12/05/2026
एक ईसाई औरत अपने इस्लाम क़ुबूल करने की वजह बयान करते हुए कहती है:
“जब मैं गुनाह करती थी, तो पादरी (काहिन) के पास जाकर अपने गुनाह बयान करती थी। वह मुझे अपने सामने सज्दा करवाता, और अपने आपको ज़मीन में ‘ख़ुदा का नुमाइंदा’ समझता था। अगर पादरी माफ़ कर दे, तभी आसमान वाला रब माफ़ करता — यानी उसके बग़ैर मग़फ़िरत नहीं!
और सबसे बड़ी मुसीबत यह थी कि पादरी मेरे तमाम राज़ जानता था।
लेकिन इस्लाम में, जब मुझसे कोई गुनाह हो जाता है — चाहे जानबूझकर या भूल से — तो मैं सीधे अपने रब की तरफ़ रुजू‘ करती हूँ, बिना किसी वसीले के उससे इस्तिग़फ़ार करती हूँ, और मेरे राज़ किसी बाप, पादरी या इंसान को मालूम नहीं होते।
फिर मैंने सोचा कि आख़िर पादरी ही क्यों हमारे राज़ जाने? और मग़फ़िरत सिर्फ़ उन्हीं के ज़रिये क्यों हो?
तो मैंने इस्लाम का मुतालआ किया, और क़ुरआन मजीद में यह आयत पाई:
﴿اتَّخَذُوا أَحْبَارَهُمْ وَرُهْبَانَهُمْ أَرْبَابًا مِّن دُونِ اللَّهِ وَالْمَسِيحَ ابْنَ مَرْيَمَ وَمَا أُمِرُوا إِلَّا لِيَعْبُدُوا إِلَٰهًا وَاحِدًا ۖ لَّا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ سُبْحَانَهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ﴾
“उन्होंने अल्लाह को छोड़कर अपने आलिमों और दरवेशों को रब बना लिया, और मसीह इब्ने मरयम को भी; हालाँकि उन्हें सिर्फ़ एक माबूद की इबादत का हुक्म दिया गया था। उसके सिवा कोई माबूद नहीं। वह पाक है उन चीज़ों से जिन्हें ये लोग उसका शरीक ठहराते हैं।”
📖 सूरह अत-तौबह: 31
फिर मैं क़ुरआन की इस ख़ूबसूरत आयत पर हैरान रह गई:
﴿وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ ۖ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ ۖ فَلْيَسْتَجِيبُوا لِي وَلْيُؤْمِنُوا بِي لَعَلَّهُمْ يَرْشُدُونَ﴾
“और (ऐ नबी) जब मेरे बंदे आपसे मेरे बारे में पूछें, तो मैं बहुत क़रीब हूँ। जब कोई दुआ करने वाला मुझे पुकारता है, तो मैं उसकी दुआ क़ुबूल करता हूँ। इसलिए उन्हें चाहिए कि मेरा कहना मानें और मुझ पर ईमान लाएँ, ताकि वे हिदायत पा जाएँ।”
📖 सूरह अल-बक़रह: 186
फिर मैं समझ गई कि इस्लाम बंदे और उसके रब के दरमियान सीधा रिश्ता क़ायम करता है।
अल्हम्दुलिल्लाह, इस्लाम जैसी नेअमत पर जितना शुक्र किया जाए कम है।
لا إله إلا الله محمد رسول الله۔