29/09/2026
यह इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ सहायक संपादक संतोष सिंह का पोस्ट है, जिसमें वह इलेक्शन कमिश्नर के भ्रष्टाचार के ऊपर रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट के संदर्भ में इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता का गुणगान कर रहे हैं।
कल मैंने इनके इस पोस्ट पर कमेंट किया कि:
“उम्मीद है कि किसी दिन बिहार के घोटालों और सरकारी भ्रष्टाचार पर भी ऐसी ही गहन और निष्पक्ष खोजी पत्रकारिता देखने को मिलेगी। ऋषु श्री टेंडर, डस्टबिन घोटाले और ऐसे कई अन्य मामलों पर द इंडियन एक्सप्रेस की चुप्पी स्पष्ट दिखती है।”
इन्होंने मेरी बात का संज्ञान लेते हुए कमेंट किया कि हम जल्द बात करेंगे और उसके बाद अपने पोस्ट से मेरे कमेंट को डिलीट कर दिया, क्योंकि कुछ लोगों ने मेरी उस बात से सहमति जताई।
मेरे कमेंट को डिलीट किया जाना मुद्दा नहीं है, मगर बड़ा सवाल ये है कि साल 2008 से इंडियन एक्सप्रेस के बिहार के वरिष्ठ सहायक संपादक के पद पर बैठे हुए संतोष सिंह जी ने बिहार में हो रहे व्यापक भ्रष्टाचार के ऊपर कितनी रिपोर्टिंग की है और इनको निष्पक्ष और क्रांतिकारी पत्रकार का तगमा लेकर सार्वजनिक बखान करने का क्या अधिकार है?
अगर सिर्फ़ पिछले तीन महीने में इनकी रिपोर्टिंग को देखें तो इन्होंने लगभग 85 रिपोर्ट फ़ाइल की हैं।
इस दौरान बिहार में ऋषु श्री घोटाला, डस्टबिन घोटाला समेत कई घोटाले उजागर हुए हैं। विपक्ष के द्वारा भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही के संदर्भ में कई प्रेस कॉन्फ्रेंस किए गए, मगर आपको उस बारे में एक रिपोर्ट नहीं देखने को मिलेगी।
संतोष सिंह की रिपोर्टों का अवलोकन कीजिएगा तो आप देखिएगा कि 85 में से लगभग 10 से 12 रिपोर्ट ये प्रशांत किशोर और उनका गुणगान करने के लिए कर रहे हैं।
प्रशांत किशोर की चुनावी जीत और प्रशांत किशोर का गुणगान करते हुए 5 दिन के अंदर 8 लेख लिखे हैं।
फिर इनका दूसरा पसंदीदा टॉपिक है निशांत कुमार और नीतीश कुमार की विरासत, जिस पर इन्होंने चार-पाँच रिपोर्ट की हैं।
उसके बाद ये जदयू के सांसद झा की फ़र्ज़ी प्रायोजित बात कि फरक्का बराज से बिहार में बाढ़ की समस्या हो रही है, बिना किसी एक्सपर्ट या जानकार से राय लिए और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को देखे बिना, तथ्यों के विपरीत विशुद्ध गलत रिपोर्ट फ़ाइल करते हैं।
जल संसाधन और गंगा संबंधित एक भी विशेषज्ञ से एक स्टेटमेंट तक लेना ज़रूरी नहीं समझा गया। संतोष सिंह चाहते तो उस समय के जल संसाधन मंत्री से मिलकर मुद्दे को समझ ही सकते थे।
मोतिहारी सेंट्रल यूनिवर्सिटी के भ्रष्टाचार का मामला है तो उस रिपोर्ट की हेडिंग में ही स्पष्टीकरण दे दिया गया है।
पिछले कुछ महीनों में इनके द्वारा लिखी गई कुछ रिपोर्टों का हेडिंग देख लीजिए:
17 जुलाई को: तेजस्वी अंध समर्थकों से घिरे हुए हैं, राजद ने एक प्रवक्ता क्यों खोया?
बिहार में शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े के लिए प्रदर्शन हुआ आक्रामक, 25 लोग हुए गिरफ्तार।
मुख्यमंत्री के द्वारा पोर्टल का उद्घाटन किया गया और आश्वासन दिया कि इससे छात्रों की शिकायतें दूर होंगी।
पेपर लीक के मामलों को देखते हुए बिहार सरकार ने एक्सपर्ट कमिटी का गठन किया।
इंडस्ट्री मंत्री श्रेयसी सिंह से बातचीत कि बिहार सरकार इथेनॉल को क्यों प्राथमिकता दे रही है।
छात्रों के प्रदर्शन में दो पुलिस वाले हुए घायल, 25 छात्रों को किया गया गिरफ्तार।
फरक्का संधि को बिहार क्यों रद्द करवाना चाहता है।
बिहार को 200 नए कॉलेज मिले, अब आगे क्या ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में टीचरों को ट्रेनिंग?
मोतिहारी के महात्मा गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी का खर्च बजट से 488 करोड़ ज़्यादा, विश्वविद्यालय ने कहा कि ये आँकड़े अंतिम नहीं, जाँच चल रही है।
संतोष जी के द्वारा बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ खिंचवाई गई तस्वीर को भी डाल रहा हूँ, जिसको इन्होंने पूरे गर्व के साथ अपने फेसबुक पर डाला है। तस्वीर देखकर यही लग रहा है कि ये सम्राट चौधरी के साथ फोटो खिंचाने के लिए लालायित हैं और सम्राट चौधरी का ध्यान कहीं और है, बस किसी ने फोटो ले लिया है।
इनकी कार्यशैली सरकार के प्रवक्ताओं वाली है और सवाल पूछने पर ऐसे क्रोधित होंगे हैं जैसे कि सवाल पूछने वाला ही गलत हो ।
गनीमत है रितिका चोपड़ा ऐसी तस्वीरों को देखकर प्रभावित नहीं हुईं, नहीं तो उनका भी मन चोर ज्ञानेश, मोदी और शाह के साथ फोटो खिंचाने का कर जाता तो आज हम लोगों के सामने चुनाव आयोग की सच्चाई सामने नहीं आती।
जो पत्रकार सोचते हैं कि वे सरकार में बैठे नेताओं और चोर अधिकारियों का गुणगान करके और उनके साथ फोटो खिंचवाकर देश और दुनिया में क्रांति ला देंगे, वे मूर्ख किसी और को बनाएँ।
Indian Express