Vidya dhar Dubey

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Vidya dhar Dubey खुशी मेरे दर पर ठहरती नहीं,
दुआ है कि फ़लक तक पहुंचती नहीं;
क्या डूब ही जाएगी उम्मीदों की कश्ती ?
नसीबो की रेखा है कि बदलती नहीं।

23/08/2026

आरक्षण (भाग 9)

दुनिया का इतिहास देख लो ,
वर्गों की एक रही श्रृंखला ।
कहीं रंग कहीं धन के कारण,
कहीं कर्मो में रही भिन्नता ।

सामाजिक न्याय छलावा है ! बस,
समता एक कपोल कल्पना।
भेदभाव एक अमर दैत्य हैं,
अस्पृश्यता है संविधान संकल्पना।

समाज हमेशा बंटा हुआ था,
अपने-अपने आधारों पर।
भेदभाव होता कैसे है,
फर्क पड़ता है विचारों पर।

कार्ल मार्क्स से प्रभावित होकर,
बनाना चाहते हैं यूटोपिया।
जनता बेचारी नासमझ है,
नेताओं ने पहनाई टोपियां।

विविधिताओं का देश है भारत,
समता जहां असम्भव है।
अस्पृश्यता यदि हटा भी दोगे,
फिर भी विभेद संभव है।

मुफ्त में जो भी मिलता है,
उसके पीछे गहराई है।
लेकर तुमसे तुम्हीं को देंगे,
यह नेताओं की चतुराई है।

सियासत-दाँ के फ़रेब में आकर,
नष्ट करो ना भाईचारा।
जो भी जिसके काबिल है,
पाकर दूर करें अंधियारा ।

महत्व सभी के कार्यों का है,
कोई भविष्य नहीं विद्वेष का।
देश का गौरव मायने रखता,
ना कि व्यक्ति विशेष का।

विद्या की तूलिका थम रही,
यदि बातों में कुछ लगे वजन।
छोड़ के पूर्वाग्रह का बंधन,
निश्चय ही सब करना मनन ।

धन्यवाद
विद्याधर

#आरक्षण
#सच्चाई
#समानता
#सभीकार्यसमान

23/08/2026

आरक्षण (भाग 8)

ब्राह्मण को गाली देने वालों,
बुद्धि अगर हो करो विचार ।
ब्राह्मण , ब्राह्मण है अपने कर्मों से,
जिसे पूजता है संसार ।

बुद्धि से अपने पूजे जाते ,
त्याग ही है जिसकी पहचान।
कड़ी तपस्या करता है जब ,
बनता है तब जग में महान ।

वहशी आक्रांताओं से जिसने ,
अपनी प्रजा का किया है त्राण।
देश की रक्षा के खातिर ,
क्षत्रियों ने तज दिए थे प्राण।

क्षत्रिय होना सरल नहीं है ,
करना पड़ता है खुद का बलिदान।
खाना पड़ता है घास की रोटी ,
ताकि बचा रहे धरती का स्वाभिमान।

दुनिया भर में चमक रहे हैं,
ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य।
अपने दम पर है प्रस्थिति पाई,
क्यों करते हो उनसे वैमनस्य।

संविधान क्या मान चुका है?
कम बुद्धि का होता है यह वर्ग!
जिसके अभ्युदय के खातिर,
सवर्णों का होता है उत्सर्ग।

खुद को नीच समझने वालों,
देश के तुम ही हो आधार।
एक दिन भी तुम गर बैठ गए ,
थम जाएगा यह संसार।

एक शरीर के सभी अंग है,
ना कोई कम है ना कोई ज्यादा।
एक दूजे बिन सभी अधूरे,
सफल हुए तब, जब एक इरादा।

विद्याधर

#संविधान
#आरक्षण

23/08/2026

आरक्षण (भाग 7)

आरक्षण गर देना है,
उन यतीम बच्चों को दो।
देश की रक्षा के खातिर,
जिनके पिता शहीद हुए।

आरक्षण गर देना है,
रोते बिलखते परिवारों को दो,
देश की सेवा करते-करते,
जिनके लाल बलिदान हुए।

आरक्षण गर देना है,
उन अनाथ बच्चों को दो।
जिनके सिर पर ना छत है ,
ना ही है पिता की छाया।

आरक्षण गर देना है,
उन निराश्रित दुःखियों को दो।
सरकार की कुनीतियों के कारण,
छिन गया जिनका सहारा।

आरक्षण गर देना है,
उन गरीब बच्चों को दो।
उड़ना चाहते हैं आसमान में,
पर पैरों तले जमीन नहीं।

आरक्षण गर देना है,
शोषित , वंचित, उपेक्षित को दो।
आभावों से जो गुजर रहे,
जाति उनकी चाहे जो हो।

आरक्षण गर देना है,
दिव्यांग और नारी को दो।
पूर्वाग्रह से बाहर आकर,
जो समाज का उत्कर्ष करें।

आरक्षण गर देना है,
शिक्षा और अवसर का दो।
उद्यमी ही जहां सफलता पाए,
योग्यता ना कभी प्रताड़ित हो।

राष्ट्र का गौरव वापस होगा,
करके यकीन तुम करो परीक्षण।
खुद को विधाता समझने वालों,
बंद करो यह जाति आरक्षण।

विद्याधर

#वास्तविकआरक्षण
#यहीचाहिए
#भारतसरकारध्यानदे
#जातिआरक्षणबंदकरो

23/08/2026

आरक्षण (भाग 6)

राजनीति एक दलदल है,
जो भी गया वह फंस जाएगा।
सत्य निष्ठा के पर काटेंगे
भ्रष्टाचार में वह धंस जाएगा।

जन आकांक्षाओं का दमन कर,
वह नेताओं के गुण सीखेगा।
दोगलों की यदि प्रतिस्पर्धा हो,
निश्चित ही नेता जीतेगा।

आरक्षण बनी संजीवनी,
सत्ता को अक्षुण्ण बनाने में।
आपस में ही लड़वा देंगे,
राजनीति चमकाने में।

"क्रीमीलेयर" समझते हो क्या?
यह भी एक परजीवी है।
अपनों का ही हक मारकर ,
बना नया चिरंजीवी है।

इंसा बेबस, संस्था बेबस,
बेबस सर्वोच्च न्यायालय हैं।
भाई का हक भाई छीने,
विधायिका बनी प्रेक्षालय है ।

ऊंचे पद पर जो बैठा है,
वंशज उसी की पाते संरक्षण।
बेबस, लाचार समाज है वह,
जहां अपनो से होता संघर्षण।

कामयाबी जिसे मिल चुकी है ,
आरक्षण की क्या जरूरत?
जिसका पेट भरा हुआ है,
उसे खिलाने की क्या जरूरत।

सदियों का जो भूखा है,
उसे सूखी रोटी भी अमृत है।
धरती में जो है धंसा हुआ ,
उसे उठाना संस्कृति है।

आरक्षण का विरोध नहीं है,
मिले उसे जो लायक हो।
खुद का करे विकास, और
समाज के लिए फलदायक हो।

एक बार जो आरक्षण पाए,
फिर ना उसके लायक हो।
पर, बनता है हकदार वही,
जिसके चचा विधायक हों।

नैतिकता से बढ़कर है,
नेताओं के लिए हुकूमत।
आस्तीन के सांप हैं सारे,
ख्वाब डसा फिर किया सियासत।

लोकतंत्र की मर्यादाओं का
नेताओं ने किया है चीर-हरण ।
सियासत के क्रूर हथकंडों से ,
रिआया का होता तिल-तिल मरण

अघोषित तानाशाही है,
जन इच्छा है निराधार।
सियासत के रहनुमाओं ने
देश का किया है बंटाधार ।

विद्याधर

#आरक्षण
#क्रीमीलेयर
#बंदकरो

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23/08/2026

आरक्षण (भाग 5)

दुनिया का दस्तूर यही है ,
अपने ही होते गद्दार।
हक छीनते अपने ही हैं,
अपने ही करते अत्याचार।
सबल हुए गर अपने ,
लाचारों से करते हैं नफरत,
स्वार्थ ही सर्वोपरि होता है,
जाति- बिरादरी है बेकार।
क्या सच में मिला आरक्षण उनको ?
जिनको यह दिया गया।
या, आंदोलन की कठपुतली बन,
केवल बदलते रहे सरकार।
एस, टी, एस,सी, का जो रहनुमा है,
वास्तव में वह सुख भोग रहा।
वर्षों का वह शोषित वंचित,
आज भी उतना ही है लाचार।
बेटा, पिता और दादा पूर्वज,
सब आरक्षण के परजीवी हैं।
खस्ताहाल है सदियों से जो,
उसे नहीं आरक्षण का अधिकार।
इतना विकास किया नेताओं ने,
हरिजन से उनको दलित किए ।
दलित ! दलित ही रह गया ,
नेताओं का कुल भी हो गया ज़रदार।
एसटी, एससी के ही वर्ग में,
सामाजिक न्याय नहीं हो पाया।
76 वर्षों से मिला है अवसर, बस!
अब बंद करो देना यह उपहार।
आकांक्षाएं यदि ऊंची हो ,
प्रतिभा को तुम दो संरक्षण।
देश निरंतर प्रगति करेगा ,
खत्म होगा जब आरक्षण।

विद्याधर

#आरक्षण
#बंदकरो
#रक्तबीज

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