15/06/2025
*रविवार खास*-------
#लोकतंत्र आया और #बनिया किनारे कर दिया गया — ना कोई नारा, ना कोई मोर्चा, ना कोई मंत्री पद।
'बनिया वोट बैंक' नाम की कोई चीज़ आज भी हमारे देश की राजनीतिक शब्दावली में नहीं है।
क्यों?
क्योंकि बनिया चिल्लाता नहीं, सिर्फ हिसाब रखता है। गिनती का आदमी है —
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बनिया सुबह उठता है, तिजोरी खोलता है, शाम तक टैक्स भरता है और रात को भगवान से प्रार्थना करता है — "हे प्रभु, कोई मुझे मंत्री बना दे, भले ही वाणिज्य मंत्रालय दे दो।"
लेकिन ऊपरवाला कहता है — "तू तो ठीक है, तू तो GST समझता है, लेकिन तू जाट, यादव, दलित, पाटीदार नहीं है। तू नारे नहीं लगाता, धरने नहीं देता, तू व्यापार करता है।"
राजनीतिक दलों के लिए बनिया वही है जैसे शादी में वो मेहमान जो खर्चा भी करता है, गिफ्ट भी लाता है, पर फोटो में कहीं नहीं दिखता।
उससे चंदा ले लो, लेकिन टिकट मत दो।
उससे प्रचार करवा लो, लेकिन भाषण मत दिलवाओ।
क्योंकि वो "साइलेंट सपोर्टर" है।
कभी-कभी जब कोई बनिया नेता बन भी जाए…
…तो उसे पार्टी की “चंदा समिति” का अध्यक्ष बना दिया जाता है।
कोई पद, कोई शक्ति नहीं — बस ledger और ledger।
"भाई साहब, आप कैश कितने देंगे?"
"भाई साहब, आप बिल लेंगे या बिना बिल के?"
आरक्षण में नहीं, आरक्षित सीट पर नहीं
सामान्य वर्ग में है, लेकिन सामान्य स्थिति में नहीं।
आरक्षण नहीं है, लेकिन असुरक्षा बहुत है।
क्योंकि जो वर्ग करदाता है, वही वर्ग राजद्वार से बाहर है.
हालांकि #कमियां खुद में ही नजर आती है।
एक सर्वे करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि हर पाँच बनिया घरों में एक नेता पाया जाता है। बाक़ी चार, नेता बनने की योजना पर दिन-रात मंथन कर रहे होते हैं।
सभी आपस में भयंकर प्रतिस्पर्धा भी रखते हैं।
ज्यादा जोगी मठ उजाड़ कहावत एकदम सटीक प्रतीत होती है ।
*समापन में एक सवाल*---
*क्या बनिया को राजनीति चाहिए?*
*या*
*राजनीति को बनिया?*
बाकी कहा सुना माफ करना। ये सिर्फ एक कटाक्ष है।
*अगले रविवार को अगला रविवार खास*