महिला अधिकार एवं संरक्षण परिषद

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महिला अधिकार एवं संरक्षण परिषद ◼️HUMAN RIGHTS COUNCIL ◼️
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 #💔 शादी का झांसा देकर बनाया संबंध…  #क्या यह सिर्फ  #धोखा है या  #कानून की नज़र में  #अपराध है।।"जब किसी लड़की के सपनों...
03/08/2026

#💔 शादी का झांसा देकर बनाया संबंध…
#क्या यह सिर्फ #धोखा है या #कानून की नज़र में #अपराध है।।

"जब किसी लड़की के सपनों, विश्वास और सम्मान को केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति का साधन बना दिया जाता है, तब यह केवल एक प्रेम कहानी का अंत नहीं होता—यह एक इंसान के #आत्मसम्मान पर #गहरा आघात होता है।"

आज समाज में ऐसे अनेक मामले सामने आते हैं जहाँ किसी महिला को शादी का भरोसा दिया जाता है, भविष्य के सपने दिखाए जाते हैं और उसी विश्वास के आधार पर शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं। बाद में यदि यह सामने आए कि शुरुआत से ही शादी करने की वास्तविक मंशा नहीं थी और केवल धोखे से सहमति प्राप्त की गई, तो मामला परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर गंभीर आपराधिक रूप ले सकता है।

⚖️ कानून क्या देखता है?

✔️ क्या शादी का वादा शुरू से ही झूठा था?
✔️ क्या केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए धोखा दिया गया?
✔️ क्या महिला की सहमति उसी झूठे विश्वास पर आधारित थी?
✔️ क्या चैट, कॉल रिकॉर्ड, संदेश या अन्य साक्ष्य आरोपी की मंशा दर्शाते हैं?

यदि इन बातों का समर्थन साक्ष्यों से होता है, तो अदालत मामले के तथ्यों के अनुसार भारतीय न्याय संहिता (BNS) की प्रासंगिक धाराओं के तहत कार्रवाई कर सकती है।
हर मामला अपने तथ्यों पर तय होता है; केवल शादी न हो पाना अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता।

# # # 📢 हर बेटी को जानना चाहिए—

🔹 अपने सभी डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखें।
🔹 किसी भी प्रकार की धमकी या ब्लैकमेल का विरोध करें।
🔹 बिना देर किए पुलिस या महिला थाना में शिकायत दर्ज कराएँ।
🔹 आवश्यकता होने पर कानूनी सहायता लें।
🔹 चुप्पी कई बार अपराधियों की सबसे बड़ी ताकत बन जाती है।

# # # समाज से अपील

किसी पीड़िता को दोषी ठहराने से पहले उसकी बात सुनें। साथ ही, किसी भी आरोपी को अदालत के अंतिम निर्णय से पहले दोषी घोषित करना भी उचित नहीं है। न्याय का आधार निष्पक्ष जांच और साक्ष्य हैं।

याद रखिए—विश्वास किसी का अधिकार नहीं, जिम्मेदारी है। और यदि उस विश्वास का इस्तेमाल छल के लिए किया जाए, तो कानून हस्तक्षेप कर सकता है।

✍️ अगर आपको लगता है कि यह जानकारी समाज के लिए उपयोगी है, तो इसे साझा करें ताकि अधिक से अधिक लोग अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक हो सकें।

#महिला_सुरक्षा #महिला_अधिकार #नारी_सम्मान

  Empowerment and Rights:    ,    Women are the foundation of every family and the driving force behind a progressive so...
03/08/2026

Empowerment and Rights: ,

Women are the foundation of every family and the driving force behind a progressive society. When women are educated, respected, safe, and empowered, families prosper, communities grow stronger, and nations move forward.

means giving women equal opportunities, equal rights, and the freedom to make decisions about their own lives. It is not about creating superiority over men—it is about ensuring equality, dignity, and justice.

Every woman has the right to:

* Live a life free from violence and discrimination.
* Receive quality education and healthcare.
* Work with equal pay and equal opportunities.
* Own property and participate in decision-making.
* Express her opinions without fear.
* Access justice and legal protection.

Despite significant progress, many women still face challenges such as domestic violence, workplace harassment, child marriage, trafficking, dowry-related abuse, and unequal opportunities. These issues cannot be solved by laws alone—they require awareness, education, accountability, and collective action from society.

True empowerment begins when girls are encouraged to dream, women are supported in leadership, and every individual stands against injustice. Families, schools, workplaces, governments, and communities all have a shared responsibility to create an environment where women can thrive with dignity and confidence.

's rights are . Respecting these rights is not an act of kindness—it is a fundamental responsibility. A society that values women creates a brighter future for everyone.

"Empower a woman, and you empower generations."

🛑 #बिहार का चर्चित   छात्रा कांड: क्या एक  #बेटी के सपनों की कोई कीमत नहीं?🛑✍️बिहार की धरती को ज्ञान, संघर्ष और प्रतिभा ...
30/07/2026

🛑 #बिहार का चर्चित छात्रा कांड: क्या एक #बेटी के सपनों की कोई कीमत नहीं?🛑

✍️बिहार की धरती को ज्ञान, संघर्ष और प्रतिभा की भूमि कहा जाता है। हर वर्ष हजारों बेटियाँ और बेटे अपने परिवार के सपनों को साकार करने के लिए घर से दूर रहकर NEET, JEE और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। माता-पिता अपनी जमा-पूंजी खर्च कर यह उम्मीद पालते हैं कि एक दिन उनका बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर या अधिकारी बनेगा। लेकिन जब इन्हीं सपनों के बीच किसी छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत की खबर आती है, तो केवल एक परिवार नहीं टूटता—पूरा समाज सवालों के कटघरे में खड़ा हो जाता है।

✍️ #पटना में की तैयारी कर रही एक #छात्रा की संदिग्ध मृत्यु ने पूरे बिहार को झकझोर दिया। इस घटना ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हमारे छात्र-छात्राएँ वास्तव में सुरक्षित हैं? क्या छात्रावासों में रहने वाली बेटियों की सुरक्षा सुनिश्चित है? क्या हर ऐसी घटना की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच होती है?

✍️इस मामले के बाद पूरे राज्य में आक्रोश देखने को मिला। छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने निष्पक्ष जांच और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग उठाई। सरकार ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तरीय जांच की दिशा में कदम बढ़ाए। लेकिन आज भी सबसे बड़ा प्रश्न यही है—**क्या हर पीड़ित परिवार को समय पर न्याय मिल पाता है?**

✍️यह घटना केवल एक आपराधिक जांच का विषय नहीं है, बल्कि हमारी व्यवस्था की परीक्षा भी है। जब कोई बेटी घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर पढ़ने जाती है, तो उसके माता-पिता केवल फीस नहीं भरते, बल्कि अपना विश्वास भी उस व्यवस्था को सौंपते हैं। यदि वही विश्वास टूट जाए, तो उसकी भरपाई किसी मुआवज़े से नहीं हो सकती।

✍️दुख की बात यह भी है कि ऐसी घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर अफवाहों और अपुष्ट दावों की बाढ़ आ जाती है। इससे जांच प्रभावित हो सकती है और निर्दोष लोगों की प्रतिष्ठा भी नुकसान उठा सकती है। इसलिए समाज का दायित्व है कि वह केवल सत्यापित तथ्यों पर भरोसा करे और निष्पक्ष जांच का समर्थन करे।

✍️आज आवश्यकता केवल इस एक मामले में न्याय की नहीं, बल्कि ऐसे स्थायी सुधारों की है जिनसे भविष्य में कोई भी छात्रा या छात्र असुरक्षित महसूस न करे। हर छात्रावास में मजबूत सुरक्षा व्यवस्था, प्रभावी शिकायत प्रणाली, नियमित निरीक्षण और संवेदनशील प्रशासन समय की मांग है।

✍️एक सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी बेटियों की सुरक्षा से होती है।

✍️यदि एक होनहार छात्रा के सपने संदिग्ध परिस्थितियों में हमेशा के लिए थम जाएँ, तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक विफलता है।

✍️न्याय में देरी केवल एक केस को लंबा नहीं करती, बल्कि लाखों माता-पिता के भरोसे को भी कमजोर करती है। इसलिए निष्पक्ष, पारदर्शी और शीघ्र न्याय ही इस घटना का सबसे उचित उत्तर है।

#बिहार #पटना ात्रा #न्याय_दो #बेटी_को_न्याय #महिलासुरक्षा #छात्रासुरक्षा #निष्पक्ष_जांच #न्याय_की_मांग #बेटी_बचाओ #शिक्षा_का_अधिकार #बिहार_की_बेटी
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🛑सहरसा ईंट-भट्ठा कांड🛑✍️ क्या गरीब मजदूरों की बेटियों की सुरक्षा की कोई कीमत नहीं?बिहार के सहरसा जिले से सामने आया ईंट-भ...
30/07/2026

🛑सहरसा ईंट-भट्ठा कांड🛑

✍️ क्या गरीब मजदूरों की बेटियों की सुरक्षा की कोई कीमत नहीं?

बिहार के सहरसा जिले से सामने आया ईंट-भट्ठा कांड पूरे समाज को झकझोर देने वाला है। पुलिस के अनुसार, एक ईंट-भट्ठे पर काम करने वाले मजदूर की पत्नी और उसकी नाबालिग बेटी के साथ गंभीर अपराध का आरोप लगाया गया है। आरोप है कि जब महिला ने विरोध किया, तो उसे गोली मार दी गई। यह घटना केवल एक परिवार पर हमला नहीं, बल्कि कानून, मानवता और समाज के नैतिक मूल्यों को चुनौती देने वाली घटना है।

यदि पुलिस के आरोप और जांच में सामने आए तथ्य अदालत में सिद्ध होते हैं, तो यह मामला उन अपराधों में गिना जाएगा जो समाज की अंतरात्मा को झकझोर देते हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि पीड़ित परिवार आर्थिक रूप से कमजोर मजदूर वर्ग से जुड़ा बताया गया है। ऐसे लोगों के लिए न्याय की राह अक्सर लंबी और कठिन होती है।

इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी और अन्य संबंधित व्यक्तियों को गिरफ्तार किया तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS), पॉक्सो (POCSO) अधिनियम और अन्य लागू कानूनों के तहत मामला दर्ज किया। अब यह न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि निष्पक्ष सुनवाई के बाद साक्ष्यों के आधार पर उचित निर्णय दे।

यह घटना कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है—

✍️क्या गरीब मजदूरों और उनके परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित है?
✍️क्या महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ अपराध रोकने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त है, या उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही आवश्यक है?
✍️ क्या प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई हर मामले में समान निष्पक्षता से हो पाती है?

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि भारत का संविधान हर नागरिक को समान अधिकार और समान न्याय की गारंटी देता है। कोई भी व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, यदि उसके विरुद्ध लगाए गए आरोप अदालत में साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध होते हैं, तो उसे कानून के अनुसार कठोर दंड मिलना चाहिए। वहीं, न्याय के मूल सिद्धांत के अनुसार किसी भी आरोपी को अदालत द्वारा दोष सिद्ध होने तक दोषी नहीं माना जाता।

समाज की जिम्मेदारी केवल घटना पर आक्रोश व्यक्त करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। पीड़ित परिवार को कानूनी सहायता, सामाजिक समर्थन और निष्पक्ष जांच मिलना भी उतना ही आवश्यक है। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा केवल सरकार या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।

आइए, हम ऐसी घटनाओं के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठाएं, पीड़ितों के साथ खड़े हों और यह सुनिश्चित करें कि न्याय केवल हो ही नहीं, बल्कि होता हुआ दिखाई भी दे।

"न्याय में देरी, पीड़ित के घावों को और गहरा कर देती है। कानून का उद्देश्य केवल अपराधी को दंड देना नहीं, बल्कि समाज में यह विश्वास बनाए रखना भी है कि हर नागरिक सुरक्षित है और न्याय सबके लिए समान है।"

🛑"जब ममता ही मौत बन जाए…"🛑👣बिहार के अररिया से आया यह फैसला केवल एक अदालत का निर्णय नहीं, बल्कि समाज के लिए एक गहरी चेताव...
30/07/2026

🛑"जब ममता ही मौत बन जाए…"🛑👣

बिहार के अररिया से आया यह फैसला केवल एक अदालत का निर्णय नहीं, बल्कि समाज के लिए एक गहरी चेतावनी है। एक ऐसी मां, जिसे अपने बच्चे की पहली सुरक्षा और पहला सहारा माना जाता है, उसी पर अपनी मासूम बेटी की हत्या का दोष सिद्ध होने के बाद अदालत ने मृत्युदंड की सजा सुनाई।

अभियोजन के अनुसार, बच्ची ने अपनी मां के निजी संबंधों से जुड़ी ऐसी बात देख ली थी जिसे छिपाने के लिए उसकी हत्या कर दी गई। यदि अदालत द्वारा स्थापित यह अपराध वास्तव में इसी प्रकार हुआ, तो यह केवल एक हत्या नहीं, बल्कि मातृत्व, विश्वास और मानवता के मूल्यों पर गहरा आघात है।

अदालत ने इस अपराध को **"रेयरेस्ट ऑफ द रेयर"** मानते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई। न्यायालय का मानना था कि एक असहाय नाबालिग बच्ची की उसकी अपनी मां द्वारा योजनाबद्ध हत्या ऐसा अपराध है जो समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर देता है।

यह मामला हमें सोचने पर मजबूर करता है कि जब व्यक्तिगत स्वार्थ, लालच या रिश्तों को बचाने की कोशिश इंसानियत से ऊपर हो जाए, तो उसके परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं। किसी भी परिस्थिति में एक मासूम बच्चे का जीवन छीनने का कोई नैतिक या कानूनी औचित्य नहीं हो सकता।

साथ ही, यह भी याद रखना आवश्यक है कि भारतीय कानून में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा अंतिम नहीं होती। ऐसी सजा पर उच्च न्यायालय की पुष्टि आवश्यक होती है और दोषी को आगे अपील का अधिकार भी प्राप्त रहता है।

आइए, इस घटना को केवल एक समाचार बनाकर न छोड़ें। यह बच्चों की सुरक्षा, नैतिक मूल्यों और कानून के प्रति सम्मान का संदेश भी है। हर बच्चे को सुरक्षित बचपन और हर अपराध के लिए निष्पक्ष न्याय मिलना ही एक सभ्य समाज की पहचान है।

"मासूम बच्चों की सुरक्षा और न्याय—यही एक संवेदनशील समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।"



AZ Department of Child Safety

रेप: एक जघन्य अपराध, जिस पर समाज की चुप्पी भी अपराध है✍️रेप केवल एक महिला के शरीर पर हमला नहीं होता, बल्कि उसकी गरिमा, आ...
23/07/2026

रेप: एक जघन्य अपराध, जिस पर समाज की चुप्पी भी अपराध है

✍️रेप केवल एक महिला के शरीर पर हमला नहीं होता, बल्कि उसकी गरिमा, आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों पर भी क्रूर प्रहार होता है। यह ऐसा अपराध है जो पीड़िता को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से गहरे आघात में डाल देता है। इसलिए समाज का प्रत्येक नागरिक, परिवार, संस्था और कानून-व्यवस्था का दायित्व है कि ऐसे अपराधों के विरुद्ध शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) की नीति अपनाई जाए।

✍️भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita - BNS), 2023 में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के लिए कठोर कानूनी प्रावधान किए गए हैं। किसी भी महिला की इच्छा और स्वतंत्र सहमति के विरुद्ध यौन संबंध बनाना एक गंभीर दंडनीय अपराध है। कानून का उद्देश्य पीड़िताओं को न्याय दिलाना और अपराधियों को कठोर दंड देकर समाज में भय का वातावरण उत्पन्न करना है, ताकि ऐसे अपराधों की पुनरावृत्ति न हो।

✍️यह भी समझना आवश्यक है कि किसी भी प्रकार का दबाव, धमकी, धोखा, भय, या जबरन बनाया गया संबंध "सहमति" नहीं कहलाता। महिलाओं की गरिमा और उनकी इच्छा का सम्मान करना प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक और कानूनी दायित्व है।

✍️दुर्भाग्यवश, कई पीड़िताएँ सामाजिक बदनामी, पारिवारिक दबाव, धमकियों या न्याय मिलने में देरी के डर से शिकायत दर्ज नहीं करा पातीं। लेकिन हमें यह समझना होगा कि चुप्पी अपराधियों का हौसला बढ़ाती है। यदि किसी महिला या लड़की के साथ ऐसा अपराध होता है, तो उसे बिना डर के पुलिस में शिकायत दर्ज करानी चाहिए और कानून की सहायता लेनी चाहिए।

✍️एक सभ्य समाज वही है जहाँ महिलाएँ भयमुक्त होकर शिक्षा प्राप्त कर सकें, कार्य कर सकें और सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। महिलाओं की सुरक्षा केवल सरकार या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। हमें पीड़िता का साथ देना चाहिए, अपराधी का नहीं।

✍️आइए संकल्प लें कि महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के लिए सदैव आवाज़ उठाएँगे, किसी भी प्रकार की यौन हिंसा का विरोध करेंगे और कानून के शासन को मजबूत बनाने में अपना योगदान देंगे।

"चुप्पी नहीं, न्याय चाहिए।
सम्मान नहीं छीनने देंगे, अपराधियों को कानून के कटघरे तक पहुँचाएंगे।
सुरक्षित नारी ही सशक्त समाज की पहचान है।"


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Human Rights Campaign Ministry of Women & Child Development, Government of India

भारतीय कानून के तहत, यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज नहीं करने वाले पुलिस अधिकारी को दो साल तक जेल की सजा का सामना करना पड़त...
09/07/2026

भारतीय कानून के तहत, यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज नहीं करने वाले पुलिस अधिकारी को दो साल तक जेल की सजा का सामना करना पड़ता है. हालांकि, महिला अधिकार एवं संरक्षण परिषद ने पाया कि पुलिस हमेशा प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज नहीं करती है, जबकि पुलिस के जांच शुरू करने का यह पहला कदम है. पुलिस खासकर तब ऐसा करती है अगर पीड़िता आर्थिक या सामाजिक रूप से हाशिए के समुदाय से आती हो. कई मामलों में, पुलिस ने एफआईआर दाखिल करने में बाधा डाली या पीड़िता के परिवार पर "मामला निपटाने" या "समझौता" करने का दबाव डाला, विशेषकर अगर आरोपी शक्तिशाली परिवार या समुदाय के थे.

आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 में यौन उत्पीड़न, तांक-झांक और पीछा करने को यौन अपराधों की श्रेणी में शामिल कर इसकी परिभाषा का विस्तार किया गया है. लड़कियों के खिलाफ यौन उत्पीड़न के जिन चार मामलों का हमारी संस्था ने दस्तावेजीकरण किया है, पुलिस ने अपराधों की जांच और आरोप पत्र दाखिल करने में देरी की. लड़कियों के माता-पिता ने बताया कि शिकायत दर्ज कराने के बाद उन्हें अपनी बेटियों की सुरक्षा का डर हो गया क्योंकि आरोपियों को आसानी से जमानत मिल गई और फिर उन्होंने धमकी दी.

कुछ मामलों की रिपोर्ट जारी करते हुए हमने पाया की रेप पीड़िताओं और शादी का झांसा देकर संबंध बनाने को पुलिस ने अलग-अलग नजरिए से देखा और सवाल करने का तरीका भी बेहद बेहूदगी भरा था। कई रे पीड़िताओं को जब मैं साथ लेकर शिकायत दर्ज कराने थान ए जाती हूं तो मैं यह पाती हूं की पीड़िताओं से कोई महिला अधिकारी या महिला कांस्टेबल बात नहीं करती बल्कि कुछ पुरुष अधिकारी बैठकर उनके साथ हंसी तितली करते हैं और बड़ी राजी खुशी से बताते हैं कि उनके लिए भी लड़कियां एक ऑब्जेक्ट है, आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हमने उपरोक्त लिखी सभी बातों का वीडियो फुटेज इमेज और दस्तावेजीकरण किया है, लगभग डेढ़ सौ केसेस ऐसे थे जिसमें रेप पीड़िताएं जब तक संस्था या मानवाधिकार आयोग का दरवाजा नहीं खटखटाती हैं तब तक यह केसेस दर्ज ही नहीं होते, कई मामलों में हमने ऐसा पाया की इन्वेस्टिगेशन ऑफीसर की मिली भगत के कारण आज तक रेप पीड़िताओं को इंसाफ नहीं मिल पाया और बड़ी आसानी से आरोपी आज भी उसके साथ अपराध कर रहा है।।
सरकार दावा करती है की लड़कियां या महिलाएं अपने साथ अपराध होते ही पुलिस के पास जाएं और उनकी पुलिस महिला सुरक्षा की दिशा में बहुत ज्यादा तत्पर है जबकि हमने अपने रिपोर्ट में पाया की सबसे ज्यादा टॉर्चर और सबसे ज्यादा परेशानी पीड़िताओं को केस दर्ज कराने यानी थाने में ही झेलना पड़ता है।।
Ruhee Singh National Commission for Women Human Rights Campaign Bihar Police Ministry of Women & Child Development, Government of India , Justice Rape/Sexual Assault/Abuse Awareness International Justice Mission The Voice Mahila Suraksha Sewa Sangathan मानव सेवा महिला संगठन

मुख्य आरोपी का शव लेने से परिवार ने किया मना।पत्नी ने कहा मेरे साथ हमेशा दुर्व्यवहार करता था। **st
09/07/2026

मुख्य आरोपी का शव लेने से परिवार ने किया मना।
पत्नी ने कहा मेरे साथ हमेशा दुर्व्यवहार करता था।
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🕯️ दर्दनाक घटना!झारखंड के गोड्डा की 19 वर्षीय अंजू कुमारी की बिहार के भोजपुर जिले में हत्या की खबर बेहद दुखद है। दोषी जो...
09/07/2026

🕯️ दर्दनाक घटना!

झारखंड के गोड्डा की 19 वर्षीय अंजू कुमारी की बिहार के भोजपुर जिले में हत्या की खबर बेहद दुखद है। दोषी जो भी हो, उसे कानून के अनुसार कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति दें और उनके परिवार को इस कठिन समय में हिम्मत प्रदान करें। 🙏

नोट: मामले की जांच जारी है। अंतिम सच्चाई पुलिस जांच और न्यायालय के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।

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