14/06/2022
भाजपा का प्रतिवर्ष 2 करोड़ नियमित नौकरियाँ देने का लिखित वादा था लेकिन 8 वर्ष के शासन बाद भी अब डेढ़ साल में केवल दस लाख नौकरियाँ देने का ज़ुबानी खर्च हो रहा है।
इनकी बातों, वादों, कसमों, जुमलों, भाषणों और इरादों का तुलनात्मक विश्लेषण होना चाहिए कि नहीं? क्या झूठ की कोई सीमा होती है?
भाजपा की डबल इंजन सरकार बताए कि कथित डेढ़ साल में देशभर में दी जाने वाली 10 लाख नौकरियाँ उनके वादेनुसार बिहार में दी जाने वाली 19 लाख नौकरियों से अलग है या उसी में से है?
* क्या ये नौकरियाँ नियमित होंगी या ठेके (संविदा) पर होंगी?
* क्या इनके लिए भी परीक्षा फ़ॉर्म शुल्क लिया जाएगा?