04/08/2026
खो जाऊँ मुश्त ए खाक में ऐसा नहीं हूँ मैं
दरिया हूँ अपनी जात में कतरा नहीं हूँ मैं।
गुजरूंगा जिस जगह से निशां छोड़ जाउंगा
आंधी हूँ अपने वक़्त की, झोंका नहीं हूँ मैं।
पूछी है ख़त में आपने जो खैरियत मिरी
कैसे लिखूं जनाब कि अच्छा नहीं हूँ मैं।
मंजिल से ये कहो कि करे मेरा इंतिजार
ठहरा हुआ जरूर हूँ भटका नहीं हूँ मैं।
खुशबू तिरे बदन की मिरे साथ साथ है
कह दे कोई हवाओं से तन्हा नहीं हूँ मैं।
हुस्न ओ शबाब सागर ओ मीना थे सामने
लेकिन किसी भी शब कहीं ठहरा नहीं हूँ मैं।
दे कर खिलौने मुझको जो बहला रहे हैँ लोग
' एजाज ' उनसे कह दो बच्चा नहीं हूँ मैं। 🙏
" एजाज अंसारी "