26/06/2020
आजकल समाज में लोग बेटी के रिश्ते के लिए (लड़के मे ) चौबीस टंच का सोना खरिदने जाते है । देखते देखते देखते घूमते घूमते चार पांच साल भी टाईमपास हो जाता है, पढाई ओर क्वालीफीकेसन के नाम पर भी टाईमपास कर देते हैं ।
*लङके देखने का अंदाज भी टाईमपास का अनौखा उदाहरण हो गया है ?
खूद का मकान हैं कि नही ?
अगर है तो फर्नीचर कैसा है ?
कमरे कितने है ?
रहन सहन केसा है ?
हाई फाई परंपराओं से तौला जाता है ।
फोर व्हीलर है नही ?
कितने भाई हैं ?
बंटवारे में मां बाप किनके गले पडे हैं।
बहन कितनी हैं ,उनकी शादी हूई कि नही ?
रिश्ते नाते वाले आधुनिक काल के है कि नही ।
बच्चे की हाईट क्या !
रंग रूप कैसा !
आदत ,में थोड़ा एडजस्ट कर लेंगे।
पढाई ।
कमाई ।
बैंक बैलेंस ।
सब बातो पर इन्क्वायरी पूरी होने के बाद कुछ प्रश्न पूछने में समय पास हो जाता है । ईर्ष्या और डिमांड भी सब कूछ चोपट कर जाती हैं ।
मां बाप का स्वभाव ठीक नहीं है ?
मेरे चाचाजी का लडका है कहो तो कूंङली मंगवा दू ?
हालात तो क्या कहे माँ बाप की नींद खूलती है पच्चीस पर ओर चार पांच साल कि दौड धूप बच्चो की जवानी को बरबाद करने के लिए काफी है। इस वजह से अच्छे रिस्ते हाथ से निकल जाते है ।
*मै सही तुम गलत के खेल में*
*न जाने कितने रिश्ते ढह गए...*
ऐक समय था जब बिना देखे , घर के खानदान व व्यवहार पर रिश्ते होते थे । वो लम्बे भी निभते थे। समधी समधन में मान मनुहार थी। सुख दूख में साथ था। रिश्ते नाते कि अहमियत का अहसास था। चाहे पैसे माया कम थी मगर खुशीया घर आंगन पणीहारी मै झलकती थी । कभी कोई ऊची नीची बात हो जाती तो आपस में बड़े बुजर्ग संभाल लेते थे ।
तलाक शब्द रिश्तों में था ही नही । दाम्पत्य जीवन खटे मीठे अनुभव में बीत जाया करता था और दोनों एक दूसरे के बुढ़ापे की लाठी बनते थे और पोते पोतियों में संस्कारो के बीज भरते थे।
अब कहा है वो संस्कार ।
शादी में तो तलॉक की बाते हो जाती है ।
आँख की शर्म तो इतिहास हो गई।
*कमाल है*
*आजाद रिश्तों में*
*लोग बंधन ढूंढ रहे है*
*और*
*बंधे हुए रिश्तों में आजादी*
और नोबत आ जाती है रिश्तों में समझोता करने का। लड़का अपने समाज का नही होगा तो भी चलेगा, ऐसी बाते भी सामने आ रही है ।
लडकिया खुले आम दूसरे धर्म में लव मैरिज कर रही है और दोष दे रही है समाज में अच्छे लड़के मेरे लायक नही है क्योकि ये लडकिया आधुनिकता की पराकाष्ठा पार कर गई है । सिगरेट और शराब पीना आजकल कॉलेज जाने वाली लड़कियों का फ़ैशन बन चुका है ।*
अगर अब भी माँ बाप नही जागेंगे तो स्थितियां विस्फोटक हो जाएगी । समाज के लोगो को समझना होगा लड़कियों की शादी 22-23-में हो जाये और लड़का 24-का हो।
सब में सब गुण नही मिलते। । पंडित जी भी 36 गूण में से 21-गूण पास कर जाते थे। 24 टंच ना सही 19टंच भी सोना ही है ।
पीतल घर में मत लाओ। घर बंगले ।फोर व्हीलर से पहले व्यवहार तोलो खानदानी ढूढो।जो कूंजी है रिश्ते नाते की वो कभी फैल नही होते ।
किसी अज्ञात लेखक की ये पंक्तियां इस दौर को बखूबी चित्रित किया है
"परिवार अब कहाँ, परिवार तो कब के मर गए , पहले अगाध स्नेह और प्यार अब तो रिश्तों के आईने तड़क कर हो गए हैं कच्चे, केवल मैं और मेरे बच्चे, माँ बाप भी नहीं रहे परिवार का हिस्सा, तो समझिये खत्म ही हो गया किस्सा !"
माँ बाप भी आर्थिक चकाचोंध में बह रहे है । आपसी प्रेम का खत्म होने को परिवार को तोड़ने में अब तो कानून ने भी बो दिए हैं बीज
जायज है लिव इन रिलेशनशिप ,और कॉन्ट्रैक्ट मैरिज ना मुर्गी ना अंडा ना सास ससुर का फंडा
जब पति पत्नी ही नहीं तो परिवार कहाँ से बसते कॉन्ट्रैक्ट खत्म , चल दिये अपने अपने रास्ते
इस दौरान जो बच्चे हुए ,
पलते हैं यतीमों की तरह ।
पीते हैं तिरस्कार का जहर !
अर्थ की भागम भाग में मीलों पीछे छूट गए हैं ,
रिश्ते नातेदार !
टूट रहे हैं घर परिवार
सूख रहा है प्रेम और प्यार
परिवारों का इस पीढ़ी ने ऐसा तमाशा किया कि , आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में पढ़ेंगी संस्कार।!
समाज को अब जागना जरूरी है
वरना रिश्ते ढूढते रह जाएंगे।