23/08/2026
आरक्षण (भाग 9)
दुनिया का इतिहास देख लो ,
वर्गों की एक रही श्रृंखला ।
कहीं रंग कहीं धन के कारण,
कहीं कर्मो में रही भिन्नता ।
सामाजिक न्याय छलावा है ! बस,
समता एक कपोल कल्पना।
भेदभाव एक अमर दैत्य हैं,
अस्पृश्यता है संविधान संकल्पना।
समाज हमेशा बंटा हुआ था,
अपने-अपने आधारों पर।
भेदभाव होता कैसे है,
फर्क पड़ता है विचारों पर।
कार्ल मार्क्स से प्रभावित होकर,
बनाना चाहते हैं यूटोपिया।
जनता बेचारी नासमझ है,
नेताओं ने पहनाई टोपियां।
विविधिताओं का देश है भारत,
समता जहां असम्भव है।
अस्पृश्यता यदि हटा भी दोगे,
फिर भी विभेद संभव है।
मुफ्त में जो भी मिलता है,
उसके पीछे गहराई है।
लेकर तुमसे तुम्हीं को देंगे,
यह नेताओं की चतुराई है।
सियासत-दाँ के फ़रेब में आकर,
नष्ट करो ना भाईचारा।
जो भी जिसके काबिल है,
पाकर दूर करें अंधियारा ।
महत्व सभी के कार्यों का है,
कोई भविष्य नहीं विद्वेष का।
देश का गौरव मायने रखता,
ना कि व्यक्ति विशेष का।
विद्या की तूलिका थम रही,
यदि बातों में कुछ लगे वजन।
छोड़ के पूर्वाग्रह का बंधन,
निश्चय ही सब करना मनन ।
धन्यवाद
विद्याधर
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