15/08/2017
स्ट्रांग पोल के पोलराइजेशन की पॉलिटिक्स है बीजेपी-आरएसएस की, इसकी काट क्या हो?:
यह देखिये कैसे:
1) हरियाणा और राजस्थान में जाट बनाम नॉन-जाट
2) गुजरात में पटेल बनाम नॉन-पटेल
3) पंजाब में सिख बनाम नॉन-सिख
4) महाराष्ट्र में मराठा बनाम नॉन-मराठा
5) आंध्रप्रदेश में रेड्डी बनाम नॉन-रेड्डी
6) हैदराबाद में काप्पू बनाम नॉन-काप्पू
7) बिहार में यादव बनाम गैर-यादव
8) उतरप्रदेश में हिन्दू बनाम मुस्लिम
9) दक्षिण भारत में दलित बनाम नॉन-दलित
10) उडीसा-बंगाल-झारखंड में आदिवासी बनाम नॉन-आदिवासी
और यह पोलराइजेशन करते वक्त यह ना "हिन्दू एकता और बराबरी" का इनका खुद का दिया नारा (जुमला ही कहिये) फॉलो करते और ना इनको इसका डर कि कोई यह सवाल कर लेगा तो क्या जवाब दोगे?
इस टॉपिक पर डिबेट होनी चाहियें, इसी से आगे का रास्ता निकलेगा| आपके अनुसार क्या तोड़ है इनकी इस राजनीति का?
फौरी तौर पर जो एक सबसे बड़ा हल मुझे दीखता है वो है कि इनके बनाये वर्णवाद को अस्वीकृत करके तिरस्कृत कर दो, नंबर एक|
दूसरा है यह थ्योरी बदलनी होगी कि समर्थ को 70 खून भी माफ़, वह कुछ भी कर सकता है|
तीसरा आप समाज के सबसे स्ट्रांग यानि मेजोरिटी पोल हो आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता कि अर्रोगंस यह आपमें भर देते हैं| और दूसरी तरफ नीचे-नीचे यह आपकी ही गोभी खोदते रहते हैं और आप मेजोरिटी में टूलते रह जाते हो| यह टूलना बंद करना होगा और खुद को सहजता से लेना शुरू करना होगा|
चौथा आप मेजोरिटी के घमंड में आ के खुद की मान्यताओं के अलावा हर किसी ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे की चीजों को अंगीकार करने लगते हो (जिसमें आपकी ही महिलाएं विस्फोटक भूमिका निभाती हैं) और आपकी अपने पुरखों की दी हुई जाँची-परखी हुई चीजें-मान्यताएं तिरस्कृत सी पड़ी आपके वापिस मुड़ने की बाट जोह रही होती हैं| तो अपनी चीज को सबसे पहले अपना कहना सीखना और उसको सबसे आगे रखना शुरू करना होगा|
पांचवा समाज चलाने के लिए हमें आपराधिक छवि के अस्त्र-शस्त्र से लैश भगवान नहीं बल्कि आदर्श भगवान चाहियें| क्योंकि आपराधिक छवि के भगवान के नाम पर आपसे यह लोग उस भगवान द्वारा दलित (राम बनाम दलित सम्भूक अध्याय) को मारना भी पुण्य का कार्य स्थापित कर देते हैं| कृष्ण द्वारा अपनी सगी बहन को बुआ के लड़के से ब्याहना भी जायज ठहरवा लेते हैं, उसके द्वारा प्रेमिका को धोखा देना भी लव-सिंबल बना देते हैं| धर्मराज द्वारा पत्नी को जुए में लगाना भी सहजता से स्वीकार करवा देते हैं| इंद्रा द्वारा आहिल्या का बलात्कार भी आम बात जैसा ठहरा देते हैं| और तो और परशुराम द्वारा अपनी माँ का गला रेतना भी हॉनर-किलिंग नहीं रहता| जबकि समाज की हकीकत इसकी उल्टी है| कोई तो हॉनर किलर को समाज में भगवान नहीं बनाता, कोई अपनी बहन अपनी बुआ के लड़के को देने वाले के पास भी बैठना पसंद नहीं करता, कोई दलित पर अत्याचार को जायज नहीं ठहराता, कोई भी खुद की बीवी जुए में लगाने वाला कभी पंचायती नहीं बनता; या बनता है? तो स्पष्ट है हमें भगवान के रूप में हमारे पुरखे चाहियें, उनके आदर्श चाहियें; ना कि यह समाज की व्यवहारिकता से कोसों दूर इनके घड़े काल्पनिक भगवान; जिनके स्थापित (ऊपर गिनाये) कीर्तिमानों व् सिद्धांतों को यह खुद तक फॉलो नहीं करते|
यानि लब्बो-लवाब यह है कि जड़ें गहरी हैं परन्तु लाइलाज नहीं|
Jai-Hind ... Jai-Bharat