14/06/2026
नई इमारत से पहले पुराने शिक्षण संस्थानों को बचाइए, यही सबसे व्यावहारिक मॉडल
पटना।
बिहार प्रदेश कांग्रेस सेवा दल के प्रदेश अध्यक्ष एवं राम लखन सिंह यादव कॉलेज, जहानाबाद के प्रभारी प्राचार्य डॉ. संजय यादव ने राज्य सरकार की प्रखंड स्तर पर डिग्री कॉलेज खोलने की प्रस्तावित योजना का स्वागत करते हुए कहा है कि यदि सरकार वास्तव में उच्च शिक्षा का विस्तार चाहती है, तो उसे राज्य के वित्त रहित डिग्री कॉलेजों को इस योजना में प्राथमिकता के आधार पर समाहित करना चाहिए।
डॉ. संजय यादव ने कहा कि बिहार में बड़ी संख्या में वित्त रहित डिग्री कॉलेज पिछले 40 वर्षों से सीमित संसाधनों के बावजूद उच्च शिक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लाखों गरीब और मध्यमवर्गीय विद्यार्थियों को शिक्षा उपलब्ध कराने में इन संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके बावजूद ये संस्थान वर्षों से आर्थिक उपेक्षा और अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार यदि हर प्रखंड में नए डिग्री कॉलेज खोलने की दिशा में आगे बढ़ रही है, तो सबसे व्यावहारिक, कम खर्चीला और त्वरित समाधान यही होगा कि पहले से संचालित वित्त रहित कॉलेजों को चरणबद्ध तरीके से सरकारी योजना में शामिल किया जाए। इससे नई जमीन अधिग्रहण, भवन निर्माण और आधारभूत संरचना पर होने वाले भारी खर्च से भी सरकार को राहत मिलेगी।
डॉ. संजय यादव ने कहा कि राज्य के अधिकांश वित्त रहित कॉलेजों के पास पहले से भवन, कक्षाएं, पुस्तकालय, आधारभूत संरचना और स्थानीय शैक्षणिक नेटवर्क उपलब्ध हैं। कई संस्थानों की जमीन भी सरकारी मानकों के अनुरूप है। ऐसे में सरकार यदि इन संस्थानों को मजबूत करती है, तो कम समय और कम लागत में उच्च शिक्षा का बड़ा विस्तार संभव हो सकता है।
उन्होंने कहा कि यह केवल वित्त रहित शिक्षकों के हित का मुद्दा नहीं है, बल्कि बिहार के लाखों छात्रों के भविष्य और ग्रामीण उच्च शिक्षा की मजबूती का विषय है। यदि सरकार इन कॉलेजों को योजना में शामिल करती है, तो एक तरफ शिक्षा की पहुंच बढ़ेगी और दूसरी तरफ वर्षों से संघर्ष कर रहे हजारों शिक्षकों एवं शिक्षकेत्तर कर्मियों को भी स्थिरता और सम्मान मिल सकेगा।
डॉ. यादव ने सरकार से मांग की कि वित्त रहित डिग्री कॉलेजों की स्थिति की उच्चस्तरीय समीक्षा कर उन्हें प्रखंड स्तरीय डिग्री कॉलेज योजना में प्राथमिकता के आधार पर शामिल किया जाए।
उन्होंने कहा कि जो संस्थान दशकों से बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था को संभाले हुए हैं, उन्हें नजरअंदाज कर नई व्यवस्था खड़ी करना न तो व्यावहारिक है और न ही आर्थिक रूप से उचित। सरकार चाहे तो इसी नीति से वित्त रहित शिक्षा व्यवस्था की पुरानी समस्या का ऐतिहासिक समाधान निकल सकता है।
Sent from WA Business
wa.me/918789600201?source=exsh