07/07/2026
*सेवा ही सच्चा दान, शिक्षा ही श्रेष्ठ निवेश*
"दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥"
— श्रीमद्भगवद्गीता 17.20
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो दान बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, उचित समय, उचित स्थान और योग्य पात्र को केवल कर्तव्य मानकर दिया जाता है, वही सात्त्विक दान है।
हाल ही में एक 11 वर्षीय बालिका सड़क किनारे आम बेच रही थी। उसका उद्देश्य अपने परिवार का पालन-पोषण भर नहीं था; वह ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मोबाइल खरीदना चाहती थी। उसकी लगन और शिक्षा के प्रति समर्पण ने एक संवेदनशील उद्योगपति का हृदय स्पर्श किया। उन्होंने केवल मोबाइल ही नहीं दिलाया, बल्कि उसकी आगे की शिक्षा का संपूर्ण उत्तरदायित्व भी स्वीकार किया।
यही भारतीय संस्कृति का संदेश है—सेवा, संवेदना और संस्कार।
हमारे आसपास भी अनेक प्रतिभाशाली बच्चे हैं जो केवल संसाधनों के अभाव में अपने सपनों को साकार नहीं कर पाते। किसी को पुस्तक चाहिए, किसी को विद्यालय की फीस, किसी को मोबाइल, किसी को लैपटॉप, तो किसी को छात्रवृत्ति।
यदि ईश्वर ने हमें सामर्थ्य दिया है, तो उस सामर्थ्य का सर्वोत्तम उपयोग किसी योग्य बालक या बालिका के जीवन में आशा का दीप जलाना है। शिक्षा पर किया गया प्रत्येक सहयोग राष्ट्र की भावी शक्ति का निर्माण करता है।
भगवान श्रीकृष्ण आगे कहते हैं—
"अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥"
— श्रीमद्भगवद्गीता 17.22
अर्थात् जो दान अनुचित समय, अयोग्य पात्र को या तिरस्कारपूर्वक दिया जाता है, वह तामसिक दान है।
भारतीय परंपरा में दान का उद्देश्य केवल वस्तु देना नहीं, बल्कि जीवन बनाना है। अन्नदान जीवन बचाता है, रक्तदान जीवन देता है, किंतु विद्यादान जीवन के साथ-साथ भविष्य भी गढ़ता है।
आइए, संकल्प लें—
यदि हम किसी एक बच्चे की शिक्षा का दायित्व उठा सकें, तो यह केवल एक व्यक्ति की सहायता नहीं होगी; यह एक परिवार, समाज और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य में हमारा योगदान होगा।
"नर सेवा ही नारायण सेवा है।"
"विद्यादान महादान है।"