Mukesh Gupta

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समाज की भलाई के लिए खल-वंदना भी करें।“खल” अर्थात् दुष्ट , कपटी , ईर्ष्यालु , दूसरों के सुख से दुखी और दूसरों के दुख से स...
08/05/2026

समाज की भलाई के लिए खल-वंदना भी करें।
“खल” अर्थात् दुष्ट , कपटी , ईर्ष्यालु , दूसरों के सुख से दुखी और दूसरों के दुख से सुखी होने वाला प्राणी। और “वंदना” अर्थात् प्रणाम , स्तुति या सम्मान। अब पहली नज़र में यह बड़ा विचित्र लगता है कि भला दुष्टों की वंदना क्यों ? सज्जनों की वंदना समझ में आती है , देवताओं की वंदना भी उचित है , पर खल-वंदना ? यह तो ऐसा हुआ जैसे मच्छरों को धन्यवाद देना कि वे रात भर हमें जगाकर योगाभ्यास करवा रहे हैं!
परंतु भारतीय काव्य-परंपरा बड़ी गूढ़ है। यहाँ व्यंग्य भी है , नीति भी है और अनुभव का निचोड़ भी। विशेषतः गोस्वामी तुलसीदास ने “रामचरितमानस” में खल-वंदना करके यह सिद्ध कर दिया कि जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक कभी-कभी सज्जन नहीं , दुष्ट ही होते हैं।
खल-वंदना क्यों ?
दुष्ट व्यक्ति समाज का “अनचाहा अलार्म सिस्टम” है।
वह हमें सावधान रहना सिखाता है।
सज्जन व्यक्ति हमें प्रेम देता है ,
पर खल व्यक्ति हमें “पासवर्ड बदलना” सिखाता है।
सज्जन कहता है -
“भाई , सब अच्छा होगा।”
खल कहता है—
“देख लेना , मैं कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर करूँगा।”
और आश्चर्य यह कि दूसरे की बात ही अधिक सत्य निकलती है !
इसलिए खल-वंदना वास्तव में दुष्ट की प्रशंसा नहीं , बल्कि उसकी उपयोगिता की स्वीकृति है।

खल व्यक्ति बड़ा परोपकारी होता है -
स्वयं जलता है और दूसरों को भी जलाता है।
उसे आपकी उन्नति देखकर इतना कष्ट होता है कि वह बिना डॉक्टर की सलाह के ही रातभर करवटें बदलता रहता है।
आपकी सफलता उसके लिए वैसा ही आघात है जैसा विद्यार्थी के लिए “कल परीक्षा है” का संदेश।
यदि आपने सामूहिक कन्या विवाह में उपहार दिए हैं तो वह बोलेगा , “अच्छा है नम्बर दो की कमाई बहुत होगी न ?”
यदि आपने पुरस्कार पाया है तो वह कुटिलता पूर्वक मुस्कुराएगा, “अरे , आजकल तो सब सेटिंग से ही होता है।”
अब ऐसे महान आत्माओं को प्रणाम न करें तो क्या करें ?

समाज में तो खल व्यक्ति नमक की तरह है - अधिक हो जाए तो भोजन बिगड़ जाए ,
यदि बिल्कुल भी न हो तो स्वाद फीका लगे।
अर्थात यदि संसार में केवल सज्जन ही होते ,
तो “सावधान” शब्द शब्दकोश से हीं गायब हो जाता।
न कोई राजनीति रोचक होती ,
न कोई दफ्तर रोमांचक ,
न पड़ोस की चर्चा में रस आता।
खल व्यक्ति ही समाज को “कथानक” देता है।
रामायण में यदि रावण न होता ,
तो कथा इतनी विराट कैसे बनती ?
महाभारत में यदि दुर्योधन न होता ,
तो नीति-शिक्षा किससे मिलती ?
अतः खल व्यक्ति कथा का विलेन ही नहीं , कथानक का इंजन भी होता है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने खल-वंदना इसलिए की क्योंकि दुष्ट व्यक्ति बिना बुलाए आलोचक होता है।
वह आपके दोष ढूँढने में इतनी मेहनत करता है कि जितनी आप गुण बनाने में भी नहीं करते।
वह आपकी पीठ पीछे चर्चा करता है
अर्थात् आपकी “मुफ़्त पब्लिसिटी” करता है।
वह आपको नीचा दिखाने का प्रयास करता है
अर्थात् आपको ऊँचा उठने की प्रेरणा देता है।
इस प्रकार खल व्यक्ति अनजाने में आपका चरित्र-निर्माण ही करता है।
वह आपका शत्रु कम, निजी प्रशिक्षक अधिक होता है।

खल-वंदना हमें तीन बातें सिखाती है
(1) सजग रहो
हर मुस्कान मित्रता नहीं होती।
(2) धैर्य रखो
क्योंकि दुष्ट का काम है कहना
और बुद्धिमान का काम है समझना।
(3) विनम्र रहो
क्योंकि कभी-कभी हम स्वयं भी किसी और की कहानी में “खल पात्र” हो सकते हैं , मेरा प्रत्यक्ष अनुभव सबके सम्मुख है।
यह विचार मनुष्य को अहंकार से बचाता है।

आज के समय में खल व्यक्ति कई रूपों में मिलते हैं -
समाजसेवक के रूप में ,
ऑफिस के सहकर्मी रूप में ,
रिश्तेदारी के विशेषज्ञ रूप में ,
सोशल मीडिया के टिप्पणी-वीर रूप में ,
पड़ोस के समाचार चैनल रूप में
और व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय के कुलपति रूप में।
इन सबकी वंदना आवश्यक है ,
क्योंकि ये हमें मानसिक रूप से इतना मजबूत बना देते हैं कि फिर जीवन की असली समस्याएँ भी छोटी लगने लगती हैं।

कुल मिलाकर खल-वंदना का अर्थ दुष्टता का सम्मान नहीं ,
बल्कि अनुभव का सम्मान है।
दुष्ट व्यक्ति हमें विवेक देता है ,
सावधानी देता है ,
आत्मबल देता है
और कभी-कभी अच्छे व्यंग्य लेख लिखने की सामग्री भी देता है।
अतः कहा जा सकता है कि सज्जन हमें जीना सिखाते हैं और खल हमें बचकर जीना सिखाते हैं।
इसलिए खल को प्रणाम करना उसकी महानता नहीं बल्कि आपकी अपनी समझदारी का प्रमाण है।
सच्चाई यह है कि
जिस दिन आपके विरोधी बढ़ जाएँ तो समझ लीजिए आप कुछ अच्छा कर रहे हैं !

बड़े बेटे प्रिंस के जन्मदिन (6 मई) के उपलक्ष्य में श्री हाथीवान जी महाराज बरहा धाम में श्रीरामचरितमानस का अखण्ड पाठ ।
08/05/2026

बड़े बेटे प्रिंस के जन्मदिन (6 मई) के उपलक्ष्य में श्री हाथीवान जी महाराज बरहा धाम में श्रीरामचरितमानस का अखण्ड पाठ ।

अभिनंदन 💐  आभार 🙏Big shout out to my new rising fans! Raju Eletakals, ER Ashwani Parihar, Vasudev B Khatri, Kali Kapalin...
08/05/2026

अभिनंदन 💐 आभार 🙏
Big shout out to my new rising fans! Raju Eletakals, ER Ashwani Parihar, Vasudev B Khatri, Kali Kapalini

देवता भी यज्ञ करते थे तो दानव विघ्न डालते थे ।प्रायः हम सबने पढ़ा है कि जब-जब देवता यज्ञ किया करते थे तब-तब असुर उसमें व...
08/05/2026

देवता भी यज्ञ करते थे तो दानव विघ्न डालते थे ।
प्रायः हम सबने पढ़ा है कि जब-जब देवता यज्ञ किया करते थे तब-तब असुर उसमें विघ्न पैदा किया करते थे, जैसे उन्होंने विघ्न डालने का ठेका मानो जन्मसिद्ध अधिकार की तरह ले रखा था। ऋषि-मुनि मंत्रोच्चार कर रहे हैं , अग्नि प्रज्वलित है , आहुति दी जा रही है और उधर कोई राक्षस मारीच बनकर स्वर्णमृग हो जाता है , कोई ताड़का बनकर जंगल में आतंक मचा देता है , कोई सुबाहु बनकर यज्ञकुंड में हड्डियाँ फेंक आता है। मानो उनका पूरा विभाग ही “विघ्न एवं बाधा मंत्रालय” रहा हो।

देवता बेचारे सृष्टि के कल्याण के लिए यज्ञ करते थे - वर्षा हो , अन्न उपजे , लोक में शांति रहे , धर्म की रक्षा हो। परन्तु असुरों को इस सबसे व्यक्तिगत अपमान महसूस होता था। उन्हें लगता था कि यदि संसार में शांति स्थापित हो गई , लोग सुखी हो गए , तो फिर उनकी पूछ कौन करेगा ? उनका आतंक-उद्योग बंद हो जाएगा। इसलिए वे हर शुभ कार्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे ! कुछ वैसे ही जैसे आजकल समाज के किसी *सर्वसम्मत आयोजन* में एक “विशेषज्ञ” अवश्य मिल जाता है , जो आयोजक को कहता है “उसे क्यों बुलाया ? , इसे क्यों नहीं बुलाया ? वह चोर हैं।”

असल समस्या यह थी कि असुर स्वयं कोई श्रेष्ठ कार्य कर नहीं सकते थे। साधना में धैर्य चाहिए , यज्ञ में संयम चाहिए , लोककल्याण में त्याग चाहिए और ये तीनों गुण उनके चरित्र में उतने ही दुर्लभ थे जितना ईमानदारी किसी घोटाले की फाइल में। इसलिए उन्होंने आसान रास्ता चुना , जो अच्छा कर रहा है उसका काम बिगाड़ दो। स्वयं दीपक न जला सको तो कम से कम दूसरे का बुझा दो , इससे उनकी आत्मा को एक विचित्र प्रकार का आनंद मिलता है , जिसे आधुनिक मनोविज्ञान “कुंठा” कहता है और हमारी दादी इसे “जली-कटी प्रवृत्ति” बतलाती हैं।

समाज बदला , युग बदले , वेशभूषा बदली पर असुरों की आत्मा आज भी सक्रिय है। फर्क केवल इतना है कि पहले वे राक्षस कहलाते थे , अब “प्रभावशाली व्यक्ति”, “स्थानीय तत्व”, “सोशल मीडिया विशेषज्ञ” और “बिना मांगे सलाहकार” जैसे सम्मानजनक नामों से पुकारे जाते हैं।

उदाहरण के लिए - आप किसी मोहल्ले में पुस्तकालय खोलने का प्रयास कीजिए तुरंत एक सज्जन प्रकट होंगे जो कहेंगे - “आजकल कौन पढ़ता है ? यहाँ जिम खोलो , लड़के सुधरेंगे।” यदि आप जिम खोल दें , तो वही महापुरुष अगले दिन कहेंगे - “इससे क्या होगा ? बच्चों को संस्कार चाहिए” और यदि आपने संस्कार शिविर लगाए , तो वे फुसफुसाएँगे - “इसमें जरूर कोई फंड का खेल है।” उनका लक्ष्य समाधान नहीं , संदेह होता है।

यदि कोई व्यक्ति गरीब बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा का अभियान चलाए , तो कुछ लोग इतने दुखी हो जाते हैं मानो उनकी निजी संपत्ति लुट गई हो। वे तुरंत पूछेंगे - “इतना परोपकार क्यों ? जरूर चुनाव लड़ने का इरादा है।” उन्हें यह स्वीकार ही नहीं कि कोई बिना स्वार्थ भी अच्छा काम कर सकता है। क्योंकि वे स्वयं ऐसा कर नहीं सकते , इसलिए उन्हें दूसरों की सदाशयता भी षड्यंत्र लगती है।

यदि कोई व्यक्ति आगे आकर समाज की गरीब कन्याओं के हाथ पीले करने के लिए सामूहिक कन्या विवाह महायज्ञ जैसा आयोजन करता है और समान विचार के सहयोगियों को सम्मान देता है , तब कुंठाग्रस्त ईर्ष्यालु कहेगा कि जब मैं खुद सम्मानित हूं तो सबको क्यों सम्मान दिया जा रहा है।

ऐसे लोग प्रत्येक समाज , प्रत्येक संस्था , प्रत्येक परिवार और प्रत्येक व्हाट्सऐप ग्रुप में भी पाए जाते हैं। यदि आप किसी बैठक में समाधान प्रस्तुत करें , वे समस्या का नया संस्करण लेकर आएँगे। यदि आप शांति की बात करें तो वे पुरानी दुश्मनियों की फाइल खोल देंगे। यदि आप किसी की प्रशंसा करें तो वे तुरंत कहेंगे - “आप उसकी असलियत नहीं जानते।”

वास्तव में इनका जीवन-दर्शन बड़ा सरल है , “यदि हम ऊँचे नहीं उठ सकते , तो कम से कम दूसरों को नीचे तो खींच ही सकते हैं।” यह दर्शन केकड़ों से प्रेरित प्रतीत होता है , जो बाल्टी में चढ़ते साथी को नीचे खींचकर सामूहिक समानता स्थापित करते हैं।

विडंबना यह है कि ऐसे दुर्जन स्वयं को समाज का सबसे बड़ा हितैषी मानते हैं। वे हर अच्छे काम में बाधा डालकर सोचते हैं कि उन्होंने बहुत बड़ा बौद्धिक योगदान दिया है। जैसे कोई व्यक्ति विवाह में जाकर जनरेटर की तार काट दे और फिर गर्व से कहे कि “मैंने तो व्यवस्था की कमजोरियाँ उजागर की हैं।”

सज्जनों की कठिनाई यह है कि वे सेवा के काम में लगे रहते हैं , दुर्जनों की सुविधा यह है कि उनके पास कोई काम ही नहीं होता , इसलिए वे दूसरों के काम डालने में लग जाते हैं। यही कारण है कि इतिहास में राम को रावण से लड़ना पड़ा , कृष्ण को कंस वध करना पड़ा और आज किसी कर्मशील व्यक्ति को अपने ही समूह के “कर्महीन नर” से।

फिर भी आशा का आधार यही है कि यज्ञ अंततः पूर्ण होते हैं। ताड़का मारी जाती है , सुबाहु भागता है , रावण का अंत होता है। सज्जनों का कार्य कठिन अवश्य होता है , पर निष्फल नहीं। असुरों का शोर कुछ समय तक भय पैदा कर सकता है , पर सृजन की अग्नि अंततः अधिक प्रबल होती है।

इसलिए जब भी कोई आपके अच्छे कार्य में बाधा उत्पन्न करने की कोशिश करे तो निराश मत होइए। निश्चित मान लीजिए कि आपका यज्ञ सही दिशा में है। क्योंकि जहाँ कोई विघ्न नहीं , वहाँ शायद कोई बड़ा काम भी नहीं हो रहा। राक्षसों की उपस्थिति कभी-कभी इस बात का प्रमाण होती है कि अग्निकुंड सचमुच प्रज्वलित है।

बस ध्यान इतना रहे ! हम स्वयं यज्ञ करने वाले बनें , यज्ञ भंग करने वाले नहीं। इतिहास में देवताओं को पूजा गया है और राक्षसों को केवल उदाहरण के रूप में याद किया गया है , वह भी बुरे उदाहरण के रूप में।

परमात्मा सभी को सद्बुद्धि , सद्प्रेरणा और सदमार्ग प्रदान करें।
😃
🙏🌹

गंगा दशहरा शास्त्र सम्मत रूप से 25 मई 2026 , सोमवार को मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशम...
06/05/2026

गंगा दशहरा शास्त्र सम्मत रूप से 25 मई 2026 , सोमवार को मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को हस्त नक्षत्र में मां गंगा धरती पर अवतरित हुई थीं। उदया तिथि की गणना के अनुसार सोमवार 25 मई को दशमी तिथि व्याप्त है , इसलिए स्नान दान का मुख्य पर्व और श्री हाथीवान जी महाराज बरहा धाम का गंगा दशहरा मेला और भण्डारा इसी दिन सम्पन्न होगा।

श्रीपण्डोखर सरकार धाम में आगामी अमावस्या पर्व शनिवार 16 मई 2026 स्नानदान श्राद्ध अमावस्या से रविवार 31 मई 2026 स्नानदान ...
06/05/2026

श्रीपण्डोखर सरकार धाम में आगामी अमावस्या पर्व शनिवार 16 मई 2026 स्नानदान श्राद्ध अमावस्या से रविवार 31 मई 2026 स्नानदान पूर्णिमा तक सम्पन्न होगा।
#विशेष अर्जी 365 दिनों में कभी भी लगाकर टोकन ले सकते हैं।
#आग्रह अमावस्या की पेशी (हाजिरी) अमावस्या से पूर्णिमा तक ही करें।
#श्रीहाथीवान_जी_महाराज_बरहा_धाम_मेला "गंगा दशहरा" (सोमवार 25 मई 2026) की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं।
श्रीपण्डोखर सरकार आपके समस्त मनोरथ पूर्ण करें।💐 #शुभेच्छु मुकेश कुमार गुप्ता (सागर)

With HIIMS – I just got recognized as one of their top fans! 🎉
05/05/2026

With HIIMS – I just got recognized as one of their top fans! 🎉

पश्चिम बंगाल, असम एवं पुदुच्चेरी विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक विजयश्री पर समर्पित, कर्मठ और देवतु...
04/05/2026

पश्चिम बंगाल, असम एवं पुदुच्चेरी विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक विजयश्री पर समर्पित, कर्मठ और देवतुल्य सभी कार्यकर्ताओं को कोटिशः अभिनंदन , हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ। 💐

यह विजय केवल एक राजनीतिक सफलता नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा , संगठननिष्ठा , जनविश्वास और अथक परिश्रम का उज्ज्वल प्रमाण है। प्रत्येक कार्यकर्ता की तपस्या , समर्पण और संघर्ष ने इस गौरवपूर्ण उपलब्धि को संभव बनाया है।

आप सभी का परिश्रम ऐसे ही राष्ट्रहित , जनकल्याण और संगठन सशक्तिकरण के पथ पर निरंतर प्रेरणास्रोत बना रहे , इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ पुनः हार्दिक बधाई।

🇮🇳 भारतमाता की जय ! वंदे मातरम्! 🇮🇳

पश्चिम बंगाल चुनाव की मतगणना के रुझानों में भारतीय जनता पार्टी को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। यदि यह जनादेश विजय में बदल...
04/05/2026

पश्चिम बंगाल चुनाव की मतगणना के रुझानों में भारतीय जनता पार्टी को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। यदि यह जनादेश विजय में बदलता है , तो यह लोकतंत्र , विकास और सुशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। आपके नेतृत्व , संकल्प और राष्ट्रहित की सोच पर जनता का विश्वास निरंतर मजबूत हो रहा है।
आशा है कि पश्चिम बंगाल भी विकास , शांति और समृद्धि के नए युग में प्रवेश करेगा।
🇮🇳 जय हिंद 🇮🇳

जो समाज अपने नेतृत्वकर्ताओं पर आँखें मूंदकर विश्वास कर लेता है और उनके गलत निर्णयों का समय रहते प्रतिकार नहीं करता , वह ...
03/05/2026

जो समाज अपने नेतृत्वकर्ताओं पर आँखें मूंदकर विश्वास कर लेता है और उनके गलत निर्णयों का समय रहते प्रतिकार नहीं करता , वह धीरे-धीरे अपनी प्रगति की दिशा खो देता है।

नेतृत्व का अर्थ केवल आदेश देना नहीं , बल्कि समाज के हित में सही निर्णय लेना , पारदर्शिता बनाए रखना और उत्तरदायित्व निभाना है। जब समाज बिना प्रश्न किए हर निर्णय को स्वीकार कर लेता है , तब नेतृत्व जवाबदेही से दूर होने लगता है। यही स्थिति अन्याय , पक्षपात , भ्रष्टाचार और सामूहिक पतन का कारण बनती है।

सजग समाज वही है जो अपने नेतृत्व का सम्मान भी करता है और आवश्यक होने पर प्रश्न भी पूछता है। विरोध हमेशा विद्रोह नहीं होता , कई बार वह सुधार का सबसे सशक्त माध्यम भी होता है। मौन समर्थन यदि गलत दिशा में दिया जाए , तो वह पूरे समुदाय के भविष्य को प्रभावित कर सकता है।

इतिहास गवाह है कि जिन समाजों ने विचार , संवाद और प्रतिरोध की संस्कृति को जीवित रखा है , वे आगे बढ़े हैं और जिन्होंने अंध-समर्थन को अपनाया , वे ठहराव और पतन का शिकार हुए हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम व्यक्ति-पूजा नहीं , सिद्धांत-पूजा करें। पद नहीं , पात्रता देखें और भावनाओं से नहीं , विवेक के आधार पर निर्णय लें।

समाज की वास्तविक उन्नति तब होती है , जब जनता जागरूक हो , नेतृत्व उत्तरदायी हो , और सत्य बोलने का साहस जीवित हो।

अतः अंधविश्वास नहीं , जागरूक सहभागिता ही समृद्ध समाज की पहचान है।

समाज का भविष्य युवा पीढ़ी पर निर्भर है : सेवा , संस्कार और सम्मान का समन्वय जरूरी है।समाज की उन्नति केवल आर्थिक प्रगति स...
01/05/2026

समाज का भविष्य युवा पीढ़ी पर निर्भर है : सेवा , संस्कार और सम्मान का समन्वय जरूरी है।
समाज की उन्नति केवल आर्थिक प्रगति से नहीं होती , बल्कि उसके नैतिक मूल्यों , संस्कारों और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना से होती है। किसी भी समाज का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी पर निर्भर करता है। यदि युवाओं को सही दिशा , उचित संस्कार और सेवा-भाव की प्रेरणा मिले तो वे समाज को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकते हैं। किन्तु यदि समाज के ही तथाकथित समाजसेवक उन्हें छल , कपट , अय्यारी , स्वार्थ और अहंकार का मार्ग दिखाने लगें तो यह समाज के लिए अत्यंत चिंताजनक स्थिति बन जाती है।

आज समाज में यह देखने को मिलता है कि कुछ लोग समाजसेवा के नाम पर केवल व्यक्तिगत प्रतिष्ठा , पद , प्रभाव और स्वार्थ की पूर्ति में लगे हुए हैं। वे सेवा नहीं , बल्कि नेतृत्व की होड़ में लगे दिखाई देते हैं। ऐसे लोग युवा पीढ़ी को यह संदेश देते हैं कि समाजसेवा का उद्देश्य लोककल्याण नहीं , बल्कि स्वयं को समाज का अगुआ सिद्ध करना है। जब युवा यह देखते हैं कि बुजुर्गों के सम्मान को दरकिनार कर , परंपराओं को तोड़कर और छल-कपट करके भी समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त की जा सकती है तो उनके मन में वास्तविक सेवा-भाव कमजोर पड़ने लगता है।

समाजसेवा का वास्तविक अर्थ निःस्वार्थ भाव , दया , करुणा , समर्पण और विनम्रता है। यह दिखावे का विषय नहीं , बल्कि आत्मा की पुकार है। सच्चा समाजसेवक वही है , जो बिना किसी स्वार्थ के समाज के दुख-दर्द को अपना समझे , पीड़ितों की सहायता करे , बुजुर्गों का सम्मान करे और समाज की परंपराओं व मर्यादाओं को बनाए रखते हुए कार्य करे। सेवा का मार्ग त्याग मांगता है , प्रतिष्ठा नहीं। वह समर्पण मांगता है , अहंकार नहीं।

बड़े-बुजुर्ग किसी भी समाज की जड़ होते हैं। उनका अनुभव , उनका आशीर्वाद और उनकी जीवन दृष्टि समाज को स्थिरता प्रदान करती है। जो युवा अपने बुजुर्गों का सम्मान करना नहीं सीखता , वह समाज की वास्तविक गरिमा को कभी नहीं समझ सकता। यदि नई पीढ़ी को यह शिक्षा दी जाए कि प्रगति का अर्थ केवल आगे बढ़ना नहीं , बल्कि अपने संस्कारों और मूल्यों को साथ लेकर चलना है , तभी समाज का संतुलित विकास संभव होगा।

युवाओं को यह समझाना आवश्यक है कि समाजसेवा केवल मंचों पर भाषण देने , फोटो खिंचवाने या पद प्राप्त करने का माध्यम नहीं है। यह एक जिम्मेदारी है , जो व्यक्ति को भीतर से संवेदनशील और परिपक्व बनाती है। उन्हें यह सीख देनी होगी कि सेवा में विनम्रता हो , नेतृत्व में मर्यादा हो , और प्रगति में संस्कार हों।

अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज के वरिष्ठजन , शिक्षक , अभिभावक और सच्चे समाजसेवक मिलकर युवा पीढ़ी को सही दिशा दें। उन्हें सेवा और समर्पण का वास्तविक अर्थ समझाएँ। यह सुनिश्चित करें कि वे समाज की परंपराओं , मान-मर्यादाओं और बड़े-बुजुर्गों के सम्मान को सर्वोपरि मानते हुए समाज सेवा के पथ पर आगे बढ़ें।
यदि युवा पीढ़ी सेवा को स्वार्थ नहीं बल्कि धर्म मानेगी , सम्मान को कमजोरी नहीं बल्कि संस्कार समझेगी और समाजसेवा को प्रदर्शन नहीं बल्कि कर्तव्य मानेगी तभी एक स्वस्थ , सशक्त और संस्कारित समाज का निर्माण संभव होगा।

यह विषय वास्तव में अत्यंत गंभीर और विचारणीय है। समाज का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम आज अपने युवाओं को क्या सिखा रहे हैं ! अहंकार या आदर , स्वार्थ या सेवा , छल या चरित्र। सही चुनाव ही उज्ज्वल समाज की नींव रखेगा।
🌹 आपका प्रतिपल मंगलमय हो। 🌹

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