05/09/2026
एक कहानी सुनाता हूं
एक तंबू में वाहिद खान और याकूब खान दो आदमी रहते थे, बारिश हुई तो एक ऊंट वहां आया और बोला कि बारिश हो रही है, तंबू में जगह दे दीजिए, वहीद खान बोले कि इसमें जगह कहां है ? जो तुम आ सको ...
ऊंट बोला, नाक की नकेल की वजह से मेरी नाक कट गयी है , ज़ख्म हो रहा है, ज़ख्म पर पानी गिरता है तो दर्द होता है, बस नाक छिपाने की जगह दे दीजिए, वाहिद खान और याकूब खान पुराने ज़मीदार , उन्हें दया आ गयी , उन्होंने ऊंट को नाक छिपाने की जगह दे दी।
सुबह तक पूरा ऊंट तंबू के अंदर और वाहिद खान और याकूब खान बाहर.... दर-बदर हो गये।
ऐसे ही सहारनपुर की मस्जिद का मामला है। 1888-1889 के सरकारी दस्तावेज में खेवट नं. 10/1 में मौजा पठानपुरा की जमीन वाहिद खान और याकूब खान के नाम दर्ज थी…
वाहिद खान और याकूब खान सहारनपुर के बड़े ज़मीदार थे, मौजूदा कलेक्ट्रेट परिसर का हिस्सा मौजा पठानपुरा, खसरा नं. 539 की 5.780 हेक्टेयर ज़मीन इनके नाम पर थी , अभी भी है..
इसी ज़मीन पर एक मस्जिद 1911 में बनाई गई ....
प्रशासन ने कहा कि नकेल की वजह से ज़ख्मी नाक छिपाना है , ज़मीदार वाहिद खान और याकूब खान ने कलेक्टर आफिस बनाने के लिए थोड़ी सी ज़मीन दे दी।
बिना किसी लिखत पढ़त के
आज प्रशासन ने पूरे तंबू पर कब्जा करके वह मस्जिद शहीद कर दी। जबकि कलेक्ट्रेट की खुद की ज़मीन आज भी वाहिद खान और याकूब खान के नाम पर है।
पहले के ज़मीदारों को इतना भी दरियादिल नहीं होना चाहिए था, बात बात पर ज़मीन दे देते थे।
मोहम्मद ज़ाहिद