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भारत के प्रमुख ऐतिहासिक व धार्मिक स्थलों की तस्वीर              #भारतधरतीकास्वर्ग
03/06/2026

भारत के प्रमुख ऐतिहासिक व धार्मिक स्थलों की तस्वीर

#भारतधरतीकास्वर्ग

भारत मे अन्य देशों की मुद्रा की कीमत   #मुद्रा  #रुपये  #डॉलर  #दिनार    #भूटान  #कुवैत  #मालवदीप  #भारतीय
03/06/2026

भारत मे अन्य देशों की मुद्रा की कीमत
#मुद्रा #रुपये #डॉलर #दिनार #भूटान #कुवैत #मालवदीप #भारतीय

शिक्षक समाज व राष्ट्र का निर्माता होता हैं। क्या शिक्षकों को "दो कौड़ी के शिक्षक" कहना सही है?     #शिक्षक   GreatestHig...
01/06/2026

शिक्षक समाज व राष्ट्र का निर्माता होता हैं। क्या शिक्षकों को "दो कौड़ी के शिक्षक" कहना सही है?
#शिक्षक GreatestHighlights
#आजतक #तक #ही #राजनीति #डिबेट
चाणक्य ने भी कहा था, "शिक्षक कभी साधारण नहीं होता, प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं।"
1.शिक्षक केवल किताबी ज्ञान नहीं देते, बल्कि बच्चों में ईमानदारी, अनुशासन, सहानुभूति और देशभक्ति जैसे नैतिक मूल्यों का संचार करते हैं।
शिक्षक समाज की रीढ़ होते हैं,जो आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान और संस्कार देकर देश का भविष्य बनाते हैं।

2.​वे केवल किताबी ज्ञान नहीं देते,बल्कि छात्रों में नैतिक मूल्य,अनुशासन और सही-गलत का भेद करना भी सिखाते हैं।
देश के भावी डॉक्टर,इंजीनियर,वैज्ञानिक, पत्रकार,प्रशासनिक अधिकारी और नेता किसी न किसी शिक्षक की कक्षा से ही निकलकर आगे बढ़ते हैं।

3.आधुनिक युग में शिक्षक छात्रों को नई तकनीक, नवाचार (Innovation) और तार्किक सोच (Logical Thinking) के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे देश आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनता है। छात्रों को किसी नई तकनीकी से पढ़ना गलत बात नहीं है

4.एक डॉक्टर बीमार का इलाज करता है, एक इंजीनियर पुल बनाता है, लेकिन एक शिक्षक पूरे समाज और राष्ट्र की सोच का निर्माण करता है। इसलिए, शिक्षक को 'राष्ट्र निर्माता' कहा जाता है।

5.एक प्रतिष्ठित पत्रकार,जो खुद कई शिक्षकों के मार्गदर्शन से इस मुकाम तक पहुंची है,वह ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करती है ऐसे शब्दों की हम कड़ी निंदा करते हैं

रीतिकाल के प्रमुख स्तंभ चिंतामणि के बारे में संपूर्ण जानकारी        #लेटेस्ट  #नोट्स  #मोस्ट  #ही  #हिंदीभाषाकेप्रेमी  #...
01/06/2026

रीतिकाल के प्रमुख स्तंभ चिंतामणि के बारे में संपूर्ण जानकारी
#लेटेस्ट #नोट्स #मोस्ट #ही #हिंदीभाषाकेप्रेमी #हिंदीसाहित्य #रीतिकाल #चिंतामणि
1.​रीतिकाल के प्रवर्तक: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने चिंतामणि को रीतिकाल की अखंड परंपरा का वास्तविक प्रवर्तक माना है।
2.​जन्म स्थान: चिंतामणि का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के तिकवांपुर नामक गाँव में हुआ था।
3.​समय काल: इनका जन्म काल लगभग संवत 1666 (1609 ई.) और रचना काल संवत 1700 के आसपास माना जाता है।
4.​प्रसिद्ध भाई: ये रीतिकाल के प्रसिद्ध कवियों—भूषण, मतिराम और जटाशंकर के सगे भाई थे।
5.​पिता का नाम: इनके पिता का नाम पं. रतिनाथ त्रिपाठी (कुछ विद्वानों के अनुसार रत्नाकर त्रिपाठी) था।
6.​प्रधान आश्रयदाता: ये नागपुर के भोंसला राजा मकरंद शाह के मुख्य आश्रय में रहे।
7.​अन्य आश्रयदाता: इन्होंने मुगल बादशाह शाहजहाँ और चित्रकूट के राजा रुद्रसाह सोलंकी के दरबार में भी समय बिताया।
8.​काव्यधारा: चिंतामणि रीतिकाल की रीतिबद्ध काव्यधारा के शीर्ष आचार्यों में गिने जाते हैं।
9.​सर्वांग निरूपक आचार्य: इन्हें काव्य के सभी अंगों (रस, अलंकार, छंद, गुण, दोष) का विवेचन करने वाला 'सर्वांग निरूपक' कवि माना जाता है।
10.​प्रतिनिधि ग्रंथ: 'कविकुल कल्पतरु' इनका सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय रीति-ग्रंथ है।
11.​संस्कृत आधार: 'कविकुल कल्पतरु' की रचना आचार्य मम्मट के 'काव्यप्रकाश' और जयदेव के 'चन्द्रालोक' के आधार पर हुई है।
12.​रस विवेचन: इनका 'रस विलास' ग्रंथ मुख्य रूप से रस सिद्धांत और नायिका-भेद पर आधारित है।
13.​छंद शास्त्र: छंदों के प्रामाणिक विवेचन के लिए इन्होंने 'छन्द विचार पिंगल' ग्रंथ की रचना की थी।
14.​काव्य विवेक: काव्य के स्वरूप, प्रयोजन और भेदों को स्पष्ट करने के लिए इन्होंने 'काव्य विवेक' नामक ग्रंथ लिखा।
15.​रामायण की रचना: इन्होंने प्रबंध काव्य के रूप में 'कवित्त रामायण' लिखकर अपनी रामभक्ति भी प्रकट की।
16.​कृष्ण चरित: कृष्ण लीलाओं पर आधारित इनका 'कृष्ण चरित' भी एक प्रमुख प्रबंधात्मक ग्रंथ माना जाता है।
17.​काव्य भाषा: चिंतामणि की काव्य भाषा पूरी तरह से परिमार्जित, शुद्ध और सरस ब्रजभाषा है।
18.​भाषा की विशेषता: शुक्ल जी के अनुसार, इनकी भाषा में अनुप्रास का आडंबर नहीं है, बल्कि एक स्वाभाविक मिठास और प्रवाह है।
19.​काव्य लक्षण सूत्र: कविकुल कल्पतरु में इन्होंने काव्य का लक्षण दिया है: "सगुण अलंकारन सहित, दोष रहित जो होइ। शब्द अर्थ वारौ कवित, कहत सबै कोउ लोइ॥"
20.​मम्मट के अनुयायी: ध्वनि और रस सिद्धांत के निरूपण में चिंतामणि मुख्य रूप से संस्कृत आचार्य मम्मट के मत का अनुसरण करते हैं।
21.​अलंकार विवेचन: अलंकारों के लक्षण देने के लिए इन्होंने पीयूषवर्ष जयदेव के 'चन्द्रालोक' को आदर्श बनाया।
22.​सहृदयता: इन्हें सिद्धांत प्रतिपादन से अधिक एक 'सहृदय कवि' के रूप में ख्याति मिली क्योंकि इनके उदाहरण अत्यंत जीवंत हैं।
23.​शृंगार चित्रण: इन्होंने शृंगार रस के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का मर्यादित तथा मार्मिक चित्रण किया है।
24.​केशवदास से भिन्नता:केशवदास की क्लिष्टता (कठिनाई) के विपरीत चिंतामणि की शैली अत्यंत सरल, सुबोध और शास्त्रीय है।
25.​ऐतिहासिक महत्व: हिंदी साहित्य में लक्षण-ग्रंथ लिखने की जो परिपाटी चिंतामणि से शुरू हुई, वह रीतिकाल के अंत तक बिना रुके चलती रही।

कवि गुरु गोरखनाथ: साहित्यिक परिचय व​जीवन परिचय               ​काल (समय): 11वीं शताब्दी (डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल के अनुस...
31/05/2026

कवि गुरु गोरखनाथ: साहित्यिक परिचय व
​जीवन परिचय

​काल (समय): 11वीं शताब्दी (डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल के अनुसार सर्वमान्य मत)
​गुरु का नाम: महायोगी मन्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ)
​पंथ: नाथ सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक और संगठनकर्ता

साहित्यिक विशेषताएँ

​हठयोग का उपदेश: प्राण और अपान वायु के मिलन (हठयोग) तथा कुंडलिनी जागरण पर बल।
​भाषा-शैली: सधुक्कड़ी (मिश्रित खड़ी बोली), जिसमें राजस्थानी और पंजाबी का प्रभाव है।
​सामाजिक सुधार: बाह्याडंबरों, जाति-पांत और छुआछूत का कड़ा विरोध।
​नैतिक शुद्धता: इंद्रिय निग्रह, वैराग्य और मन की शुद्धता को साधना का मूल माना।

प्रमुख रचनाएँ
​(डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल द्वारा 'गोरख-बानी' में संपादित 14 प्रामाणिक ग्रंथ)
​सबदी (सबसे महत्वपूर्ण व प्रामाणिक)
​पद
​प्रान संकली
​आत्मबोध
​नरवै बोध
​शिष्यादरसन

साहित्यिक महत्व (विशेष बिंदु)

1.​प्रथम गद्य लेखक: मिश्रबंधुओं ने इन्हें "हिन्दी का प्रथम गद्य लेखक" स्वीकार किया है।
2.​कबीर के अग्रदूत: भक्तिकाल के संत कबीरदास की निर्गुण साधना, गुरु महिमा और उलटबांसियों का मुख्य स्रोत गोरखनाथ का साहित्य ही है।
3.नाथ साहित्य के प्रवर्त्तक: हिन्दी साहित्य में नाथ पंथ की शुरुआत और संगठन का श्रेय गुरु गोरखनाथ को जाता है।
4.​गोरखनाथ के गुरु का नाम: महायोगी मन्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) गोरखनाथ के गुरु थे।
5.​समय को लेकर सर्वमान्य मत: डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल के अनुसार इनका समय 11वीं शताब्दी माना जाता है।
6.​आचार्य शुक्ल का मत: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने गोरखनाथ का समय 13वीं शताब्दी (पृथ्वीराज चौहान के समय के आसपास) माना है।
7.​राहुल सांकृत्यायन का मत: राहुल सांकृत्यायन ने इनका समय 845 ईस्वी (9वीं शताब्दी) स्वीकार किया है।
8.​ग्रंथों का प्रामाणिक संपादन: डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ की रचनाओं का संपादन 'गोरख-बानी' (1930 ई.) नाम से किया।
9.​प्रामाणिक ग्रंथों की संख्या: 'गोरख-बानी' में बड़थ्वाल जी ने गोरखनाथ के 14 ग्रंथों को प्रामाणिक माना है।
1.​सबसे प्रामाणिक रचना: गोरखनाथ की रचनाओं में 'सबदी' को सबसे प्रामाणिक और महत्वपूर्ण माना जाता है।
11.​प्रथम गद्य लेखक: मिश्रबंधुओं ने गुरु गोरखनाथ को "हिन्दी का प्रथम गद्य लेखक" माना है।
12.​काव्य की भाषा: इनकी भाषा सधुक्कड़ी (मिश्रित खड़ी बोली) है, जिसमें राजस्थानी, पंजाबी और पूर्वी हिन्दी का प्रभाव है।
13.​साधना का मूल आधार: गोरखनाथ की साधना का मुख्य आधार 'हठयोग' (प्राण और अपान वायु का मिलन) है।
14.​कबीर के अग्रदूत:
भक्तिकाल के संत कबीरदास की साधना,
गुरु महिमा और उलटबांसियों पर गोरखनाथ का सर्वाधिक प्रभाव है।
15.​द्विवेदी जी का प्रसिद्ध कथन: डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि "शंकराचार्य के बाद इतना प्रभावशाली और इतना महिमान्वित भारतवर्ष में दूसरा नहीं हुआ।"

भारतेंदु युग के प्रमुख निबंधकार पंडित प्रताप नारायण मिश्र के बारे में संपूर्ण जानकारी    #परिवार  #निबंध  #पंडित  #ही   ...
28/05/2026

भारतेंदु युग के प्रमुख निबंधकार पंडित प्रताप नारायण मिश्र के बारे में संपूर्ण जानकारी
#परिवार #निबंध #पंडित #ही UGC NET HINDI
#भारतेंदु_युग

पंडित प्रतापनारायण मिश्र (भारतेंदु युग) का जीवन परिचय .......
​"भारतेंदु युग के प्रखर निबंधकार, कवि और 'ब्राह्मण' पत्र के यशस्वी संपादक पंडित प्रतापनारायण मिश्र (1856–1894) ने अपनी जीवंत, विनोदी और ठेठ पूर्वी शैली से हिंदी गद्य को एक नई दिशा प्रदान की।"

काव्य कृतियां (कविता संग्रह)
​ १.प्रेम-पुष्पावली
(प्रमुख काव्य संग्रह)
​ २ मन की लहर
(लोकप्रिय सामाजिक-राजनीतिक कविताएं)
​३.प्रताप-लहरी
​४.लोकोक्ति-शतक
५.तृप्यन्ताम्
६.दंगल खंड/भैंसों का मरसिया
(व्यंग्यात्मक शैली)
७.हल्दीघाटी(देशभक्ति पूर्ण काव्य)

​2. नाटक एवं रूपक:

1.कलि-कौतुक रूपक (सामाजिक कुरीतियों पर तीखा व्यंग्य)
2.​हठी हम्मीर (ऐतिहासिक नाटक - रणथंभौर के राव हम्मीर देव पर आधारित)
3.संगीत शाकुंतल (लावनियों के रूप में अनूदित रूपक)
​4.भारत-दुर्दशा (रूपक)

​3. निबंध संग्रह एवं गद्य रचनाएं:
​ १.प्रताप-पीयूष (निबंधों का सर्वश्रेष्ठ संग्रह)
​ २.निबंध-नवनीत
​(विशेष: इन्होंने 'भौंह', 'पेट', 'नाक', 'दांत', 'मूंछ' और 'बात' जैसे साधारण विषयों पर अत्यंत गंभीर और विनोदात्मक निबंध लिखे हैं)

​4. संपादन एवं पत्रकारिता:

'ब्राह्मण' (मासिक पत्र): सन् 1883 में कानपुर से इसका संपादन शुरू किया। इस पत्र के माध्यम से इन्होंने हिंदी भाषा और समाज सुधार की अलख जगाई।

क्विक साहित्यिक फैक्ट्स
​मूल मंत्र:
इनका एक प्रसिद्ध नारा बहुत लोकप्रिय हुआ था— "जपो निरंतर एक जबान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान।"

​लेखन शैली:
इनकी शैली में कानपुर की ठेठ पूर्वी बोली, मुहावरों और हास्य-व्यंग्य का अद्भुत पुट मिलता है। इन्हें भारतेंदु हरिश्चंद्र का सच्चा प्रतिरूप माना जाता है।

प्रताप नारायण मिश्र के बारे में महत्वपूर्ण बिंदु

1.जन्म और स्थान:
इनका जन्म 1856 ई. में बैजनाथ (उन्नाव), उत्तर प्रदेश में हुआ था, लेकिन इनकी कर्मभूमि कानपुर रही।
2.​युग प्रतिनिधित्व:

ये आधुनिक काल के भारतेंदु मंडल/युग के सबसे प्रमुख और सक्रिय लेखक माने जाते हैं।
​प्रसिद्ध नारा: इन्होंने हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए "जपो निरंतर एक जबान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान" का प्रसिद्ध नारा दिया था।
3.​पत्रकारिता:
इन्होंने सन् 1883 ई. में कानपुर से प्रसिद्ध मासिक पत्र 'ब्राह्मण' का संपादन और प्रकाशन शुरू किया था।
4.​आर्थिक संघर्ष: '
ब्राह्मण' पत्र के चंदे के लिए इन्होंने अपने पाठकों से "आठ मास बीते जजमान, अब तो करो दच्छिना दान" की प्रसिद्ध याचना की थी।
5.​उपनाम/उपाधि:
रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी गद्य साहित्य में इनके महत्व को देखते हुए इन्हें "हिंदी का एडिसन" कहा है (जबकि बालकृष्ण भट्ट को 'स्टील' कहा)।
6.​निबंधों की विशेषता:
इन्होंने 'बात', 'भौं', 'मूंछ', 'नाक', 'पेट', 'दांत' और 'वृद्ध' जैसे अत्यंत साधारण और अनूठे विषयों पर उच्च कोटि के मनोरंजक निबंध लिखे।
7.​प्रमुख निबंध संग्रह:
इनके निबंधों का सबसे प्रामाणिक और प्रसिद्ध 8.संकलन
'प्रताप-पीयूष' नाम से जाना जाता है।
9.​सर्वश्रेष्ठ नाटक:
इनका 'हठी हम्मीर' एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक है, जिसमें राजा हम्मीर देव के हठ और शौर्य की कथा है।
10.​व्यंग्य नाटक:
इनका 'कलि-कौतुक रूपक' नाटक समाज में व्याप्त पाखंड, वेश्यागमन और कुरीतियों पर तीखा प्रहार करता है।
11.​प्रतिनिधि कविता:
'मन की लहर' इनकी देश-दशा और समाज सुधार को दर्शाने वाली सबसे लोकप्रिय काव्य कृति है।
12.​उर्दू शायरी:
ये उर्दू में 'रसाम' उपनाम से गजलें और शायरी लिखा करते थे।
13.​शैली की पहचान:
इनकी गद्य शैली की मुख्य विशेषता 'अल्हड़पन', 'पूर्वीपन' (कानपुरी ठेठ शब्द) और 'हास्य-व्यंग्य' का सटीक पुट है।
14.​अल्पायु अवसान: मात्र 38 वर्ष की अल्पायु में 1894 ई. में कानपुर में इनका निधन हो गया था।

बहुत ही शानदार और कॉमेडीयुक्त स्वरचित राजस्थानी कविता पूरी कविता अवश्य पढ़े और पसंद आए तो लाइक सब्सक्राइब और कमेंट करें ...
27/05/2026

बहुत ही शानदार और कॉमेडीयुक्त स्वरचित राजस्थानी कविता पूरी कविता अवश्य पढ़े और पसंद आए तो लाइक सब्सक्राइब और कमेंट करें
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​स्वादिष्ट और लाजवाब: यह राबड़ी मलाईदार, केसरिया और मेवों से भरपूर है, जो स्वाद में लाजवाब है।
​ठंडी और ताज़ा: यह एक ठंडक पहुँचाने वाला पेय है जो विशेष रूप से गर्मियों के मौसम के लिए बहुत ताज़ा होता है।
​स्वास्थ्य के लिए लाभकारी: इसमें बाजरा और दही का उपयोग किया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी हैं।
​बनाने में आसान: यह पारंपरिक विधि से घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है।
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Shankarlalnath.blogspot.com

आदिकाल के रासो साहित्य के प्रमुख कवि चंद्रवरदाई के बारे में संपूर्ण जानकारी....   #शेयर  #ही  #परिवार  #आदिकाल  #रासो  #...
26/05/2026

आदिकाल के रासो साहित्य के प्रमुख कवि चंद्रवरदाई के बारे में संपूर्ण जानकारी....
#शेयर #ही #परिवार #आदिकाल #रासो #लाहोर #पीपी #वीरगाथा

#चन्दबरदाई (Chand Bardai) हिंदी साहित्य के आदिकाल (वीरगाथा काल) के सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं। वे केवल एक कवि ही नहीं, बल्कि एक महान योद्धा और राजा के परम मित्र भी थे।
​आइए चन्दबरदाई के बारे में संपूर्ण और महत्वपूर्ण जानकारी को विस्तार से समझते हैं:
​1. जीवन परिचय और पृष्ठभूमि
​जन्म: इनका जन्म 1148 ईस्वी (संवत 1205) में लाहौर (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि चन्दबरदाई और महाराजा पृथ्वीराज चौहान का जन्म एक ही दिन हुआ था।
​जाति: ये 'जगाती' या 'भाट' कुल के राव वेणीपाल के पुत्र थे।
​भाषा ज्ञान: ये भाषा और व्याकरण के प्रकांड विद्वान थे। इन्हें षट्-भाषा (छह भाषाओं), व्याकरण, काव्य, नाटक, ज्योतिष, पुराण और युद्ध कला का अद्भुत ज्ञान था।
​मृत्यु: ऐसा माना जाता है कि इनका निधन 1192 ईस्वी में गजनी (अफगानिस्तान) में हुआ। लोक मान्यता के अनुसार, इनका और पृथ्वीराज चौहान का अवसान भी एक ही दिन हुआ था।
​2. पृथ्वीराज चौहान के अभिन्न मित्र और दरबारी कवि
​चन्दबरदाई दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट महाराजा पृथ्वीराज चौहान तृतीय के राजकवि, अनन्य मित्र और युद्ध-सलाहकार (सामंत) थे।
​वे राजा के सुख-दुख के साथी थे। जब भी पृथ्वीराज चौहान किसी युद्ध में जाते, चन्दबरदाई उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते थे और अपनी कविताओं से सेना में वीर रस का संचार करते थे।
​3. अमर कृति: 'पृथ्वीराज रासो'
​चन्दबरदाई की ख्याति का मुख्य आधार उनका महाकाव्य 'पृथ्वीराज रासो' है।

​प्रथम महाकाव्य: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'पृथ्वीराज रासो' को हिंदी का प्रथम महाकाव्य और चन्दबरदाई को हिंदी का प्रथम महाकवि माना है।

​विषय वस्तु: इसमें पृथ्वीराज चौहान के जीवन, उनके शौर्य, युद्धों और संयोगिता के साथ उनके प्रेम विवाह का अत्यंत सजीव और सुंदर वर्णन है। इसमें वीर रस और शृंगार रस की प्रधानता है।
​ग्रंथ की पूर्णता: जब पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गोरी बंदी बनाकर गजनी ले गया, तब चन्दबरदाई भी उनके पीछे गजनी चल दिए। जाने से पहले उन्होंने पुस्तक का अधूरा काम अपने पुत्र जल्हण को सौंप दिया था। साहित्य में एक प्रसिद्ध उक्ति है:
​"पुस्तक जल्हण हत्थ दै, चलि गज्जन नृप काज।"
​4. गजनी की ऐतिहासिक घटना और प्रसिद्ध दोहा
​जब मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान की आँखें फोड़ दीं, तब चन्दबरदाई ने गजनी के दरबार में एक सुल्तान-वध की योजना बनाई। उन्होंने गोरी को पृथ्वीराज की 'शब्दभेदी बाण' चलाने की कला देखने के लिए राजी किया।
विशेष बिंदु.....
1. इनका जन्म 1148 ई. (लाहौर) में हुआ तथा ये महाराजा पृथ्वीराज चौहान के बालसखा व राजकवि थे।

सर्वश्रेष्ठ रचना

2. 'पृथ्वीराज रासो' को हिंदी साहित्य का प्रथम महाकाव्य स्वीकार किया जाता है।

3. इस महाकाव्य की मूल भाषा डिंगल-पिंगल (अपभ्रंश मिश्रित पुरानी हिंदी) है।

ग्रंथ की पूर्णता

4.चन्दबरदाई ने इस अधूरे ग्रंथ को अपने पुत्र जल्हण को सौंपा था ("पुस्तक जल्हण हत्थ दै...")।

संरचना व छंद

5.पृथ्वीराज रासो में कुल 69 समय (अध्याय) और 68 प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ है।

6.चन्दबरदाई को 'छप्पय छंद' का विशेषज्ञ (राजा) माना जाता है।

साहित्यिक रस

7. इस महाकाव्य का मुख्य अंगी रस वीर रस है तथा सहयोगी रस शृंगार रस है।

प्रामाणिकता पर मत

8. प्रामाणिक मानने वाले: श्यामसुंदर दास, मिश्रबंधु, कर्नल टॉड।

9.अप्रामाणिक मानने वाले: रामचंद्र शुक्ल, कविराज श्यामलदान, डॉ. वूलर।

10. अर्ध-प्रामाणिक मानने वाले: हजारीप्रसाद द्विवेदी, मुनि जिनविजय।

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