17/12/2022
23 वें तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ प्रभु का
जन्म एवं दीक्षा कल्याणक
जीवन परिचय
पार्श्वनाथ प्रभु एवं कमठ के 10 भव
1️⃣ अरविंद राजा के पुरोहित के दो बेटे कमठ ( कमठ का जीव)और मरुभुति ( पार्श्वनाथ प्रभु का जीव)
2️⃣ दुसरे भव में कुर्कुट सर्प और हाथी हुआ
3️⃣तिसरे भव में कमठ का जीव पांचवीं नरक में, और प्रभु का जीव सहस्त्रार देवलोक में देवहुए
4️⃣चौथे भव में सर्प व किरणवेग नाम का विद्याधर हुए
5️⃣ पांचवे भव में कमठ का जीव पांंचवी नरक में और प्रभु का जीव दुसरे अच्युत कल्प में देव हुऐ
6️⃣ छठे भव में पश्चिम महाविदेह क्षेत्र में भील एवं वज्रनाभ नाम के राजा हुए
7️⃣ सातवें भव में कमठ का जीव सातवीं नरक में और प्रभु का जीव मध्यग्रेवेयक में देव हुए
8️⃣ आठवें भव में कमठ का जीव पूर्व महाविदेह क्षेत्र में सिंहऔर प्रभु का जीव सुवर्णबाहू नाम से चक्रवर्ती हुए
9️⃣ नौवें भव में कमठ का जीव चौथी नरक में और प्रभु का जीव प्राणतकल्प में देव हुए
🔟 दसवें भव में कमठ और प्रभु पार्श्वनाथ तिर्थंकर हुए
इस प्रकार पार्श्वनाथ प्रभु के एवं कमठ के दस भव हुए ग्यारहवें भव में भी कमठ जीव मेघकुमार देव बनकर अति वृष्टि कर प्रभु को कष्ट दिया। बाद में प्रभु से बोध पा कर वैर रहित हुए।
यहाँ पर पहले भव का उल्लेख किया है उस भव में कमठ और प्रभु का जीव भाई थे।
इस जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में पोतनपुर के नाम से नगर था। उसमें अरविंद नाम का राजा था।उनकें विश्वभुति नाम का पुरोहित था। पुरोहित के अनुरध्धा नाम की पत्नी से कमठ एवं मरुभुति नाम से दो पुत्र हुए। कमठ स्वभाव से ही शठ था और मरुभुति स्वभाव से भवभीरु ओर धर्मनिष्ठ था।
कमठ को वरुणा नाम की और मरुभुति को वसुंधरा नाम की स्त्री थी। मरुभुति जैन धर्म को सेवने की इच्छा रखता था। अपने बडे भाई कमठ को अपनी स्त्री वसुंधरा के साथ गुप्तरीति से दुराचार करते मरुभुति ने देखा और क्रोध में आकर इसकी शिकायत राजा से की। राजा ने कमठ का तिरस्कार कर नगर से बाहर कर दिया।
तिरस्कार पाया हुआ कमठ एक तापस के आश्रम में रह कर तपस्या करने लगा।
एक दिन मरुभुति पश्चाताप करते हुए अपने बडे़ भाई कमठ जो अब तपस्वी था उसकों वन्दना करने आश्रम में गया। जैसे ही वन्दना की कमठ ने बड़ी शीला मरुभुति के मस्तक पर दे मारी। वहीं मरुभुति का प्राणान्त हो गया और मरकर हाथी बने। कमठ का जीव कुर्कुट सर्प बना। और इस तरह यह पहले भव का वैर प्रभु के साथ दस भव तक चला।
इस जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में वाराणसी नगरी में अश्वसेन राजा के वामादेवी नाम की रानी थी। चैत्र वदी चोथ को बीस सागरोपम का आयुष्य पुर्ण कर प्राणतकल्प से देव ( नौवें भव), सुवर्णबाहू ( आठवें भव में साधु) का जीव रानी वामादेवी की कुक्षी में अवतरा और पोष वदी दसमी अनुराधा नक्षत्र में जैसे विदुरगिरि की भूमि रत्न को प्रसव करती हैं वैसे ही वामादेवी माता ने सर्प के चिन्ह वाले निल वर्णी प्रभु का जन्म दिया। छप्पन दिक्कुमारियों ने आकर माता का सुतिका कर्म किया।फिर शक्रेन्द्र ने ईआकर माता को अवस्वापिनी निद्रा में सुला कर और प्रभु का प्रतिबिम्ब रख कर स्वयं के पांच रुप बना कर एक ने प्रभु को उठाया दो रुपों ने चामर धारण किये।एक रुप ने प्रभु के सिर पर छत्र धारण कराया और एक रुप ने वज्र उछालते हुए सुन्दर चाल से मेरुपर्वत की तरह चले। वहाँ प्रभु को गोदी में लेकर सिहांसन पर बैठे और विधीपूर्वक जन्माभिषेक किया।
प्रभु गर्भ में थे तब माता ने कृष्णपक्ष की रात्रि में अपने पास काले सर्प को देखा था जिससे राजा अश्वसेन ने प्रभु का नाम पार्श्व रखा।
प्रसेनजित राजा की प्रभावती नाम की पुत्री के साथ पार्श्वकुमार का लग्न हुआ।
कमठ का जीव आठवें भव में सिंह बना, जिसने प्रभु का जीव जो साधु सुवर्णबाहू थे उनको मारा था। कमठ का जीव दस सागरोपम आयुष्य वाले चौथे नरक में गया। वहीं से आयुष्य पूरा कर एक गरीब ब्राह्मण के घर में पुत्र के रूप में पैदा हुआ। उसके जन्मते ही माता पिता और भाई की मृत्यु हो गयी। लोगों ने कृपा कर जिन्दा रखा। बहुत दु:खी रहा, बड़ी मुश्किल से भोजन मिलता था। उस समय नगरी के श्रेष्ठी लोग को स्वर्णाभुषण पहने देख वैराग्य उपजता है वो सोचता हे कि इनका वैभव पूर्व जन्म के पुण्य का फल है और मैं भोजन के लिए भी दु:ख देखना पड़ता है।यह सोच कर वो कन्दमुल फल खाकर पंचाग्नि तप करने लगा। वो घुमता हुआ वाराणसी नगरी में पहुँच गया। और नगर के बाहर उद्यान में पंचाग्नि तप करने लगा।
तीन ज्ञान से सूर्य समान पार्श्वनाथ प्रभु उसके पास गये और कहा कि तापस यह आप का अज्ञान तप है। इस लकडे में जिवीत सर्प जल रहा है और उसको निकाल कर बताया। कृपालु प्रभु ने पंच परमेष्ठी नवकार मंत्र सुनाया उससे वो सर्प समाधि पुर्वक मरकर धरणेन्द्र देव बने।
पोष वदी ग्यारस के दिन प्रभु ने दिक्षा ली ।
दिक्षा नक्षत्र- विशाखा
वैराग्य कारण- जातिस्मरण ज्ञान
समय- पुर्वान्ह
दिक्षा वन -अश्वत्थ
दिक्षा वृक्ष- देवदार
प्रथम आहार दाता- धन्यसेन राजा गाय के दुध की खीर से सह दिक्षीत 300 साधु,
चैत्र वदी चौथ को प्रभु को कैवल्यज्ञान हुआ।
श्रावण सुद चौथ को प्रभु सम्मेदशिखर से 33 मुनियों के साथ मोक्ष पधारे।
प्रभु के परिवार में
16 हजार साधु,
38 हजार साध्वी,
350 चोदह पुर्व धारी,
1400 अवधि ज्ञानी,
750 मन: पर्यव ज्ञानी
1000 केवलज्ञानी,
1100 वेक्रीय लब्धि धारी,
600 वादलब्धिधारी
1 लाख 64 हजार श्रावक,
3 लाख 70 हजार श्राविकाऐं थी।
तीर्थंकर 30 वर्ष गृहस्थावस्था में
70 वर्ष संयम पर्याय में,
इस प्रकार 100 वर्ष का आयुष्य।
सभार संकलित🙏