History of Mewat with Altaf Hussain

History of Mewat with Altaf Hussain History of Mewat with Dr. Altaf Hussain
Preserving Mewat’s Past. Inspiring Its Future.
मेवात की तवारीख़, मेवात की ज़ुबानी।
Mewat! Meo! Mewati! History! Mewati !

Culture! Oral History! Folk history!

05/09/2026

🌿 कच्चा नीम की निंबोळी… सावण का दिन आयो… 🌿

वो भी क्या ज़माना था…
जब नई-नई ब्याही बेटी के लिए पहलो सावण मायके में बिताना सबसे बड़ी खुशी हुआ करता था। ❤️

बेटी जब ससुराल जाती थी, तो मन में एक ही चिंता रहती थी—
“कहीं ब्याह दूर हो गया तो सावण में बाबल के घर कैसे आऊँगी?”

वह बाबल से कहती—

कच्चा नीम की निंबोळी, सावण का दिन आयो,
बाबल दूर मत दीजो, म्हाने कौंण बुलायो?

बाबल बेटी को दिलासा देता—

बेटी, मोटर की सवारी,
तोहे झट्ट बुला लूंगो।

फिर बेटी माई से कहती—

कच्चा नीम की निंबोळी, सावण का दिन आयो,
माई दूर मत दीजो, म्हाने कौंण बुलायो?

माई कहती—

बेटी, तेरे भाई तो भुतेरे,
तोहे झट्ट बुला लूंगी।

और जब भाई की बारी आती, तो बेटी फिर कहती—

कच्चा नीम की निंबोळी, सावण का दिन आयो,
भाई दूर मत दीजो, म्हाने कौंण बुलायो?

भाई कहता—

बाहण, रेल की सवारी,
तोहे झट्ट बुला लूंगो। ❤️

आज ये पंक्तियाँ सुनने में सिर्फ़ एक लोकगीत लगती हैं,
लेकिन उस दौर के मेवात की बेटियों की पूरी दुनिया इनमें बसती थी।

वो कच्चा नीम…
वो सावण…
वो बाबल का आँगन…
माई की ममता…
और भाई का इंतज़ार…

वक़्त बदल गयो, सावण बदल गयो,
लेकिन मायके को तरसती बेटी की आँखों का इंतज़ार आज भी वही है। 🥹💔

ये सिर्फ़ गीत नहीं…
मेवात की बेटियों की बीती हुई ज़िंदगी की एक मीठी याद है। 🌿❤️

#मेवाती #मेवात #मेवाती_लोकगीत #पुराना_मेवात #सावण #मायका #बेटी

04/09/2026

आज महेंद्रगढ़ ज़िले की नारनौल तहसील में कांटी गाँव मौजूद है। यह मेव समुदाय का एक पुराना गाँव माना जाता है। बुज़ुर्गों के मुताबिक़, इस गाँव को लगभग साढ़े सात सौ साल पहले राणा बशेसर मेवाती ने बसाया था। उसी दौर में यहाँ कनैहरी क़िला बनवाया गया और गाँव का नाम कनैहरी रखा गया।

यह मेवात की पुरानी तारीख़ और मेवों की विरासत से जुड़ी एक अहम कहानी है। ऐसी ही ऐतिहासिक जानकारी के लिए Like, Share और Comment करें।
अगर आपके पास कांटी गाँव या कनैहरी क़िले के बारे में कोई पुरानी जानकारी है, तो Comment में ज़रूर बताएं।
❤️🥀💫🤟

03/09/2026

मेवाती जुबान में हज़ारों कहावतें और डाईलोक हैं। ये हमारी बोली, तहज़ीब और पुरखों की याद का हिस्सा हैं। पहले ज़माने में लोग बातचीत के दौरान इनका खूब इस्तेमाल करते थे। आज भी मेवात के बुज़ुर्गों और गाँव-देहात की रोज़मर्रा की बातचीत में ऐसे बहुत से डाईलोक सुनने को मिल जाते हैं।

मेवाती डाईलोक की अपनी एक अलग मिठास है। इनमें देसी अंदाज़, हाज़िरजवाबी, तजुर्बा और मेवात की मिट्टी की खुशबू महसूस होती है।

कुछ मेवाती कहावतें / डाईलोक
आंधी के आगे भबूला की ना चले।
ओछी लडे, उधार मांगे।
ऐसे खड़ो है जैसे बिगड़ा ब्याह में नाई।
अपनी छाछ है, कौन खट्टी बतावे है।
ओछो करज कंगाल को ओडी में दुख देय।
अपनी दाड़ी दूसरा का हाथ में देनी।
अभी चरती-चरती देखी हां, मरती ना देखी।
एक चुप सौ ने हरावे।
जाकी कोठी में दो दाणा, वाका बावला भी स्याणा।
इ तो पानी में आग लगातो डोले।
इ कीकर को खूंट है, सदा दुख देएगो।
कुले और जले मिलते देर ना लगे।
कुल्हायडी को घाव भर जाय, बातन को घाव ना भरे।
मियां जी की दाड़ी तो स्वाबी-स्वाब में चली जाएगी।
गोडा तो पेट कु ही नमा।
घर की मुर्गी दाल बराबर।
टटला के सिर नाई कहा मांगे।
चीलन का घूंसला में मांस ढूंडरो हा।
चना के गेल घुण पिसे।
जाकी कोठी में दो दाणा, वाका बावला भी स्याणा।
जाकी बंधगी साक, वाकी कहा करे पोसाक।

मेवात की पहचान सिर्फ़ उसके गाँव, खेत, चौपाल और इतिहास में नहीं, बल्कि उसकी बोली में भी ज़िंदा है। हमारी कहावतें और डाईलोक हमारी उन पीढ़ियों की आवाज़ हैं, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी के तजुर्बे को छोटी-छोटी बातों में सहेजकर हमारे लिए छोड़ दिया।

आज जब बोलचाल का अंदाज़ तेज़ी से बदल रहा है, तो इन पुरानी कहावतों को लिखना, सुनना, बोलना और अगली नस्ल तक पहुँचाना और भी ज़रूरी हो गया है।

आख़िर में एक बात…जो बोली भूल गया, वो अपनी जड़ भूल गया! मेवाती कहावतें सिर्फ़ कहावतें नहीं, मेवात की ज़ुबान में ज़िंदा हमारी विरासत हैं।

आपने भी अपने बुज़ुर्गों से कोई मेवाती कहावत या डाईलोक सुना हो तो कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें। आपकी एक कहावत किसी भूली हुई आवाज़ को फिर से ज़िंदा कर सकती है।

मेवाती बोलो, मेवाती लिखो और मेवाती विरासत को आगे बढ़ाओ। ❤️

02/09/2026

क्या एक गांव की रवायत, एक पुराना शिलालेख और फ़ारसी इतिहास की एक पंक्ति—मेवात की 700 साल पुरानी कहानी की कड़ियां जोड़ सकते हैं?

कहानी शुरू होती है कांटी से। बुज़ुर्गों की रवायत के मुताबिक, करीब साढ़े सात सौ साल पहले राणा बशेसर ने इसे बसाया, जिसका पुराना नाम कनैहरी बताया जाता है। पुराने विवरणों में कांटी को मेव गांव के रूप में दर्ज किया गया है।

फिर पहुंचते हैं नारनौल के पीर तुर्कमान पर। हरियाणा पुरातत्व विभाग के विवरण में 760 हिजरी/1357 ई. में Alam ख़ाँ मेवाती द्वारा परिसर के एक हिस्से के निर्माण का उल्लेख मिलता है। यानी 14वीं सदी में नारनौल की इस ऐतिहासिक इमारत पर मेवाती उपस्थिति का एक ठोस प्रमाण मिलता है।

1411 ई. में फ़ारसी इतिहास-स्रोत हमें बताते हैं कि नारनौल इक़लीम ख़ाँ और बहादुर नाहर के अधिकार में था। 1411–12 ई. के फ़ारसी विवरण याह्या बिन अहमद सिरहिंदी की तारीख़-ए-मुबारकशाही हमें बहादुर नाहर के परिवार, उनके उत्तराधिकारियों और मेवात की बदलती राजनीतिक स्थिति की अगली कड़ियों तक ले जाते हैं।

अब इन कड़ियों को एक साथ देखिए—कांटी की मेव बस्ती → 1357 का Alam ख़ाँ मेवाती → पीर तुर्कमान Tomb → 1411 का बहादुर नाहर और इक़लीम ख़ाँ।

क्या ये महज़ अलग-अलग घटनाएं हैं? या नारनौल और आसपास के इलाके में सदियों पुरानी मेवाती मौजूदगी और राजनीतिक प्रभाव की एक बड़ी कहानी की कड़ियां हैं?

मेवाती तवारीख़ का सफ़र यहीं से शुरू होता है—गांवों की रवायत से, शिलालेखों से और फ़ारसी तारीख़ों से अपनी भूली हुई कहानी तलाशने का सफ़र।

31/08/2026

मेवात सिर्फ़ एक इलाका नहीं… एक एहसास है, एक पहचान है, एक तारीख़ है। ❤️

अल्लाह ने मेवात को कुदरत की ऐसी खूबसूरती से नवाज़ा है—हरे-भरे खेत, काला पहाड़, खुला आसमान और सुकून देने वाली ये वादियाँ… 🌾⛰️ और इस मिट्टी ने सदियों से बहादुर, जाँबाज़ और हिम्मत वाले लोग पैदा किए हैं। हमारी तारीख़ इसकी गवाह है।

लेकिन आज हमें एक बात याद रखने की ज़रूरत है—मेवात की ज़मीन सिर्फ़ ज़मीन नहीं है। यही हमारी जड़ है, यही हमारी पहचान है। अगर ज़मीन हाथ से निकलती गई, तो आने वाली नस्लें सिर्फ़ अपनी ज़मीन ही नहीं खोएँगी…अपनी पहचान और अपनी विरासत से भी दूर होती जाएँगी।

इसलिए मेवात को बचाने का मतलब सिर्फ़ ज़मीन बचाना नहीं—भाईचारा बचाना है, तालीम बढ़ाना है, मेहनत करना है और अपनी आने वाली नस्लों का मुस्तक़बिल बेहतर बनाना है। ❤️

आपस में लड़ना नहीं, एक-दूसरे का सहारा बनना है।बच्चों को पढ़ाना है मेहनत करनी है।हुनर सीखना है। और मेवात को खुशहाल बनाना है।

फिर देखना…मेवात की खूबसूरती सिर्फ़ इन खेतों और पहाड़ों में नहीं, इसके लोगों की तरक़्क़ी और खुशहाली में भी दिखाई देगी। 🌿❤️

🤲 ज़मीन बचाओ | भाईचारा बचाओ | तालीम बढ़ाओ | मेवात सजाओ
मेवात हमारी मिट्टी है।
मेवात हमारी पहचान है।
मेवात हमारी विरासत है। ❤️
Mewat long live❤️
History of Mewat with Altaf Hussain

30/08/2026

मथुरा और मेवात — इतिहास की एक भूली हुई कड़ी

क्या आप जानते हैं… मथुरा का इतिहास सिर्फ श्रीकृष्ण, ब्रज और प्राचीन मंदिरों तक सीमित नहीं है? मथुरा का इतिहास मेवात और मेवातियों के इतिहास से भी एक अहम रिश्ता रखता है।

प्राचीन समय में मथुरा शूरसेन जनपद की राजधानी थी। यमुना के किनारे बसी मथुरा सदियों से राजनीति, व्यापार और मज़हब का एक बड़ा मरकज़ रही है। आगे चलकर यही इलाका ब्रज के नाम से मशहूर हुआ।

लेकिन अब ज़रा इतिहास के उस दौर में चलते हैं, जिसके बारे में शायद बहुत कम लोगों ने सुना है।

⚔️ 11वीं सदी की मथुरा

11वीं सदी की शुरुआत में उत्तर भारत की सियासत तेजी से बदल रही थी। इसी दौर में महमूद गजनवी ने 1018–19 ईस्वी में मथुरा पर हमला किया। मथुरा के पुराने ऐतिहासिक विवरण में इस दौर के बारे में एक बहुत अहम बात लिखी मिलती है कि:

“The District … was largely held by Mewatis.”

यानी उस दौर में मथुरा का इलाका काफी हद तक मेवातियों के क़ब्ज़े या इख़्तियार में था। ज़रा सोचिए… आज हम मेवात का नाम लेते हैं तो हमारे ज़हन में नूंह, अलवर और भरतपुर का इलाका आता है। लेकिन इतिहास के पन्ने बताते हैं कि मेवातियों की मौजूदगी और असर मथुरा और ब्रज तक भी था। और यही बात इस इतिहास को और दिलचस्प बना देती है।

महमूद गजनवी के मथुरा पर हमले के समय मथुरा के इलाके में मेवातियों की मौजूदगी और इख़्तियार का यह उल्लेख, हमारे लिए एक अहम ऐतिहासिक सुराग है। लेकिन सवाल अभी बाकी हैं—

ये मेवाती यहाँ कब से थे?
मथुरा और आसपास के इलाकों में उनका असर कितना था?
मेवात और ब्रज के बीच क्या रिश्ते थे?
और सबसे बड़ा सवाल—

हमारे इतिहास के ऐसे कितने पन्ने अभी सामने आना बाकी हैं शायद मेवात का इतिहास हमारी सोच से कहीं ज्यादा पुराना, वसीअ और दिलचस्प है।

इसलिए हमें अपने इतिहास को सिर्फ सुनी-सुनाई बातों से नहीं, बल्कि पुराने दस्तावेज़ों, गजेटियर, किताबों और ऐतिहासिक स्रोतों से समझना होगा।

मेवात के लोगों से मेरी एक गुज़ारिश है—अपने इतिहास को जानिए, अपने बच्चों को बताइए और ऐसी जानकारी को आगे पहुँचाइए। अगर आप मेवात के भूले-बिसरे इतिहास, हमारे बुज़ुर्गों, बहादुरों, इलाकों और हमारी तहज़ीबी विरासत के बारे में जानना चाहते हैं, तो इस पेज को Follow कीजिए और इस वीडियो को अपने लोगों तक Share कीजिए।

क्योंकि जिस क़ौम को अपने इतिहास का इल्म होता है, वह अपने मुस्तकबिल को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकती है।

मेवात का इतिहास अभी बाकी है…
और हम मिलकर उसके पन्ने तलाशेंगे । ❤️
जय मेवात |

28/08/2026

मेवाती कहावतें/डाईलोक

मेवाती जुबान में हज़ारों कहावतें और डाईलोक हैं। ये सिर्फ़ बोलने की बातें नहीं हैं, बल्कि इनमें हमारे बुज़ुर्गों का तजुर्बा, समझ और देसी अंदाज़ छुपा हुआ है।

पहले ज़माने में लोग बातचीत के दौरान इनका खूब इस्तेमाल करते थे। आज भी मेवात में कई बुज़ुर्ग और लोग अपनी रोज़मर्रा की बातों में ये पुराने डाईलोक बोलते हैं।

कुछ मेवाती कहावतें और डाईलोक—

“आंधी के आगे भबूला की ना चले।”
“ओछी लडे, उधार मांगे।”
“ऐसे खड़ो है जैसे बिगड़ा ब्याह में नाई।”
“अपनी छाछ है, कौन खट्टी बतावे है।”
“ओछो करज कंगाल को ओडी में दुख देय।”
“अपनी दाड़ी दूसरा का हाथ में देनी।”
“अभी चरती-चरती देखी हां, मरती ना देखी।”
“एक चुप सौ ने हरावे।”
“जाकी कोठी में दो दाणा, वाका बावला भी स्याणा।”

इन डाईलोक में मेवात की मिट्टी, हमारी बोली और पुरखों की याद बसी हुई है। आज ज़रूरत है कि हम इन्हें सिर्फ़ सुनें नहीं, बल्कि महफ़ूज़ भी करें और अगली नस्ल तक पहुँचाएँ।

आपने भी कोई मेवाती कहावत या डाईलोक सुना हो तो कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।
हो सकता है आपकी एक कहावत किसी भूली हुई लोक-परंपरा को फिर से ज़िंदा कर दे।

27/08/2026

मेवात का असली ख़ज़ाना ज़मीन के नीचे नहीं है… 🏚️

हमारे पुराने किले, बैठकें, मक़बरे, कब्रें और ऐतिहासिक निशानियाँ किसी छिपे हुए ख़ज़ाने की तलाश के लिए नहीं, बल्कि हमारी तारीख़, पहचान और विरासत को समझने के लिए हैं।

आज कई ऐतिहासिक जगहें “ख़ज़ाना” खोजने की लालच में खोदी और बर्बाद की जा रही हैं। याद रखिए—सोना मिल भी गया तो एक दिन ख़त्म हो जाएगा, लेकिन इतिहास की एक निशानी मिट गई तो वापस नहीं आएगी।

मेवात के इन पत्थरों में हमारे बुज़ुर्गों की बहादुरी, संघर्ष, स्वाभिमान और कहानी छुपी है।

कब्रों में ख़ज़ाना मत खोजो…
मक़बरों को मत खोदो…
किलों और पुरानी बैठकों को मत तोड़ो।

अपने इतिहास को बचाइए।
क्योंकि—

मेवात का असली ख़ज़ाना सोना नहीं, हमारी विरासत है। ❤️

अगर आप भी चाहते हैं कि मेवात की ऐतिहासिक धरोहर बची रहे, तो इस वीडियो को शेयर करें और अपनी आवाज़ उठाएँ।

#मेवात_का_इतिहास

26/08/2026

“इत दिल्ली, उत आगरो, अलवर और बैराठ,
कालो पहाड़ सुहावणो, जाके बीच बसे मेवात।
नू तो सारी जात ही, बसां एक ही साथ,
मेव घणी तादाद में, नू बाजे मेवात॥”

इन पंक्तियों में मेवात की सरज़मीं, उसकी पहचान और सदियों पुरानी सामाजिक रिवायत की झलक मिलती है।
दिल्ली, आगरा, अलवर और बैराठ के दरमियान बसा यह इलाका—जहाँ काला पहाड़ सिर्फ़ पहाड़ नहीं, बल्कि मेवात की ज़िंदगी, रोज़गार और यादों का हिस्सा रहा है।

मेवात की ख़ूबसूरती उसकी मिट्टी, पहाड़, लोक-संस्कृति और यहाँ साथ बसने वाली मुख़्तलिफ़ बिरादरियों में है।

मेवात—एक सरज़मीं, एक रवायत, एक पहचान। ❤️🌿

#मेवात #मेव #मेवाती KalaPahad मेवातकीपहचान मेवातकीरिवायत

1857: जब मेवात के कबीर खान मेवाती ने हांसी में संभाली बगावत की कमानआज हम आपको मेवात के एक ऐसे भूले-बिसरे और अनसुने नाम स...
26/08/2026

1857: जब मेवात के कबीर खान मेवाती ने हांसी में संभाली बगावत की कमान

आज हम आपको मेवात के एक ऐसे भूले-बिसरे और अनसुने नाम से रूबरू करा रहे हैं, जिसकी कहानी मेवात की सीमाओं से निकलकर 1857 के विद्रोह की हांसी की घटनाओं तक पहुँचती है—जमादार कबीर खान मेवाती।

1857 की क्रांति को अक्सर मेरठ, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ और झाँसी के प्रसिद्ध घटनाक्रमों के माध्यम से याद किया जाता है। लेकिन 1857 का इतिहास केवल बड़े शहरों और प्रसिद्ध नेताओं का इतिहास नहीं था। यह उन सैनिकों, गाँवों, स्थानीय जमींदारों और आम लोगों का भी इतिहास था, जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन को चुनौती दी। इसी व्यापक विद्रोह में मेवाती सैनिकों की भूमिका का एक महत्वपूर्ण उल्लेख हमें हांसी की घटनाओं में मिलता है।

30 मई 1857 — हांसी में कबीर खान की कमान

ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, 30 मई 1857 को जमादार कबीर खान मेवाती ने हांसी में विद्रोही मेवाती सिपाहियों की कमान संभाली। कबीर खान कोई साधारण या नया सैनिक नहीं था। वह लगभग 30 वर्षों तक कर्नल जेम्स स्किनर की सेवा में रह चुका था। लेकिन 1857 में परिस्थितियाँ बदल गईं।

जिस सैन्य व्यवस्था की वह दशकों तक सेवा कर चुका था, उसी व्यवस्था के विरुद्ध वह विद्रोही सिपाहियों के साथ खड़ा दिखाई देता है। विवरण के अनुसार, कबीर खान ने HLI से 50–60 मेवाती सिपाहियों को अपने साथ लिया। इसके बाद स्किनर की सेवा में मौजूद 35 मेवाती सिपाही भी उनके साथ आ मिले। यह संख्या अपने आप में महत्वपूर्ण है। यह बताती है कि 1857 की उथल-पुथल में मेवाती सैनिक केवल दर्शक नहीं थे—वे सक्रिय रूप से घटनाओं का हिस्सा बने।

इसके बाद हांसी में स्थिति तेजी से बदल गई। स्किनर की संपत्ति और कार्यालय के रिकॉर्ड शहर में हटाए जाने के बाद छावनी में लूट और तोड़फोड़ शुरू हुई। अगली सुबह विद्रोही सिपाहियों ने सुबह से दोपहर तक शहर में लूटपाट और विद्रोही कार्रवाई की।और फिर शाम को—विद्रोही रेजिमेंट ने दिल्ली की ओर कूच कर दिया।

कबीर खान की भूमिका यहीं समाप्त नहीं हुई ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, कबीर खान मेवाती विद्रोही रेजिमेंट के साथ स्किनर के धाना स्थित किले तक गया। वहाँ स्किनर की संपत्ति को निशाना बनाया गया, आग लगाई गई और संपत्ति नष्ट की गई। दिल्ली की ओर आगे बढ़ने के लिए बैलगाड़ियों और बैलों पर भी कब्ज़ा किया गया।

इस पूरे घटनाक्रम में आसपास के गाँवों के जमींदार भी शामिल हुए। विवरण में 800 से अधिक मवेशियों तथा मूल्यवान घोड़ों के कब्ज़े का उल्लेख मिलता है। सरकारी नोट, सनद और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी नष्ट या चोरी किए गए। और फिर इस पूरे घटनाक्रम के बारे में स्रोत एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी करता है—

“The whole Hansi district stood liberated on 31 May 1857.”

अर्थात, 31 मई 1857 तक पूरा हांसी जिला अंग्रेजी नियंत्रण से मुक्त बताया गया।

कबीर खान मेवाती क्यों महत्वपूर्ण हैं? कबीर खान की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 1857 के विद्रोह के एक ऐसे पहलू को सामने लाती है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है
कबीर खान मेवाती का उल्लेख हांसी की घटनाओं में मिलता है—आज का हांसी हरियाणा के हिसार क्षेत्र में है। अर्थात उपलब्ध इस ऐतिहासिक विवरण में मेवात का एक सैनिक मेवात से बाहर, हांसी की धरती पर 1857 के विद्रोही घटनाक्रम में सक्रिय दिखाई देता है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह हमें बताती है कि 1857 का विद्रोह किस तरह सैन्य छावनियों से निकलकर स्थानीय समाज, गाँवों और जमींदारों तक फैल रहा था। कबीर खान लगभग तीन दशक तक स्किनर की सेवा में रहने के बाद उसी दौर में विद्रोही मेवाती सिपाहियों की कमान संभालता दिखाई देता है।

इतिहास का एक अनसुना सवाल? हम 1857 के बड़े-बड़े नामों को जानते हैं। लेकिन क्या हम उन स्थानीय सैनिकों को भी जानते हैं जिन्होंने इस विद्रोह को जमीन पर ताकत दी? कबीर खान मेवाती उन्हीं नामों में से एक हैं। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि— 1857 केवल मेरठ से दिल्ली तक की कहानी नहीं थी। यह हांसी तक पहुँची कहानी थी। यह सैनिकों और गाँवों की कहानी थी। और इसमें मेवात के मेवाती सिपाहियों की भी एक भूमिका थी।

इसलिए जब हम 1857 के इतिहास को याद करें, तो जमादार कबीर खान मेवाती जैसे नामों को भी इतिहास के पन्नों में उनका उचित स्थान देने की कोशिश करें। 🇮🇳जमादार कबीर खान मेवाती❤️

अगर आपको लगता है कि मेवात के ऐसे भूले-बिसरे इतिहास को सामने आना चाहिए, तो इस पोस्ट को साझा करें।

1857: When Kabir Khan Mewati of Mewat Challenged British Rule at Hansi

Today, we bring you the story of a forgotten and unsung hero of Mewat — Jemadar Kabir Khan Mewati, whose role in the Revolt of 1857 took him beyond the borders of Mewat to Hansi in present-day Haryana.

When we talk about the Revolt of 1857, we usually remember Meerut, Delhi, Kanpur, Lucknow and Jhansi. But the revolt was much larger than these famous centres. It was also a story of local soldiers, villages, zamindars and ordinary people who challenged British authority in their own regions. One such important but lesser-known story comes from Hansi.

30 May 1857 — Kabir Khan Takes Command. According to the historical account, on 30 May 1857, Jemadar Kabir Khan Mewati took command of the rebel Mewati sepoys at Hansi. Kabir Khan was an experienced soldier. He had spent nearly 30 years in the service of Colonel James Skinner.

Yet, in the turbulent days of 1857, his position changed completely. The man who had served in Skinner’s military establishment for decades now stood with the rebels against British authority. Kabir Khan took around 50–60 Mewati sepoys from the HLI with him. Soon afterwards, another 35 Mewati sepoys serving under Skinner joined the rebellion.

It shows that Mewati soldiers were not merely witnesses to the events of 1857. They became active participants in the revolt. After the rebellion began, the situation at Hansi changed rapidly. Skinner’s property and office records had been moved into the city. The cantonment was then attacked and plundered. The following morning, rebel sepoys moved through the city, and from daybreak until the afternoon, Hansi witnessed widespread plunder and rebellion.

By evening, the rebel regiment began its march towards Delhi. But Kabir Khan’s role did not end at Hansi. The historical account states that Kabir Khan Mewati accompanied the rebel regiment to Skinner’s fort at Dhana. There, Skinner’s property was attacked. The house was set on fire and property was destroyed. The rebels also seized bullock carts and bullocks needed for their onward journey towards Delhi. The rebellion was no longer limited to the soldiers. Zamindars from neighbouring villages also became involved.

The account records the seizure of more than 800 cattle, along with valuable horses. Government notes, sannads and other important documents were also destroyed or taken away. Then comes one of the most striking statements in the historical account:

“The whole Hansi district stood liberated on 31 May 1857.”

According to this account, by 31 May 1857, the entire Hansi district was described as being free from British control.

Why Is Kabir Khan Mewati Important?

Kabir Khan’s story matters because it takes us beyond the usual narrative of 1857. It shows us the role of Mewati soldiers outside Mewat. Hansi, where Kabir Khan appears in this historical account, is in present-day Haryana’s Hisar region. So, this is not simply a story about what happened inside Mewat.

It is the story of a Mewati soldier who crossed the geographical boundaries of Mewat and became part of the rebellion at Hansi. His story also shows how the uprising spread from military establishments into villages and local society, bringing soldiers and zamindars into the conflict with British authority. And perhaps the most striking part of his story is this:

Kabir Khan had served Colonel Skinner for nearly three decades. Yet, in 1857, he emerged as a leader of rebel Mewati soldiers. That transformation tells us something important about the depth of the crisis created by the Revolt of 1857.

We remember many celebrated heroes of 1857. But history was also shaped by hundreds of local men whose names rarely entered the mainstream narrative. Jemadar Kabir Khan Mewati is one of those forgotten names. His story reminds us that 1857 was not confined to Meerut or Delhi.

It reached Hansi.

It reached the villages.

It involved local soldiers and zamindars.

And among those who stood against British authority were Mewati soldiers led by Jemadar Kabir Khan Mewati.

Jemadar Kabir Khan Mewati ❤️🇮🇳

If you believe that the forgotten history of Mewat deserves to be brought into the light, share this story and help keep these names alive.

#1857

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House No. 151
Nuh
122107

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