11/02/2022
आज पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की पुण्यतिथि है ।दीनदयाल जी के जीवन की अनेको एसी घटनायें है जो आज के सभी राजनीतिक दलो के कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणादायी है । जिसकी कुछ घटनाओं का उल्लेख कर उन्हें मानस रूप से श्रद्धा - सुमन अर्पित करूँगा ।
भारत-चीन युद्ध के पूर्व चीन के राष्ट्रपति ने भारत के प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू पर गंदी टिप्पणी की ।इस टिप्पणी के संबंध में भारतीय जनसंघ की बैठक में पं. दीनदयाल उपाध्याय जी ने कहा की इस टिप्पणी से देश और देश के प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू दोनो का अपमान है ।इस विषय को हमें जनता तक ले जाकर चीन की नियत और नीति का पर्दाफ़ाश करना चाहिए ।बैठक में उपस्थित जनसंघ के कार्यकर्ताओं ने कहा की सामने चुनावी वर्ष है ऐसा करने से भारतीय जनसंघ को नुक़सान होगा ।दीनदयाल जी ने कहा “देश से बड़ा दल का हित नही होता ।देशहित के लिए जनसंघ के हित को न्योछावर करना होगा ।” जनसंघ के कार्यकर्ताओं ने चीन के राष्ट्रपति की नेहरू जी के लिए की गयी गंदी टिप्पणी को जनता तक ले जाकर चीन की नीति व नियत का पर्दाफ़ाश किया ।
भारतीय जनसंघ दलगत राजनीत से ऊपर उठकर देश के केंद्र की कांग्रेश सरकार व भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ खड़ी थी।उस समय विश्व के प्रायः देश चीन के साथ थे ।
दीनदयाल जी सभी दल के कार्यकर्ताओं को अपना ही मानते थे ।जिसकी एक घटना यहाँ उल्लेख करना प्रासंगिक होगा ।एक बार संघ शिक्षा वर्ग में पं.दीनदयाल उपाध्याय जी से प्रश्न हुआ की अब संसद में आपके कितने सांसद है ?दीनदयाल जी ने कहा पाँच सौ सांसद अपने है ।तो प्रतिप्रश्न हुआ पाँच सौ कैसे ? दीनदयाल जी ने कहा संसद के सभी सांसद अपने ही है ।फिर वापस प्रतिप्रश्न हुआ मै भारतीय जनसंघ के सांसदो की संख्या पूछ रहा था ।दीनदयाल जी ने उत्तर दिया अच्छा आप जनसंघ के सांसदो की संख्या पूछ रहे है ,उनकी संख्या पैंतीस है ।पं.दीनदयाल जी सभी दल के कार्यकर्ताओं को अपना ही मानते थे ।
दीनदयाल जी राजनीत में रहकर राजनीति से अलिप्त रहे । दीनदयाल जी अपने जीवन काल में अंग्रेज़ी साप्ताहिक अख़बार आर्गेनाईजर के स्थाई काँलम ‘पोलिटिकल डायरी’ में लिखा करते थे ।उनके ब्रम्हलीन होने के पश्चात् नाना जी देशमुख के प्रयासों से पोलिटिकल डायरी के चुनिंदा आलेखों को छाँटकर “पोलिटिकल डायरी” शीर्षक से ही साहित्य का प्रकाशन करवाया ।प्रकाशन पूर्व तब के प्रख्यात कांग्रेस के नेता ,विद्वान व काशी विद्यापीठ के कुलाधिपति डॉक्टर सम्पूर्णानंद के पास नाना जी देशमुख गए और साहित्य की प्रति देकर आग्रह किया की आप इसकी भूमिका लिखे ।डॉक्टर सम्पूर्णानंद ने कहा मै कांग्रेसी कार्यकर्ता हूँ और आप सभी जनसंघी है तो आप एसा क्यूँ चाहते है की मै इन लेखों के संग्रह की भूमिका लिखूँ ।नाना जी ने कहा की आप कांग्रेसी है और दीनदयाल जी जनसंघी है पर आप दोनो विद्वान है ।आप भारतीय परम्परा को जानते है,इसलिए आप लिखे हम आपको आश्वस्त करते है की आप जो लिखेंगे हम वैसी भूमिका छापेंगे । आपने यदि उनकी आलोचना की तो वो भी हम छापेंगे ।इसलिए आप भूमिका लिखे ।डॉक्टर सम्पूर्णानंद जी ने भूमिका लिखी ।उन्होंने उन आलेखों को कालजयी आलेख बताया ,और आश्चर्य किया की एक राजनीतिक दल के नेता ऐसा कैसे सोच सकते है ।डॉक्टर सम्पूर्णानंद ने भी पं.दीनदयाल उपाध्याय को दलवादी राजनेता ना मानकर सिद्धांतयुक्त राजनीत के लिए राजनीति में होना बताया ।पोलिटिकल डायरी के लेखों को डॉक्टर सम्पूर्णानंद अमूल्य बताते हुए लिखते है की “इस श्रेणी के लेख वर्तमान समय की सीमा से बहुत आगे पहुँच गए है ,मुझे आश्चर्य होता है कि क्या स्वयं उपाध्याय जी ने उनको अनुभव किया था ,या उनका अनुभव करने के लिए उनके पास समय था ।मै उदाहरण के लिए केवल एक ही चर्चा करूँगा , ‘आपका मत ‘ शीर्षक लेख वर्तमान मतदाताओं को लक्ष्य कर लिखे गए है ।”
यहाँ पर उल्लेख करना चाहूँगा की दीनदयाल जी “लोकमत परिष्कार” के नौ आलेख लिखे थे ।वे सिद्धांतहीन मतदान को सिद्धांतहीन राजनीति का जनक मानते थे ।दीनदयाल जी का मतदाताओं से आग्रह था की राजनीतिक दल चुनावों में टिकट देने में त्रुटि कर सकते है और एसे व्यक्ति को टिकट दे सकते है जो आपके मत का अधिकारी नहीं हो ।तो मतदाता की ये ज़िम्मेदारी है की वे राजनीतिक दलो को श्रेष्ठ टिकट देने हेतु बाध्य करे व ज़रूरी ये भी नहीं की उसे वे अपना मत दे जिसमें वे भारतीय जनसंघ को भी शामिल करते थे । साथ ही दीनदयाल जी ने एक प्रश्न के उत्तर में हमें उनका परिचय मिलता है जिसमें उन्होंने कहा था की “मै राजनीति के लिए राजनीत में नहीं हूँ,मै राजनीत में संस्कृति का राजदूत हूँ ।” इसको चरितार्थ दीनदयाल जी ने जोनपुर चुनाव में ब्राह्मणों को खुद ब्राम्हण होने के बाद भी जातीसूचक सम्बोधन नहीं दिया जबकी वह सीट ब्राम्हण बहुल थी। इस बाबत समाज के प्रतिनिधिमंडल उनसे मुलाक़ात कर आग्रह किया था ।मात्र जातीसूचक सम्बोधन नहीं करने से दीनदयाल जी चुनाव हारे ।बाद में उन्होंने कहा की यदि वे जातीसूचक सम्बोधन कर जीत जाते तो भी वह जनसंघ की विचारधारा की हार होती ।दीनदयाल जी जातिवाद के ख़िलाफ़ एसे समय खड़े हुए जब देश के सभी दल जातीवाद के आधार पर टिकिट का निर्णय करते थे ।”देश प्रथम - दल द्वितीय“ ,“जातपात नहीं - भारतीयता “, “राजनीत में राजनीति नहीं- राजनीति में संस्कृति” ,विदेशी नहीं स्वदेशी”,इसे कहना तो सरल है पर करना असम्भव ही है जो दीनदयाल जैसा विराट व्यक्तित्व ही कर सकता है ,एसे दीनदयाल के लिए आज राष्ट्र तरस रहा है ।
पं.दीनदयाल उपाध्याय जी को शत शत नमन.......अवधेश कुमार जैन