04/03/2026
गांव की परंपराएँ केवल रस्में नहीं होतीं, वे पीढ़ियों की आत्मा होती हैं।
होली का फाग केवल गीत नहीं, बल्कि गांव की एकता, भाईचारे और संस्कृति की पहचान है।
परंतु बड़ा दुख होता है जब कोई व्यक्ति अपनी अहंकार की आग में जलकर उस परंपरा को ही मिटाने की कोशिश करता है, जिसे हमारे बुजुर्गों ने अपने खून-पसीने से सींचा है।
कहावत है—
“जिस थाली में खाओ, उसी में छेद मत करो।”
और एक पुराना दोहा याद आता है—
परंपरा की छांव में, पीढ़ियाँ पलती जाएँ,
जो उसको ललकारे, इतिहास उसे भुलाए।
आज गांव के कुछ लोग अपनी ताकत और पद के घमंड में यह भूल रहे हैं कि गांव किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं होता।
यह जनता का होता है, और जनता ही उसका असली मालिक होती है।
होली के पावन पर्व पर फाग गाना, मिलकर हँसना-गाना और एक-दूसरे को गले लगाना हमारी संस्कृति की पहचान है।
लेकिन जब कोई व्यक्ति इस पवित्र माहौल को बिगाड़ने की कोशिश करता है, तो यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं बल्कि पूरे गांव की आत्मा को ठेस पहुँचाने जैसा है।
व्यंग्य में एक बात कही जाती है—
“घमंड का सिर ऊँचा जरूर होता है,
लेकिन टिकता बहुत कम समय तक है।”
एक और दोहा देखिए—
अहंकार की आग में, जो खुद को जलाए,
जनता की अदालत में, वही सिर झुकाए।
किसी को डराने-धमकाने से सम्मान नहीं मिलता।
सम्मान मिलता है व्यवहार से, संयम से और समाज के प्रति जिम्मेदारी से।
हम सब जानते हैं कि
“लाठी के जोर से नहीं, बल्कि सच्चाई के जोर से समाज चलता है।”
अगर कोई व्यक्ति यह सोचता है कि डर दिखाकर या दबाव बनाकर गांव की आवाज को दबा देगा, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है।
क्योंकि—
सत्य की राह कठिन सही, पर हार नहीं मानती,
जनता की शक्ति के आगे, कोई दीवार नहीं ठहरती।
गांव के लोग हमेशा शांति, परंपरा और सम्मान के पक्ष में खड़े रहे हैं और आगे भी रहेंगे।
हमारी संस्कृति को कोई मिटा नहीं सकता।
एक अंतिम दोहा—
फाग की धुन में बसा, गांव का सारा मान,
जो उसको रोकने चले, समझो उसका अवसान।
हम सबकी यही अपील है कि गांव की मर्यादा और परंपराओं का सम्मान किया जाए।
होली का पर्व प्रेम, मेल-मिलाप और भाईचारे का प्रतीक है, इसे किसी के अहंकार का मैदान न बनाया जाए।
गांव की परंपरा जिंदा थी, जिंदा है और जिंदा रहेगी।
क्योंकि परंपराएँ तलवार से नहीं, लोगों के दिलों से चलती हैं।