06/09/2026
17 साल की ज़ेनब… हुनर बेशुमार, सपने बड़े, लेकिन गरीबी ने रोक दी उड़ान
संस्कृत में 12वीं में हासिल किया प्रथम स्थान, खेलों में ऑलराउंडर और पहाड़ी संस्कृति से बेइंतहा प्यार… पिता मजदूर, मां बीमार; अब ज़ेनब के भविष्य के लिए आगे आया ‘ज़िंदगी रिटर्न्स’
कुछ कहानियां सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं… उन्हें महसूस किया जाता है।
पांवटा साहिब के जामनीवाला की रहने वाली 17 वर्षीय ज़ेनब की कहानी भी ऐसी ही है। एक ऐसी बेटी, जिसके भीतर प्रतिभा की कोई कमी नहीं, पढ़ाई में जिसने अपनी काबिलियत साबित की, खेलों में जिसके सपने हैं और अपनी संस्कृति से जिसे बेहद प्यार है। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी चीज है जो उसके हर सपने के सामने दीवार बनकर खड़ी है—परिवार की आर्थिक मजबूरी।
ज़ेनब पढ़ाई में हमेशा आगे रहने वाली छात्रा रही है। तमाम मुश्किलों के बावजूद उसने 12वीं कक्षा में संस्कृत विषय में प्रथम स्थान हासिल किया। संस्कृत को लेकर उसने अपनी पसंद को चुना और मेहनत के दम पर यह साबित कर दिया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, प्रतिभा अपना रास्ता बना सकती है।
लेकिन ज़ेनब की प्रतिभा सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है।
वह ऑलराउंडर स्पोर्ट्स प्लेयर है। खेल के मैदान में आगे बढ़ने और अपनी अलग पहचान बनाने का सपना उसके दिल में है। उसके अंदर खेल के प्रति जुनून और प्रतिभा दोनों हैं, लेकिन आर्थिक स्थिति ऐसी है कि खेलों में आगे बढ़ने के लिए जरूरी संसाधन जुटाना परिवार के लिए बेहद मुश्किल है।
प्रतिभा मौजूद है… हौसला मौजूद है… मेहनत करने की ताकत मौजूद है… लेकिन संसाधन नहीं हैं।
पिता मजदूर, बीमारी ने कमजोर कर दिया शरीर
ज़ेनब के पिता पेशे से मजदूर हैं। मजदूरी करके उन्होंने परिवार का पेट पालने और अपनी तीनों बेटियों की जरूरतें पूरी करने की कोशिश की।
लेकिन बीमारी ने अब उनके शरीर को कमजोर कर दिया है।
ज़ेनब की मां भी कभी मजदूरी करके परिवार की आर्थिक मदद करती थीं। लेकिन बीमारी के कारण आज वह भी पहले की तरह काम करने की स्थिति में नहीं हैं।
यानी जिस परिवार में सीमित आमदनी के बावजूद बेटियों को आगे बढ़ाने के सपने देखे गए थे, वहां बीमारी और आर्थिक तंगी दोनों ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
परिवार में तीन बेटियां हैं।
माता-पिता की सोच हमेशा यही रही कि बेटियों की परवरिश और पढ़ाई में कोई कमी न आए। इसी सोच के साथ उन्होंने इसके बाद कोई और बच्चा नहीं किया, ताकि अपनी बेटियों को बेहतर तरीके से पाल सकें और उनकी जरूरतें पूरी कर सकें।
लेकिन हालात शायद उनकी कोशिशों से कहीं ज्यादा कठिन निकले।
एक बहन की 12वीं के बाद पढ़ाई रुकी, दूसरी भी पैसों के कारण आगे नहीं पढ़ सकी
परिवार की आर्थिक स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ज़ेनब की एक बहन की पढ़ाई 12वीं के बाद रुक गई।
वहीं दूसरी बहन भी आगे पढ़ना चाहती थी, लेकिन उच्च शिक्षा के लिए जरूरी आर्थिक संसाधन परिवार के पास नहीं थे। मजबूरी में उसकी पढ़ाई भी रुक गई।
अब ज़ेनब के सामने भी वही सवाल खड़ा है—
क्या पैसों की कमी उसके सपनों को भी रोक देगी?
17 साल की उम्र में जिम्मेदारियों को समझती है ज़ेनब
ज़ेनब सिर्फ पढ़ाई और खेलों में ही आगे नहीं है, बल्कि परिवार की जिम्मेदारियों को भी समझती है।
वह घर के उन तमाम कामों में हाथ बंटाती है जिन्हें आमतौर पर लोग पुरुषों से जोड़कर देखते हैं। मोटरसाइकिल चलाने से लेकर परिवार की जरूरतों से जुड़े कई कामों तक, ज़ेनब पीछे नहीं हटती।
मुश्किल परिस्थितियों ने उसे उम्र से पहले ही जिम्मेदार बना दिया है।
लेकिन इन जिम्मेदारियों के बावजूद उसके सपनों में कमी नहीं आई।
वह पढ़ना चाहती है। खेलों में आगे बढ़ना चाहती है। अपनी पहचान बनाना चाहती है।
संस्कृत में प्रथम स्थान… और पहाड़ी संस्कृति से गहरा रिश्ता
ज़ेनब की कहानी का सबसे खूबसूरत पहलू उसकी अपनी संस्कृति से जुड़ाव है।
उसे पहाड़ी संस्कृति और परंपराओं से बेहद प्यार है।
जब वह पारंपरिक पहाड़ी वेशभूषा पहनकर नाटी करती है, तो उसे देखने वाले भी हैरान रह जाते हैं। उसकी नाटी में सिर्फ नृत्य नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति के प्रति प्रेम दिखाई देता है।
एक तरफ संस्कृत जैसे विषय में प्रथम स्थान हासिल करने वाली ज़ेनब है, दूसरी तरफ खेलों में ऑलराउंडर प्रतिभा रखने वाली खिलाड़ी और तीसरी तरफ अपनी पहाड़ी संस्कृति को दिल से अपनाने वाली बेटी।
उसके भीतर हुनर की कमी नहीं… कमी सिर्फ अवसर की है।
अब ज़ेनब के सपनों को सहारा देने आगे आया ‘ज़िंदगी रिटर्न्स’
ज़ेनब की कहानी सामने आने के बाद ‘ज़िंदगी रिटर्न्स’ NGO इस परिवार के साथ खड़ा हुआ है।
संस्था का उद्देश्य है कि आर्थिक मजबूरी के कारण इस होनहार बेटी की पढ़ाई और उसके सपने न रुकें। ज़ेनब को वह अवसर मिले, जिसकी वह हकदार है और वह अपनी प्रतिभा के दम पर आगे बढ़ सके।
‘ज़िंदगी रिटर्न्स’ का मानना है कि किसी बेटी की प्रतिभा को सिर्फ इसलिए दबना नहीं चाहिए क्योंकि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है।
इसी उद्देश्य से संस्था ने समाज के लोगों से भी ज़ेनब के भविष्य के लिए आगे आने की अपील की है।
“बेटियां सबकी साझी होती हैं…”
‘ज़िंदगी रिटर्न्स’ की लोगों से भावुक अपील है—
बेटियां किसी एक परिवार की नहीं होतीं, बेटियां सबकी साझी होती हैं।
आज ज़ेनब को समाज के सहयोग की जरूरत है।
जरूरत है कि लोग इस बेटी की पढ़ाई और भविष्य को संवारने के लिए आगे आएं। उसकी खेल प्रतिभा को आगे बढ़ाने में सहयोग करें और उसे अपने सपनों को पूरा करने का अवसर दें।
क्योंकि ज़ेनब को किसी की दया नहीं चाहिए।
उसे सिर्फ एक मौका चाहिए।
एक मौका पढ़ाई पूरी करने का।
एक मौका खेलों में आगे बढ़ने का।
एक मौका अपनी प्रतिभा को दुनिया के सामने साबित करने का।
और एक मौका अपने परिवार की जिंदगी बदलने का।
जिस पिता ने मजदूरी करके बेटियों को पालने की कोशिश की, जिस मां ने बीमारी से पहले मजदूरी करके परिवार का साथ दिया और जिन बहनों ने आर्थिक मजबूरी के कारण अपनी पढ़ाई तक छोड़ दी—आज उस परिवार की उम्मीद ज़ेनब से जुड़ी है।
शायद अब समाज भी इस उम्मीद का हिस्सा बन सकता है।
आइए, ज़ेनब का हाथ थामें।
उसकी पढ़ाई और खेल के सपनों को सहारा दें।
उसकी जिंदगी संवारने के लिए आगे आएं।
क्योंकि बेटियां किसी एक की नहीं… सबकी साझी होती हैं।
आज ज़ेनब के भविष्य के लिए उठाया गया आपका एक कदम, कल उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी की वजह बन सकता है।