Mahamrityunjay Trust, Palwal

Mahamrityunjay Trust, Palwal This trust is to provide Hearse for the co**se from his/her residence to Moksh Dham free of cost for the residents of Palwal City.

The main objective of “Mahamrityunjay Trust, Palwal” is to provide Hearse (शव वाहन) for the dead body of human being from his/her residence to Moksh Dham or from any Hospital of Palwal City to his/her residence free of cost for the residents of Palwal City.

16/06/2022

क्यों पड़ते है श्री जगन्नाथ भगवान प्रत्येक वर्ष बीमार...... ????
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ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा से भगवान श्री जगन्नाथ आज भी रोगी हो जाते हैं। इस दिन से अगले 15 दिनों तक जगन्नाथ भगवान बीमार रहते हैं। 15 दिन के लिए मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं और उनकी रसोई बंद कर दी जाती है। भगवान् जगन्नाथ के बीमाऱ होने से जुडी एक प्राचीन कथा इस प्रकार हैं।

उड़ीसा प्रान्त में जगन्नाथ पूरी में एक भक्त रहते थे , श्री माधव दास जी अकेले रहते थे, कोई संसार से इनका लेना देना नही।

अकेले बैठे बैठे भजन किया करते थे, नित्य प्रति श्री जगन्नाथ प्रभु का दर्शन करते थे और उन्ही को अपना सखा मानते थे, प्रभु के साथ खेलते थे।

प्रभु इनके साथ अनेक लीलाए किया करते थे | प्रभु इनको चोरी करना भी सिखाते थे भक्त माधव दास जी अपनी मस्ती में मग्न रहते थे |

एक बार माधव दास जी को अतिसार( उलटी – दस्त ) का रोग हो गया। वह इतने दुर्बल हो गए कि उठ-बैठ नहीं सकते थे, पर जब तक इनसे बना ये अपना कार्य स्वयं करते थे और सेवा किसी से लेते भी नही थे।

कोई कहे महाराजजी हम कर दे आपकी सेवा तो कहते नही मेरे तो एक जगन्नाथ ही है वही मेरी रक्षा करेंगे । ऐसी दशा में जब उनका रोग बढ़ गया वो उठने बेठने में भी असमर्थ हो गये ,

तब श्री जगन्नाथजी स्वयं सेवक बनकर इनके घर पहुचे और माधवदासजी को कहा की हम आपकी सेवा कर दे।

भक्तो के लिए अपने क्या क्या नही किया…
क्यूंकि उनका इतना रोग बढ़ गया था की उन्हें पता भी नही चलता था की कब मल मूत्र त्याग देते थे। वस्त्र गंदे हो जाते थे।

उन वस्त्रो को जगन्नाथ भगवान अपने हाथो से साफ करते थे, उनके पुरे शरीर को साफ करते थे, उनको स्वच्छ करते थे।

कोई अपना भी इतनी सेवा नही कर सके, जितनी जगन्नाथ भगवान ने भक्त माधव दास जी की करी है।

भक्त माधव दास जी पर प्रभु का स्नेह.........

जब माधवदासजी को होश आया,तब उन्होंने तुरंत पहचान लीया की यह तो मेरे प्रभु ही हैं।
एक दिन श्री माधवदासजी ने पूछ लिया प्रभु से –

“प्रभु आप तो त्रिभुवन के मालिक हो, स्वामी हो, आप मेरी सेवा कर रहे हो आप चाहते तो मेरा ये रोग भी तो दूर कर सकते थे, रोग दूर कर देते तो ये सब करना नही पड़ता”

ठाकुरजी कहते हा देखो माधव! मुझसे भक्तों का कष्ट नहीं सहा जाता,इसी कारण तुम्हारी सेवा मैंने स्वयं की। जो प्रारब्द्ध होता है उसे तो भोगना ही पड़ता है।

अगर उसको काटोगे तो इस जन्म में नही पर उसको भोगने के लिए फिर तुम्हे अगला जन्म लेना पड़ेगा और मै नही चाहता की मेरे भक्त को ज़रा से प्रारब्द्ध के कारण अगला जन्म फिर लेना पड़े,

इसीलिए मैंने तुम्हारी सेवा की लेकिन अगर फिर भी तुम कह रहे हो तो भक्त की बात भी नही टाल सकता

भक्तो के सहायक बन उनको प्रारब्द्ध के दुखो से, कष्टों से सहज ही पार कर देते है प्रभु
अब तुम्हारे प्रारब्द्ध में ये 15 दिन का रोग और बचा है, इसलिए 15 दिन का रोग तू मुझे दे दे
15 दिन का वो रोग जगन्नाथ प्रभु ने माधवदास जी से ले लिया

आज भी इसलिए जगन्नाथ भगवान होते है बीमार.......

वो तो हो गयी तब की बात पर भक्त वत्सलता देखो आज भी वर्ष में एक बार जगन्नाथ भगवान को स्नान कराया जाता है ( जिसे स्नान यात्रा कहते है )

स्नान यात्रा करने के बाद हर साल 15 दिन के लिए जगन्नाथ भगवान आज भी बीमार पड़ते है।

15 दिन के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है कभी भी जगनाथ भगवान की रसोई बंद नही होती पर इन 15 दिन के लिए उनकी रसोई बंद कर दी जाती है।

भगवान को 56 भोग नही खिलाया जाता , ( बीमार हो तो परहेज़ तो रखना पड़ेगा )

प्रभु को लगाया जाता है काढ़ो का भोग.........

15 दिन जगन्नाथ भगवान को काढ़ो का भोग लगता है। इस दौरान भगवान को आयुर्वेदिक काढ़े का भोग लगाया जाता है। जगन्नाथ धाम मंदिर में तो भगवान की बीमारी की जांच करने के लिए हर दिन वैद्य भी आते हैं।

काढ़े के अलावा फलों का रस भी दिया जाता है। वहीं रोज शीतल लेप भी लगया जाता है। बीमार के दौरान उन्हें फलों का रस, छेना का भोग लगाया जाता है और रात में सोने से पहले मीठा दूध अर्पित किया जाता है।

भगवान जगन्नाथ बीमार हो गए है और अब 15 दिनों तक आराम करेंगे। आराम के लिए 15 दिन तक मंदिरों पट भी बंद कर दिए जाते है और उनकी सेवा की जाती है। ताकि वे जल्दी ठीक हो जाएं।

जिस दिन वे पूरी तरह से ठीक होते है उस दिन जगन्नाथ यात्रा निकलती है, जिसके दर्शन हेतु असंख्य भक्त उमड़ते है।

खुद पे तकलीफ ले कर अपने भक्तो का जीवन सुखमयी बनाये। ऐसे तो सिर्फ मेरे भगवान ही हो सकते है

25/05/2022

खाटू श्याम बाबा की कहानी .....

📢राजस्थान के सीकर जिले में श्री खाटू श्याम जी का सुप्रसिद्ध मंदिर है. वैसे तो खाटू श्याम बाबा के भक्तों की कोई गिनती नहीं लेकिन इनमें खासकर वैश्य, मारवाड़ी जैसे व्यवसायी वर्ग अधिक संख्या में है. श्याम बाबा कौन थे, उनके जन्म और जीवन चरित्र के बारे में जानते हैं इस लेख में.

खाटू श्याम जी का असली नाम बर्बरीक है. महाभारत की एक कहानी के अनुसार बर्बरीक का सिर राजस्थान प्रदेश के खाटू नगर में दफना दिया था. इसीलिए बर्बरीक जी का नाम खाटू श्याम बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुआ. वर्तमान में खाटूनगर सीकर जिले के नाम से जाना जाता है. खाटू श्याम बाबा जी कलियुग में श्री कृष्ण भगवान के अवतार के रूप में माने जाते हैं.
✍️✍️ #राधे_राधे 🙏🙏

श्याम बाबा घटोत्कच और नागकन्या नाग कन्या मौरवी के पुत्र हैं. पांचों पांडवों में सर्वाधिक बलशाली भीम और उनकी पत्नी हिडिम्बा बर्बरीक के दादा दादी थे. कहा जाता है कि जन्म के समय बर्बरीक के बाल बब्बर शेर के समान थे, अतः उनका नाम बर्बरीक रखा गया. बर्बरीक का नाम श्याम बाबा (Shyam Baba) कैसे पड़ा, आइये इसकी कहानी जानते हैं.

बर्बरीक बचपन में एक वीर और तेजस्वी बालक थे. बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण और अपनी माँ मौरवी से युद्धकला, कौशल सीखकर निपुणता प्राप्त कर ली थी. बर्बरीक ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी, जिसके आशीर्वादस्वरुप भगवान ने शिव ने बर्बरीक को 3 चमत्कारी बाण प्रदान किए. इसी कारणवश बर्बरीक का नाम तीन बाणधारी के रूप में भी प्रसिद्ध है. भगवान अग्निदेव ने बर्बरीक को एक दिव्य धनुष दिया था, जिससे वो तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने में समर्थ थे.

जब कौरवों-पांडवों का युद्ध होने का सूचना बर्बरीक को मिली तो उन्होंने भी युद्ध में भाग लेने का निर्णय लिया. बर्बरीक अपनी माँ का आशीर्वाद लिए और उन्हें हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन देकर निकल पड़े. इसी वचन के कारण हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा यह बात प्रसिद्ध हुई.

जब बर्बरीक जा रहे थे तो उन्हें मार्ग में एक ब्राह्मण मिला. यह ब्राह्मण कोई और नहीं, भगवान श्री कृष्ण थे जोकि बर्बरीक की परीक्षा लेना चाहते थे. ब्राह्मण बने श्री कृष्ण ने बर्बरीक से प्रश्न किया कि वो मात्र 3 बाण लेकर लड़ने को जा रहा है ? मात्र 3 बाण से कोई युद्ध कैसे लड़ सकता है. बर्बरीक ने कहा कि उनका एक ही बाण शत्रु सेना को समाप्त करने में सक्षम है और इसके बाद भी वह तीर नष्ट न होकर वापस उनके तरकश में आ जायेगा. अतः अगर तीनों तीर के उपयोग से तो सम्पूर्ण जगत का विनाश किया जा सकता है.

ब्राह्मण ने बर्बरीक (Barbarik) से एक पीपल के वृक्ष की ओर इशारा करके कहा कि वो एक बाण से पेड़ के सारे पत्तों को भेदकर दिखाए. बर्बरीक ने भगवान का ध्यान कर एक बाण छोड़ दिया. उस बाण ने पीपल के सारे पत्तों को छेद दिया और उसके बाद बाण ब्राह्मण बने कृष्ण के पैर के चारों तरफ घूमने लगा. असल में कृष्ण ने एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा दिया था. बर्बरीक समझ गये कि तीर उसी पत्ते को भेदने के लिए ब्राह्मण के पैर के चक्कर लगा रहा है. बर्बरीक बोले – हे ब्राह्मण अपना पैर हटा लो, नहीं तो ये आपके पैर को वेध देगा.

श्री कृष्ण बर्बरीक के पराक्रम से प्रसन्न हुए. उन्होंने पूंछा कि बर्बरीक किस पक्ष की तरफ से युद्ध करेंगे. बर्बरीक बोले कि उन्होंने लड़ने के लिए कोई पक्ष निर्धारित किया है, वो तो बस अपने वचन अनुसार हारे हुए पक्ष की ओर से लड़ेंगे. श्री कृष्ण ये सुनकर विचारमग्न हो गये क्योकि बर्बरीक के इस वचन के बारे में कौरव जानते थे. कौरवों ने योजना बनाई थी कि युद्ध के पहले दिन वो कम सेना के साथ युद्ध करेंगे. इससे कौरव युद्ध में हराने लगेंगे, जिसके कारण बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ने आ जायेंगे. अगर बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ेंगे तो उनके चमत्कारी बाण पांडवों का नाश कर देंगे.

कौरवों की योजना विफल करने के लिए ब्राह्मण बने कृष्ण ने बर्बरीक से एक दान देने का वचन माँगा. बर्बरीक ने दान देने का वचन दे दिया. अब ब्राह्मण ने बर्बरीक से कहा कि उसे दान में बर्बरीक का सिर चाहिए. इस अनोखे दान की मांग सुनकर बर्बरीक आश्चर्यचकित हुए और समझ गये कि यह ब्राह्मण कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है. बर्बरीक ने प्रार्थना कि वो दिए गये वचन अनुसार अपने शीश का दान अवश्य करेंगे, लेकिन पहले ब्राह्मणदेव अपने वास्तविक रूप में प्रकट हों.

भगवान कृष्ण अपने असली रूप में प्रकट हुए. बर्बरीक बोले कि हे देव मैं अपना शीश देने के लिए बचनबद्ध हूँ लेकिन मेरी युद्ध अपनी आँखों से देखने की इच्छा है. श्री कृष्ण बर्बरीक ने बर्बरीक की वचनबद्धता से प्रसन्न होकर उसकी इच्छा पूरी करने का आशीर्वाद दिया. बर्बरीक ने अपना शीश काटकर कृष्ण को दे दिया. श्री कृष्ण ने बर्बरीक के सिर को 14 देवियों के द्वारा अमृत से सींचकर युद्धभूमि के पास एक पहाड़ी पर स्थित कर दिया, जहाँ से बर्बरीक युद्ध का दृश्य देख सकें. इसके पश्चात कृष्ण ने बर्बरीक के धड़ का शास्त्रोक्त विधि से अंतिम संस्कार कर दिया.

महाभारत का महान युद्ध समाप्त हुआ और पांडव विजयी हुए. विजय के बाद पांडवों में यह बहस होने लगी कि इस विजय का श्रेय किस योद्धा को जाता है. श्री कृष्ण ने कहा – चूंकि बर्बरीक इस युद्ध के साक्षी रहे हैं अतः इस प्रश्न का उत्तर उन्ही से जानना चाहिए. तब परमवीर बर्बरीक ने कहा कि इस युद्ध की विजय का श्रेय एकमात्र श्री कृष्ण को जाता है, क्योकि यह सब कुछ श्री कृष्ण की उत्कृष्ट युद्धनीति के कारण ही सम्भव हुआ. विजय के पीछे सबकुछ श्री कृष्ण की ही माया थी.

बर्बरीक के इस सत्य वचन से देवताओं ने बर्बरीक पर पुष्पों की वर्षा की और उनके गुणगान गाने लगे. श्री कृष्ण वीर बर्बरीक की महानता से अति प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा – हे वीर बर्बरीक आप महान है. मेरे आशीर्वाद स्वरुप आज से आप मेरे नाम श्याम से प्रसिद्ध होओगे. कलियुग में आप कृष्णअवतार रूप में पूजे जायेंगे और अपने भक्तों के मनोरथ पूर्ण करेंगे.

भगवान श्री कृष्ण का वचन सिद्ध हुआ

11/05/2022

#महामृत्युंजय_मंत्र की रचना और महिमा

#शिवजी के अनन्य भक्त मृकण्ड ऋषि संतानहीन होने के कारण दुखी थे. विधाता ने उन्हें संतान योग नहीं दिया था.

*मृकण्ड ने सोचा कि महादेव संसार के सारे विधान बदल सकते हैं. इसलिए क्यों न भोलेनाथ को प्रसन्नकर यह विधान बदलवाया जाए.

*मृकण्ड ने घोर तप किया. भोलेनाथ मृकण्ड के तप का कारण जानते थे इसलिए उन्होंने शीघ्र दर्शन न दिया लेकिन भक्त की भक्ति के आगे भोले झुक ही जाते हैं.

*महादेव प्रसन्न हुए. उन्होंने ऋषि को कहा कि मैं विधान को बदलकर तुम्हें पुत्र का वरदान दे रहा हूं लेकिन इस वरदान के साथ हर्ष के साथ विषाद भी होगा.

*भोलेनाथ के वरदान से मृकण्ड को पुत्र हुआ जिसका नाम मार्कण्डेय पड़ा. ज्योतिषियों ने मृकण्ड को बताया कि यह विलक्ष्ण बालक अल्पायु है. इसकी उम्र केवल 12 वर्ष है.

*ऋषि का हर्ष विषाद में बदल गया. मृकण्ड ने अपनी पत्नी को आश्वत किया- जिस ईश्वर की कृपा से संतान हुई है वही भोले इसकी रक्षा करेंगे. भाग्य को बदल देना उनके लिए सरल कार्य है.

*मार्कण्डेय बड़े होने लगे तो पिता ने उन्हें शिवमंत्र की दीक्षा दी. मार्कण्डेय की माता बालक के उम्र बढ़ने से चिंतित रहती थी. उन्होंने मार्कण्डेय को अल्पायु होने की बात बता दी.

*मार्कण्डेय ने निश्चय किया कि माता-पिता के सुख के लिए उसी सदाशिव भगवान से दीर्घायु होने का वरदान लेंगे जिन्होंने जीवन दिया है. बारह वर्ष पूरे होने को आए थे.*

*मार्कण्डेय ने शिवजी की आराधना के लिए महामृत्युंजय मंत्र की रचना की और शिव मंदिर में बैठकर इसका अखंड जाप करने लगे.*

्र्यम्बकं_यजामहे_सुगन्धिं_पुष्टिवर्धनम्_उर्वारुकमिव_बन्धनान्_मृत्योर्मुक्षीय_मामृताता॥

समय पूरा होने पर यमदूत उन्हें लेने आए. यमदूतों ने देखा कि बालक महाकाल की आराधना कर रहा है तो उन्होंने थोड़ी देर प्रतीक्षा की. मार्केण्डेय ने अखंड जप का संकल्प लिया था.

यमदूतों का मार्केण्डेय को छूने का साहस न हुआ और लौट गए. उन्होंने यमराज को बताया कि वे बालक तक पहुंचने का साहस नहीं कर पाए.

*इस पर यमराज ने कहा कि मृकण्ड के पुत्र को मैं स्वयं लेकर आऊंगा. यमराज मार्कण्डेय के पास पहुंच गए.*

बालक मार्कण्डेय ने यमराज को देखा तो जोर-जोर से महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग से लिपट गया.

*यमराज ने बालक को शिवलिंग से खींचकर ले जाने की चेष्टा की तभी जोरदार हुंकार से मंदिर कांपने लगा. एक प्रचण्ड प्रकाश से यमराज की आंखें चुंधिया गईं.

शिवलिंग से स्वयं महाकाल प्रकट हो गए. उन्होंने हाथों में त्रिशूल लेकर यमराज को सावधान किया और पूछा तुमने मेरी साधना में लीन भक्त को खींचने का साहस कैसे किया?

*यमराज महाकाल के प्रचंड रूप से कांपने लगे. उन्होंने कहा- प्रभु मैं आप का सेवक हूं. आपने ही जीवों से प्राण हरने का निष्ठुर कार्य मुझे सौंपा है.

*भगवान चंद्रशेखर का क्रोध कुछ शांत हुआ तो बोले- मैं अपने भक्त की स्तुति से प्रसन्न हूं और मैंने इसे दीर्घायु होने का वरदान दिया है. तुम इसे नहीं ले जा सकते.

*यम ने कहा- प्रभु आपकी आज्ञा सर्वोपरि है. मैं आपके भक्त मार्कण्डेय द्वारा रचित महामृत्युंजय का पाठ करने वाले को त्रास नहीं दूंगा.

#महाकाल की कृपा से मार्केण्डेय दीर्घायु हो गए. उनके द्वारा रचित महामृत्युंजय मंत्र काल को भी परास्त करता है🌷🌷जय श्री महाकाल🌷🌷

10/05/2022

#संस्कार

एक राजा के पास सुन्दर घोड़ी थी। कई बार युद्व में इस घोड़ी ने राजा के प्राण बचाये और वह घोड़ी राजा के लिए पूर्णतः वफादार थीI कुछ दिनों के बाद इस घोड़ी ने एक बच्चे को जन्म दिया किन्तु बच्चा काना पैदा हुआ अर्थात उसकी एक आंख जन्मजात खराब थी लेकिन उसका शरीर हृष्ट-पुष्ट व सुडौल था।

बच्चा बड़ा हुआ तो एक दिन बच्चे ने मां से प्रश्न किया- "मां मैं बहुत बलवान हूँ लेकिन मेरी एक आंख जन्म से ही खराब है।यह कैसे हो गया?"

अपने पुत्र के प्रश्न को उत्तरित करते हुए घोड़ी बोली-"बेटा, जब में गर्भवती थी तब एक दिन राजा ने मेरे ऊपर सवारी करते समय मुझे एक कोड़ा मार दिया था जिसके कारण तेरी एक आंख ज्योतिविहीन हो गई।"

सारी बात जानकर बच्चे को राजा पर गुस्सा आया और मां से बोला: "मां, अब मैं इसका बदला राजा से लूंगा।"

मां ने कहा- "राजा ने हमारा पालन-पोषण किया है बेटा, तू जो स्वस्थ है....सुन्दर है, उन्हीं के पोषण से तो है। यदि राजा को एक बार किसी बात पर गुस्सा आ गया तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम उसे क्षति पहुंचाएं।"

घोड़ी की यह समझदारी भरी बात उसके बच्चे की समझ में नहीं आई। उसने मन ही मन राजा से बदला लेने का दृढ़ निश्चय कर लिया।

एक दिन ऐसा भी आ गया जब घोड़े को राजा के साथ युद्व में जाने का अवसर मिल गया। युद्व लड़ते-लड़ते राजा घायल हो गया। घोड़ा उसे तुरन्त उठाकर वापस महल ले आया।

महल पर पहुंच कर घोड़े को स्वयं आश्चर्य हुआ कि वह राजा को घायल अवस्था में वापस क्यों ले आया जबकि उसने तो बदला लेने का प्रण कर रखा था?उसने अपनी दुविधा को मां से कहा- "मां, आज राजा से बदला लेने का अच्छा अवसर था था मगर मुझे युद्व के मैदान में बदला लेने का ख्याल ही नहीं आया और न ही मैं ले पाया। मन ने इसे स्वीकार ही नहीं किया।"

अपने बेटे की इस बात पर घोड़ी ने हंस कर बोली-"बेटा, तेरे खून में और तेरे संस्कार में धोखा है ही नहीं। तू जानकर तो धोखा दे ही नहीं सकता है।तुझ से नमक हरामी हो ही नहीं सकती क्योंकि तेरी नस्ल में तेरी मां का ही तो अंश है।"

घोड़े की आशंका का समाधान हो गया।

यह सत्य है कि जैसे हमारे संस्कार होते है, वैसा ही हमारे मन का व्यवहार होता है, हमारे पारिवारिक-संस्कार अवचेतन मस्तिष्क में गहरे बैठ जाते हैं, माता-पिता जिस संस्कार के होते हैं, उनके बच्चे भी उसी संस्कारों को लेकर पैदा होते हैं।

संस्कार मनुष्य को आचरणवान और चरित्रवान बनाते हैं। संस्कार मनुष्य जीवन को परिष्कार एवं शुद्धि प्रदान करते हैं तथा मनुष्य को पवित्रता प्रदान करके व्यक्तित्व को निखारते हैं। संस्कार मनुष्यों को सामाजिक एवं आध्यात्मिक नागरिक बनाने में सहयोग करते हैं। संस्कार मानव के समाजीकरण में सहयोगी होते हैं।

हमारे कर्म ही 'संस्‍कार' बनते हैं और संस्कार ही प्रारब्धों का रूप लेते हैं! यदि हम कर्मों को सही व बेहतर दिशा दे दें तो संस्कार अच्छे बनेगें और संस्कार अच्छे बनेंगे तो जो प्रारब्ध का फल बनेगा, वह मीठा व स्वादिष्ट होगा।

🏹💢🏹 ्री_राम🏹💢🏹

06/05/2022

*🌸 नर्मदा नदी के हर पत्थर में है शिव, आखिर क्यों ?🙏🏻🌸*

नर्मदेश्वर शिवलिंग के सम्बन्ध में एक धार्मिक कथा है –भारतवर्ष में गंगा, यमुना, नर्मदा और सरस्वती ये चार नदियां सर्वश्रेष्ठ हैं। इनमें भी इस भूमण्डल पर गंगा की समता करने वाली कोई नदी नहीं है। प्राचीनकाल में नर्मदा नदी ने बहुत वर्षों तक तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने वर मांगने को कहा। तब नर्मदाजी ने कहा–’ब्रह्मन्! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे गंगाजी के समान कर दीजिए।’ब्रह्माजी ने मुस्कराते हुए कहा–’यदि कोई दूसरा देवता भगवान शिव की बराबरी कर ले, कोई दूसरा पुरुष भगवान विष्णु के समान हो जाए, कोई दूसरी नारी पार्वतीजी की समानता कर ले और कोई दूसरी नगरी काशीपुरी की बराबरी कर सके तो कोई दूसरी नदी भी गंगा के समान हो सकती है। ब्रह्माजी की बात सुनकर नर्मदा उनके वरदान का त्याग करके काशी चली गयीं और वहां पिलपिलातीर्थ में शिवलिंग की स्थापना करके तप करने लगीं। भगवान शंकर उन पर बहुत प्रसन्न हुए और वर मांगने के लिए कहा। तब नर्मदा ने कहा–’भगवन्! तुच्छ वर मांगने से क्या लाभ? बस आपके चरणकमलों में मेरी भक्ति बनी रहे। नर्मदा की बात सुनकर भगवान शंकर बहुत प्रसन्न हो गए और बोले–’नर्मदे! तुम्हारे तट पर जितने भी प्रस्तरखण्ड (पत्थर) हैं, वे सब मेरे वर से शिवलिंगरूप हो जाएंगे। गंगा में स्नान करने पर शीघ्र ही पाप का नाश होता है, यमुना सात दिन के स्नान से और सरस्वती तीन दिन के स्नान से सब पापों का नाश करती हैं, परन्तु तुम दर्शनमात्र से सम्पूर्ण पापों का निवारण करने वाली होगी। तुमने जो नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना की है, वह पुण्य और मोक्ष देने वाला होगा।’ भगवान शंकर उसी लिंग में लीन हो गए। इतनी पवित्रता पाकर नर्मदा भी प्रसन्न हो गयीं। इसलिए कहा जाता है–‘नर्मदा का हर कंकर शंकर है।

हर हर महादेव

23/04/2022

★★★सत्संग की महिमा, पढ़े नारद की ये कथा-

★एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु के पास गए और प्रणाम करते हुए बोले, “भगवान मुझे सत्संग की महिमा सुनाइये।” भगवान मुस्कराते हुए बोले, नारद! तुम यहां से आगे जाओ, वहां इमली के पेड़ पर एक रंगीन प्राणी मिलेगा। वह सत्संग की महिमा जानता है, वही तुम्हें भी समझाएगा भी।

नारद जी खुशी-खुशी इमली के पेड़ के पास गए और गिरगिट से बातें करने लगे। उन्होंने गिरगिट से सत्संग की महिमा के बारे में पूछा। सवाल सुनते ही वह गिरगिट पेड़ से नीचे गिर गया और छटपटाते हुए प्राण छोड़ दिए। नारदजी आश्चर्यचकित होकर लौट आए और भगवान को सारा वृत्तांत सुनाया।

भगवान ने मुस्कराते हुए कहा, इस बार तुम नगर के उस धनवान के घर जाओ और वहां जो तोता पिंजरे में दिखेगा, उसी से सत्संग की महिमा पूछ लेना। नारदजी क्षण भर में वहां पहुंच गए और तोते से सत्संग का महत्व पूछा। थोड़ी देर बाद ही तोते की आंखें बंद हो गईं और उसके भी प्राणपखेरू उड़ गए। इस बार तो नारद जी भी घबरा गए और दौड़े-दौड़े भगवान कृष्ण के पास पहुंचे!

नारद जी कहा, भगवान यह क्या लीला है। क्या सत्संग का नाम सुनकर मरना ही सत्संग की महिमा है?” भगवान हंसते हुए बोले, यह बात भी तुमको जल्द ही समझ आ जाएगी। इस बार तुम नगर के राजा के महल में जाओ और उसके नवजात पुत्र से अपना प्रश्न पूछो।”

नारदजी तो थरथर कांपने लगे और बोले, अभी तक तो पक्षी ही अपने प्राण छोड़ रहे थे। इस बार अगर वह नवजात राजपुत्र मर गया तो राजा मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा।” भगवान ने नारदजी को अभयदान दिया। नारदजी दिल मुट्ठी में रखकर राजमहल में आए। वहां उनका बड़ा सत्कार किया गया। अब तक राजा को कोई संतान नहीं थी। अतः पुत्र के जन्म पर बड़े आनन्दोल्लास से उत्सव मनाया जा रहा था।

नारदजी ने डरते-डरते राजा से पुत्र के बारे में पूछा। नारदजी को राजपुत्र के पास ले जाया गया। पसीने से तर होते हुए, मन-ही-मन श्रीहरि का नाम लेते हुए नारदजी ने राजपुत्र से सत्संग की महिमा के बारे में प्रश्न किया तो वह नवजात शिशु हंस पड़ा और बोलाः “महाराज! चंदन को अपनी सुगंध और अमृत को अपने माधुर्य का पता नहीं होता। ऐसे ही आप अपनी महिमा नहीं जानते, इसलिए मुझसे पूछ रहे हैं।

★वास्तव में आप ही के क्षणमात्र के संग से मैं गिरगिट की योनि से मुक्त हो गया और आप ही के दर्शनमात्र से तोते की क्षुद्र योनि से मुक्त होकर इस मनुष्य जन्म को पा सका। आपके सान्निध्यमात्र से मेरी कितनी सारी योनियां कट गईं और मैं सीधे मानव-तन में ही नहीं पहुंचा अपीतू राजपुत्र भी बना। यह सत्संग का ही अदभुत प्रभाव है। बालक बोला- हे ऋषिवर, अब मुझे आशीर्वाद दें कि मैं मनुष्य जन्म के परम लक्ष्य को पा लूं।

★नारदजी ने खुशी-खुशी आशीर्वाद दिया और भगवान श्री हरि के पास जाकर सब कुछ बता दिया। भगवान ने कहा, सचमुच, सत्संग की बड़ी महिमा है। संत का सही गौरव या तो संत जानते हैं या उनके सच्चे प्रेमी भक्त!

!!!!! इति, शुभमस्तु !!!!!

20/04/2022

#रामायण: आठ प्रश्नों के उत्तर, जो कम ही लोगों को पता हैं ?
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रामायण हो या महाभारत दोनों ही धर्म ग्रंथ हिंदू धर्म मानने वालों के लिए बहुत पूजनीय है। इनसे जुड़ी कई बातें ऐसी हैं, जो इन ग्रंथों के बारे में जब देखने या सुनने को मिलती है तो कई प्रश्न दिमाग में आने लगते हैं। यदि आपके दिमाग में भी कई बार ऐसे ही प्रश्न उठे हैं तो हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ ऐसे रोचक प्रश्नों के उत्तर जो आपकी जिज्ञासा शांत करने के साथ ही आपके ज्ञान को भी बढ़ाएंगे। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ प्रश्नों के उत्तर...

प्रश्न1. #श्रीराम ने बाली पर पीछे से वार क्याें किया?

उत्तर: श्रीराम के द्वारा बाली के वध की कथा रामचरितमानस के किष्किंधा कांड में मिलती है। यह एक विवादित प्रश्न रहा है कि
मर्यादा के रक्षक श्रीराम ने बाली का वध पीछे से क्याें किया। तुलसीदासजी नेे एक चौपाई- धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि ब्याध की नाईं।
के जरिए इस प्रश्न काेे उठाया हैै यानी बाली नेे मरते वक्त पूछा कि हे राम आपने धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया, लेकिन मुझे शिकारी की तरह छुपकर क्याें मारा। इसका उत्तर अगली चाैपाई में रामजी देते हैं।

अनुज बधू भगिनी सुत नारी।सुनु सठ कन्या सम ए चारी।
इन्हहि कुदृष्टि बिलाकइ जोई। ताहि बंधें कुछ पाप न होई।

यानी रामजी बोले अरे मूर्ख सुन। छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्र की पत्नी और बेटी ये चारों समान हैं। इनको जो बुरी दृष्टि से देखता है उसे मारने में कोई पाप नहीं है। ध्यान रहे बाली ने सुग्रीव को न केवल राज्य से निकाला था, बल्कि उसकी पत्नी भी छीन ली थी। भगवान का क्रोध इसलिए था कि जो व्यक्ति स्त्री का सम्मान नहीं करता उसे सामने से मारने या छुपकर मारने में कोई अंतर नहीं है। मूल बात है उसे दंड मिले। आखिरकार भगवान ने बाली को दंड दिया।

प्रश्न 2. सीता ने स्वयंवर के जरिए ही राम को क्यों चुना?

उत्तर: स्वयंवर दो शब्द का जोड़ है- स्वयं अौर वर। आशय है वधू स्वयं ही अपना वर चुने। प्राचीनकाल से भारत में यह प्रथा थी। जिसके अंर्तगत कन्या को यह अधिकार था कि वह अपने अनुकूल वर का चयन स्वयं करें। पार्वती द्वारा शिव का चयन, सीता का स्वयंवर और द्रोपदी का अर्जुन के साथ विवाह हमेशा इसी परंपरा के उदाहरण है।
राम और कृष्ण युग में इस प्रथा के साथ वर का शौर्य प्रदर्शन भी जुड़ गया था। राम को जनक के दरबार मे भगवान शंकर का धनुष उठाने पर सीता और अर्जुन को मछली की आंख बाण से भेदने पर ही द्राेपदी मिली।

सीता के स्वयंवर की कथा वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस के बालकांड सहित सभी रामकथाओं में मिलती है। वाल्मीकि रामायण में जनक द्वारा सीता के लिए वीर्य शुल्क का संबोधन मिलता है। जिसका अर्थ है जनक ने यह निश्चय किया था कि जो व्यक्ति अपने पराक्रम के प्रदर्शन रूपी शुल्क को देने में समर्थ होगा, वही सीता से विवाह कर सकेगा।

इस अर्थ में वीर्यशुल्का कन्या सीता के लिए स्वयंवर का आयोजन किया गया। एक तरह से यह प्रथा तात्कालीन समाज में स्त्री की सशक्तता का श्रेष्ठ उदाहरण है। जिसमे अपना जीवन साथी चुनने के लिए पिता का आग्रह या दुराग्रह न होकर कन्या को ही वर चयन का सामाजिक अधिकार प्राप्त था।

प्रश्न 3.भरत #राजगद्दी पर क्यों नहीं बैठे?

उत्तर: दशरथ के चार पुत्रों में भरत दशरथ की प्रिय रानी कैकेयी से जन्मे थे। श्रीरामकथा में सारा विवाद इन्हीं को लेकर हुआ। दशरथ ने जब राम को राजा बनाने की तैयारी की तब कैकेयी भरत को राज्य देने के लिए अड़ गई। पहले दिए वचनों से बंधे होने के कारण दशरथ ने राम को वनवास दिया आैर भरत के लिए राज्य की सहमति दी। इसी के साथ दशरथ के प्राणों का अंत हो गया। राम व लक्ष्मण सीता के साथ वन चले गए। इस पूरे घटनाक्रम के समय भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्न के साथ ननिहाल में थे।
लौटने पर जब उन्हें विवाद का कारण पता चला तो वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने राम को वन से वापस अयोध्या लाने की बहुत कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिलने पर वे राम की खड़ाऊं ही ले आए और उसे राजगद्दी पर विराजित कर राजकाज चलाया। राम के वनवास की अवधि 14 वर्ष थी। उस दौरान भरत भी अयोध्या के पास नंदीग्राम में तपस्वी जीवन जीते रहे। भरत का चरित्र राज्य के बजाए भातृ प्रेम और त्याग का उदाहरण है। उन्होंने राजा बनाए जाने के बावजूद इसलिए राज्य नहीं लिया,क्योंकि वे परिवार में धन के लिए विवाद का कारण नहीं बनना चाहते थे। भरत का त्याग उन्हें यशस्वी बना गया।
प्रश्न 4. मंथरा का श्रीराम से क्या बैर था?

उत्तर: मंथरा #रामकथा की एक महत्वपूर्ण पात्र है, जो दशरथ की सबसे प्रिय और सुंदर रानी कैकयी की दासी थी और विवाह में पिता द्वारा कैकयी को दहेज में दी गई थी। मंथरा ने ही कैकयी को भड़काया था, जिसके कारण कैकयी ने राम के राज्याभिषेक में विघ्न डाला और मंथरा के ही बताए गए दो वचन दशरथ से मांग कर पूरे राज परिवार को संकट में डाल दिया। वाल्मीकि रामायण और श्रीरामचरित मानस सहित रामकथाओं के अन्य संस्करणों में मंथरा का चरित्र और उसकी भूमिका अक्सर एक सी दी गई है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने अपनी रामचरितमानस के अयोध्याकांड में इसे पीछे देवताओं की भूमिका का भी उल्लेख किया है।

संदर्भ है कि जब दशरथ ने राम को राजा बनाने का निश्चय किया और अवध में तैयारियां शुरू हुई, देवता घबरा गए। उनका उद्देश्य था राम वन में जाए ताकि इस बहाने रावण सहित अन्य राक्षसों का वध हो सके। यही कारण था कि राम का अवतार हुआ था, लेकिन जब राज्यभिषेक की तैयारी शुरू हुई। तब राम को वन भेजने के उद्देश्य से देवताओं ने ज्ञान की देवी सरस्वती के जरिए कैकयी की दासी मंथरा की मति फेर दी। परिणामस्वरूप मंथरा के मन में मोह, लोभ और क्रोध के विकार जन्मे और उसने कैकयी को भड़का दिया। मंथरा का राम से बैर तो नहीं था, लेकिन वह तुलसीदासजी के शब्दों में अपनी एक गलती से हमेशा के लिए अपयश का पात्र बन गई।

प्रश्न 5. #श्रवण_कुमार की कथा का क्या महत्व है?
उत्तर: श्रवण का अर्थ सुनना और एक नक्षत्र के नाम के रूप में ग्रहण किया गया है, लेकिन श्रीरामकथा में श्रवणकुमार एक महत्वपूर्ण पात्र है। जिसके बारे में वाल्मीकि रामायण अयोध्याकांड के 64 वें अध्याय में कथा मिलती है। श्रीराम के वनगमन पर दुखी दशरथ अपनी मृत्यु से पहले रानी कौशल्या को यह कथा बताते हैं। इसके अनुसार दशरथ शब्द भेदी बाण चलाते थे यानी शब्द व ध्वनि सुनकर बाण चलाने में समर्थ थे।

एक दिन हिंसक पशु के भ्रम में उन्होंने एक मुनि के जिनके माता-पिता वृद्ध और नेत्रहीन थे, पर बाण चला दिया।अपने एकलौते पुत्र का वध सुन मुनि दशरथ को पुत्र वियोग में प्राण त्यागने का श्राप दिया था। अपने अंतिम समय में दशरथ ने कौशल्या को बताया कि उनके प्राण भी पुत्र वियोग में जाएंगे, क्योंकि उनके हाथों मुनि कुमार के वध का पाप हो चुका है और वे मुनि के श्राप से ग्रस्त हैं। रामायण में मुनि कुमार ही मिलता है, श्रवण नाम नहीं, लेकिन अन्य पुराणों में यही कथा श्रवण के रूप में मिलती है। जिसके बारे में यह भी कहा जाता है कि वह कावड़ में बैठाकर अपने माता-पिता को तीर्थ यात्रा पर ले गया था।

प्रश्न 6. #राम_सेतु_निर्माण में पत्थर कैसे तैर गए?

उत्तर: माता सीता की खोज के लिए जब प्रभु राम की सेना लंका की ओर चली, तो रास्ते में विशाल समुद्र बड़ी बाधा बनकर उपस्थित हुआ। सेना सहित समुद्र को पार करना लगभग असंभव था। तीन दिन की प्रतीक्षा के बाद जब कोई हल न निकला तो श्रीराम ने गुस्से से अपना धनुष-बाण उठाया और मानव रूप धरकर प्रकट हुए समुद्र ने उन्हें पुल निर्माण का सुझाव दिया। इसमें बढ़ी बाधा यह थी कि समुद्र की तेज लहरों पर पत्थर कैसे टिकेंगे। समुद्र ने ही इसका समाधान किया।

उसने प्रभु श्रीराम को बताया कि उनकी सेना में नल और नील नाम के दो वानर हैं, जिन्हें बाल्यकाल में एक ऋषि से आशीर्वाद मिला था कि उनसे स्पर्श किए पत्थर पानी में तैर जाएंगे। श्रीराम की आज्ञा से नल व नील ने सभी पत्थरों को अपने हाथों से स्पर्श कर वानरों को देते गए, क्योंकि नल और नील पत्थर तैराने संबंधित विशिष्ट वरदान से विभूषित थे। इसलिए सारे पत्थर तैर गए और पुल निर्माण आसान हो गया। यह प्रतीकात्मक है। दरअसल नल और नील पुल निर्माण के विशेषज्ञ इंजीनियर थे। समुद्र ने केवल सेना में उनकी उपस्थिति का परिचय भर कराया। बस फिर क्या था श्रीराम की कृपा से प्रसिद्ध राम सेतु बन गया।

प्रश्न 7. #रावण के दस सिर क्यों थे?

उत्तर: रावण मुनि विश्रवा और कैकसी के चार बच्चो में सबसे बड़ा पुत्र था। वाल्मीकि रामायण के उतराखंड में विश्रवा की संतानों के जन्म की कथा में प्रसंग है कि रावण दस मस्तक, बड़ी दाढ़ी, तांबे जैसे होंठ, विशाल मुख और बीस भुजाओं के साथ जन्मा था। उसका शरीर का रंग कोयले के समान काला था।उसके पिता ने उसकी दस ग्रीवा देखी तो उसका नाम दशग्रीव रखा। दस गर्दन यानी दस सिर वाला।
यही कारण है कि रावण दशानन, दसकंधर आदि नामों से प्रसिद्ध हुआ, हालांकि यह अस्वाभाविक है कि किसी के एक साथ दस सिर हों। यह सिर्फ प्रतीक मात्र है। रावण के दस सिरों की भिन्न- भिन्न व्यंजनाएं मिलती है। जिनके अनुसार रावण के दस सिर अहंकार, मोह, क्रोध, माया आदि विकारों के प्रतीक हैं यानी रावण सभी विकारों से ग्रसित था और इसी कारण ज्ञान व श्री संपन्न होने के बावजूद मात्र सीताहरण का एक अपराध करने से मारा गया। स्पष्टत: रावण के दस सिर प्रतीकात्मक है न कि प्राकृतिक और स्वाभाविक।

प्रश्न 8. #लवकुश और #हनुमान के बीच युद्ध क्यों हुआ?

उत्तर: रावण वध के बाद सीता को लेकर अयोध्या लौटे, राम ने कुछ समय राज किया। इसके बाद लोक मर्यादा के रहते सीता का त्याग कर दिया। तब सीता वाल्मीकि के आश्रम में रहीं और वहीं दो जुड़वां पुत्रों लव व कुश को जन्म दिया। आश्रम में ही दोनों बालक बड़े हुए। इस बीच अयोध्या में सभी के आग्रह पर राम ने अश्वमेध यज्ञ किया। जिसमें यज्ञ का अश्व स्वतंत्र विचरण के लिए छोड़ा जाता है यदि कोई उस अश्व यानी घोड़े को पकड़े तो उसे युद्ध करना होता है। राम के यज्ञ का अश्व जब वाल्मीकि के आश्रम तक पहुंचा तो यज्ञ से अनभिज्ञ दोनों तपस्वी बालकों लव और कुश ने उसे पकड़ लिया।

यज्ञ के अश्व की रक्षा के लिए साथ गए भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और हनुमान सहित पूरी राम सेना से लव –कुश की लड़ाई हुई। इसी लड़ाई में हनुमान भी लव-कुश से लड़े, क्योंकि दोनों राम व सीता के पुत्र होने के साथ ही बहुत बलशाली और युद्ध में निपुण योद्धा भी थे, इसलिए कोई भी उनके सामने न टिक पाया। आखिर में जब राम खुद युद्ध के लिए पहुंचे। तब सीता के आ जाने से पूरी कथा की धारा बदल गई। हनुमान और लव-कुश के युद्ध की यह कथा रामकथाओं में अलग-अलग रूपों में विस्तार से मिलती है।

कवितावली ( श्रीमद गोस्वामी तुलसी दास जी कृत ) ( बालकाण्ड )
वाललीला
बर दंतकी पंगति कुंदकली अधराधर - पल्लव खोलनकी ।
चपला चमकैं घन बीच जगै छबि मोतिन माल अमोलनकी ॥
घुँघुरारि लटैं लटकैं मुख ऊपर कुंडल लोल कपोलनकी ।
नेवछावरि प्रान करै तुलसी बलि जाउँ लला इन बोलनकी ॥५॥
भावार्थ -- कुन्दकलिके समान उज्ज्वलवर्ण दन्तावली, अधरपुटोंका खोलना और अमूल्य मुत्कामालाओंकी छवि ऐसी जान पड़ती है मानो श्याममेघके भीतर बिजली चमकती हो । मुखपर घुँघुराली अलकें लटक रही हैं । तुलसीदासजी कहते हैं -- लला ! मैं कुण्डलोंकी झलकसे सुशोभित तुम्हारे कपोलों और इन अमोल बोलोंपर अपने प्राण न्यौछावर करता हूँ ।। ५ ।।

ज्योतिष में श्री राम शलाका
प्रश्नावली का महत्त्व !!

श्री राम शलाका प्रश्नावली में २२५
खाने है इनका मूलांक २+२+५=९,
आता है जो कि अंक शास्त्र में सबसे
बड़ी संख्या है।

अब यदि २२५ को नौ से भाग दिया
जाय तो २५ कि संख्या हमे प्राप्त होती
है जिसका मूलांक २+५=७ आता है जो
कि ७ ग्रहों का ही रूप है।

गोस्वामी जी ने नौ चौपाई का प्रयोग इस
श्री राम शलाका प्रश्नावली में किया है।

एक एक चौपाई अलग अलग
ग्रह का प्रतिनिधित्व करती है।

गोस्वामी तुलसीदास जी का ज्योतिष
में महत्वपूर्ण स्थान है श्री राम चरित
मानस एक धार्मिक आस्था का प्रतीक
तथा पूज्यनीय ग्रन्थ होने के साथ साथ
ज्योतिषीय शास्त्र के रूप में भी अपनी
प्रतिष्ठा रखता है।

परम पूज्य गोस्वामी जी का ज्योतिष
के अंतर्गत गणित व फलित दोनों में
महत्वपूर्ण स्थान है।

गोस्वामी जी एक पूर्ण ज्योतिषी का
ज्ञान रखते थे,यह हमें श्री राम चरित
मानस में स्पष्ट दिखाई देता है।

श्री राम चरित मानस को यदि हम
ज्योतिष का मानस शास्त्र कहें तो
भी ठीक है गोस्वामी जी ने मानव
जाति के जीवन के सभी प्रश्नों के
उत्तर रामायण में स्पष्ट दिए है।

आज मैं श्री राम चरित मानस अंतर्गत
श्री राम शलाका प्रश्नावली के विषय में
बताने जा रहा हूं जिसमें कि गोस्वामी
जी ने गणित और फलित दोनों को ही
उपयोग कर प्रश्नों के उत्तर चौपाइयो
द्वारा दिए है।

अंक ज्योतिष के अनुसार सूर्य आदि
नवग्रहों को एक से लेकर नौ अंको के
बीच माना गया है।

श्री राम शलाका प्रश्नावली में नव
चौपाइयों को लेकर ही प्रत्येक प्रश्न
का समाधान कर फलित ज्योतिष
को सार्थक किया है।

इन नौ चौपाइयों में से तीन चौपाइयों
के अंतर्गत कार्य में संदेह दिखाया गया
है जो कि शनि,राहू, और केतु का फल
बताती है।

श्री राम शलाका प्रश्नावली में तीन
चौपाइयों में कार्य सिद्ध होना बताया
है जो कि चन्द्र,वृहस्पति और शुक्र का
फल हमारे सामने रखा है।

तथा श्री राम शलाका प्रश्नावली में
तीन चौपाइयों में अनिश्चय की स्थिति
रख कर सूर्य,मंगल और बुध के गुणों
को हमारे सामने रखा है।

श्री राम शलाका प्रश्नावली में गोस्वामी
जी ने तीन तीन चौपाई द्वारा फल को
बाँट कर अपने आत्म ज्ञान से सज
राज और तम का सन्देश दिया है।

श्री राम शलाका प्रश्नावली की रचना
कर गोस्वामी जी के भविष्यवक्ता के
ज्ञान का परिचय कराती है।

रामशलाका प्रश्नावली की नौ चौपाइयां ;-

होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावहिं साखा।।

कार्य पूर्ण होने में सन्देह है।
अतः उसे भगवान पर छोड़
देना चाहिए।

सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।

प्रश्न उत्तम है।
कार्य सिद्ध होगा।

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा।।

भगवान का स्मरण करके
कार्यारम्भ करें।
सफलता मिलेगी।

उधरहिं अंत न होइ निबाहू।
कालनेमि जिमि रावन राहू।।

इस कार्य में भलाई नही है।
कार्य की सफलता में सन्देह है।

बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं।
फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं।।

खोटे मनुष्य का संग छोड़ दें।
कार्य पूर्ण होने में सन्देह है।

मुद मङ्गलमय संत समाजू।
जो जग जंगम तीरथराजू।।

प्रश्न उत्तम है।
कार्य सिद्ध होगा।

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई।।

प्रश्न बहुत श्रेष्ठ है।
कार्य सफल होगा।

बरुन कुबेर सुरेस समीरा।
रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा।।

कार्य पूर्ण होने में सन्देह है।

सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे।
राम लखनु सुनि भये सुखारे।।

प्रश्न बहुत उत्तम है।
कार्य सिद्ध होगा।

प्रश्नोत्तर जानने की विधि ;-

सर्वप्रथम स्नानादि से निवृत होकर प्रभु
श्री राम का ध्यान करते हुए तथा श्रद्धा
विश्वासपूर्वक मनसे अभीष्ट प्रश्न का
चिंतन करते हुए मनचाहे कोष्ठक में
अंगुली या कोई शलाका रख देनी
चाहिए।

कोष्ठक में जो अक्षर हो उसे किसी
कोरे कागज पर लिख लें।

तदुपरांत आगे बढ़ते जाएँ तथा
प्रत्येक नवें कोष्ठक के अक्षरों को
क्रम से लिखते जाए।

कोष्ठक के अंत तक 9 चौपाई में के
किसी एक चौपाई का अंश सामने
आएगा।

उस चौपाई के अनुसार प्रश्नोत्तर
को जान लें।

ध्यान रहे कि किसी कोष्ठक में केवल
"आ" की मात्रा या संयुक्त अक्षर हैं।

क्रम से उन्हें भी अवश्य लिखें तभी
चौपाई का अंश पूरा होगा।

आवश्यकता है तो आस्था
और विश्वास की .......

श्री राम चरित मानस रुपी इस शास्त्र
को बड़ी श्रद्धा के साथ पीले रंग के
वस्त्र में लपेट कर घर में उचित स्थान
दे नित्य प्रति पूजन करें तो यह आपके
जीवन के सभी प्रश्नों का समाधान करने
में सक्षम है

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Palwal
121102

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