24/05/2026
हमें जापान से उसकी तकनीक, अनुशासन, राष्ट्रप्रेम, ईमानदारी, शिक्षा, आपदा से लड़ने की क्षमता, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, स्वच्छता, आत्मनिर्भरता और देशहित में समर्पण सीखना था… मगर भारतीय बाजार, समाज के नीम-हकीम और दवा कंपनियों ने लिया भी तो क्या लिया- एक तेल के आगे “जापानी” शब्द जोड़ लिया… और नाम दे दिया उसका “जापानी तेल”!
अब यह जापानी तेल वास्तव में जापान का है भी नहीं, न ही उसमें जापान की कोई विशेष तकनीक लगी दिखती है। लगता है किसी दूरदर्शी मार्केटिंग महापुरुष ने अपने उत्पाद को आकर्षक बनाने के लिए नाम के आगे “जापानी” जोड़ दिया- और खेल ऐसा खेला कि खेल ही जम गया और तेल सारा बह गया!
मगर जिस उद्देश्य से “जापानी” शब्द लगाया गया, उसका प्रभाव समाज में खूब दिख रहा है। लगता है जापान की मजबूती, तकनीक और अनुशासन तो नहीं ले पाए, पर “तेल” वाला प्रयोग बड़े समर्पण से आत्मसात कर लिया!
अरे, इस दौर में सीखना कुछ और था, सीख कुछ और गए… और जो सीखकर आए, उसमें आगे निकलने में तनिक देर भी नहीं लगाई! जिसने भी इस शब्द का खेल खेला, बड़ी चीज खेल गया। अपने ब्रांड और उत्पाद को आकर्षक बनाने के लिए ऐसा प्रयोग किया कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, दवा दुकानें और चारदीवारी तक इस नाम से रंगी पड़ी हैं।
और वैसे भी भारतीय समाज एक बार जिसे स्वीकार कर ले, उसे आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। अब कहीं जनसंख्या वृद्धि की कहानी में भी यह “अतिरिक्त उत्साह” अपना तनिक योगदान तो नहीं दे रहा- यह शोध का विषय समाज स्वयं तय कर ले!
अब मालूम नहीं किस महापुरुष ने “जापानी” शब्द को इस रूप में समाज में स्थापित किया, मगर मीडिया और प्रचार-प्रसार ने भी इसमें यथोचित योगदान दिया। देश तो शायद ऐसा नहीं सोचता, लेकिन गाहे-बगाहे समाज ने इसे आत्मसात जरूर कर लिया। कल तक जो केवल एक शब्द था, आज समाज उसे अपने ढंग से यथार्थ में उतारता भी दिख रहा है। इतना ही नहीं, अब तो बोलचाल की भाषा में भी लोग मजे लेने और तंज कसने के लिए इसका प्रयोग करने लगे हैं।
“जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।”
जापान वहाँ तकनीक, शिक्षा, अनुशासन, आत्मनिर्भरता, आपदा प्रबंधन, ईमानदारी, स्वास्थ्य, इन्फ्रास्ट्रक्चर, गुणवत्ता, सैन्य क्षमता, स्वच्छता और वैश्विक प्रतिष्ठा के बल पर विश्व पटल पर मजबूती से खड़ा है… और हम “जापानी” शब्द का अर्थ शायद कुछ और ही निकाल बैठे!
अब जे है सो है… इसमें योगदान देने वाले भी सोचें और इसका सहारा लेने वाले भी कि वास्तव में खुद को, समाज को और देश को आगे बढ़ाने में क्या जरूरी है। या फिर समाज इतना कमजोर हो गया है कि मजबूती भी दूसरे देश के नाम के सहारे तेल में खोजनी पड़ रही हो, और देसी अंदाज में उसका प्रतिफल भी दिख रहा हो!
खैर, नाम का सदुपयोग देश, समाज और कंपनियाँ करतीं तो कुछ और भला होता… हालांकि भला तो वैसे भी हो ही रहा है! हम भले लोग और देशवासी हैं—किसी न किसी रूप में “भला” करके ही रहेंगे!
खूबसूरती तो देखो भाई- इस “जापानी” का प्रयोग करके भी लोग आखिरकार देसी ही हो रहे हैं!
✍️🤣