28/07/2026
मोदी-शाह शासन के विरुद्ध मौजूदा छात्र-युवा आन्दोलन 12 साल से बेहाल जनता के धैर्य के जवाब देने की निशानी है।
स्वत:स्फूर्तता से आगे बढ़कर मौजूदा जनान्दोलन को एक सचेतन क्रान्तिकारी जनान्दोलन में तब्दील करो!
पिछले कुछ हफ़्तों से देश में छात्रों-युवाओं का एक आन्दोलन जारी है। इसका तात्कालिक मुद्दा निश्चय ही नीट पेपर लीक और एनटीए द्वारा छात्रों के भविष्य के साथ किया जा रहा खिलवाड़ है। लेकिन अब यह आन्दोलन महज़ इस मुद्दे पर जनता के रोष को प्रतिबिम्बित नहीं कर रहा है। बल्कि यह देश भर में जनता के बीच पिछले 12 वर्षों से एकत्र हो रहे असन्तोष और गुस्से की अभिव्यक्ति बन चुका है।
पिछले 12 वर्षों में जनता जिस क़दर महँगाई, बेरोज़गारी, महँगी होती शिक्षा, परीक्षा घोटालों और सामाजिक असुरक्षा से बेहाल है, वह देश के इतिहास में अभूतपूर्व है। इस क़दर जनविरोधी सरकार आज तक भारत की जनता ने नहीं देखी है। 12 वर्षों तक उसे साम्प्रदायिक मसलों और आर.एस.एस. और भाजपा के फ़र्जी “राष्ट्रवाद” में उलझाकर रखा गया। इसके नाम पर जनता को नोटबन्दी और कोविड के समय योजनाविहीन तरीक़े से किये गये लॉकडॉउन के ज़हर के घूँट भी पिला दिये गये। कभी पाकिस्तान तो कभी चीन का नकली हौव्वा खड़ाकर जनता को असल मसलों से भटकाकर रखा गया, तो कभी उसे साम्प्रदायिक तनाव में झोंककर फँसा दिया गया। इस बीच मोदी की विदेश यात्राओं और भाजपा सरकार द्वारा विकास के झूठे प्रचारों पर जनता के अरबों-खरबों रुपये बहा दिये गये। जिस समय जनता को फ़ालतू के धार्मिक और जातिवादी मसलों में उलझाकर रखा गया, उसी बीच देश की सार्वजनिक सम्पत्ति और प्राकृतिक संसाधनों को अम्बानियों और अडाणियों को कौड़ी के दाम बेच दिया गया। जिस राम मन्दिर के मसले को हवा देकर भाजपा सत्ता में पहुँची उसका चन्दाचोरी करने में भी संघ परिवार व भाजपा के प्यादों और कारकूनों को कोई गुरेज़ नहीं था। इनका तो शुरू से ही यही नारा रहा है कि ‘राम नाम की लूट मची है, लूट सके तो लूट’! इसी बीच महँगाई ने आज़ादी के बाद के भारत के इतिहास के सारे कीर्तिमान तोड़ दिये। बेरोज़गारी भी पीछे नहीं रही और हालात ये पैदा हो गये कि क़रीब 30 करोड़ लोग आज बेरोज़गार या अर्द्धबेरोज़गार हैं। देश में 50 करोड़ से भी ज़्यादा लोग अनौपचारिक क्षेत्र में 12-12 घण्टे खेतों-खलिहानों, कल-कारखानों और खानों-खदानों में 8-10 हज़ार रुपये में ठेका या दिहाड़ी पर खटने को मजबूर कर दिये गये। नतीजतन, हालिया दिनों में मज़दूरों के पास भी सड़कों पर उतरने और हड़ताल करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। जिस तरह से आज मोदी-शाह शासन छात्रों-युवाओं का बर्बर दमन कर रहा है, उसी प्रकार हालिया दिनों में मज़दूरों व मज़दूर कार्यकर्ताओं का भी हरियाणा से लेकर उत्तर प्रदेश तक में बेशर्मी से संविधान व क़ानून को ताक पर रख कर दमन किया गया। ग़रीब किसानों और शहरी व ग्रामीण आम मेहनतकश आबादी को भी दाने-दाने का मोहताज बना दिया गया।
दूसरी ओर, देश के धनिक वर्ग, सेठ, कम्पनी-मालिक, बड़े व्यापारी, दलाल, बिचौलिये, धनी कुलक-फार्मर व भूस्वामी अश्लीलता के सारे रिकार्ड ध्वस्त करते हुए देश की ग़रीब मेहनतकश जनता व छात्रों-युवाओं के आँसुओं के समन्दर के बीच अपनी ऐय्याशी और ऐश्वर्य की मीनारें खड़ी करते रहे। नेता-नौकरशाह और बड़े सिविल व सेना अधिकारियों के ऐशो-आराम, वेतन भत्तों और रंगरलियों में भी अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई। घपलों-घोटालों के मामले में तो भाजपा सरकार ने नये मानक स्थापित कर दिये। व्यापम घोटाले से लेकर, दिल्ली का स्वास्थ्य घोटाला, परीक्षा घोटाला, एनपीए घोटाला, राफ़ेल घोटाला और न जाने कितने अरबों-खरबों के घोटालों की फ़ेहरिस्त 12 सालों में इतनी लम्बी हो चुकी है कि उसकी लम्बाई किलोमीटर में ही नापी जा सकती है! लेकिन चूँकि ये धर्मध्वजाधारियों द्वारा किये गये “राष्ट्रवादी” घपले थे, इसलिए यह कहीं मसला नहीं बना! मीडिया को पूरी तरह निगलकर गोदी मीडिया में तब्दील कर दिया गया और उनकी दलाली की इन्तहाँ इस क़दर हुई कि इन गोदी चैनलों व अख़बारों के बेचारे वेतनभोगी रिपोर्टर अपने मालिकान व प्रबन्धन के पापों और कुकर्मों की क़ीमत जनता के हाथों आज सड़कों पर चुका रहे हैं।
केचुआ (केन्द्रीय चुनाव आयोग), एनफ़ोर्समेण्ट डाइरेक्टोरेट (ईडी) से लेकर सीबीआई जैसी संस्थाओं में संघ परिवार ने आन्तरिक घुसपैठ करके उसे अपना जेबी माल बना लिया। आज समूची जनता इस बात को जानती है चाहे सत्ताधारी और न्यायपालिका इस पर कितनी भी क्लीन चिट अपने आपको देते रहें। न्यायपालिका की हालत भी कैसी है, यह किसी से छिपा नहीं है। पहले भारत के सीजेआई ने बेरोज़गार युवाओं को कॉकरोच बोला। अब 20 जुलाई को जन्तर-मन्तर पर छात्रों-युवाओं पर दिल्ली पुलिस और आरएएफ़ द्वारा किये गये बर्बर लाठी चार्ज व दमन पर दायर याचिका पर उन्होंने याचिका डालने वाले से कहा कि उनके पास पुलिस द्वारा दमन, लड़कियों और बच्चों को मारने, उनके कपड़े फाड़ने के वीडियो देखने का वक़्त नहीं है, उसका समय न बरबाद किया जाय! ये ही न्यायाधीश महोदय समय रैना के कॉमेडी वीडियो देखने के लिए फ्री थे! हाईकोर्ट में याचिका पड़ी तो पहले कोर्ट ने कहा कि कोर्ट को इस मसले में न घसीटा जाय! बाद में, इस याचिका पर सुनवाई शुरू हुई लेकिन उसमें अगली तिथि ही सितम्बर 2026 की दी गयी। अब किसी सेठ-व्यापारी के मुनाफ़े का मसला तो था नहीं कि न्यायपालिका रात के 12 बजे भी दरवाज़े खोलकर सुनवाई करे! पुलिस और सशस्त्र बलों में अधिकारी स्तर पर संघ परिवार की घुसपैठ पर भी तमाम रपटें सामने आ चुकी हैं। इसमें ताज्जुब की क्या बात है कि वह क़ानून और संविधान की रक्षा करने के बजाय सत्तासीन भाजपा और उसके नेताओं-मन्त्रियों की रक्षा में लगी है और उसके लिए 10-12 साल के छोटे बच्चों को हिरासत में लेने, 16-17 साल के न्याय माँग रहे नवयुवकों का सिर फोड़ने, उन पर पेलेट गन चलाने, शॉक बेटन से मारने और लड़कियों पर हाथ उठाने व उनके कपड़े फाड़ने तक से बाज़ नहीं आ रही है?
एसआईआर की साज़िश के तहत देश की जनता को फिर से लाइनों में खड़ा किया जा रहा है। जिन्होंने अपनी फ़र्जी डिग्री तक कभी नहीं दिखायी, वे देश की जनता से नागरिकता के सबूत माँग रहे हैं। मक़सद है एनआरसी को चोर दरवाज़े से लागू करना और सभी ऐसे वोटरों का नाम वोटर लिस्ट से काटना जो भाजपा के विरुद्ध वोट कर सकते हों, चाहे वे मुसलमान हों, दलित हों, ग़रीब मेहनतकश औरतें हों, आदिवासी हों या फिर पिछड़े वर्ग। हाल में छात्रों-युवाओं को आत्महत्या पर मजबूर करने वाले परीक्षा घोटालों व पेपर लीक्स ने उस आख़िरी तिनके का काम किया है जो ऊँट की क़मर तोड़ता है। आज इसकी वजह से देश के छात्र-युवा, उनके अभिभावक व माता-पिता लाठी-डण्डों, पेलेट गन आदि का डर दिखाने के बावजूद जिस क़दर सड़कों पर उतरे हैं, जिस तरह से देश की मेहनतकश जनता, स्विगी-ज़ोमैटो डिलिवरी करने वाले, आम मज़दूर और कमेरे लोग लड़ रहे युवाओं और उनके माताओं-पिताओं को संघर्ष करने के लिए मदद और रसद पहुँचा रहे हैं, वह इस बात को साबित करता है कि जनता के सब्र का प्याला छलक गया है। मोदी-शाह शासन और भाजपा के विरुद्ध गुस्से और असन्तोष का माहौल यह है कि देश भर में भाजपा के नेताओं को जनता सड़कों पर दौड़ा रही है, उनके पोस्टर फाड़ रही है, उनके झण्डे फाड़ रही है और उनके लिए घरों से निकलना मुश्किल हो गया है। संघ परिवार अपने लम्पटों की ब्रिगेड को मौजूदा छात्रों-युवाओं के आन्दोलन पर कटखन्ने कुत्तों की तरह छोड़ने की फ़िराक़ में था, लेकिन दिल्ली और देश के आन्दोलनरत नौजवानों की हिम्मत और हौसला देखकर अब इसकी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
इस समूची स्थिति से भी स्पष्ट सवाल उठता है कि अगर मज़दूर नाराज़ हैं, छात्र-युवा नाराज़ हैं, माता-पिता नाराज़ हैं, तो भाजपा की तमाम चुनावी जीतों में उसे वोट दे कौन रहा है? ख़ैर, बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में भाजपा ने एसआईआर, ईवीएम और गणना में खेल करके कैसे चुनाव जीता है, यह अब सारी जनता को पता है। भाजपा चाहे अपनी जेब में बैठी न्यायपालिका और चुनाव आयोग से कोई भी सफ़ाई या बयान दिलवा ले, जनता सब जान रही है। वास्तव में, ये चुनाव कैसे हेरफेर से जीते गये हैं, इस पर भरोसेमन्द और सम्माननीय खोजी पत्रकारों द्वारा तमाम रपटें पेश की जा चुकी हैं, जिनमें विविध प्रमाण पेश किये गये हैं। भाजपा का नारा है कि मतदाता सरकार चुनेंगे, लेकिन उससे पहले भाजपा मतदाताओं को चुनेगी! इससे वह एक ऐसा निर्वाचन मण्डल निर्मित करना चाहती है, जो बस भाजपा को वोट दे! लेकिन अगर इस नवनिर्मित निर्वाचन मण्डल की बहुसंख्या ही मोदी-शाह शासन की असलियत समझने लगे और उन्हें सत्ताच्युत करने के लिए सड़कों पर उतरने लगे तो? आज भाजपा सरकार इसी वजह से बुरी तरह डरी हुई है।
भाजपा और संघ परिवार एसआईआर के दौरान यह निर्धारित करने की शक्ति अपने हाथों में केन्द्रित करना चाहते हैं कि कौन भारतीय है कौन नहीं। ये वे लोग हैं जिनके विचारधारात्मक और राजनीतिक पुरखे अंग्रेज़ों से क्रान्तिकारियों और स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों की मुख़बिरी कर रहे थे और माफ़ीनामे लिख रहे थे। मज़ाकिया बात यह है कि पहले तो ये केवल “राष्ट्रवाद” का सर्टिफिकेट देने का दावा कर रहे थे, अब ये नागरिकता का भी प्रमाणपत्र देंगे! जब भी मोदी सरकार संकट में घिरती है तो कभी नोटबन्दी करके, कभी सीएए-एनआरसी का लुकमा उछालकर, कभी नागरिकता साबित करने (जो आप शायद भाजपा के सदस्यता कार्ड के अलावा किसी दस्तावेज़ से नहीं कर सकते!) की क़वायद में जनता को लाइनों में खड़ा करने के चक्कर में रहती है। लेकिन इस बार जनता पर पहले से जो बेरोज़गारी, महँगाई, ग़रीबी, असुरक्षा व अनिश्चितता के कारण आफ़त का पहाड़ टूटा पड़ा था, उसके कारण उसका धीरज चुक गया है। ऐसे मौक़ों पर जनता सच्चाई को समझने लगती है। सत्ता का डर उसके दिल से जाता रहता है। यही वह मौक़ा होता है जब सरकार का और हुक्मरानों का डर शुरू होता है। परीक्षा घोटालों पर छात्रों-युवाओं का जो आन्दोलन फूट पड़ा है और जिस तरह से वह एक व्यापक जनान्दोलन बन गया है, वह एक ऐसे मौक़े के आने की ओर ही इशारा कर रहे हैं। संघ परिवार और मोदी सरकार द्वारा लम्बे समय से लोगों को झूठे फ़ालतू के मसलों में बहकाया जाता रहा है। लेकिन बात यह है कि आप कभी-कभी कुछ लोगों को बेवकूफ़ बना सकते हैं, लेकिन आप हमेशा सभी को बेवकूफ़ नहीं बना सकते।
मौजूदा जनान्दोलन में मज़दूरों और मेहनतकशों को भी सचेतन तौर पर हिस्सेदारी करनी चाहिए। सवाल केवल धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े का नहीं है। अगर मौजूदा शिक्षा व्यवस्था बनी रही, जिसका अंग एनटीए और नयी शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 भी हैं, तो धर्मेन्द्र प्रधान की जगह कोई और आ जायेगा, लेकिन बदलेगा कुछ भी नहीं। लेकिन शिक्षा व्यवस्था भी किसी निर्वात में मौजूद नहीं होती है, बल्कि समूची राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा होती है। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था मौजूदा फ़ासीवादी निज़ाम द्वारा खड़ी की गयी है। चाहे पाठ्यक्रमों का साम्प्रदायिकीकरण हो, नयी शिक्षा नीति हो, एनटीए हो, परीक्षा घोटाले व पेपर लीक हों, घटती सीटें और बढ़ती फ़ीसें हों, या फिर बन्द होते स्कूल और उच्चतर शिक्षा में घटते दाख़िले हों, ये इसी फ़ासीवादी व्यवस्था के तहत काम करने वाली शिक्षा व्यवस्था के नतीजे हैं। जब हम समूची शिक्षा व्यवस्था का प्रश्न उठायेंगे तो हमें अन्तत: मौजूदा फ़ासीवादी निज़ाम का सवाल, मोदी-शाह सरकार का सवाल भी उठाना ही पड़ेगा। आज जारी जनान्दोलन तेज़ी से ये सवाल उठाने की ओर स्वत:स्फूर्त तरीक़े से बढ़ रहा है। लेकिन साथ ही इस जनान्दोलन को अपने आपको व्यवस्थित भी करना होगा, एक सुचिन्तित और सुनियोजित कार्यक्रम का निर्माण कर उस पर अमल करना होगा, अपने तात्कालिक और दीर्घकालिक लक्ष्य तय करने होंगे, अपने नेतृत्व को सुगठित करना होगा जो लोकतान्त्रिक प्रणाली से कार्य करे, अपनी रणनीति और आम रणकौशल तय करने होंगे। एक सचेतन और सुनियोजित तौर पर काम करने वाले एकजुट शासक वर्ग का मुक़ाबला तभी किया जा सकता है जब क्रान्तिकारी जनान्दोलन अपने आपको क्रान्तिकारी चेतना, कार्यक्रम, नेतृत्व, योजनाबद्धता और अनुशासन से लैस करे, क्योंकि उसका मक़सद केवल भड़ाँस निकालना या गुस्सा ज़ाहिर करना नहीं है, बल्कि परिवर्तन करना है। हुक़्मरानों की टोपी में हमेशा बहुत से ख़रगोश होते हैं। वे अक्सर पूर्ण रूप से स्वत:स्फूर्त आन्दोलनों को बहकाकर, भरमाकर तितर-बितर कर देते हैं। ऐसी चालों का मुक़ाबला जनता के आन्दोलन संगठन, नेतृत्व, और क्रान्तिकारी राजनीतिक चेतना के साथ ही कर सकते हैं। आज मौजूदा जनान्दोलन के सामने महत्वपूर्ण तात्कालिक कार्यभार यही है कि वह इन्हें विकसित करे।