Gayatri poonia

Gayatri poonia सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट गायत्री पूनिया..
समर्पित सेवा संस्थान (बदलाव की आवाज) Navodaya family(world wide)

30/06/2026

बंद कमरों से खेल के मैदान तक: बचपन को वापस लौटाने का समय
आज का बचपन एक गंभीर चुनौती के दौर से गुजर रहा है। कभी बच्चे सुबह से शाम तक गलियों और मैदानों में दौड़ते, कबड्डी, खो-खो, क्रिकेट, फुटबॉल और अनेक पारंपरिक खेल खेलते थे। उनकी हँसी पूरे मोहल्ले में गूंजती थी। लेकिन आज वही बचपन मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन और टेलीविजन के सामने सिमटकर रह गया है।
आज अधिकांश बच्चे खुले आसमान की जगह बंद कमरों को अपना संसार मान बैठे हैं। मोबाइल गेम, सोशल मीडिया और टीवी ने उनके बचपन का बड़ा हिस्सा छीन लिया है। इसका परिणाम केवल शारीरिक कमजोरी तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी, मोटापा और सामाजिक व्यवहार में गिरावट जैसी समस्याएँ भी तेजी से बढ़ रही हैं।
खेल केवल मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाते हैं। मैदान बच्चों को अनुशासन, टीम भावना, नेतृत्व, हार-जीत को स्वीकार करने की क्षमता, आत्मविश्वास और संघर्ष करना सिखाता है। मैदान में खेला गया हर खेल बच्चे के व्यक्तित्व को निखारता है, जबकि मोबाइल की दुनिया उसे धीरे-धीरे अकेला और निष्क्रिय बना देती है।
अब प्रश्न यह है कि बच्चों को फिर से मैदान तक कौन लाएगा? इसका उत्तर स्पष्ट है—हम सब मिलकर।
सबसे पहले माता-पिता को स्वयं पहल करनी होगी। बच्चों को केवल मोबाइल देकर चुप कराने के बजाय उनके साथ मैदान तक जाना होगा। घर में मोबाइल और टीवी देखने का समय सीमित करना होगा तथा प्रतिदिन कम से कम एक-दो घंटे आउटडोर खेलों के लिए प्रेरित करना होगा।
विद्यालयों को भी खेलों को केवल वार्षिक खेलकूद प्रतियोगिता तक सीमित नहीं रखना चाहिए। प्रतिदिन खेल का समय अनिवार्य हो, स्थानीय और पारंपरिक खेलों को बढ़ावा दिया जाए तथा प्रत्येक बच्चे को किसी न किसी खेल से जोड़ा जाए।
समाज के लोगों की भी बड़ी भूमिका है। हर मोहल्ले और गाँव में सुरक्षित खेल मैदान उपलब्ध हों। नियमित खेल प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएँ, खेल सामग्री उपलब्ध कराई जाए और ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाए जहाँ बच्चे खुशी-खुशी मैदान की ओर आकर्षित हों।
आज आवश्यकता केवल खिलाड़ियों को तैयार करने की नहीं, बल्कि स्वस्थ, संस्कारी और आत्मविश्वासी पीढ़ी तैयार करने की है। यदि हम बच्चों को आज मैदान से जोड़ देंगे, तो कल वे मोबाइल की लत से स्वतः दूर हो जाएंगे।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हर बच्चे को स्क्रीन की कैद से निकालकर खुले मैदान की आज़ादी देंगे। क्योंकि मोबाइल बच्चों का भविष्य नहीं बना सकता, लेकिन खेल का मैदान निश्चित रूप से एक स्वस्थ, सक्षम और सशक्त भविष्य की नींव रख सकता है।
"बचपन स्क्रीन पर नहीं, मैदान में खिलता है। आइए, बच्चों को फिर से खेल के मैदान तक ले चलें।"

29/06/2026

खेल केंद्र पर अच्छा प्रदर्शन करनेवाले बालक बालिकाओं का उत्साह वर्धन।

28/06/2026

देश हमें देता है सबकुछ.....

27/06/2026

बाल टोली बैरासर छौटा

समाज का वो पहलूएक समय था...जब खबरें आती थीं कि कोई पुरुष अपनी पत्नी पर अत्याचार कर रहा है। हमारा सिर शर्म से झुक जाता था...
26/06/2026

समाज का वो पहलू
एक समय था...
जब खबरें आती थीं कि कोई पुरुष अपनी पत्नी पर अत्याचार कर रहा है। हमारा सिर शर्म से झुक जाता था।
लेकिन आज...
समाचार बदल गए हैं।
कहीं एक माँ अपने ही बच्चों की हत्या कर देती है। कहीं पत्नी अपने पति की हत्या की साज़िश में शामिल पाई जाती है। कहीं प्रेम, वासना, लालच या अहंकार इंसानियत से बड़ा हो जाता है।
सवाल यह नहीं कि अपराधी पुरुष है या महिला।
सवाल यह है कि आख़िर इंसान के भीतर का इंसान मर क्यों रहा है?
क्या हमारी शिक्षा केवल डिग्री दे रही है? क्या हमारे घर केवल सुविधाएँ दे रहे हैं? क्या हमारे बच्चे मोबाइल से जुड़ रहे हैं, लेकिन संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं?
हमने आधुनिकता तो अपनाई, लेकिन क्या हमने संवेदनशीलता बचाई?
जब माँ के ममत्व पर स्वार्थ भारी पड़ जाए... जब पति-पत्नी का रिश्ता विश्वास की जगह षड्यंत्र में बदल जाए... जब प्रेम, जीवन देने के बजाय जीवन लेने का कारण बन जाए...
तब समझ लीजिए कि समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे समाज की है।
आज ज़रूरत किसी एक वर्ग को दोष देने की नहीं, बल्कि अपने घर, अपने बच्चों और अपने चरित्र को फिर से देखने की है।
क्योंकि...
सभ्यता कपड़ों से नहीं, चरित्र से पहचानी जाती है।
और यदि चरित्र गिर गया, तो समाज का सबसे बड़ा पतन शुरू हो चुका है।
आइए...
न पुरुष के पक्ष में खड़े हों, न महिला के।
सिर्फ़ सत्य, न्याय और मानवता के पक्ष में खड़े हों।
यही है...
समाज का वो पहलू।

25/06/2026

वंदेमातरम

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गांव बैरासर छोटा
Sadulpur
331023

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