Bharat ki Baat

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19/03/2026

ज़मीन के नीचे दफन वो बदबूदार काला ज़हर, जिसके बिना आज दुनिया एक दिन भी नहीं चल सकती... धरती का सीना चीरकर निकाला गया वो गाढ़ा कीचड़, जिसे पूरी दुनिया काला सोना कहती है... आखिर इस ज़हरीले दिखने वाले मलबे को हमारी गाड़ियों की रगों में दौड़ने लायक कैसे बनाया जाता है... 400 डिग्री की भयानक गर्मी में उबलते इस काले सोने का सबसे खौफनाक रहस्य...

जब ज़मीन या समंदर की गहराई से जब "कच्चा तेल" ( Crude Oil ) निकाला जाता है, तो वह बिल्कुल वैसा नहीं होता जैसा हम पेट्रोल पंप पर देखते हैं। असल में यह काले या भूरे रंग का एक बेहद गाढ़ा, चिपचिपा और बदबूदार तरल होता है, जिसे Black Gold ( काला सोना ) भी कहते हैं। सीधे तौर पर यह हमारे किसी काम का नहीं होता, लेकिन इसी काले कीचड़ से हमारी गाड़ियों को दौड़ाने वाला चमचमाता पेट्रोल और डीज़ल बनता है।

इस जादुई सफर की शुरुआत तब होती है जब इस कच्चे तेल को बड़ी-बड़ी Pipelines या विशाल जहाज़ों के ज़रिए Oil Refinery में भेजा जाता है। रिफाइनरी एक बहुत बड़ी Factory होती है जहाँ इस तेल को साफ करके अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाता है, जिसे Science की भाषा में "Fractional Distillation" कहते हैं। यहाँ एक बहुत ऊंची चिमनी जैसी विशाल भट्टी ( Furnace) होती है। कच्चे तेल को इस भट्टी में डालकर 400°C से भी ज़्यादा तापमान पर उबाला जाता है। जिस तरह पानी उबल कर भाप बन जाता है, वैसे ही कच्चा तेल भी इस भयंकर गर्मी में उबल कर अलग-अलग गैसों और भाप में बदलने लगता है।

इस विशाल भट्टी का सबसे बड़ा कमाल यह है कि यह नीचे से बहुत ज़्यादा गर्म होती है और ऊपर जाते-जाते इसका Temperature कम ( ठंडा ) होने लगता है। कच्चे तेल की भाप जब ऊपर उठती है, तो अलग-अलग तापमान पर ठंडी होकर अलग-अलग चीज़ों में बदल जाती है। जो गैसें सबसे हल्की होती हैं, वो भट्टी के सबसे ऊपरी हिस्से में पहुँच जाती हैं और वहीं से हमें हमारे घरों में खाना पकाने वाली ( LPG ) गैस मिलती है। उससे थोड़ा नीचे वाले हिस्से से भाप ठंडी होकर वह "पेट्रोल" ( Petrol ) बन जाती है, जो हमारी कारों और Bikes की प्यास बुझाता है।

भट्टी के बीच वाले हिस्से से "केरोसिन यानी मिट्टी" का तेल और हवाई जहाज़ों को आसमान में उड़ाने वाला खास ईंधन ( Aviation Fuel ) निकाला जाता है। उससे थोड़ा और नीचे जाने पर Trucks और Trains को ताकत देने वाला "डीज़ल" ( Diesel ) मिलता है। सबसे हैरानी की बात तो यह है कि भट्टी के सबसे निचले हिस्से में जो एकदम गाढ़ा और भारी मलबा बच जाता है, वह भी बिल्कुल बेकार नहीं जाता। उस बचे हुए मलबे से इंजन ऑयल, Grice, वैसलीन और डामर ( Asphalt ) बनता है, जिससे हमारी मजबूत सड़कें बिछाई जाती हैं।

भट्टी से निकलने के बाद इन सभी चीज़ों को कुछ खास Chemicals के ज़रिए एक आखिरी बार अच्छी तरह साफ किया जाता है, ताकि गाड़ियों का इंजन खराब ना हो और धुआं या Pollution भी कम हो। इसके बाद ही यह आपके नज़दीकी पेट्रोल पंपों तक पहुँचने के लिए पूरी तरह तैयार होता है। मतलब ज़मीन से निकलने वाले उस एक काले गाढ़े तरल की एक बूंद भी बर्बाद नहीं होती, इंसान उसका हर एक हिस्सा अपने किसी न किसी काम में ले ही लेता है।

19/03/2026

Colorful Mother Earth....

19/03/2026

Amazing Universe....

19/03/2026

Beautiful Kullu-Manali

19/03/2026

सर आइजैक न्यूटन ने जब गुरुत्वाकर्षण के नियमों की खोज की, तो उन्होंने यह तो बखूबी समझा दिया कि ग्रह सूरज के चारों ओर कैसे घूमते हैं और वे अपनी कक्षा (Orbit) में कैसे बने रहते हैं। लेकिन उनके सामने भी एक बहुत बड़ा सवाल था—इन ग्रहों को आखिर पहली बार वह धक्का किसने दिया?
विज्ञान के अनुसार, न्यूटन यह मानते थे कि गुरुत्वाकर्षण केवल ग्रहों को खींचकर रख सकता है, लेकिन उन्हें चलने के लिए शुरुआती रफ्तार किसी बाहरी शक्ति ने दी होगी। आज का आधुनिक विज्ञान इसका जवाब 'सौर मंडल के जन्म' की प्रक्रिया में ढूंढता है।

करीब साढ़े चार अरब साल पहले, जब धूल और गैस का एक विशाल बादल अपने ही गुरुत्वाकर्षण से सिमटने लगा, तो वह बहुत तेजी से घूमने लगा। जैसे एक घूमता हुआ लट्टू अपनी गति बनाए रखता है, ठीक वैसे ही उस शुरुआती घुमाव (Angular Momentum) की वजह से ग्रहों को वह गति मिली जो आज भी अरबों सालों से जारी है। अंतरिक्ष में हवा या घर्षण (Friction) न होने के कारण, ग्रहों की यह रफ्तार कभी धीमी नहीं होती।

न्यूटन का यह कहना बिल्कुल सही था कि नियम केवल रास्ते बताते हैं, लेकिन शुरुआत हमेशा किसी न किसी ऊर्जा के स्रोत से होती है

स्रोत: यह जानकारी न्यूटन के 'प्रिंसिपिया मैथमैटिका', कोपरनिकस के सिद्धांतों और सौर मंडल के निर्माण के आधुनिक खगोल भौतिकी (Astrophysics) शोधों पर आधारित है।

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