Sujeet kumar jha

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05/09/2026
घाट अलग-अलग, गंगा एक… और तस्वीर में ‘निरंतरता’ बरकरार!बिहार में बाढ़ आती है तो गंगा सिर्फ पानी नहीं बढ़ाती, राजनीतिक स्म...
03/09/2026

घाट अलग-अलग, गंगा एक… और तस्वीर में ‘निरंतरता’ बरकरार!
बिहार में बाढ़ आती है तो गंगा सिर्फ पानी नहीं बढ़ाती, राजनीतिक स्मृतियां भी ताजा कर देती है। इस बार की दो तस्वीरें इसी स्मृति की दिलचस्प कहानी कह रही हैं।
एक तस्वीर में वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी गंगा के किनारे बाढ़ का जायजा ले रहे हैं। दूसरी तस्वीर में पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गंगा के दूसरे घाट पर बाढ़ की स्थिति देख रहे हैं।
दोनों के बीच समय का अंतर है, सत्ता का अंतर है, पद का अंतर है और घाट का भी अंतर है।
लेकिन प्रशासनिक निरंतरता देखिए—दीपक कुमार आज भी मुख्यमंत्री के आसपास दिखाई देते हैं।
यानी बिहार में सत्ता बदल सकती है, मुख्यमंत्री बदल सकता है, सरकार का राजनीतिक समीकरण बदल सकता है, लेकिन कुछ अधिकारी ऐसे हैं जिनकी ‘गंगा-यात्रा’ सत्ता परिवर्तन से भी लंबी है!
नीतीश कुमार के साथ अधिकारी रहे दीपक कुमार अब सम्राट चौधरी के साथ हैं। यह तस्वीर किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था की उस खासियत की तस्वीर है जिसमें राजनीतिक कुर्सी पर बैठने वाला बदलता रहता है, मगर कुर्सी के आसपास के कुछ चेहरे स्थायी भाव से खड़े रहते हैं।
इसे बिहार की राजनीति का ‘सत्ता-संतुलन’ कहें या प्रशासनिक अनुभव की निरंतरता—व्याख्या के लिए सब स्वतंत्र हैं।
और बाढ़ के समय तो यह व्यवस्था और भी सुंदर दिखाई देती है।गंगा पूछती नहीं कि मुख्यमंत्री कौन है। पानी सबके सामने बराबर बढ़ता है।
लेकिन तस्वीरें जरूर बता देती हैं कि सत्ता के साथ कौन-कौन चलता है।
नीतीश कुमार के समय भी बाढ़ थी, निरीक्षण था, अधिकारी थे।आज सम्राट चौधरी के समय भी बाढ़ है, निरीक्षण है, अधिकारी हैं।
बस फर्क इतना है कि पहले तस्वीर में मुख्यमंत्री के साथ नीतीश कुमार थे और अधिकारी उनके साथ; आज मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं और अधिकारी उनके साथ।
इसे ही शायद बिहार की प्रशासनिक परंपरा कहते हैं—
“सरकार नई, चेहरा नया… व्यवस्था वही पुरानी।”
बाढ़ का पानी उतर जाएगा।
घाट सूख जाएंगे।
राजनीतिक बयान भी बदल जाएंगे।
लेकिन सवाल यह रहेगा कि क्या बिहार में सिर्फ मुख्यमंत्री बदलते हैं, या शासन चलाने का तरीका भी कभी बदलता है?

जनता की परिषद या सत्ता का राजनीतिक पुनर्वास केंद्र? बिहार राज्य नागरिक परिषद का औचित्य क्या है ? बिहार राज्य नागरिक परिष...
01/09/2026

जनता की परिषद या सत्ता का राजनीतिक पुनर्वास केंद्र? बिहार राज्य नागरिक परिषद का औचित्य क्या है ?

बिहार राज्य नागरिक परिषद का नाम सुनने में जितना लोकतांत्रिक और जनोन्मुख लगता है, उसकी वास्तविक भूमिका को लेकर उतने ही गंभीर सवाल खड़े होते हैं। सरकार और जनता के बीच संवाद, सरकारी योजनाओं का प्रचार और जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाना—इन उद्देश्यों से शायद ही किसी को आपत्ति हो। सवाल यह है कि इसके लिए एक अलग राजनीतिक-सामाजिक संस्था की जरूरत आखिर कितनी है?

परिषद में 21 सदस्यों को प्रतिमाह 30 हजार रुपये का मानदेय मिलता है। यानी केवल सदस्यों के मानदेय पर सालाना 75.60 लाख रुपये खर्च होते हैं। इसके अलावा दो उपाध्यक्षों और सात महासचिवों के वेतन, मानदेय, यात्रा, बैठकों और अन्य सुविधाओं का खर्च अलग है। इसका मतलब है कि वास्तविक सरकारी खर्च इस रकम से निश्चित रूप से अधिक है।

बजट के आकार की तुलना में यह राशि भले ही बहुत छोटी हो, लेकिन असली सवाल पैसे का नहीं, उपयोगिता का है।

जनता की समस्याएं सुनने के लिए मुख्यमंत्री का जनता दरबार है। जिला स्तर पर प्रशासन है। विधायक और विधान परिषद सदस्य हैं। पंचायत और नगर निकायों की अपनी संस्थाएं हैं। सरकारी योजनाओं के प्रचार के लिए सूचना एवं जनसंपर्क तंत्र है। फिर नागरिक परिषद की अतिरिक्त जरूरत क्या है?

यहीं परिषद का दूसरा चेहरा सामने आता है।
ऐसी संस्थाएं अक्सर उन राजनीतिक और सामाजिक चेहरों को जगह देने का माध्यम बन जाती हैं जिन्हें सत्ता में प्रत्यक्ष संवैधानिक या प्रशासनिक पद नहीं मिल पाता। पद मिलता है, सरकारी पहचान मिलती है, मानदेय और सुविधाएं मिलती हैं और साथ में अपने-अपने सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहने का अवसर भी।
इसे राजनीतिक भाषा में ‘राजनीतिक समायोजन’ कहा जा सकता है। एडजस्टमेंट ।

2025 में परिषद के पुनर्गठन में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक समूहों को प्रतिनिधित्व दिया गया। 2026 में दो महत्वपूर्ण पदों पर फिर बदलाव हुआ। एक ओर छोटू सिंह को महासचिव पद से हटाया गया, दूसरी ओर हरेंद्र बहादुर सिंह को महासचिव और डॉ. अजय कुमार सिंह को उपाध्यक्ष बनाया गया। इन नियुक्तियों की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या परिषद महज जनसंपर्क संस्था है या सत्ता के सामाजिक-राजनीतिक नेटवर्क को मजबूत करने का माध्यम भी?

सरकार के लिए इसका लाभ स्पष्ट है। ऐसे पदाधिकारी सरकार के लिए जिलों और सामाजिक समूहों तक पहुंच का अतिरिक्त नेटवर्क बन सकते हैं। सरकारी योजनाओं का प्रचार कर सकते हैं, स्थानीय असंतोष का फीडबैक दे सकते हैं और उन लोगों को सत्ता के साथ जोड़े रख सकते हैं जो चुनावी राजनीति में तत्काल किसी पद पर नहीं हैं।

लेकिन लोकतंत्र में हर राजनीतिक लाभ को सरकारी संस्था के जरिए हासिल करना जरूरी नहीं है।

यदि नागरिक परिषद वास्तव में जनता की आवाज सरकार तक पहुंचाने वाली संस्था है तो उसकी वार्षिक उपलब्धियों का सार्वजनिक लेखा-जोखा भी होना चाहिए। कितनी शिकायतें मिलीं? कितनी सरकार तक पहुंचीं? कितने मामलों का समाधान हुआ? कितनी सरकारी योजनाओं के प्रचार का दायित्व परिषद ने निभाया? कितने जिलों में परिषद ने बैठकें कीं और उनका क्या परिणाम निकला?

इन सवालों के जवाब ही परिषद की वास्तविक उपयोगिता साबित करेंगे।

अन्यथा यह धारणा मजबूत होगी कि बिहार में सत्ता केवल मंत्रिमंडल और सरकारी विभागों के जरिए नहीं चलती, बल्कि उसके आसपास राजनीतिक पुनर्वास के लिए कई ऐसे मंच भी बनाए जाते हैं जिनका प्रशासनिक औचित्य सीमित और राजनीतिक उपयोगिता अधिक होती है।

नागरिक परिषद को खत्म करने की मांग जरूरी नहीं है। लेकिन उसे जवाबदेह बनाना जरूर जरूरी है।

जनता के नाम पर और जनता के पैसे पर बनी संस्था को जनता के सामने यह बताना ही चाहिए कि वह जनता के लिए आखिर करती क्या है।

वरना सवाल बना रहेगा—

यह जनता की नागरिक परिषद है या सत्ता का राजनीतिक पुनर्वास केंद्र?

26/08/2026

बाढ़ के आगे बेबस इंसान

नेपाल में भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों का रौद्र रूप तबाही की तस्वीर दिखा रहा है।
पहाड़ों से उतरता पानी अब बिहार की गंडक के लिए भी चिंता बढ़ा रहा है।
वाल्मीकिनगर से लेकर पश्चिम चंपारण और गंडक किनारे के इलाकों पर नजरें टिक गई हैं।
नदी का पानी बढ़ा तो खेत, घर और जनजीवन फिर सैलाब की चपेट में आ सकते हैं।
प्रकृति के इस प्रहार के सामने इंसान की सारी ताकत छोटी पड़ जाती है—बाढ़ के आगे सचमुच इंसान बेबस है।

आंदोलन जायज, लेकिन न्याय सबके लिएपटना में 70वीं बीपीएससी को रद्द करने की मांग को केवल छात्रों का दबाव कहकर खारिज नहीं कि...
25/08/2026

आंदोलन जायज, लेकिन न्याय सबके लिए

पटना में 70वीं बीपीएससी को रद्द करने की मांग को केवल छात्रों का दबाव कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। परीक्षा की निष्पक्षता को लेकर यदि अभ्यर्थियों के पास ठोस शिकायतें और प्रमाण हैं, तो सरकार को उनकी निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि 70वीं बीपीएससी की पूरी चयन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और 2,027 अभ्यर्थियों का चयन हो चुका है। ऐसे में पूरी परीक्षा रद्द करने का फैसला हजारों परिवारों के भविष्य को प्रभावित करेगा।

झारखंड का हालिया उदाहरण इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाता है। छात्रों के दबाव में सरकार ने जेपीएससी से जुड़ी कुछ परीक्षाओं और नियुक्तियों को रद्द करने का फैसला लिया, लेकिन झारखंड हाईकोर्ट ने 11वीं से 13वीं जेपीएससी से हुई नियुक्तियों को रद्द करने के सरकारी आदेश पर रोक लगा दी। अदालत का मूल सवाल यही था कि यदि कुछ लोगों पर गड़बड़ी का आरोप है तो बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के सभी चयनित अभ्यर्थियों को दोषी कैसे माना जा सकता है?

बिहार में भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए। छात्रों की मांग सुनना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन सफल अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा करना भी सरकार और न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी है।

यदि 70वीं बीपीएससी में व्यापक धांधली के ठोस प्रमाण मिलते हैं तो परीक्षा रद्द करने जैसे कठोर कदम से भी पीछे नहीं हटना चाहिए। लेकिन केवल आरोप या आंदोलन के दबाव में पूरी परीक्षा रद्द करना उचित नहीं होगा। दोषियों की पहचान कर कार्रवाई करना और निर्दोष अभ्यर्थियों को बचाना ही न्याय का रास्ता है।

सरकार को चाहिए कि आंदोलनकारी छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करे और किसी स्वतंत्र एजेंसी से समयबद्ध जांच कराए। जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक हो और उसी के आधार पर फैसला लिया जाए।

युवाओं का आंदोलन व्यवस्था में भरोसे की कमी का संकेत है, लेकिन समाधान ऐसा होना चाहिए जिसमें आंदोलनकारी छात्रों को न्याय मिले और मेहनत से चयनित अभ्यर्थियों के साथ भी अन्याय न हो।

परीक्षा की निष्पक्षता जरूरी है, लेकिन न्याय का अर्थ यह नहीं कि एक गलती की आशंका में हजारों निर्दोषों को सजा दे दी जाए।

25/08/2026

Bihar में बड़ा सियासी बदलाव! Nishant Kumar को Deputy CM बनाने की चर्चा, क्या है वजह

अधिकारी की भाषा पर सरकार का जवाबअधिकारी का काम छात्रों के सवालों का जवाब देना है, उन्हें ताना मारना नहीं। बीपीएससी के पर...
24/08/2026

अधिकारी की भाषा पर सरकार का जवाब

अधिकारी का काम छात्रों के सवालों का जवाब देना है, उन्हें ताना मारना नहीं। बीपीएससी के परीक्षा नियंत्रक राजेश कुमार सिंह का आंदोलनकारी छात्रों के संदर्भ में “हाथी चले बाजार, कुत्ते भौंके हजार” कहना न सिर्फ अमर्यादित था, बल्कि उस संवेदनशील माहौल में छात्रों के जख्म पर नमक छिड़कने जैसा था।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मामले का संज्ञान लेकर निलंबन का आदेश देकर यह स्पष्ट किया है कि सरकार अधिकारियों की भाषा और व्यवहार को लेकर समझौता नहीं करेगी।

लेकिन असली सवाल निलंबन से आगे है। छात्र जिन परीक्षा संबंधी सवालों को लेकर सड़क पर हैं, उनका समाधान कब होगा? अधिकारी को निलंबित करना जरूरी हो सकता है, लेकिन छात्रों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच उससे भी ज्यादा जरूरी है।

सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बीपीएससी में सवाल पूछने वाले छात्रों को जवाब मिले, उपेक्षा नहीं; और शिकायत करने वालों को न्याय मिले, उपहास नहीं। यही सुशासन की असली परीक्षा है।

कैमरा सबके लिए एक जैसा क्यों नहीं?हाईवे पर लगे कैमरों से ओवरस्पीडिंग का चालान कटना अच्छी बात है। इससे सड़क पर अनुशासन आत...
24/08/2026

कैमरा सबके लिए एक जैसा क्यों नहीं?

हाईवे पर लगे कैमरों से ओवरस्पीडिंग का चालान कटना अच्छी बात है। इससे सड़क पर अनुशासन आता है और हादसों पर भी लगाम लग सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह नियम सभी पर समान रूप से लागू होता है?

मोतिहारी से मुजफ्फरपुर जाने वाले NH-27 पर आम आदमी टोल टैक्स देता है। सड़क खाली हो, फिर भी निर्धारित स्पीड से थोड़ी भी अधिक गति हुई तो कैमरा गाड़ी की तस्वीर लेकर चालान भेज देता है। कई बार मोबाइल पर आए चालान में तस्वीर तो होती है, लेकिन उस समय गाड़ी की वास्तविक गति कितनी थी, यह साफ नहीं होता।

दूसरी ओर मंत्री, विधायक या सरकार के किसी महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति का काफिला इसी सड़क से गुजरता है। कई बार उनकी गाड़ियां काफी तेज गति से चलती दिखाई देती हैं। उन्हें निर्धारित नियमों के तहत टोल से छूट भी मिल सकती है। लेकिन क्या इसका मतलब यह भी है कि उनकी गति सीमा लागू नहीं होती?

अगर आम आदमी के लिए 80 की सीमा है तो VIP या सरकारी वाहन के लिए कितनी है? अगर उनकी गाड़ी भी निर्धारित सीमा से अधिक चलती है तो क्या कैमरा उसका चालान काटता है?

अगर काटता है तो बिहार सरकार को पिछले छह महीने का आंकड़ा सार्वजनिक करना चाहिए—

NH-27 के मोतिहारी-मुजफ्फरपुर खंड पर ओवरस्पीड के कितने चालान काटे गए? इनमें कितने VIP, मंत्री, विधायक और सरकारी वाहनों के थे? कितने चालानों का भुगतान हुआ?

और अगर एक भी VIP या सरकारी वाहन का चालान नहीं कटा तो इसका कारण भी सरकार को बताना चाहिए।

कैमरा मशीन है। उसे गाड़ी में बैठे व्यक्ति का पद, जाति या धर्म नहीं पता होना चाहिए। उसे सिर्फ गति पता होनी चाहिए या उसमे भी आरक्षण लागू है?

टोल देने वाले आम आदमी के लिए नियम और टोल से छूट पाने वाले VIP के लिए अलग नियम—यह सवाल सड़क सुरक्षा से ज्यादा कानून की समानता का है।

सरकार आंकड़े सार्वजनिक करे। इससे आरोप और आशंका दोनों खत्म हो जाएंगे।

कानून वही मजबूत होता है, जो सबके लिए एक जैसा दिखाई दे।

हर हर महादेव 🙏
24/08/2026

हर हर महादेव 🙏

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