26/08/2026
🔱गायत्री और यज्ञ-- भारतीय धर्म-संस्कति के माता-पिता🔱
🔰गायत्री भारतीय संस्कृति की जननी और यज्ञ भारतीय धर्म का पिता है। भारतीय तत्त्वज्ञान का सार-मर्म इन्हीं दो तथ्यों में समाया हुआ है । इसलिए गायत्री और यज्ञ को हम अनादिकाल से अपने आध्यात्मिक माता-पिता मानते रहे हैं।
🔰गायत्री महामंत्र उपासना की दष्टि से परम सामर्थ्यवान है। शास्त्रकारों ने इसके पाँच मख, पाँच नाम बताए हैं ( १) अमृत ( २) पारस (३) कल्पवक्ष ( ४) कामधेन (५) ब्रह्मया। इन पाँचों द्वारा जो लाभ उठाए जा सकते हैं, उन सभी को दे सकने की क्षमता इस महामंत्र में विद्यमान है।
🔰मनुष्य के भीतर अन्नमयकोश. मनोमयकोश. प्राणमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनंदमयकोश--ये परम सामर्थ्यवान पाँच आवरण हैं। इन पाँचों में अगणित रहस्यमय शक्तियाँ सन्नहित हैं। उन्हें जगाने के लिए गायत्री उपासना से बढकर और कोई साधना नहीं। षटचक्रों का भेदन, कंडलिनी- जागरण, स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरों का परिशोधन तथा १२ महत्त्वपूर्ण योग-साधनाओं की सफल साधना गायत्री के माध्यम से ही की जाती है। इस महाशक्ति को तंत्र-मार्ग से प्रयुक्त करके आश्चर्यचकित कर देने वाली सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं।
🔰योग-साधना का केंद्रबिंदु अपने धर्म में गायत्री महामंत्र ही रहा है।
आत्मबल बढाने और आत्मपरिशोधन का यह सार्वजनिक सार्वभौम मंत्र है। इसकी उपासना नर-नारी बाल-वृद्ध, कोई भी कर सकता है। बद्धि को प्रकाशवान और प्रखर बनाना. अंतःकरण में ऋतंभरा प्रजा को प्रकाशमान करना गायत्री की सबसे बडी विशेषता है।
🔰इसलिए भारतीय धर्म के हर अनुयायी को नित्य इस मंत्र की उपासना अनिवार्य बतार् गर् है। जो इसकी उपेक्षा करता है. उसकी कडे शब्दो में भर्त्सना की गई है। कोई किसी देवता या मंत्र की साधना भले ही करता हो. पर उसे सबसे पहले गायत्री द्वारा अंतःकरण चतष्टय तथा इंद्रियसमूह को शुद्ध करना पड़ता है।
🔰इसके बिना कोई साधना सफल नहीं हो सकती। कष्ट संकट विपत्ति और चिताजनक में फँसे हए व्यक्ति उलझना इस साधना का आश्रय लेकर अपनी समस्याओं को हल करने और उलझनों को सुलझाने का मार्ग प्राप्त कर सकते हैं।
🔰निराशाजनक परिस्थितियों में आशा का प्रकाश उत्पन्न करने एवं विपन्नता को संपन्नता में बदल देने की शक्ति इस महामंत्र में किस सीमा तक भरी पड़ी है, इसकी परीक्षा कोई भी व्यक्ति श्रद्धापूर्वक गायत्री मंत्र की उपासना करके कभी भी कर सकता है।
🔰भारतीय धर्म का सारा विस्तार वेदों में हआ और चारों वेद गायत्री के चारों चरणों की व्याख्या मात्र हैं। बीजरूप से गायत्री में वह सब मौजद है. जो हमारे धर्मग्रंथो में कहा समझाया गया है। इस मंत्र में २४ अक्षरों की व्याख्या की जाए तो उनमें नीति, धर्म, सदाचरण. लोक- व्यवहार की ऐसी शिक्षाएँ ओत-प्रोत मिलेंगी. जिन्हें अपनाकर मनुष्य अपना लोक और परलोक सुख-शांतिमय बना सकता है।
🔰विवेक बुद्धि को प्राथमिकता देना और उसे सर्वोपरि ईश्वरीय संदेश मानना गायत्री का सार है। यह मंत्र हमें विवेकवान विचारशील बनने एवं हंस की तरह नीर-क्षीर का विवक करते हुए अनुचित को त्यागने एवं उचित को अपनाने के निर्देश करता है।
✍️परम पूज्य गुरुदेव वेदमूर्ति तपोनिष्ट पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी
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बाल संस्कार शाला - गायत्री गुरुकुल
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