27/01/2026
UGC का नया कानून छात्रों की आवाज़ दबाने की कोशिश, और यह लड़ाई सवर्ण छात्रों के भविष्य की भी है हम छात्र हैं।हम किसी जाति, धर्म या पार्टी के मोहरे नहीं हैं।लेकिन आज सच बोलना ज़रूरी है।
यूजीसी के नाम पर जो नया कानून लाया जा रहा है, वह सिर्फ यूनिवर्सिटी की आज़ादी पर हमला नहीं है,
यह सवर्ण (General Category) छात्रों के भविष्य पर भी सीधा वार है, जिसे जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है।आज सवर्ण छात्रों को कहा जाता है तुम्हें तो सब कुछ मिला हुआ है।लेकिन सच यह है कि सवर्ण छात्रों के पास न आरक्षण है, न सुरक्षा,और अब शिक्षा में भी आवाज़ छीनने की तैयारी है।जब यूनिवर्सिटी का कंट्रोल ऊपर चला जाएगा,तो सबसे पहले नुकसान उसी छात्र का होगा जो सिर्फ मेरिट, मेहनत और पढ़ाई के भरोसे आगे बढ़ना चाहता है।इतिहास गवाह है की जब-जब छात्रों ने सिस्टम से सवाल पूछा है,तब-तब बदलाव आया है।1974 में जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर बिहार का छात्र आंदोलन खड़ा हुआ।
वह आंदोलन किसी एक जाति के लिए नहीं था,
वह छात्रों के सम्मान और लोकतंत्र के लिए था।
जेपी आंदोलन ने सत्ता को झुकने पर मजबूर किया,
इमरजेंसी जैसी तानाशाही को चुनौती दी।आज़ादी की लड़ाई हो,जेपी आंदोलन हो,मंडल आंदोलन हो,
या फीस और शिक्षा बचाने के संघर्ष हर बार छात्रों ने यह साबित किया कि जब छात्र एक होते हैं, तो सत्ता डरती है।आज वही इतिहास दोहराया जा रहा है।फर्क बस इतना है कि आज छात्रों को जाति में बांटकर असल मुद्दे से भटकाया जा रहा है।सवर्ण छात्रों को खामोश रहने को कहा जा रहा है। दलित-पिछड़े छात्रों को डराया जा रहा है।अल्पसंख्यक छात्रों को भ्रम में रखा जा रहा है।लेकिन यूजीसी का यह कानून सबको बराबर नुकसान पहुंचाएगा।आज अगर सवर्ण छात्र चुप रहे,तो कल उनकी मेरिट की कोई कीमत नहीं बचेगी। आज अगर छात्र एकजुट नहीं हुए,तो कल यूनिवर्सिटी सवाल पूछने की जगह नहीं रहेगी।यह लड़ाई न आरक्षण की है,न विरोध की राजनीति की।यह लड़ाई छात्र बनाम सिस्टम की है।
यूजीसी का यह कानून छात्रों के लिए काला कानून है,
और खासकर उन सवर्ण छात्रों के लिए भी जो मेहनत के अलावा कुछ नहीं मांगते।
सवर्ण छात्र एकता ज़िंदाबाद।