23/08/2022
पता नहीं क्यों लोग हाकम सिंह, और मनराल का विरोध कर रहे हैं, जबकि इन्होंने तो पहाड़ के हित मे ही काम किया है। जरा पता कीजिये कि पिछले 22 साल में, छोटे बड़े ठेके, शोध और सर्वे के काम, NGO को मिलने वाले काम, फ़िल्म- डाक्यूमेंट्री बनाने के काम, प्रिंटिंग और पब्लिसिटी के काम, सरकारी विज्ञापन, सड़क-पुल निर्माण, मध्यान्ह भोजन के काम किन लोगों को और कैसे मिले हैं।
कितने पत्रकार हैं जिन्होंने इस बहती गंगा में हाथ धोए हैं? एक बड़का किस्म का पत्रकार जब मीडिया सलाहकार था, तब उसके कारनामें क्या थे?
कितने अधिकारी हैं जिन्होंने अपने रिश्तेदारों को दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार से लाकर देहरादून में सेट करवा दिया है?
राजनीति में पकड़ होने के वावजूद, हर दूसरे नेता से सीधी पहुंच होने के वावजूद, क्यों अधिकारी (पहाड़ी और गैर पहाड़ी) हमारा नाम देखकर ही बिदक जाते हैं?
अगर, उत्तराखंड को बचाना है तो एक बार, सिविल सोसाइटी का एक समूह बनाकर, सिर्फ 10 प्रतिशत अधिकारियों, नेताओं, पत्रकारों की ईमानदारी से जांच करनी होगी, और रिपोर्ट सार्वजनिक करनी होगी।
हाकम सिंह और मनराल ने तो उस भ्रष्टाचारी सिस्टम की होम डिलीवरी की है, उसने तो ज्यादातर पहाड़ियों की ही मदद की है। बल्कि यह भी कह सकते हैं कि हाकम सिंह और मनराल असली रॉबिनहुड हैं जिन्होंने भेड़ियों के झुंड से माँस का टुकड़ा छीनकर, उसे पहाड़ियों में बाँट दिया है।
लेख Prem Bahukhandi