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सरकारी स्कूलों में मिलने वाले मिड डे मील में लापरवाही कब तक !!!बीते कल बिहार के नालन्दा ज़िले में एक सरकारी मध्य विद्याल...
19/08/2026

सरकारी स्कूलों में मिलने वाले मिड डे मील में लापरवाही कब तक !!!

बीते कल बिहार के नालन्दा ज़िले में एक सरकारी मध्य विद्यालय में मिड डे मील के साथ नमक की बजाय कपड़े धोने का डिटर्जेंट दिये जाने के कारण क़रीब 34 छात्रों की तबीयत बिगड़ गयी। बिहार में मिड डे मील खाने के दौरान बच्चों की तबीयत बिगड़ने की यह पहली घटना नहीं है। इसके पहले भी मिड डे मील के खाने में मरी हुई छिपकली, कीड़े मिलने और ख़राब गुणवत्ता का खाना दिये जाने की घटनाएँ सामने आ चुकी है। वर्ष 2013 की हृदयविदारक घटना अब भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा है जब मिड डे मील में विषाक्त भोजन खाने से क़रीब 23 बच्चों की मौत हो गयी थी। इस घटना के एक दशक से भी ज़्यादा वक़्त बीत जाने के बाद मिड डे मील को लेकर अभी तक लापरवाही बरती जा रही है। आज भी मिड डे मील की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के नाम पर केवल खानापूर्ति ही की जाती है। क्या सरकार की नज़रों में ग़रीब मेहनतकश परिवारों से आने वाले बच्चों के जान की कोई क़ीमत नहीं है? स्कूल में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और पौष्टिक आहार देना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है। मिड डे मील को लेकर राज्य सरकार को अपनी जवाबदेही तय करनी होगी। मिड डे मील को लेकर बरती जा रही लापरवाही दरअसल स्कूली स्तर की शिक्षा की बदहाली की ही अभिव्यक्ति है। आज समस्या केवल मिड डे मील तक सीमित नहीं है, बिहार में ऐसे न जाने कितने सरकारी स्कूल हैं जिनकी इमारतें जर्जर हो चुकी हैं, लेकिन इसकी कोई सुध नहीं ली जाती है और कई स्कूलों में तो शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। कई स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं है। आज देशभर में स्कूली छात्र, स्तरीय शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं की माँग को लेकर सड़कों पर उतरने को विवश हो रहे हैं। क्या यह त्रासद नहीं है कि ऐसे नौनिहाल जिन्हें पढ़ने लिखने की सारी सुविधाएँ निःशुल्क मुहैया करायी जानी चाहिए, आज उन्हें इन सबके लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। अगर बिहार में सरकारी स्कूलों की व्यवस्था नहीं सुधरी तो यहाँ भी छात्रों को अपनी माँगो को लेकर सड़कों पर उतरने के लिए विवश होना पड़ेगा।

भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी यह माँग करती है कि नालन्दा में परासी मध्य विद्यालय में मिड डे मील खाने से बीमार हुए बच्चों का निःशुल्क इलाज किया जाए। इस पूरे मामले की जाँच करायी जाए और दोषी व्यक्तियों पर कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही मिड डे मील योजना के तहत मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता की जाँच के लिए विद्यालय और प्रखण्ड स्तर पर ठोस व्यवस्था की जाए।

#बिहार

बाँकीपुर विधानसभा उपचुनाव के राजनीतिक निहितार्थ : यह प्रशांत किशोर की दक्षिणपंथी लोकरंजकतावादी राजनीति की जीत नहीं बल्कि...
06/08/2026

बाँकीपुर विधानसभा उपचुनाव के राजनीतिक निहितार्थ : यह प्रशांत किशोर की दक्षिणपंथी लोकरंजकतावादी राजनीति की जीत नहीं बल्कि जनता में भाजपा के ख़िलाफ़ सुलगते गुस्से की अभिव्यक्ति है!

बाँकीपुर विधानसभा उपचुनाव ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि जनता भाजपा से त्रस्त और परेशान है। आज जनता विकल्प की तलाश में है, लेकिन विकल्पहीनता के इस दौर में बाँकीपुर की जनता ने प्रशांत किशोर की दक्षिणपंथी लोकरंजकतावादी राजनीति को चुना है। गौरतलब है कि इस चुनाव में जन सुराज के प्रशांत किशोर ने भाजपा के उम्मीदवार नीरज सिन्हा को 19,324 वोट से हरा दिया। वहीं दूसरी तरफ़ प्रमुख विपक्षी पार्टी राजद इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रही। बाँकीपुर विधानसभा वह सीट है जहाँ पिछले 31 सालों से भाजपा नहीं हारी थी। इस सीट को भाजपा का गढ़ कहा जाता था। 8 महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहाँ से जीत हासिल की थी। लेकिन इस उपचुनाव में भाजपा को करारी हार मिली है। पिछले लोकसभा चुनाव से ही इस तथ्य का अंदेशा लगने लगा था कि मोदी लहर अब कमज़ोर पड़ चुकी है। अगर भाजपा द्वारा एसआईआर और वोटचोरी जैसे हथकण्डे नहीं अपनाये जाते तो फ़िर परिणाम बिल्कुल उलट भी हो सकते थे। ज़ाहिर है कि सभी चुनावों में भाजपा वोटचोरी करने के अपने हथकण्डे इस्तेमाल नहीं कर सकती है, विशेषकर जब चुनाव केवल एक विधानसभा सीट का हो। लेकिन, भाजपा ने अपने दूसरे हथकण्डे यानी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को ज़रूर आज़माया, लेकिन इस बार भाजपाईयों की दाल नहीं गल सकी। भाजपा की इस हार का कारण प्रशांत किशोर के लोकरंजक वायदे नहीं थे, बल्कि लोगों का भाजपा के प्रति गुस्सा था, जो पिछले कुछ दिनों में तीव्र गति से बढ़ा है।

आज केन्द्र में मौजूद फ़ासीवादी मोदी सरकार और राज्य में 'सम्राट सरकार' के ख़िलाफ़ जनता का आक्रोश किसी से छिपा नहीं है। पिछले कुछ महीनों के दौरान देशभर में हुए मज़दूर, छात्र और जनता के अलग-अलग हिस्सों द्वारा किये गये स्वतःस्फूर्त आन्दोलन इसकी पुष्टि कर रहे हैं। खासकर पिछले माह में ही पेपर लीक के ख़िलाफ जन्तर-मन्तर पर हुए छात्र आन्दोलन ने देशव्यापी स्वरूप ले लिया था। इस आन्दोलन को दबाने के लिए मोदी सरकार द्वारा किये गये बर्बर दमन ने भाजपा के दमनकारी चरित्र को और उजागर किया है। बाँकीपुर विधानसभा स्थित गाँधी मैदान क्षेत्र में आन्दोलनरत छात्रों के साथ हुए लाठीचार्ज की घटना को इस क्षेत्र के मतदाताओं ने प्रत्यक्ष तौर पर देखा था। इस क्षेत्र में कई ऐसे भी मतदाता थे जिनके ख़ुद के बच्चों पर लाठीचार्ज हुआ था। इन घटनाओं ने भाजपा के परम्परागत वोटरों के बीच भाजपा के मिथ्या आभामण्डल को एक हद तक ख़त्म किया है। वहीं, अधिकांश जेन ज़ी नवयुवा भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति और तानाशाहाना रवैये को समझते हैं। जेन ज़ी आबादी का अधिकांश हिस्सा भाजपा को वोट नहीं देता है।

दूसरी ओर, बिहार राज्य की भाजपा - जद(यू) की नयी गठित सरकार का कामकाज़ भी सवालों के घेरे में रहा है। बिहार के कई हिस्सों में स्त्री विरोधी घटनाएँ बढ़ी है। कई घटनाओं पर राज्य सरकार और पुलिस का रवैया लीपा पोती का ही रहा है। भ्रष्टाचार और अफ़सरशाही से जनता परेशान है। इन सबके कारण भाजपा जद यू की सरकार बिहार की जनता के समक्ष नंगी हुई है।

ञञञऐसे समय में निश्चित रूप से जनता नये विकल्प की तलाश करती है। लेकिन विकल्प के नाम पर जनता के सामने एक तरफ वही विपक्ष नजर आता है, जिसका खुद का इतिहास भ्रष्टाचार का रहा है और जो अतीत में खुद सत्ता में आकर जन विरोधी नीतियाँ बनाती रही है। बिहार के मुख्य विपक्षी दल राजद के जन विरोधी चरित्र से बिहार की जनता वाकिफ़ है। लेकिन पूँजीवादी जनतंत्र में जब जनता का स्वतंत्र क्रान्तिकारी विकल्प नहीं मौजूद होता है तो ऐसे समय में एक निर्वात पैदा होता है और उस निर्वात को भरने के लिए एवम् पूँजीवादी जनतंत्र के खोखले ढाँचे को बचाए रखने के लिए ऐसे बहरूपियों की ज़रूरत पड़ती है, जो लोकरंजकवादी राजनीति करते हुए लोक लुभावन नारे देता हो। विकल्पहीनता के कारण जनता के सामने जब कोई विकल्प नहीं रह जाता है तो ऐसे लोग इसका फ़ायदा उठाते हैं। एक दशक पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उभार से लेकर आज की तारीख़ में तमिलनाडु में तमिलगा वेत्री कड़गम इसका जीता जागता उदाहरण है। केजरीवाल और जोसेफ विजय ऐसी ही दक्षिणपंथी लोकरंजकतावादी राजनीति के पैरोकार हैं। इन्हीं की परिपाटी पर चलते हुए आज बिहार में जन सुराज के रूप में प्रशांत किशोर का चेहरा सामने आ रहा है।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि प्रशांत किशोर राजनीतिक रूप से एकदम ही मौका परस्त व्यक्ति है। अवसरवादी राजनीति करके अपनी रोटियाँ सेंकने में माहिर ऐसे लोग किसी बहरूपिए से कम नहीं हैं। प्रशांत किशोर भाजपा के ख़िलाफ़ आज नारे लगा रहे हैं, उनको सत्ता से बेदखल करने की बात कर रहें हैं। लेकिन भाजपा को सत्ता तक पहुँचने में और मोदी जी के उभार में इनका योगदान किसी से छिपा नहीं है। ज़्यादा वक़्त नहीं बीता जब प्रशांत किशोर चुनावों में भाजपा की विजय के लिए नीतियाँ बनाते थें। अगर भाजपा आज देश में सत्ता पर पिछले एक दशक से ज़्यादा समय से काबिज़ है तो फ़िर इसके पीछे एक हद तक प्रशान्त किशोर खुद भी ज़िम्मेदार हैं। प्रशान्त किशोर भाजपा के शासन पर तो सवाल उठाते हैं, लेकिन जहाँ भी पूँजीपतियों द्वारा आम मेहनतकश आबादी के शोषण की बात हो, वहाँ चुप्पी साध लेते हैं। देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंककर कॉर्पोरेट कम्पनियों की सेवा मोदी सरकार की ख़ासियत है मगर प्रशांत किशोर इस पर कभी हमले नहीं करते हैं। बात-बात पर शिक्षा की बात करने वाले प्रशांत किशोर यह कभी नहीं कहते कि शिक्षा का निजीकरण और बाजारीकरण बंद होना चाहिए। अगर सच में उनको शिक्षित बिहार बनाना है तो क्यों नहीं वह निःशुल्क और समान शिक्षा की बात करते हैं। रोज़गार के सवाल पर गोल-मोल बात करते हैं कभी यह नहीं कहते कि रोज़गार की गारण्टी का कानून होना चाहिए। इसके साथ ही वह बिहार के प्रवासी मज़दूरों और पलायन का ज़िक्र अपने हर चुनावी भाषण में करते हैं। मगर अप्रैल के महीने में जब यही बिहार के प्रवासी मज़दूर नोएडा से लेकर मानेसर, गुरूग्राम, हरिद्वार,सूरत जैसे कई शहरों में अपने बुनियादी हक के लिए सड़क पर उतरे थे और उनका बर्बर दमन हुआ था, तो प्रशान्त किशोर ने एक शब्द भी उनके समर्थन में नहीं कहा था। प्रशांत किशोर कहते हैं कि बिहार के अंदर इण्डस्ट्री लगना चाहिए, परन्तु वह इस पर चुप रहते हैं कि उसका मालिकाना किसके हाथ में होगा। निश्चित ही वह भी उन्हीं पूँजीपतियों के हाथों में होगा जो अन्य राज्यों में बिहारी मज़दूरों का शोषण करते हैं। यानी बिहार का मज़दूर है तो बिहार में ही उसका शोषण हो! इसके साथ ही इस चुनाव में बड़े जोरो शोरों से वह कहते रहे हैं कि उन्हें सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद से हटाना है, भाजपा किसी और को बैठा दे, इससे उन्हें गुरेज़ नहीं है। उनसे फ़िर सवाल यह है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सम्राट चौधरी बैठे या कोई और अगर राज्य में भाजपा की सरकार है तो क्या साम्प्रदायिक उन्माद को बढ़ावा दिया जाना बन्द हो जायेगा और क्या भाजपा सरकार द्वारा लागू की जा रही जनविरोधी नीतियाँ बंद हो जायेंगी? साफ़ है कि इन ज़रूरी सवालों से कुटिल तरीक़े से कन्नी काटकर प्रशांत किशोर अवसरवादी राजनीति का ही प्रदर्शन कर रहे हैं। अपनी विशिष्ट किस्म की दक्षिणपंथी अवसरवादी लोकरंजकतावादी राजनीति के ज़रिए वे जनता के बीच विकल्पहीनता की स्थिति का फ़ायदा उठाकर सत्ता में अपनी जगह पक्की कर रहे हैं। बिहार की जनता को प्रशान्त किशोर की इस अवसरवादी दक्षिणपंथी लोकरंजकतावादी राजनीति से सावधान रहने की ज़रूरत है।

दूसरी ओर, आज कई बुद्धिजीवी हैं, जो यह मानकर बैठे हैं कि चुनावों में भाजपा को हराकर देश में फ़ासीवादी शक्तियों को परास्त किया जा सकता है। इसलिए, देश के तथाकथित वाम तथा लिबरल जनवादियों के एक खेमें में प्रशांत किशोर की जीत को नयी शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। यहाँ तक कि कुछ गम्भीर जनपक्षधर बुद्धिजीवी प्रशान्त किशोर की अवसरवादी राजनीति को समझते हुए भी उनकी जीत के कसीदे पढ़ रहे हैं और इसमें सकारात्मकता तलाश रहे हैं। अव्वल बात तो यह है कि चुनावों में हार जीत से देश में फ़ासीवाद की सेहत पर कोई खास फ़र्क नहीं पड़ेगा। चूँकि, आज देश की संवैधानिक संस्थाओं, न्यायपालिका, कार्यपालिका आदि तक के पोर-पोर में फ़ासीवादी शक्तियों ने घुसपैठ कर ली है। इसलिए भाजपा सत्ता में रहे या न रहे देश से फ़ासीवादी ख़तरा नहीं टलेगा। ऊपर से ढुलमुल अवसरवादी राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रशांत किशोर जैसे व्यक्ति किसी भी वक़्त पलटी मार कर भाजपा के खेमें में जा सकते हैं। अगर ऐसा भविष्य में घटित हो तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसलिए ऐसे बहुरूपियों से सावधान रहने की ज़रूरत है।

जैसा कि ऊपर कहा गया है कि भाजपा सत्ता से बाहर हो भी जाये तो फ़ासीवाद का ख़तरा ख़त्म नहीं होगा, लेकिन इसके बावजूद मेहनतकश आबादी को चुनाव में भाजपा को हराने के लिए लामबन्द होना चाहिए। चुनाव में हारने से फ़ासीवादी ताक़तें सत्ता से बाहर रहेंगी, तो फ़ासीवाद द्वारा प्रायोजित दमन में मात्रात्मक कमी आयेगी एवं देश में आसन्न फ़ासीवादी ख़तरे से लड़ने के लिए तैयारी करने के लिए जनता की प्रगतिशील जनवादी शक्तियों को महत्वपूर्ण समय मिलेगा। लेकिन, यह ध्यान में रखना होगा कि चुनाव में भाजपा को हराने के लिए किसी भी चुनावबाज़ पार्टी का पिछलग्गू बनने के बजाय मेहनतकश जनता को चुनावों में अपना स्वतंत्र क्रान्तिकारी विकल्प खड़ा करना होगा। आज हमें ऐसे ही स्वतंत्र क्रान्तिकारी विकल्प के निर्माण के लिए आगे आना होगा।


28/07/2026

मोदी-शाह शासन के विरुद्ध मौजूदा छात्र-युवा आन्‍दोलन 12 साल से बेहाल जनता के धैर्य के जवाब देने की निशानी है।

स्‍वत:स्‍फूर्तता से आगे बढ़कर मौजूदा जनान्‍दोलन को एक सचेतन क्रान्तिकारी जनान्‍दोलन में तब्‍दील करो!

पिछले कुछ हफ़्तों से देश में छात्रों-युवाओं का एक आन्‍दोलन जारी है। इसका तात्‍कालिक मुद्दा निश्‍चय ही नीट पेपर लीक और एनटीए द्वारा छात्रों के भविष्‍य के साथ किया जा रहा खिलवाड़ है। लेकिन अब यह आन्‍दोलन महज़ इस मुद्दे पर जनता के रोष को प्रतिबिम्बित नहीं कर रहा है। बल्कि यह देश भर में जनता के बीच पिछले 12 वर्षों से एकत्र हो रहे असन्‍तोष और गुस्‍से की अभिव्‍यक्ति बन चुका है।

पिछले 12 वर्षों में जनता जिस क़दर महँगाई, बेरोज़गारी, महँगी होती शिक्षा, परीक्षा घोटालों और सामाजिक असुरक्षा से बेहाल है, वह देश के इतिहास में अभूतपूर्व है। इस क़दर जनविरोधी सरकार आज तक भारत की जनता ने नहीं देखी है। 12 वर्षों तक उसे साम्‍प्रदायिक मसलों और आर.एस.एस. और भाजपा के फ़र्जी “राष्‍ट्रवाद” में उलझाकर रखा गया। इसके नाम पर जनता को नोटबन्‍दी और कोविड के समय योजनाविहीन तरीक़े से किये गये लॉकडॉउन के ज़हर के घूँट भी पिला दिये गये। कभी पाकिस्‍तान तो कभी चीन का नकली हौव्‍वा खड़ाकर जनता को असल मसलों से भटकाकर रखा गया, तो कभी उसे साम्‍प्रदायिक तनाव में झोंककर फँसा दिया गया। इस बीच मोदी की विदेश यात्राओं और भाजपा सरकार द्वारा विकास के झूठे प्रचारों पर जनता के अरबों-खरबों रुपये बहा दिये गये। जिस समय जनता को फ़ालतू के धार्मिक और जातिवादी मसलों में उलझाकर रखा गया, उसी बीच देश की सार्वजनिक सम्‍पत्ति और प्राकृतिक संसाधनों को अम्‍बानियों और अडाणियों को कौड़ी के दाम बेच दिया गया। जिस राम मन्दिर के मसले को हवा देकर भाजपा सत्‍ता में पहुँची उसका चन्‍दाचोरी करने में भी संघ परिवार व भाजपा के प्‍यादों और कारकूनों को कोई गुरेज़ नहीं था। इनका तो शुरू से ही यही नारा रहा है कि ‘राम नाम की लूट मची है, लूट सके तो लूट’! इसी बीच महँगाई ने आज़ादी के बाद के भारत के इतिहास के सारे कीर्तिमान तोड़ दिये। बेरोज़गारी भी पीछे नहीं रही और हालात ये पैदा हो गये कि क़रीब 30 करोड़ लोग आज बेरोज़गार या अर्द्धबेरोज़गार हैं। देश में 50 करोड़ से भी ज्‍़यादा लोग अनौपचारिक क्षेत्र में 12-12 घण्‍टे खेतों-खलिहानों, कल-कारखानों और खानों-खदानों में 8-10 हज़ार रुपये में ठेका या दिहाड़ी पर खटने को मजबूर कर दिये गये। नतीजतन, हालिया दिनों में मज़दूरों के पास भी सड़कों पर उतरने और हड़ताल करने के अलावा कोई रास्‍ता नहीं बचा। जिस तरह से आज मोदी-शाह शासन छात्रों-युवाओं का बर्बर दमन कर रहा है, उसी प्रकार हालिया दिनों में मज़दूरों व मज़दूर कार्यकर्ताओं का भी हरियाणा से लेकर उत्‍तर प्रदेश तक में बेशर्मी से संविधान व क़ानून को ताक पर रख कर दमन किया गया। ग़रीब किसानों और शहरी व ग्रामीण आम मेहनतकश आबादी को भी दाने-दाने का मोहताज बना दिया गया।

दूसरी ओर, देश के धनिक वर्ग, सेठ, कम्‍पनी-मालिक, बड़े व्‍यापारी, दलाल, बिचौलिये, धनी कुलक-फार्मर व भूस्‍वामी अश्‍लीलता के सारे रिकार्ड ध्‍वस्‍त करते हुए देश की ग़रीब मेहनतकश जनता व छात्रों-युवाओं के आँसुओं के समन्‍दर के बीच अपनी ऐय्याशी और ऐश्‍वर्य की मीनारें खड़ी करते रहे। नेता-नौकरशाह और बड़े सिविल व सेना अधिकारियों के ऐशो-आराम, वेतन भत्‍तों और रंगरलियों में भी अभूतपूर्व बढ़ोत्‍तरी हुई। घपलों-घोटालों के मामले में तो भाजपा सरकार ने नये मानक स्‍थापित कर दिये। व्‍यापम घोटाले से लेकर, दिल्‍ली का स्‍वास्‍थ्‍य घोटाला, परीक्षा घोटाला, एनपीए घोटाला, राफ़ेल घोटाला और न जाने कितने अरबों-खरबों के घोटालों की फ़ेहरिस्‍त 12 सालों में इतनी लम्‍बी हो चुकी है कि उसकी लम्‍बाई किलोमीटर में ही नापी जा सकती है! लेकिन चूँकि ये धर्मध्‍वजाधारियों द्वारा किये गये “राष्‍ट्रवादी” घपले थे, इसलिए यह कहीं मसला नहीं बना! मीडिया को पूरी तरह निगलकर गोदी मीडिया में तब्‍दील कर दिया गया और उनकी दलाली की इन्‍तहाँ इस क़दर हुई कि इन गोदी चैनलों व अख़बारों के बेचारे वेतनभोगी रिपोर्टर अपने मालिकान व प्रबन्‍धन के पापों और कुकर्मों की क़ीमत जनता के हाथों आज सड़कों पर चुका रहे हैं।

केचुआ (केन्‍द्रीय चुनाव आयोग), एनफ़ोर्समेण्‍ट डाइरेक्‍टोरेट (ईडी) से लेकर सीबीआई जैसी संस्‍थाओं में संघ परिवार ने आन्‍तरिक घुसपैठ करके उसे अपना जेबी माल बना लिया। आज समूची जनता इस बात को जानती है चाहे सत्‍ताधारी और न्‍यायपालिका इस पर कितनी भी क्‍लीन चिट अपने आपको देते रहें। न्‍यायपालिका की हालत भी कैसी है, यह किसी से छिपा नहीं है। पहले भारत के सीजेआई ने बेरोज़गार युवाओं को कॉकरोच बोला। अब 20 जुलाई को जन्‍तर-मन्‍तर पर छात्रों-युवाओं पर दिल्‍ली पुलिस और आरएएफ़ द्वारा किये गये बर्बर लाठी चार्ज व दमन पर दायर याचिका पर उन्‍होंने याचिका डालने वाले से कहा कि उनके पास पुलिस द्वारा दमन, लड़कियों और बच्‍चों को मारने, उनके कपड़े फाड़ने के वीडियो देखने का वक्‍़त नहीं है, उसका समय न बरबाद किया जाय! ये ही न्‍यायाधीश महोदय समय रैना के कॉमेडी वीडियो देखने के लिए फ्री थे! हाईकोर्ट में याचिका पड़ी तो पहले कोर्ट ने कहा कि कोर्ट को इस मसले में न घसीटा जाय! बाद में, इस याचिका पर सुनवाई शुरू हुई लेकिन उसमें अगली तिथि ही सितम्‍बर 2026 की दी गयी। अब किसी सेठ-व्‍यापारी के मुनाफ़े का मसला तो था नहीं कि न्‍यायपालिका रात के 12 बजे भी दरवाज़े खोलकर सुनवाई करे! पुलिस और सशस्‍त्र बलों में अधिकारी स्‍तर पर संघ परिवार की घुसपैठ पर भी तमाम रपटें सामने आ चुकी हैं। इसमें ताज्‍जुब की क्‍या बात है कि वह क़ानून और संविधान की रक्षा करने के बजाय सत्‍तासीन भाजपा और उसके नेताओं-मन्त्रियों की रक्षा में लगी है और उसके लिए 10-12 साल के छोटे बच्‍चों को हिरासत में लेने, 16-17 साल के न्‍याय माँग रहे नवयुवकों का सिर फोड़ने, उन पर पेलेट गन चलाने, शॉक बेटन से मारने और लड़कियों पर हाथ उठाने व उनके कपड़े फाड़ने तक से बाज़ नहीं आ रही है?

एसआईआर की साज़‍िश के तहत देश की जनता को फिर से लाइनों में खड़ा किया जा रहा है। जिन्‍होंने अपनी फ़र्जी डिग्री तक कभी नहीं दिखायी, वे देश की जनता से नागरिकता के सबूत माँग रहे हैं। मक़सद है एनआरसी को चोर दरवाज़े से लागू करना और सभी ऐसे वोटरों का नाम वोटर लिस्‍ट से काटना जो भाजपा के विरुद्ध वोट कर सकते हों, चाहे वे मुसलमान हों, दलित हों, ग़रीब मेहनतकश औरतें हों, आदिवासी हों या फिर पिछड़े वर्ग। हाल में छात्रों-युवाओं को आत्‍महत्‍या पर मजबूर करने वाले परीक्षा घोटालों व पेपर लीक्‍स ने उस आख़‍िरी तिनके का काम किया है जो ऊँट की क़मर तोड़ता है। आज इसकी वजह से देश के छात्र-युवा, उनके अभिभावक व माता-पिता लाठी-डण्‍डों, पेलेट गन आदि का डर दिखाने के बावजूद जिस क़दर सड़कों पर उतरे हैं, जिस तरह से देश की मेहनतकश जनता, स्विगी-ज़ोमैटो डिलिवरी करने वाले, आम मज़दूर और कमेरे लोग लड़ रहे युवाओं और उनके माताओं-पिताओं को संघर्ष करने के लिए मदद और रसद पहुँचा रहे हैं, वह इस बात को साबित करता है कि जनता के सब्र का प्‍याला छलक गया है। मोदी-शाह शासन और भाजपा के विरुद्ध गुस्‍से और असन्‍तोष का माहौल यह है कि देश भर में भाजपा के नेताओं को जनता सड़कों पर दौड़ा रही है, उनके पोस्‍टर फाड़ रही है, उनके झण्‍डे फाड़ रही है और उनके लिए घरों से निकलना मुश्किल हो गया है। संघ परिवार अपने लम्‍पटों की ब्रिगेड को मौजूदा छात्रों-युवाओं के आन्‍दोलन पर कटखन्‍ने कुत्‍तों की तरह छोड़ने की फ़‍िराक़ में था, लेकिन दिल्‍ली और देश के आन्‍दोलनरत नौजवानों की हिम्‍मत और हौसला देखकर अब इसकी हिम्‍मत नहीं जुटा पा रहा है।

इस समूची स्थिति से भी स्‍पष्‍ट सवाल उठता है कि अगर मज़दूर नाराज़ हैं, छात्र-युवा नाराज़ हैं, माता-पिता नाराज़ हैं, तो भाजपा की तमाम चुनावी जीतों में उसे वोट दे कौन रहा है? ख़ैर, बिहार, महाराष्‍ट्र और पश्चिम बंगाल में भाजपा ने एसआईआर, ईवीएम और गणना में खेल करके कैसे चुनाव जीता है, यह अब सारी जनता को पता है। भाजपा चाहे अपनी जेब में बैठी न्‍यायपालिका और चुनाव आयोग से कोई भी सफ़ाई या बयान दिलवा ले, जनता सब जान रही है। वास्‍तव में, ये चुनाव कैसे हेरफेर से जीते गये हैं, इस पर भरोसेमन्‍द और सम्‍माननीय खोजी पत्रकारों द्वारा तमाम रपटें पेश की जा चुकी हैं, जिनमें विविध प्रमाण पेश किये गये हैं। भाजपा का नारा है कि मतदाता सरकार चुनेंगे, लेकिन उससे पहले भाजपा मतदाताओं को चुनेगी! इससे वह एक ऐसा निर्वाचन मण्‍डल निर्मित करना चाहती है, जो बस भाजपा को वोट दे! लेकिन अगर इस नवनिर्मित निर्वाचन मण्‍डल की बहुसंख्‍या ही मोदी-शाह शासन की असलियत समझने लगे और उन्‍हें सत्‍ताच्‍युत करने के लिए सड़कों पर उतरने लगे तो? आज भाजपा सरकार इसी वजह से बुरी तरह डरी हुई है।

भाजपा और संघ परिवार एसआईआर के दौरान यह निर्धारित करने की शक्ति अपने हाथों में केन्द्रित करना चाहते हैं कि कौन भारतीय है कौन नहीं। ये वे लोग हैं जिनके विचारधारात्‍मक और राजनीतिक पुरखे अंग्रेज़ों से क्रान्तिकारियों और स्‍वतन्‍त्रता संग्राम सेनानियों की मुख़बिरी कर रहे थे और माफ़ीनामे लिख रहे थे। मज़ाकिया बात यह है कि पहले तो ये केवल “राष्‍ट्रवाद” का सर्टिफिकेट देने का दावा कर रहे थे, अब ये नागरिकता का भी प्रमाणपत्र देंगे! जब भी मोदी सरकार संकट में घिरती है तो कभी नोटबन्‍दी करके, कभी सीएए-एनआरसी का लुकमा उछालकर, कभी नागरिकता साबित करने (जो आप शायद भाजपा के सदस्‍यता कार्ड के अलावा किसी दस्‍तावेज़ से नहीं कर सकते!) की क़वायद में जनता को लाइनों में खड़ा करने के चक्‍कर में रहती है। लेकिन इस बार जनता पर पहले से जो बेरोज़गारी, महँगाई, ग़रीबी, असुरक्षा व अनिश्चितता के कारण आफ़त का पहाड़ टूटा पड़ा था, उसके कारण उसका धीरज चुक गया है। ऐसे मौक़ों पर जनता सच्‍चाई को समझने लगती है। सत्‍ता का डर उसके दिल से जाता रहता है। यही वह मौक़ा होता है जब सरकार का और हुक्‍मरानों का डर शुरू होता है। परीक्षा घोटालों पर छात्रों-युवाओं का जो आन्‍दोलन फूट पड़ा है और जिस तरह से वह एक व्‍यापक जनान्‍दोलन बन गया है, वह एक ऐसे मौक़े के आने की ओर ही इशारा कर रहे हैं। संघ परिवार और मोदी सरकार द्वारा लम्‍बे समय से लोगों को झूठे फ़ालतू के मसलों में बहकाया जाता रहा है। लेकिन बात यह है कि आप कभी-कभी कुछ लोगों को बेवकूफ़ बना सकते हैं, लेकिन आप हमेशा सभी को बेवकूफ़ नहीं बना सकते।

मौजूदा जनान्‍दोलन में मज़दूरों और मेहनतकशों को भी सचेतन तौर पर हिस्‍सेदारी करनी चाहिए। सवाल केवल धर्मेन्‍द्र प्रधान के इस्‍तीफ़े का नहीं है। अगर मौजूदा शिक्षा व्‍यवस्‍था बनी रही, जिसका अंग एनटीए और नयी शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 भी हैं, तो धर्मेन्‍द्र प्रधान की जगह कोई और आ जायेगा, लेकिन बदलेगा कुछ भी नहीं। लेकिन शिक्षा व्‍यवस्‍था भी किसी निर्वात में मौजूद नहीं होती है, बल्कि समूची राजनीतिक व आर्थिक व्‍यवस्‍था का हिस्‍सा होती है। मौजूदा शिक्षा व्‍यवस्‍था मौजूदा फ़ासीवादी निज़ाम द्वारा खड़ी की गयी है। चाहे पाठ्यक्रमों का साम्‍प्रदायिकीकरण हो, नयी शिक्षा नीति हो, एनटीए हो, परीक्षा घोटाले व पेपर लीक हों, घटती सीटें और बढ़ती फ़ीसें हों, या फिर बन्‍द होते स्‍कूल और उच्‍चतर शिक्षा में घटते दाख़‍िले हों, ये इसी फ़ासीवादी व्‍यवस्‍था के तहत काम करने वाली शिक्षा व्‍यवस्‍था के नतीजे हैं। जब हम समूची शिक्षा व्‍यवस्‍था का प्रश्‍न उठायेंगे तो हमें अन्‍तत: मौजूदा फ़ासीवादी निज़ाम का सवाल, मोदी-शाह सरकार का सवाल भी उठाना ही पड़ेगा। आज जारी जनान्‍दोलन तेज़ी से ये सवाल उठाने की ओर स्‍वत:स्‍फूर्त तरीक़े से बढ़ रहा है। लेकिन साथ ही इस जनान्‍दोलन को अपने आपको व्‍यवस्थित भी करना होगा, एक सुचिन्तित और सुनियोजित कार्यक्रम का निर्माण कर उस पर अमल करना होगा, अपने तात्‍कालिक और दीर्घकालिक लक्ष्‍य तय करने होंगे, अपने नेतृत्‍व को सुगठित करना होगा जो लोकतान्त्रिक प्रणाली से कार्य करे, अपनी रणनीति और आम रणकौशल तय करने होंगे। एक सचेतन और सुनियोजित तौर पर काम करने वाले एकजुट शासक वर्ग का मुक़ाबला तभी किया जा सकता है जब क्रान्तिकारी जनान्‍दोलन अपने आपको क्रान्तिकारी चेतना, कार्यक्रम, नेतृत्‍व, योजनाबद्धता और अनुशासन से लैस करे, क्‍योंकि उसका मक़सद केवल भड़ाँस निकालना या गुस्‍सा ज़ाहिर करना नहीं है, बल्कि परिवर्तन करना है। हुक्‍़मरानों की टोपी में हमेशा बहुत से ख़रगोश होते हैं। वे अक्‍सर पूर्ण रूप से स्‍वत:स्‍फूर्त आन्‍दोलनों को बहकाकर, भरमाकर तितर-बितर कर देते हैं। ऐसी चालों का मुक़ाबला जनता के आन्‍दोलन संगठन, नेतृत्‍व, और क्रान्तिकारी राजनीतिक चेतना के साथ ही कर सकते हैं। आज मौजूदा जनान्‍दोलन के सामने महत्‍वपूर्ण तात्‍कालिक कार्यभार यही है कि वह इन्‍हें विकसित करे।

28/07/2026

Beware Modi Government !

The students and youth will not be deterred !

Down with fascist repression!
Dharmendra Pradhan must resign !

Scrap NTA !

Repeal NEP !!

Let us grow this movement into a larger movement for true right to education !!

- issued by Revolutionary Workers' Party of India (RWPI)

The Modi government has yet again proved its fascist credentials by brutally repressing the students' and youth movement demanding the resignation of Education Minister Dharmendra Pradhan, in Delhi. After using the cliche toolkit of the accusations of 'urban-naxals', 'anti-national', phrases that have now become topics of mockery among masses, the Modi government has turned to what it is best at - outright use of brute force! The denial of permission to the march towards the Parliament, followed by the brutal lathi-charge, use of tear gas, and massive force to deter a peaceful movement, has shown that the fascist Modi government will leave no stone unturned in protecting the criminals who have destroyed lives of millions of youth of the country!

But the student and youth of the country have shown that they are not dettered, and they are not going to take this repression sitting down! By gathering in thousands once again they have shown their determination to continue this movement till the demands are met. As the current political situation is unfolding, the parliamentary opposition, in a passive mode so far, has also been compelled to take to the streets as the mood the masses is vividly clear!

Now that Modi government has shown its true colors, we need to once again realize its true class character and its program of serving the interests of the capitalist class - that includes not only the big bourgeoisie, but includes all the education profiteering barons, coaching mafia, agents, middlemen, contractual recruitment agencies, and so on. The entrance exam scams are not an isolated incident, but a direct result of commercialization of every aspect of the education system where accumulation and profit have become the norm now.

It is now known to the entire world that the entrance examination system in India has become a farce. However, we all know that this is a tip of the iceberg, as the entire education system has become corroded with profiteering, greed, and loot driven by the policies of commercialization and privatization. Exorbitant fees, communalization of curriculum, broken or non-existent infrastructure, over-burdened teachers and employees, unprofessional management, examination scams, lack of accountability, capitation fees, development charges, management quota, etc. are all symptoms of the larger diseases of privatization and commercialization. On top of this, unemployment has consistently been at its highest for years now! The New Education Policy (NEP) has paved the path for further acceleration of these anti-student and anti-youth policies.

We must demand the resignation of Dhrmendra Pradhan and force the Modi government for this minimum democratic demand! However, this initial victory can only serve as the beginning of the larger struggle that can lead to true revolutionary change in the education system. We appeal to the youth and students of the country to start raising the larger demands of disbanding the NTA, repeal of the NEP, free equal and quality KG to PG education for all, democratization of the educational institutions and implwmentation of the Bhagat Singh National Employment Guarantee Act (BSNEGA). We appeal to the youth, students, workers, and common masses of the country to join the Bhagat Singh Jan Adhikar Yatra (BSJAY) in its third phase and build a massive militant mass movement of the true change in the education system, which is an inextricably linked to the struggle for the real change in the entire socio-economic system.

Inquilab Zindabad!
Long live the revolution!
We will not be deterred!
Long live the youth-students-workers unity!

Revolutionary Workers' Party of India (RWPI)
fb.com/revolutionaryworkerspartyofindia
www.instagram.com/rwpi.india/

29/05/2026

पेट्रोल - डीज़ल के दामों में लगातार हो रही बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ पटना के गोसाईं टोला मोड़ पर मोदी का पुतला दहन

कल भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) द्वारा पटना के गोसाईं टोला में देश में बढ़ती महंँगाई के लिए ज़िम्मेदार मोदी ...
27/05/2026

कल भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) द्वारा पटना के गोसाईं टोला में देश में बढ़ती महंँगाई के लिए ज़िम्मेदार मोदी सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया गया एवं प्रधानमंत्री मोदी का पुतला दहन किया गया।

इस दौरान भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी के अजीत ने कहा कि "बहुत हुई महँगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार" का चुनावी नारा सफ़ेद झूठ साबित हुआ है। पिछले एक दशक में मोदी सरकार की पूंँजी परस्त नीतियों का नतीजा यह है कि पेट्रोल-डीज़ल से लेकर खाद्यान्न तक की क़ीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। हालिया समय में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मोदी सरकार की कूटनीतिक विफलता के कारण हालात बद से बदतर हुए हैं। इसके बावजूद महंँगाई कम करने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाने की बजाय सरकार द्वारा आम मेहनतकश जनता को "सन्तोष करो, त्याग करो" का पाठ पढ़ाया जा रहा है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि आज मुट्ठी भर पूंँजीपतियों का मुनाफ़ा सैकड़ों गुना बढ़ चुका है एवं ऐसे भी कई पूँजीपति घराने है जिनकी सम्पत्ति अरबों डॉलर तक पहुँच चुकी है। इसका नतीज़ा है कि भारत में आर्थिक असमानता तेज़ी से बढ़ी है। ऊपर की एक फ़ीसदी आबादी का देश की 40 फ़ीसदी सम्पत्ति पर कब्ज़ा है।

अब तो सरकार द्वारा महंगाई बढ़ने की समस्या को पूर्णतः बाहरी कारणों से उपजी आपदा के तौर पर दिखाया जा रहा है। अपना पल्ला झाड़ते हुए जनता पर ही इसका पूरा बोझ डाल दिया गया है। लेकिन मोदी सरकार यह नहीं बता रही है कि पेट्रोल - डीज़ल पर अब भी 32% टैक्स लिया जा रहा है जिसे ख़त्म करते हैं इसके दामों में भरी गिरावट हो सकती है। हमें सरकार के इस हथकंडे को समझने की ज़रूरत है। आज हमें संगठित होकर सड़कों पर उतरना होगा एवं सरकार को महंँगाई पर लगाम लगाने के लिए अमीरों पर कर बढ़ाने, मेहनतकश जनता पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ कम करने, ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति निर्बाध रखने जैसे उपायों को लागू करने के लिए बाध्य करना होगा।

विरोध प्रदर्शन में इलाक़े के लोग भी शामिल रहें। प्रदर्शन में उपस्थित लोगों में मोदी सरकार के ख़िलाफ़ गुस्सा स्पष्ट देखा जा सकता था।

पेट्रोल - डीज़ल के दामों में लगातार हो रही बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ पुतला दहन में शामिल हो।स्थान - गोसाईं टोला मोड़ शाम 7 बजे ...
26/05/2026

पेट्रोल - डीज़ल के दामों में लगातार हो रही बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ पुतला दहन में शामिल हो।
स्थान - गोसाईं टोला मोड़
शाम 7 बजे
26 मई 2026

बढ़ रही महँगाई की मार!कहाँ गई मोदी सरकार!! महँगाई पर रोक लगाओ!22 मई, गोसाईं टोला,पटना।बढ़ती महँगाई के ख़िलाफ़ भारत की क्र...
24/05/2026

बढ़ रही महँगाई की मार!
कहाँ गई मोदी सरकार!!

महँगाई पर रोक लगाओ!

22 मई, गोसाईं टोला,पटना।

बढ़ती महँगाई के ख़िलाफ़ भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) द्वारा पटना के गोसाईं टोला इलाक़े में अभियान चलाया गया। अभियान के दौरान लोगों से बात करते हुए कहा गया कि आज पूरा देश लगातार बढ़ती महँगाई की मार झेल रहा है और अगर ऐसा ही चलता रहा तो स्थिति और भी विकराल हो सकती है। पेट्रोल-डीजल और गैस सिलिण्डर के बढ़ते दाम का असर आम लोगों की थाली तक पहुँच चुका है। ऐसे में विश्वगुरु और 56 इंच के सीने का भोंपू बजाने वाली मोदी सरकार की नीतियों की पोल पट्टी पूरी तरह खुल चुकी है। ये बेशर्म सरकार अपनी नीतियों की विफलता को छिपाने के लिए लोगों से देशभक्ति साबित करने को कह रही है।
आज हम उस दौर में जी रहे हैं जब ये तानाशाह सरकार आम आबादी के असली मुद्दों को ताक पर रखकर अपने मित्रों (आकाओं) का बिज़नेस बढ़ाने में लगी है। ज़रूरत है कि हम अपने असली मुद्दों पर डटे रहें और इस सरकार के ख़िलाफ़ एकजुट होकर संघर्ष करें।
हम सरकार से तत्काल माँग करते हैं –
क ) सभी वस्तुओं और सेवाओं पर सभी अप्रत्यक्ष करों को तत्काल समाप्त किया जाए और प्रगतिशील कराधान तंत्र के तहत अमीर वर्गों पर कॉरपोरेट टैक्स, इनकम टैक्स, प्रॉपर्टी टैक्स व अन्य रूप में प्रत्यक्ष कर लगाकर सरकारी राजस्व एकत्र किया जाए । यह क़ीमतों के स्तर को सीधा आधा कर देगा।
ख ) जमाखोरी करने वालों पर कानूनी कार्रवाई की जाए ।
ग ) न्यूनतम मज़दूरी को बढ़ाया जाए ।
घ ) बुनियादी चीज़ों व सेवाओं के वितरण की व्यवस्था सरकार अपने मातहत करें ।

मई दिवस की विरासत ज़िन्दाबाद !मेहनतकश की वर्ग एकता ज़िन्दाबाद! पटना के कौशल नगर में अन्तर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस के अवसर पर...
02/05/2026

मई दिवस की विरासत ज़िन्दाबाद !
मेहनतकश की वर्ग एकता ज़िन्दाबाद!

पटना के कौशल नगर में अन्तर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस के अवसर पर भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी की ओर से आज दो मई को सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम के माध्यम से लोगों को मई दिवस के इतिहास से परिचित कराया गया। आज हमें अपने इतिहास से सीखने की ज़रूरत है कि किस तरीक़े से मज़दूर आन्दोलन को चलाया जाता है और कैसे अमीरों- धन्नासेठों के द्वारा मजदूर आन्दोलन को तोड़ने, हिंसा भड़काने और बदनाम करने की साजिशों को नाकाम किया जाता है।

जिस तरह से आज के समय में अलग-अलग क़ानूनों के ज़रिए लगातार आम मेहनतकशों के हक-अधिकारों को छीना जा रहा है ऐसे में आज एक बार फिर से संगठित होकर अपनी लड़ाई को तेज करने की ज़रूरत है। इसी संदेश को लेकर आज सही मायनों में मई दिवस को याद किया जा सकता है।

कार्यक्रम के दौरान बात रखते हुए आरडब्लूपीआई के अजीत ने कहा कि आज देश भर में मज़दूर अपनी जायज़ माँगों के लिए सड़कों पर उतर रहें हैं । पानीपत, गुड़गाँव, फ़रीदाबाद, मानेसर, नोएडा और भटिण्डा आदि शहरों में मज़दूरों ने अपनी माँगों के लिए हड़तालें की। लेकिन, उनकी माँगों को सुनने की बजाय सरकार ने मालिकों की जमात का पक्ष लेते हुए मज़दूरों के आन्दोलन का दमन किया। नोएडा और गुरुग्राम में सैकड़ों मज़दूरों के साथ कई मज़दूर कार्यकर्ताओं और सत्यम वर्मा सरीखे जनबुद्धिजीवी तक को गैर क़ानूनी तरीक़े से गिरफ़्तार कर लिया गया। दो सप्ताह से ज़्यादा का वक़्त गुज़रने के बाद भी उन्हें रिहा नहीं किया गया है। आज हमें एकजुट होकर फ़ासीवादी सत्ता द्वारा किए जा रहे दमनात्मक कार्रवाईयों का विरोध करना होगा। आज हमें एकजुट होकर पुलिस द्वारा गैर क़ानूनी तरीक़े से गिरफ़्तार किये गए मज़दूरों, मज़दूर कार्यकर्ताओं और सत्यम वर्मा की रिहाई की माँग करनी होगी।

कार्यक्रम के दौरान लोगों के बीच व्यापक तौर पर पर्चा वितरण किया गया और गीत भी प्रस्तुत किए गए।

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