03/10/2020
🇮🇳🙏 अवश्य पढ़ें वीर गाथा----भारत माता की वीर पुत्री शांति तिग्गा: देश की पहली महिला जवान
किसी जंग में एक पुरुष अफसर या जवान की शहादत के कई किस्से तो आपने सुने ही होंगे.
ऐसा कम ही हुआ है, जब एक महिला फौजी को देश के लिए शहीद होने का मौका मिला हो. जिनको भी यह मौका मिला, उन्हें बहादुरी और हिम्मत की मिसाल समझना गलत नहीं होगा.
ऐसी ही एक महिला थीं शांति तिग्गा, जो भारतीय सेना में भर्ती होने वाली पहली महिला जवान थीं. उन्होंने 35 की उम्र में यह साबित कर दिया कि कुछ करने के लिए जवानी नहीं, बल्कि रगों में दौड़ता गर्म खून और जज़्बा चाहिए. हालाँकि उनका सफ़र काफी छोटा रहा, लेकिन जितना रहा वो अनंतकाल तक उनके नाम की “अमर ज्योति” जलाये रखने के लिए काफी है.
तो आइए शांति तिग्गा की जिंदगी और उनके दुखद अंत के रहस्य को ज़रा नज़दीक से जानने की कोशिश करते हैं-
पति की मौत के बाद भी नहीं मानी हार
शांति का जन्म पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में हुआ. उनके घर के हालात बहुत नाज़ुक थे. आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उनके माता-पिता उनकी पढ़ाई का खर्चा नहीं उठा सकते थे. इसी कारण वो ज्यादा पढ़ नही सकी.
वो एक रूडिवादी सोच रखने वाले समाज से थीं. उस समाज की अन्य लड़कियों की ही तरह शांति की शादी भी बहुत छोटी उम्र में करवा दी गयी. वो अभी 20 वर्ष की हुई ही थीं कि वो दो बच्चों की माँ भी बन चुकी थीं.
जिंदगी पति और बच्चों के सहारे कट रही थी. पति रेलवे में थे. उनकी आमदनी से ही घर का गुज़ारा चल रहा था. किसे पता था कि एक छोटे से परिवार के खुशहाल दिन अब ख़तम होने वाले थे.
शांति उस समय कुछ 30 बरस की ही रही होंगी, जब 2005 में उनके पति की मृत्यु हो गयी. बच्चों के सर से पिता का साया उठ चुका था. शांति को अपने दुःख पर गाँठ बाँध कर अपने बच्चों के लिए जीना था.
सरकारी नौकरी होने के कारण उन्हें अपने पति की ही नौकरी मिल गयी. पॉइन्ट्स मैन के तौर पर उन्हें नौकरी पर रख लिया गया. उनकी पहली पोस्टिंग जलपाईगुड़ी जिले में ही, चालसा स्टेशन पर हुई.
इससे परिवार का गुज़ारा चलाने की चिंता अब एक हद तक कम हो चुकी थी. पति की मृत्यु से कुछ समय पहले ही शांति ने टेरिटोरियल आर्मी का ज़िक्र सुना था. उनके कुछ रिश्तेदार इसका हिस्सा भी थे.
देखते ही देखते कब यह शांति का सपना बन गया उन्हें पता ही नहीं चला. चूंकि वो एक गृहणी थीं और 2 बच्चों की माँ थीं, उन्होंने कभी इस ख्याल को हकीकत में तब्दील करने की बात नहीं सोची थी.
35 की उम्र में पूरा किया सपना
अब नौकरी करने की राह पकड़ कर, शांति आत्मनिर्भरता की तरफ अपना पहला कदम उठा चुकी थीं. इसी क्रम में उन्होंने टेरिटोरियल आर्मी में जाकर अपना सपना पूरा करने का सोचा. वो ओलिव ग्रीन ड्रेस पहनना और बंदूक चलाना चाहती थीं.
2011 में उन्होंने टेरीटोरियल आर्मी के लिए आवेदन डाला. आवेदन डालते समय उन्हें पता चला कि अब तक कोई भी महिला भारतीय सेना में अफसर रैंक से नीचे भर्ती नहीं हुई है. शांति ने कदम पीछे नही हटाऐ. उन्होंने सोचा कि जब यह सपना उन्होंने अकेले ही देखा था तो इसकी राह पर वो अकेली क्यों नहीं चल सकती.
बिना किसी तरह की हिचकिचाहट के उन्होंने आगे कदम बढ़ाने शुरू कर दिए. परीक्षा में होने वाले फिजिकल टेस्ट की तैयारी करने के लिए शांति ने दिन रात एक कर दिया था.
टेरीटोरियल आर्मी में जवान बनने के लिए जितनी भी लिखित परीक्षा हुई, शांति ने वो सभी पास कर ली. जब बात फिजिकल टेस्ट की आई तो उन्होंने देखा कि हज़ारों पुरुषों के बीच वो अकेली महिला थीं. यह भी उनके जज्बे को तोड़ नहीं सका.
शांति ने अपने प्रदर्शन से सभी को हैरान कर दिया. 1.5 किलोमीटर की दौड़ में उन्होंने सभी पुरुषों को पीछे छोड़ दिया. वो 5 सेकंड पहले ही दौड़ पूरी कर चुकी थीं.
इसके अलावा 50 मीटर की दौड़ उन्होंने केवल 12 सेकंड में पूरी कर ली. यह उस समय का सबसे अच्छा स्कोर माना गया. उन्हें दौड़ते देख वहां मौजूद सभी पुरुष हक्के बक्के रह गए.
सभी परीक्षा पास कर वो भर्ती प्रशिक्षण शिविर पहुंची. वहां रहने के दौरान तिग्गा ने बंदूक को हैंडल करने के अपने कौशल से अपने प्रशिक्षकों को काफी प्रभावित किया और निशानेबाजों में सर्वोच्च स्थान हासिल किया.
इतना ही नहीं, रिक्रूटमेंट ट्रेनिंग कैंप में उनका जोश एक नए उफान पर था. उन्होंने ट्रेनिगं के दौरान इतना शानदार प्रदर्शन किया की उन्हें सर्वोच्च ट्रेनिंग कैडेट घोषित किया गया. इसके लिए उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से पुरस्कार भी मिला.
ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्हें टेरीटोरियल आर्मी की 969 रेलवे इंजिनियर रेजिमेंट में तैनाती मिली. तैनाती के दौरान भी उनकी जाबाज़ी और शारीरिक योग्यता की खूब तारीफ़ हुई.
बदनामी का दाग और फिर...
जिंदगी में ख़ुशी और गम के बादल, धूप और छाया की तरह ही आते-जाते रहते हैं. शांति को अंदाजा भी नहीं था कि उनकी जिंदगी को काले बदल फिर से एक बार घेरने वाले हैं. और शायद ये भी नहीं कि इस बार काले बदल अब कभी हटने वाले नहीं थे.
नौकरी के महज़ डेढ़ दो साल बाद ही शांति पर ये इलज़ाम लगने लगे कि वह सिफ़ारिश कर लोगों की नौकरी लगवाती हैं. इतना ही नहीं, उन पर आरोप लगे कि वो नौकरी लगवाने के बदले लोगों से बड़ी रकम लेती हैं.
जहां एक समय पर पूरी दुनिया उनकी बहादुरी और हिम्मत के किस्से सुनाया करती थी, वहीं लोग अब उन्हें ओछी नज़रों से देखने लगे थे. इल्जामों के शोर के बीच जीना आसान नहीं था. तभी उन पर शारीरिक हमले भी शुरू हो गये.
9 मई, 2013 को उन्हें कुछ अनजान लोगों ने अगवा कर लिया. उनके अपहरण की खबर जब उनकी कंपनी को मिली, तो बिना कोई समय गवाएं उनकी तलाश शुरू कर दी गयी. रात भर तलाश करने के बाद भी शांति का कोई नाम और निशान नही मिला.
अगले दिन सुबह रेल की पटरी के पास शांति उन्हें दिखाई दी. उन्हें एक खंबे से बांधा हुआ था. उनकी आँखों पर पट्टी बंधी हुई थी. लोग उन्हें जल्दी से अस्पताल ले गए. वहां उन्हें पूरी जांच के बाद भर्ती कर लिया गया. होश आने पर शांति ने सबको बताया कि जिन भी लोगों ने उनका अपहरण किया है, उन्होंने उन पर किसी प्रकार का शारीरिक प्रहार नहीं किया था.
पुलिस अब उनकी जान की हिफाज़त को लेकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी. अस्पताल के जिस कमरे में उन्हें भर्ती किया गया था, वहां सुरक्षाबल तैनात किये गए. उन्हें लग रहा था कि निगरानी में होने से शांति अब हर खतरे से सुरक्षित है.
इसी दौरान शांति के बेटे ने कमरे से जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. वो शांति के साथ कमरे में ही था. बाहर खड़े लोग आवाज़ सुन कर अंदर पहुंचे. शांति के बेटे ने बताया कि वो काफी देर से बाथरूम से बहार नहीं निकली हैं.
लोगों ने जब बाथरूम का दरवाज़ा तोड़ा, सामने छत से शांति की लाश लटकी हुई थी. पुलिस ने तो इसे इल्जामों के दबाव में आकर की आत्महत्या बताया, लेकिन शांति के परिवारजनों का कहना है कि उनकी हत्या की गयी थी.
सच्चाई जो भी हो, लेकिन शांति तिग्गा एक जाबाज़ महिला थीं इससे इंकार नहीं किया जा सकता. उनकी विपरीत परिस्थितियों में भी सपने देखने की हिम्मत और उन्हें सच कर दिखाने के जज़्बे ने लाखों महिलाओं को प्रेरित किया है.जय हिन्द जय जवान जय किसान। 🙏🇮🇳