11/07/2026
बेपर्दगी हमारा कल्चर नहीं, पर्दा हमारी शनाख़्त है
इस्लाम ने औरत को इज़्ज़त, वक़ार और तहफ़्फ़ुज़ अता किया है, और इसी तहफ़्फ़ुज़ का एक अहम ज़रिया पर्दा है। पर्दा हमारे मुस्लिम मुआशरे की शनाख़्त है, हमारी तहज़ीब का हुस्न है और हमारी ग़ैरत व शराफ़त की अलामत है। इस पर हमें शर्मिंदा होने के बजाय फ़ख़्र होना चाहिए, क्योंकि यह सिर्फ़ एक समाजी रिवायत नहीं बल्कि अल्लाह तआला का वाज़ेह हुक्म है। इस हुक्म की पाबंदी में अल्लाह की रज़ा है और इसे छोड़ने में उसकी नाराज़गी है।
अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि आजकल हमारे अपने इलाक़े के कुछ घरानों में पर्दे का एहतिमाम कमज़ोर पड़ता जा रहा है। इससे भी ज़्यादा तश्वीश की बात यह है कि कुछ लोग अपनी ख़वातीन और पर्दे की उम्र को पहुँच चुकी बच्चियों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर बिला झिझक शेयर कर रहे हैं, उन्हें स्टेटस, स्टोरी और मुख़्तलिफ़ प्लेटफ़ॉर्म्स की ज़ीनत बना रहे हैं। यह तर्ज़-ए-अमल न सिर्फ़ इस्लामी तालीमात के ख़िलाफ़ है बल्कि हमारी दीनी और ख़ानदानी रिवायतों से भी मुताबक़त नहीं रखता।
हमें याद रखना चाहिए कि औरत का अस्ल ज़ेवर उसका पर्दा, हया और इफ़्फ़त है। जिस मुआशरे में हया बाक़ी रहती है, वहाँ इज़्ज़त, अम्न और पाकीज़गी भी बाक़ी रहती है।
लिहाज़ा हम सबको इस बात का पाबंद रहना चाहिए कि अपनी माँओं, बहनों, बेटियों और घर की तमाम ख़वातीन के पर्दे का ख़ुद भी ख़याल रखें और उन्हें भी इसकी तरग़ीब दें। नीज़, सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें और वीडियो शेयर करने से मुकम्मल इज्तिनाब करें।
✍️Abid Hussain