged for the king. They are educated, prudent, skilled and loyal.
Democracy provides opportunities to each and every one to rise to the highest echelons of government. The results are obvious. In the first place the ministers-bureaucrats themselves are corrupt. Their allegiance, devotion, support to the country is doubtful. If they happen to be from some other country, its only the God who can protect the country like Sonia & Rahul. They generate black money and deposit it tax heavens, abroad. The police, intelligence wings, secret services are manoeuvred by them, so as to protect them selves. Millions are spent over their security-rehabilitation, for no use to the common man-civilians. Even the hardened criminals who committed heinous crimes are finding berths, seats, place, positions in the parliament.
Those who are rising to higher positions without calibre on the strength of reservations have proved that they involve themselves in corruption be a President, Vice President, chief minister, president of a political party, justice of Supreme Court or of a High Court. Maya, Lalu, Khadge, Mulayam-Akhilesh, Raja, Kanimozhi, Stalin etc. The list is too long.
Today, richest person, PM, President are from low origin. How can one expect moral, ethics, virtues from them?!
#चाणक्य नीति
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PtSantoshBhardwaj

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