31/05/2026
प्रतियोगी और बोर्ड परीक्षाओं के पेपर लीक होने का मुद्दा बेहद गंभीर है, जो सीधे तौर पर करोड़ों युवाओं के भविष्य और देश की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है। सरकार और प्रशासनिक स्तर से बार-बार होने वाली ये विफलताएं वर्तमान सरकार की शिक्षा के प्रति वास्तविक सोच को दर्शाती हैं। परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं की सुरक्षा व्यवस्था और गोपनीयता बनाए रखने की क्षमता पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। आपको क्या लगता है, केवल जांच समितियों का गठन करना काफी है? सालों तक कड़ी मेहनत करने वाले छात्रों के लिए पेपर रद्द होना या लीक होना गहरा मानसिक और आर्थिक तनाव पैदा करता है, जिससे पूरी व्यवस्था के प्रति उनका भरोसा डगमगाता है। वास्तव में दोषियों के खिलाफ ऐसी सख्त और त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए थी जो भविष्य के लिए मिसाल बनते। राहुल गांधी जी और कांग्रेस पार्टी द्वारा इस मुद्दे को संसद से लेकर सड़क तक मजबूती से उठाया गया है। युवाओं के भविष्य से जुड़े इस संघर्ष में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उन आवाजों का साथ देना जरूरी है जो आज इस व्यवस्था के खिलाफ लड़ रही हैं। समाज को रोजगार, शिक्षा और निष्पक्षता जैसे बुनियादी मुद्दों पर केंद्रित रहना चाहिए। यदि आप अभी भी जाति, धर्म या अन्य सामाजिक विभाजनों में उलझे रहेंगे, तो वास्तविक मुद्दे जैसे कि शिक्षा प्रणाली में सुधार और युवाओं का भविष्य हाशिए पर चले जाएंगे। शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और सुरक्षित बनाना समाज, सरकार और सभी राजनीतिक दलों की सामूहिक जिम्मेदारी है ताकि आने वाली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित रह सके। पर आज की सरकार का सच और उसकी सोच अलहदा है। आज देश में आम और सरकारी डाटा भले ही सुरक्षित न हों पर परीक्षा के पेपर समय से पहले जनता तक पहुँचाने की डिलीवरी सर्विस शत-प्रतिशत कुशलता से काम कर रही है। वर्तमान सरकार जब भी कोई नया कानून लाती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे अपराधियों ने कानून की किताब पढ़ने से पहले ही अगले पेपर का जुगाड़ कर लिया है। इस सरकार के कागजी कानून कागज पर चाहे जितने कड़े दिखाए जाते हों, जमीन पर वो कानून उतने ही सॉफ्ट होकर तैरते हैं। हर लीक के बाद एक हाई-लेवल कमेटी बैठती है। देश में छात्रों से ज्यादा अनुभव अब उन कमेटियों को परीक्षाओं का विश्लेषण करने में हो गया है। जब तक पहली कमेटी की रिपोर्ट धूल झाड़कर बाहर आती है, तब तक दूसरी परीक्षा का पेपर बाजार में बिक चुका होता है। कड़ी निंदा, खानापूर्ति, सरकारी बयानों में दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा की लाइन इतनी बार दोहराई जा चुकी है कि अब छात्र परीक्षा के सिलेबस से ज्यादा इस वाक्य को रट चुके हैं। जब छात्र सरकार से रोजगार और पारदर्शी परीक्षाओं की मांग करते हैं, तो विमर्श को अक्सर भावनात्मक, धार्मिक या जातीय बहसों की तरफ मोड़ दिया जाता है। युवाओ को WhatsApp यूनिवर्सिटी के नैरेटिव के नशे में इतना व्यस्त कर दिया गया है कि उन्हें अपनी असली मार्कशीट की चिंता ही नहीं बची है। जब तक वे जागेंगे, तब तक डिग्री सिर्फ दीवारों पर टांगने की वस्तू बनकर रह जाएगी। परीक्षाओं का यह लीक उत्सव अब युवाओं के भविष्य के साथ एक कड़वा मजाक बन चुका है, जहां मेहनत करने वाले छात्र सिर्फ अगली तारीख का इंतजार करते रह जाते हैं। इस इंतजार का सबब यही है कि मेहनत का फल मिले न मिले, अगले पेपर लीक की खबर समय पर आ जाती है।
Rahul Gandhi All India Mahila Congress Dr.Madan Mohan Jha National Students' Union of India (नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया) Rajesh Kumar Kanhaiya Kumar Krishna Allavaru Indian National Congress - BIHAR Indian Youth Congress Priyanka Gandhi Vadra