24/07/2025
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 80 प्रतिशत ओबीसी, 83 प्रतिशत एसटी और 64 प्रतिशत एससी प्रोफेसरों के पद खाली- एससी, एसटी और ओबीसी का आरक्षण कई तरीकों से खत्म करने के तरीकों में यह भी एक तरीका है।
यह आंकड़े संसद में केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री सुकांत मजूमदार ने राज्यसभा सांसद मनोज झां के सवाल के जवाब में प्रस्तुत किए। ये आंकड़े 30 जून 2025 तक के हैं। प्रोफेसरों के इन पदों में असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर तीनों के पद शामिल हैं।
ओबीसी के स्वीकृत 423 प्रोफेसरों के पदों में सिर्फ 83 पद भरे गए हैं, 340 पद खाली हैं।
एसटी के स्वीकृत 144 प्रोफेसरों के पदों में सिर्फ 24 पद भरे गए हैं, 120 पद खाली हैं।
एससी के 308 स्वीकृत प्रोफेसरों पदों में सिर्फ सिर्फ 111 पद भरे गए हैं, 197 पद खाली हैं।
इस तरह से कुल मिलाकर देखें तो ओबीसी, एसटी और एससी कुल स्वीकृत 875 पदों में सिर्फ 218 पद भरे गए हैं, 657 पद खाली छोड़ दिए गए हैं।
केंद्र की भाजपा सरकार खुद को ओबीसी की सरकार कहती है। ओबीसी के 423 में सिर्फ 83 पद भरे गए हैं। करीब 80 प्रतिशत पद खाली हैं।
यह सरकार खुद को आदिवासियों की भी सरकार कहती है, उनके 83 प्रतिशत पद खाली हैं।
एससी के 197 पद खाली हैं।
यह सरकार खुद बाबा साहेब आंबेडकर के सपनों को पूरा करने वाला सरकार कहती है। ओबीसी की सरकार कहती है।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों के खाली 657 पद 657 नौकरियां नहीं हैं, भारत के शीर्ष विश्वविद्यालयों, शीर्ष शैक्षिक पदों और बौद्धिक गतिविधियों के केंद्रों से ओबीसी, एससी और एसटी को बाहर का रास्ता दिखाने का तरीका है।
भाजपा के ओबीसी नेता, आदिवासी नेता और दलित नेता कहते हैं कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार भारत के इतिहास की पहली सरकार है, जो ओबीसी के हितों को सबसे अधिक प्राथमिकता देती है।
क्या ओबीसी, एससी और एसटी को प्राथमिकता देने का मतलब इन समुदायों के कुछ नेताओं को मंत्री, मुख्यमंत्री या राज्यपाल बनाकर उन्हें मुखौटे की तरह प्रस्तुत करना है।