Gayatri Pariwar Sagar

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गायत्री परिवार:- हमारे गुरुदेव परम पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के साहित्य,विचारों, गायत्री परिवार सागर एवं अन्य क्षेत्रो के गायत्री परिवार से जुड़े कार्यक्रम,आदोलन को इस पेज के द्वारा सभी लोगों तक डिजिटल मीडिया के माध्यम पहुचाने का प्रयास करते है।

27/08/2026

गायत्री यज्ञ कि महिमा l गायत्री परिवार सागर..... Awgp, युवा प्रकोष्ठ, सागर DIYA Youth Cell Sagar बाल संस्कार शाला - गायत्री गुरुकुल Gayatri Chetna Center - New Jersey भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा-Awgp-Gps Gayatri Gyan Mandir (Chicago)

27/08/2026

नित्य यज्ञ

26/08/2026

गायत्री मंत्र महिमा l गायत्री परिवार सागर......
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26/08/2026

जन्मदिवस एवं पुंसवन संस्कार

🔱गायत्री और यज्ञ-- भारतीय धर्म-संस्कति के माता-पिता🔱🔰गायत्री भारतीय संस्कृति की जननी और यज्ञ भारतीय धर्म का पिता है। भार...
26/08/2026

🔱गायत्री और यज्ञ-- भारतीय धर्म-संस्कति के माता-पिता🔱
🔰गायत्री भारतीय संस्कृति की जननी और यज्ञ भारतीय धर्म का पिता है। भारतीय तत्त्वज्ञान का सार-मर्म इन्हीं दो तथ्यों में समाया हुआ है । इसलिए गायत्री और यज्ञ को हम अनादिकाल से अपने आध्यात्मिक माता-पिता मानते रहे हैं।

🔰गायत्री महामंत्र उपासना की दष्टि से परम सामर्थ्यवान है। शास्त्रकारों ने इसके पाँच मख, पाँच नाम बताए हैं ( १) अमृत ( २) पारस (३) कल्पवक्ष ( ४) कामधेन (५) ब्रह्मया। इन पाँचों द्वारा जो लाभ उठाए जा सकते हैं, उन सभी को दे सकने की क्षमता इस महामंत्र में विद्यमान है।

🔰मनुष्य के भीतर अन्नमयकोश. मनोमयकोश. प्राणमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनंदमयकोश--ये परम सामर्थ्यवान पाँच आवरण हैं। इन पाँचों में अगणित रहस्यमय शक्तियाँ सन्नहित हैं। उन्हें जगाने के लिए गायत्री उपासना से बढकर और कोई साधना नहीं। षटचक्रों का भेदन, कंडलिनी- जागरण, स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरों का परिशोधन तथा १२ महत्त्वपूर्ण योग-साधनाओं की सफल साधना गायत्री के माध्यम से ही की जाती है। इस महाशक्ति को तंत्र-मार्ग से प्रयुक्त करके आश्चर्यचकित कर देने वाली सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं।

🔰योग-साधना का केंद्रबिंदु अपने धर्म में गायत्री महामंत्र ही रहा है।
आत्मबल बढाने और आत्मपरिशोधन का यह सार्वजनिक सार्वभौम मंत्र है। इसकी उपासना नर-नारी बाल-वृद्ध, कोई भी कर सकता है। बद्धि को प्रकाशवान और प्रखर बनाना. अंतःकरण में ऋतंभरा प्रजा को प्रकाशमान करना गायत्री की सबसे बडी विशेषता है।

🔰इसलिए भारतीय धर्म के हर अनुयायी को नित्य इस मंत्र की उपासना अनिवार्य बतार् गर् है। जो इसकी उपेक्षा करता है. उसकी कडे शब्दो में भर्त्सना की गई है। कोई किसी देवता या मंत्र की साधना भले ही करता हो. पर उसे सबसे पहले गायत्री द्वारा अंतःकरण चतष्टय तथा इंद्रियसमूह को शुद्ध करना पड़ता है।

🔰इसके बिना कोई साधना सफल नहीं हो सकती। कष्ट संकट विपत्ति और चिताजनक में फँसे हए व्यक्ति उलझना इस साधना का आश्रय लेकर अपनी समस्याओं को हल करने और उलझनों को सुलझाने का मार्ग प्राप्त कर सकते हैं।

🔰निराशाजनक परिस्थितियों में आशा का प्रकाश उत्पन्न करने एवं विपन्नता को संपन्नता में बदल देने की शक्ति इस महामंत्र में किस सीमा तक भरी पड़ी है, इसकी परीक्षा कोई भी व्यक्ति श्रद्धापूर्वक गायत्री मंत्र की उपासना करके कभी भी कर सकता है।

🔰भारतीय धर्म का सारा विस्तार वेदों में हआ और चारों वेद गायत्री के चारों चरणों की व्याख्या मात्र हैं। बीजरूप से गायत्री में वह सब मौजद है. जो हमारे धर्मग्रंथो में कहा समझाया गया है। इस मंत्र में २४ अक्षरों की व्याख्या की जाए तो उनमें नीति, धर्म, सदाचरण. लोक- व्यवहार की ऐसी शिक्षाएँ ओत-प्रोत मिलेंगी. जिन्हें अपनाकर मनुष्य अपना लोक और परलोक सुख-शांतिमय बना सकता है।

🔰विवेक बुद्धि को प्राथमिकता देना और उसे सर्वोपरि ईश्वरीय संदेश मानना गायत्री का सार है। यह मंत्र हमें विवेकवान विचारशील बनने एवं हंस की तरह नीर-क्षीर का विवक करते हुए अनुचित को त्यागने एवं उचित को अपनाने के निर्देश करता है।

✍️परम पूज्य गुरुदेव वेदमूर्ति तपोनिष्ट पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी



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25/08/2026

गुरुदेव अमृत वाणी 🙏...... Awgp, युवा प्रकोष्ठ, सागर DIYA Youth Cell Sagar बाल संस्कार शाला - गायत्री गुरुकुल भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा-Awgp-Gps

🕉️सद्ज्ञान की उपलब्धि मनुष्य का श्रेष्ठतम सौभाग्य🕉️⚜️शरीर को जीवित रखने के लिए अन्न, जल और वायु की अनिवार्य आवश्यकता है।...
24/08/2026

🕉️सद्ज्ञान की उपलब्धि मनुष्य का श्रेष्ठतम सौभाग्य🕉️
⚜️शरीर को जीवित रखने के लिए अन्न, जल और वायु की अनिवार्य आवश्यकता है। आत्मा को सजीव और सुविकसित बनाने के लिए उस ज्ञान आहार की आवश्यकता है जिसके आधार पर गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता उपलब्ध की जा सके।
⚜️समुन्नत जीवन का एकमात्र आधार सद्ज्ञान है। इस अवलंबन के बिना कोई ऊँचा नहीं उठ सकता, आगे नहीं बढ़ सकता। संतोष, सम्मान और वैभव की अनेकानेक श्रेयस्कर विभूतियाँ इस सद्ज्ञान संपदा पर ही अवलंबित हैं।

⚜️मनुष्य में ज्ञान संपादन की क्षमता भी है, पर उसे एकाकी विकसित नहीं कर सकता। दूसरों के सहारे ही उसकी महानता विकसित हो सकती है। इस सहारे का नाम स्वाध्याय और सत्संग है। मानवी महानता का सारा श्रेय उस सद्ज्ञान को है जो उसकी चिंतन-प्रक्रिया एवं कार्यपद्धति को आदर्शवादी परंपराओं का
अवलंबन करने की प्रेरणा देता हो।

⚜️सौभाग्य और दुर्भाग्य की परख इस सद्ज्ञान संपदा के मिलने न मिलने की स्थिति को देखकर की जा सकती है। जिसे प्रेरक प्रकाश न मिल सका वह अँधेरे में भटकेगा, जिसे सद्ज्ञान की ऊर्जा से वंचित रहना पड़ा, वह सदा पिछड़ा ही बना रहेगा।
⚜️पारस छूकर लोहे को सोना बनाने वाली किंबदंती सच हो या झूठ, यह सुनिश्चित तथ्य है कि सद्ज्ञान की उपलब्धि मनुष्य को सौभाग्य के श्रेष्ठतम स्तर तक पहुँचा देती है।

✍️परमपूज्य गुरुदेव वेदमूर्ति तपोनिष्ट पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी


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⚜️न तो हिम्मत हारें और न हार स्वीकार करें⚜️🔘परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इनकार नहीं किया जा सकता।शारीरिक ...
24/08/2026

⚜️न तो हिम्मत हारें और न हार स्वीकार करें⚜️
🔘परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इनकार नहीं किया जा सकता।शारीरिक संकट उठ खड़ा हो, कोई अप्रत्याशित रोग घेर ले, यह असंभव नहीं। परिवार के सरल क्रम में से कोई साथी बिछुड़ जाए और शोक-संताप के आँसू बहाने पड़े, यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है।

🔘मनचाही सफलताएँ किसे मिली हैं? मनोकामनाओं को सदा पूरी करते रहने वाला कल्पवृक्ष किसके आँगन में उगा है? ऐसे तूफान आते ही रहते हैं, जो सँजोई हुई साध के घोंसले उड़ाकर कहीं-से-कहीं फेंक दें और एक-एक तिनका बीनकर बनाए गए उस घरोंदे का अस्तित्व ही आकाश में छितरा दें, ऐसे अवसर पर दुर्बल मनःस्थिति के लोग टूट जाते हैं।

🔘नियतिक्रम से हर वस्तु का, हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं? यह सब अपने ढंग से चलता रहे, पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाए, इसी में उसका गौरव है।
🔘समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिर-अतीत से अपने स्थान पर जमी अड़ी बैठी हैं। हिलोरों ने अपना टकराना बंद नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी? न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए।

🔘नियति की चुनौती स्वीकार करना और उससे दो-दो हाथ करना ही मानवी गौरव को स्थिर रख सकने वाला आचरण है।

✍️परमपूज्य गुरुदेव वेदमूर्ति तपोनिष्ट पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी



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24/08/2026

रक्षाबंधन संकल्प

23/08/2026

बाल संस्कारशाला संगीत कक्षा

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