01/06/2026
यदि शांति चाहते हो तो युद्ध के लिए तैयार रहो..
कलयुगी परशुराम बाबा वीर ब्रह्मेश्वरनाथ "मुखिया जी" की 14वीं शहादत दिवस।
वैसे तो बहुत सारे वामपंथी विचारधारा के लोग इन्हें बिहार का कसाई भी कहते हैं। लेकिन वे क्या कहते हैं, इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हम तो बस इतना जानते हैं कि नब्बे के दशक में समय की मांग थे मुखिया जी। जो लोग उन्हें कसाई कहते हैं, उनसे मेरा एक सवाल है कि अगर आपकी जमीन कोई जबरन कब्जा करने आये, आपको अपनी मिट्टी, गांव, समाज छोड़ने को बाध्य करे, आपके लोगों को जाति पूछ-पूछ कर उनकी गर्दन उतारने लगे, आपकी जाति के गाँवों को लक्ष्य बना कर एक एक रात में 30- 35- 40- 45 बेगुनाह नौजवानों को खस्सी बकरी की तरह काट दे, हजारों माताओं बहनों को विधवा बना दे, आपकी बहन बेटियों पर गंदी निगाह डाले, आपके खेत खलिहानों में आग लगा दे, और कई खूंखार नक्सली संगठन MCC/IPF/संग्राम समिति जैसे समाज और देश के दीमक आपका अस्तित्व मिटाना चाहे, साथ ही उन्हें तत्कालीन शासन और प्रशासन का भी वरदहस्त प्राप्त हो तो उस समय आप क्या करेंगे? आप नपुंसकों की तरह तमाशबीन बने रहेंगे? कहीं पहाड़ के कंदरा में छिप जाएंगे? आत्म समर्पण कर देंगे? या आत्मरक्षा में हथियार उठाकर जैसे को तैसा जवाब देंगे? हमने तो बचपन से यही पढ़ा है--
अधिकार खोकर बैठ जाना यह महादुष्कर्म है,
न्यायर्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है।।
मैं उसी तत्कालीन जहानाबाद और आज के अरवल जिला से आता हूं, जिसने इन कायर नक्सलियों का सबसे अधिक दंश झेला। हमारे आस पास के सैकड़ों ऐसे गांव हैं जहां 10 वर्ष के बालक से लेकर 70 साल के बुजुर्ग कई वर्षों तक रात में अपने घर में नहीं सोते थे। वे या तो खेत खलिहानों ने सोते थे, या रात में उनकी पहरा देने की ड्यूटी लगती थी। मैं भी लगभग 12-13 साल का था, मेरी भी ड्यूटी लगती थी रात में व्हिसल बजाने की, अपने घर के छत से टॉर्च जला कर यह बताने की हम अभी तक सुरक्षित हैं। हमारे गांव के लगभग सभी घरों में ईंट और पत्थर के टुकड़े भरे रहते थे, ताकि जब नक्सली हमला करे तो कुछ देर तक ईंट पत्थर चला कर हम अपनी जान बचा सके। छोटे छोटे बच्चों को लड़कियों का ड्रेस पहना कर उन्हें चावल गेहूं की कोठी (अनाज भंडारण का मिट्टी का बना बड़ा ड्रम जैसा) में डाल दिया करते थे। शाम होने से पहले हर रोज गांव में बस एक ही चर्चा होती कि आज शायद अपने गांव की बारी है और शाम के 06:00 बजते ही सभी के दरवाजे बंद हो जाते। बरसात में पुरानी मिट्टी का घर ढह जाने के कारण मेरा नया घर गांव से थोड़ी दूरी पर नहर किनारे बना था, जो कि मेरे याद में बना था। हम पूरे परिवार रोज रात में सैकड़ों की संख्या में खाकी वर्दी, कांधे पर बंदूक, पीठ पर गोलियों से भरा पिठ्ठू लेकर एक लाइन से कभी MCC, कभी IPF तो कभी संग्राम समिति के खूंखार नक्सलियों को देखा करते। रोज ऐसा प्रतीत होता कि पता नहीं कब ये हमारे घर की तरफ मुड़ जाएं और आज हमारी आखिरी रात हो। क्योंकि हर रोज सुबह उठते ही इस प्रकार की घटना कहीं न कहीं सुनने को मिल ही जाती थी।
तत्कालीन राजद सरकार के मुखिया लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी रबड़ी देवी हमारे समाज के गांवों में नरसंहार पीड़ितों से मिल कर सांत्वना तक देने इसलिए नहीं जाते क्योंकि उनका स्पष्ट कहना था कि ये हमारे वोटर थोड़ी न हैं। जब शासन, प्रशासन, नक्सली सभी हमारे खिलाफ खड़े थे, कोई हमारा आंसू पोछने तक को तैयार नहीं था, तब वैसी स्थिति में मरता क्या नहीं करता वाले हालात पैदा हुए। जब दलेलचक बघोरा, बारा, सेनारी, चौरम, अईरा, रामपुर जैसे दर्जनों गांव में समाज के सैकड़ों लोगों की बलि चढ़ा दी गई, तब समाज के लोगों ने यह ठान लिया कि अब यदि शांति चाहिए तो युद्ध के लिए तैयार हो जाओ, ईंट का जवाब पत्थर से दो, जब तक साँसे चल रही हैं तब तक लड़ो। उस स्थिति में भोजपुर, बक्सर, जहानाबाद-अरवल, औरंगाबाद, पटना, रोहतास, गया जिलों के अलग-अलग गाँवों में गुप्त रूप से बैठके शुरू हुईं।
भोजपुर के बेलाउर गांव निवासी स्व. रणबीर बाबा के नाम पर सेना बनाई गई जिसका नाम "रणबीर सेना" रखा गया। अपने अस्तित्व, जर, जोरू, जमीन और स्वाभिमान की रक्षा हेतु लोग इस सेना से तेजी से जुड़ने लगे। इस सेना में लगभग 95% गरीब और मध्यम वर्गीय किसान ही जुड़े। 5% पूंजीपति और संभ्रांत लोग भी इस सेना का समर्थन करते थे, लेकिन अफसोस की ऐसी विषम और भयावह परिस्थिति में भी अधिकांश पूंजीपति, संभ्रांत और नेता इस सेना का यह कहते हुए विरोध करते थे कि मुखिया जी समाज के युवाओं को हत्यारा बना रहे हैं, उन्हें हथियार पकड़ा रहे हैं, समाज बर्बाद हो रहा है। वे ऐसा इसलिए कहते थे क्योंकि उन्हें गांवों से कोई लेना देना नहीं था, वे शहरों में बस चुके थे और अपनी आने वाली दस-बीस पीढ़ियों के लिए अकूत संपत्ति बना चुके थे।
खैर! रणबीरों ने ईंट का जवाब पत्थर से देना शुरू किया, जैसे को तैसा होने लगा। वे अगर 20 मारते तो रणवीर सेना के लोग 40 मारते। हालांकि दोनों पक्षों से अधिकांश बेगुनाह ही मारे जाते थे। एक तरफ राजपूत और भूमिहार मारे जाते तो दूसरी तरफ अधिकतर दलित समाज के लोग मारे जाते। ये सिलसिला कई वर्षों तक चलता रहा लेकिन नरसंहा का दौर समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा था। एक दिन तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और देश के दलितों के सबसे बड़े नेता स्व. रामविलास पासवान जी भूमिहारों के किसी कार्यक्रम में पहुंचे और वहां उन्होंने सांकेतिक रूप से नरसंहारों का सिलसिला हमेशा के लिए खत्म करने की राह दिखाई।
उन्होंने कहा-- अरे भाई आप लोग रोज बल्ब और ट्यूब लाइट फोड़ रहे हैं, इससे कुछ नहीं होने वाला है, अगर सब कुछ ठीक करना चाहते हैं तो पावर ग्रीड उड़ाइए।
तीक्ष्ण बुद्धि के मुखिया जी तक यह संदेश पहुंचा और वे रामविलास पासवान जी के संदेश को आसानी से समझ गए। उसके कुछ ही दिनों बाद 16 जून 2000 को मियांपुर नरसंहार हुआ, जिसमें 35 की संख्या में लालू प्रसाद यादव के जाति के लोग मारे गए और यह नरसंहार बिहार का आखिरी नरसंहार हुआ। इसके बाद लालू प्रसाद यादव जी को ये बात अच्छे से समझ में आ गई कि अब यदि भूमिहार-राजपूतों पर अत्याचार करने से नक्सलियों को नहीं रोका गया तो अब आगे की लड़ाई सीधे तौर पर भूमिहार-राजपूत बनाम यादव होगी।
लालू प्रसाद यादव जी के शासनकाल में हुए इस जातीय नरसंहार और रणबीर सेना/ब्रह्मेश्वरनाथ मुखिया जी के उदय की संक्षेप कहानी लिखने के पीछे हमारा उद्येश्य यह था कि आज जो लोग भी मुखिया जी को कसाई और हत्यारा शब्द से संबोधित करते हैं उन्हें यह जानकारी नहीं है कि कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति ऐसी परिस्थिति में ऐसा ही कदम उठाता जैसा कि मुखिया जी ने उठाया था। मुखिया जी ने कारगिल युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रद्धेय अटल बिहारी बाजपाई जी को पत्र लिखकर कहा था कि भारत-पाकिस्तान युद्ध में यदि हमारे रणवीरों की जरुरत हो तो हमें आदेश करें, हमारे रणवीर देश की रक्षा ख़ातिर खुशी-ख़ुशी अपनी शहादत देने को तैयार बैठे हैं।
स्व. ब्रह्मेश्वरनाथ मुखिया जी पर भले ही 222 लोगों की हत्या का आरोप लगा लेकिन सच्चाई यही है कि मुखिया जी ने अपने जीवनकाल में एक चींटी भी नहीं मारा। चंद वर्ष जेल में बिताने के बाद मुखिया जी को न्यायालय ने बाइज्जत बारी किया। बाद में कुछ अपने ही गद्दार निकले और मुखिया जी वीरगति को प्राप्त हुए।
आज उनकी 14वीं शहादत दिवस पर हम उन्हें अपने संगठन की ओर से शत शत नमन करते हैं।
वीर ब्रह्मेश्वर मुखिया जी अमर रहें।