Påthankőtiya- PB 35 walá

Påthankőtiya- PB 35 walá ना पक्षपात,ना विरोध — सिर्फ़ अपने सिद्धांत।
No bias, no hostility — only principles.

04/09/2026
“मैं देश बचाऊं, सरहद की रखवाली करूं या अपने घर की सुरक्षा?” जम्मू-कश्मीर बॉर्डर पर तैनात भारतीय सेना के जवान आशीष कुमार ...
02/09/2026

“मैं देश बचाऊं, सरहद की रखवाली करूं या अपने घर की सुरक्षा?” जम्मू-कश्मीर बॉर्डर पर तैनात भारतीय सेना के जवान आशीष कुमार का यह सवाल इन दिनों चर्चा में है। जवान ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर अपने घर में हुई करीब 40 लाख रुपये की चोरी और पुलिस की कार्रवाई को लेकर अपनी पीड़ा जाहिर की है।

जवान का आरोप है कि घटना के करीब 6 महीने बीत जाने के बाद भी चोरी का खुलासा नहीं हो सका है। उन्होंने पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक शिकायतें भेजने का दावा किया है। अब सोशल मीडिया पर सामने आए उनके वीडियो के बाद मामले ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है।

बाकी एक बात और जो silent है वो violent भी हो सकता है फिर मरने के बाद पैसों का क्या करोगे.  .....गार्ड ने अपनी जिम्मेदारी...
29/08/2026

बाकी एक बात और जो silent है वो violent भी हो सकता है फिर मरने के बाद पैसों का क्या करोगे. .....
गार्ड ने अपनी जिम्मेदारी निभाई और उसको केवल जातिसूचक गालियां मिली, जान से मारने की धमकी मिली।

यह कहानी ग्रेटर नोएडा वेस्ट की आम्रपाली सेंचुरियन पार्क टेरेस होम्स सोसाइटी के उस गेट की है। इस घटना ने लोगों के होश उड़ा दिए। प्रत्येक रात की तरह अपार्टमेंट में कुछ सुरक्षा गार्ड अपनी ड्यूटी पर खड़े थे। उनकी आँखों में नींद भले हो, लेकिन जिम्मेदारी में कोई कमी नहीं थी। क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी ड्यूटी सिर्फ गेट संभालना नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है।

इसी दौरान रात का समय था कि एक फूड डिलीवरी बॉय सोसाइटी के गेट पर पहुँचा। Security के उद्देश्य से गार्डों ने उसे वेरिफिकेशन के लिए रोक लिया। शायद डिलीवरी में कुछ मिनट की देरी हुई। और यही देरी गार्डों के लिए मुसीबत का सबब बन गई।

बस… कुछ मिनट।

लेकिन उन्हीं कुछ मिनटों ने एक ऐसा दृश्य पैदा कर दिया, जिसने हमारे समाज की उस कड़वी सच्चाई को सामने ला दिया, जिसे हम अक्सर देखना नहीं चाहते।

आरोप है कि एक महिला अपने फ्लैट से नीचे गेट पर आईं और सुरक्षा गार्डों के साथ गाली-गलौज और अभद्रता करने लगीं। वीडियो में कथित तौर पर एक गार्ड को लात मारने की कोशिश और गरीब होने को लेकर अपमानजनक बातें भी सुनाई देती हैं। जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल के आरोप इस घटना को और भी गंभीर बना देते हैं।

दर्द इस बात का है कि एक इंसान को उसकी गरीबी के कारण छोटा समझा गया।

जिस आदमी के हाथ में दिनभर दूसरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, शायद उसी रात उसका अपना बच्चा घर पर इंतज़ार कर रहा होगा कि पापा कब लौटेंगे।

शायद उसकी पत्नी सोच रही होगी कि आज घर का राशन आ जाएगा।

शायद बूढ़े माता-पिता को उम्मीद होगी कि बेटा महीने के अंत में दवा के पैसे देगा।

और शायद उस डिलीवरी बॉय के घर में भी कोई माँ होगी, जो रात में दरवाज़े की आहट सुनकर बेटे के लौटने का इंतज़ार करती होगी।

इन लोगों के पास महंगी गाड़ियाँ नहीं हैं। बड़े फ्लैट नहीं हैं। बैंक बैलेंस शायद बहुत बड़ा नहीं है।

लेकिन उनके पास भी आत्मसम्मान है।

उनके पास भी भावनाएँ हैं।

उन्हें भी चोट लगती है।

और सबसे बड़ी बात—गरीब होना अपराध नहीं है।

लेकिन सवाल यह भी है कि आखिर अमीरी है क्या?

क्या जेब में पैसा आ जाने से इंसान सच में अमीर हो जाता है?

क्या बड़ा फ्लैट, बड़ी गाड़ी और बैंक बैलेंस किसी इंसान को दूसरे इंसान से बड़ा बना देते हैं?

नहीं।

अमीरी सिर्फ जेब भरी होने का नाम नहीं है।

जेब में पैसा होना आपको पैसे वाला बना सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि आपको एक अमीर इंसान भी बनाए।

असली अमीरी इंसान के विचारों में होती है।

उसके व्यवहार में होती है।

उसकी ईमानदारी में होती है।

उसके संस्कारों में होती है।

उसके कर्मों में होती है।

और इस बात में होती है कि आपके पास ताकत और पैसा होने के बावजूद आप अपने से कमजोर इंसान के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।

जिसके पास कम पैसा है, लेकिन दिल साफ है, मेहनत ईमानदार है, कर्म अच्छे हैं और वह किसी का हक नहीं मारता—वह भी अपने आप में बहुत अमीर है।

और जिसके पास करोड़ों रुपये हैं, लेकिन वह गरीब को इंसान नहीं समझता, अपने पैसे और रुतबे का घमंड करता है और दूसरों को नीचा दिखाता है—तो फिर सोचिए, उसकी असली अमीरी कितनी है?

पैसे से घर बड़ा हो सकता है।

लेकिन विचार बड़े नहीं होते।

पैसे से गाड़ी बड़ी हो सकती है।

लेकिन इंसान का कद बड़ा नहीं होता।

पैसे से सुविधाएँ खरीदी जा सकती हैं।

लेकिन इज्जत, संस्कार, ईमानदारी और अच्छे कर्म खरीदे नहीं जा सकते।

इसलिए किसी इंसान को उसकी जेब देखकर अमीर या गरीब मत समझिए।

कभी-कभी फटे कपड़ों में खड़ा इंसान अपने कर्मों से करोड़पति होता है।

और कभी-कभी महंगे कपड़ों में खड़ा इंसान अपने व्यवहार से बहुत गरीब।

यही जिंदगी की असली सच्चाई है।

समय-समय की बात है।

आज कोई गरीब है, जरूरी नहीं कि वह हमेशा गरीब ही रहे।

और आज कोई अमीर है, जरूरी नहीं कि उसकी अमीरी हमेशा उसके साथ रहे।

गरीब से अमीर बनने में भी वक्त लगता है और अमीर से गरीब बनने में भी कभी-कभी एक वक्त ही काफी होता है।

मेहनत इंसान की जिंदगी बदल सकती है, लेकिन जिंदगी में परिस्थितियाँ, मौके और भगवान की कृपा भी बहुत मायने रखती है।

इसलिए जिस चीज़ पर आज इतना घमंड है, उसे हमेशा अपना समझकर मत चलिए।

आज पैसा आपके पास है, कल किसी और के पास हो सकता है।

आज आपका बड़ा घर है, कल कोई और उस घर में रह सकता है।

आज आपकी गाड़ी सड़क पर सबसे महंगी है, कल कोई और आपसे आगे निकल सकता है।

समय बदलने में देर नहीं लगती।

इसलिए पैसा आने के बाद इंसान को भगवान बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

थोड़ी अक्ल पैसे से पहले आनी चाहिए।

थोड़ी शर्म अपनी हैसियत दिखाने से पहले आनी चाहिए।

और थोड़ी इंसानियत हर उस इंसान के लिए होनी चाहिए, जो हमसे आर्थिक रूप से कमजोर है।

क्योंकि भगवान ने अगर आपको किसी से ज्यादा दिया है, तो वह सिर्फ घमंड करने के लिए नहीं दिया।

शायद इसलिए दिया है कि आप किसी जरूरतमंद के काम आ सकें।

ऊपर वाला जब देता है तो छप्पर फाड़कर देता है, लेकिन इंसान को यह नहीं भूलना चाहिए कि देने वाला वही है और समय बदलने वाला भी वही है।

इसलिए किसी गरीब को यह कहना कि “तेरी औकात क्या है?” सिर्फ एक वाक्य नहीं होता।

कभी-कभी यह किसी इंसान के पूरे अस्तित्व को कुचल देने जैसा होता है।

उस रात उन सुरक्षा गार्डों ने जिस संयम का परिचय दिया, वह शायद किसी बड़ी गाड़ी, बड़े मकान या महंगे कपड़ों से कहीं अधिक बड़ी चीज़ थी।

अपमान सहकर भी उन्होंने पलटकर वही भाषा नहीं अपनाई। कथित मारपीट के बावजूद उन्होंने खुद को संभाले रखा।

क्योंकि शायद वे जानते थे कि एक छोटी-सी गलती उनकी नौकरी छीन सकती है।

और उनकी नौकरी सिर्फ उनकी नौकरी नहीं है।

वह उनके घर का चूल्हा है।
वह उनके बच्चों की फीस है।
वह उनकी माँ की दवा है।
वह उनके परिवार की उम्मीद है।

किसी गरीब की मजबूरी को उसकी कमजोरी समझ लेना बहुत बड़ी भूल है।

क्योंकि हो सकता है जिस इंसान को आप आज छोटा समझ रहे हैं, उसकी मेहनत, ईमानदारी और कर्म आपसे कहीं ज्यादा बड़े हों।

और यही फर्क है रुतबे और इंसानियत में।

जिसके पास ताकत है और फिर भी वह कमजोर का सम्मान करता है—वही असली बड़ा आदमी है।

किसी को दबा देना ताकत नहीं है।

किसी को अपमानित कर देना रुतबा नहीं है।

और किसी गरीब को छोटा समझ लेना अमीरी नहीं है।

असली अमीरी यह है कि आपके पास सब कुछ होने के बावजूद आपके व्यवहार में विनम्रता हो।

हम अक्सर कहते हैं कि समाज बदल रहा है। लोग शिक्षित हो रहे हैं। हमारे शहर आधुनिक हो रहे हैं। हमारे घर ऊँचे होते जा रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है—

क्या हमारे घरों की ऊँचाई के साथ हमारी इंसानियत भी ऊँची हो रही है?

किसी महिला की सुरक्षा और सम्मान बेहद जरूरी है। लेकिन महिला होने का अर्थ यह अधिकार नहीं हो सकता कि किसी पुरुष, किसी गरीब, किसी मजदूर या किसी कर्मचारी का सम्मान छीन लिया जाए।

कानून किसी के लिए ढाल होना चाहिए, हथियार नहीं।

और पैसा सुविधा खरीद सकता है, इंसानियत नहीं।

अब पुलिस के सामने मामला है। यदि आरोप और वीडियो में दिखाई दे रही बातें जांच में सही साबित होती हैं, तो कानून को बिना किसी दबाव और भेदभाव के अपना काम करना चाहिए।

क्योंकि इस घटना का सवाल सिर्फ एक सोसाइटी के गेट तक सीमित नहीं है।

यह सवाल हम सबके सामने खड़ा है—

क्या किसी की हैसियत इतनी बड़ी हो सकती है कि उसके सामने किसी गरीब की इज्जत छोटी पड़ जाए?

अगर जवाब “नहीं” है, तो हमें यह बात सिर्फ सोशल मीडिया पर लिखनी नहीं चाहिए।

हमें इसे अपने व्यवहार में उतारना होगा।

क्योंकि जिस गार्ड को हम आज सिर्फ एक “गार्ड” समझकर गुजर जाते हैं, वह किसी घर का बेटा है, किसी बच्चे का पिता है, किसी माँ की उम्मीद है।

और जिस डिलीवरी बॉय को हम दरवाज़े पर कुछ मिनट देर से आने पर डाँट देते हैं, वह भी किसी परिवार के सपनों को अपने कंधों पर लेकर शहर की सड़कों पर घूम रहा है।

इंसान की औकात उसकी जेब से नहीं होती।

उसकी असली औकात इस बात से होती है कि उसके पास ताकत होने के बावजूद वह कमजोर इंसान के साथ कैसा व्यवहार करता है।

क्योंकि जिंदगी में वक्त बदलते देर नहीं लगती।

आज जो ऊपर है, कल नीचे भी हो सकता है।

आज जो नीचे है, कल ऊपर भी आ सकता है।

इसलिए घमंड मत कीजिए।

शुक्र मनाइए।

मेहनत कीजिए।

अच्छे कर्म कीजिए।

और अगर भगवान ने आपको दूसरों से ज्यादा दिया है, तो उस हैसियत का इस्तेमाल किसी कमजोर को कुचलने के लिए नहीं, बल्कि किसी कमजोर को उठाने के लिए कीजिए।

क्योंकि जिंदगी की सबसे बड़ी गरीबी जेब खाली होना नहीं है।

सबसे बड़ी गरीबी है—पैसा होने के बावजूद दिल और सोच का गरीब हो जाना।

और शायद उस रात गेट पर खड़े उन गरीब गार्डों ने बिना एक शब्द कहे, यही सबसे बड़ी सीख दे दी।

रुतबा कुछ मिनटों का हो सकता है,
लेकिन इंसानियत की पहचान उम्र भर रहती है।

और याद रखिए—

समय किसी का गुलाम नहीं है।

अहंकार को टूटने में साल नहीं लगते।

कभी-कभी जिंदगी सिर्फ एक पल में इंसान को उसकी असली औकात दिखा देती है।

इसलिए पैसा कमाइए, खूब कमाइए।

बड़ा घर बनाइए, बड़ी गाड़ी खरीदिए, जिंदगी की सारी खुशियाँ हासिल कीजिए।

लेकिन अपनी अमीरी के साथ इंसानियत को गरीब मत होने दीजिए।

क्योंकि ऊपर वाले के दरबार में हिसाब आपकी जेब का नहीं होगा।

हिसाब आपके कर्मों का होगा।

और आखिर में इंसान की पहचान यह नहीं होगी कि उसके पास कितना पैसा था।

पहचान यह होगी कि उसके पास पैसा और ताकत होने के बावजूद उसने इंसानों के साथ कैसा व्यवहार किया था।

बाकी एक बात और जो silent है वो violent भी हो सकता है फिर मरने के बाद पैसों का क्या करोगे. .....

Neighbours. Friends. First Responders. 🇮🇳🇳🇵​In response to the devastating flash floods in Nepal, the   has swiftly depl...
26/08/2026

Neighbours. Friends. First Responders. 🇮🇳🇳🇵

​In response to the devastating flash floods in Nepal, the has swiftly deployed a C-130J aircraft carrying 10 tonnes of essential relief materials and medical supplies.

​Additional air effort by C-17 and C-130 aircraft will transport further relief supplies, with helicopters earmarked for rescue and evacuation operations.
​From the skies to the ground—responding with speed, agility, and precision, delivering hope when it matters most.

​ IndiaNepal NeighbourhoodFirst HumanitarianAssistance

​Ministry of Defence, India
HQ IDS India Official Account
Indian Army
National Disaster Response Force (NDRF)

26/08/2026

Hahaha 😄

Why does Bollywood and brands have to attack every Hindu festival ?Kriti Sanon’s GIVA Raksha Bandhan ad has a revealing ...
24/08/2026

Why does Bollywood and brands have to attack every Hindu festival ?

Kriti Sanon’s GIVA Raksha Bandhan ad has a revealing outfit, a family ritual and the inevitable empowerment narrative.

GIVA is literally a jewellery brand. Jewellery looks damn good with ethnic wear too. You didn’t need to turn Raksha Bandhan into a fashion campaign to sell it.

Bollywood happily wears ethnic clothes for awards, weddings and promotions but one Hindu festival suddenly needs liberating.

Would Bollywood and these brands dare to do the same with the religious traditions of peaceful communities?

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