28/05/2026
भारतेंदु युग के प्रमुख निबंधकार पंडित प्रताप नारायण मिश्र के बारे में संपूर्ण जानकारी
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पंडित प्रतापनारायण मिश्र (भारतेंदु युग) का जीवन परिचय .......
"भारतेंदु युग के प्रखर निबंधकार, कवि और 'ब्राह्मण' पत्र के यशस्वी संपादक पंडित प्रतापनारायण मिश्र (1856–1894) ने अपनी जीवंत, विनोदी और ठेठ पूर्वी शैली से हिंदी गद्य को एक नई दिशा प्रदान की।"
काव्य कृतियां (कविता संग्रह)
१.प्रेम-पुष्पावली
(प्रमुख काव्य संग्रह)
२ मन की लहर
(लोकप्रिय सामाजिक-राजनीतिक कविताएं)
३.प्रताप-लहरी
४.लोकोक्ति-शतक
५.तृप्यन्ताम्
६.दंगल खंड/भैंसों का मरसिया
(व्यंग्यात्मक शैली)
७.हल्दीघाटी(देशभक्ति पूर्ण काव्य)
2. नाटक एवं रूपक:
1.कलि-कौतुक रूपक (सामाजिक कुरीतियों पर तीखा व्यंग्य)
2.हठी हम्मीर (ऐतिहासिक नाटक - रणथंभौर के राव हम्मीर देव पर आधारित)
3.संगीत शाकुंतल (लावनियों के रूप में अनूदित रूपक)
4.भारत-दुर्दशा (रूपक)
3. निबंध संग्रह एवं गद्य रचनाएं:
१.प्रताप-पीयूष (निबंधों का सर्वश्रेष्ठ संग्रह)
२.निबंध-नवनीत
(विशेष: इन्होंने 'भौंह', 'पेट', 'नाक', 'दांत', 'मूंछ' और 'बात' जैसे साधारण विषयों पर अत्यंत गंभीर और विनोदात्मक निबंध लिखे हैं)
4. संपादन एवं पत्रकारिता:
'ब्राह्मण' (मासिक पत्र): सन् 1883 में कानपुर से इसका संपादन शुरू किया। इस पत्र के माध्यम से इन्होंने हिंदी भाषा और समाज सुधार की अलख जगाई।
क्विक साहित्यिक फैक्ट्स
मूल मंत्र:
इनका एक प्रसिद्ध नारा बहुत लोकप्रिय हुआ था— "जपो निरंतर एक जबान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान।"
लेखन शैली:
इनकी शैली में कानपुर की ठेठ पूर्वी बोली, मुहावरों और हास्य-व्यंग्य का अद्भुत पुट मिलता है। इन्हें भारतेंदु हरिश्चंद्र का सच्चा प्रतिरूप माना जाता है।
प्रताप नारायण मिश्र के बारे में महत्वपूर्ण बिंदु
1.जन्म और स्थान:
इनका जन्म 1856 ई. में बैजनाथ (उन्नाव), उत्तर प्रदेश में हुआ था, लेकिन इनकी कर्मभूमि कानपुर रही।
2.युग प्रतिनिधित्व:
ये आधुनिक काल के भारतेंदु मंडल/युग के सबसे प्रमुख और सक्रिय लेखक माने जाते हैं।
प्रसिद्ध नारा: इन्होंने हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए "जपो निरंतर एक जबान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान" का प्रसिद्ध नारा दिया था।
3.पत्रकारिता:
इन्होंने सन् 1883 ई. में कानपुर से प्रसिद्ध मासिक पत्र 'ब्राह्मण' का संपादन और प्रकाशन शुरू किया था।
4.आर्थिक संघर्ष: '
ब्राह्मण' पत्र के चंदे के लिए इन्होंने अपने पाठकों से "आठ मास बीते जजमान, अब तो करो दच्छिना दान" की प्रसिद्ध याचना की थी।
5.उपनाम/उपाधि:
रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी गद्य साहित्य में इनके महत्व को देखते हुए इन्हें "हिंदी का एडिसन" कहा है (जबकि बालकृष्ण भट्ट को 'स्टील' कहा)।
6.निबंधों की विशेषता:
इन्होंने 'बात', 'भौं', 'मूंछ', 'नाक', 'पेट', 'दांत' और 'वृद्ध' जैसे अत्यंत साधारण और अनूठे विषयों पर उच्च कोटि के मनोरंजक निबंध लिखे।
7.प्रमुख निबंध संग्रह:
इनके निबंधों का सबसे प्रामाणिक और प्रसिद्ध 8.संकलन
'प्रताप-पीयूष' नाम से जाना जाता है।
9.सर्वश्रेष्ठ नाटक:
इनका 'हठी हम्मीर' एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक है, जिसमें राजा हम्मीर देव के हठ और शौर्य की कथा है।
10.व्यंग्य नाटक:
इनका 'कलि-कौतुक रूपक' नाटक समाज में व्याप्त पाखंड, वेश्यागमन और कुरीतियों पर तीखा प्रहार करता है।
11.प्रतिनिधि कविता:
'मन की लहर' इनकी देश-दशा और समाज सुधार को दर्शाने वाली सबसे लोकप्रिय काव्य कृति है।
12.उर्दू शायरी:
ये उर्दू में 'रसाम' उपनाम से गजलें और शायरी लिखा करते थे।
13.शैली की पहचान:
इनकी गद्य शैली की मुख्य विशेषता 'अल्हड़पन', 'पूर्वीपन' (कानपुरी ठेठ शब्द) और 'हास्य-व्यंग्य' का सटीक पुट है।
14.अल्पायु अवसान: मात्र 38 वर्ष की अल्पायु में 1894 ई. में कानपुर में इनका निधन हो गया था।