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कभी मुसलमान, कभी 'दलित', कभी 'किसान' : कौन हैं ये नए बहानों से आग लगाने वालेजिहादी, नक्सल और किसानवेशधारी आंदोलनकारियों ...
06/10/2021

कभी मुसलमान, कभी 'दलित', कभी 'किसान' : कौन हैं ये नए बहानों से आग लगाने वाले

जिहादी, नक्सल और किसानवेशधारी आंदोलनकारियों में क्या समानता है ? तीनों रक्त पिपासू हैं. कट्टरपंथी हैं. व्यवस्था विध्वंसक हैं. लखीमपुर खीरी में जो रक्त-पात हुआ. चाहे किसी का भी हुआ, क्या वो होता, अगर सड़क पर किसानवेशधारी खालिस्तानी, जिहादी और नक्सलियों का गठजोड़ न होता.

जिहादी, नक्सल और किसानवेशधारी आंदोलनकारियों में क्या समानता है ? तीनों रक्त पिपासू हैं. कट्टरपंथी हैं. व्यवस्था विध्वंसक हैं. लखीमपुर खीरी में जो रक्त-पात हुआ. चाहे किसी का भी हुआ, क्या वो होता, अगर सड़क पर किसानवेशधारी खालिस्तानी, जिहादी और नक्सलियों का गठजोड़ न होता. जिहादी, नक्सल और विभिन्न वेश धरने वाले इन आंदोलनजीवियों ने कभी नागरिकता संशोधन कानून के नाम पर आग लगाई, तो कभी एससी—एसटी एक्ट के नाम पर. ये भीमा कोरेगांव में भी होते हैं और हाथरस रेप कांड में भी. अब यह पूछने का समय आ गया है कि आखिर इनका इलाज क्या है. क्या देश का पूरा विपक्ष जिहादी, नक्सल, आंदोलनजीवियों, ईसाई मिशनरी और सबसे अंत में इनके पीछे छिपी पाकिस्तान और चीन जैसी विदेशी ताकतों के हाथ का खिलौना बन गया है.

लखीमपुर खीरी का जो घटनाक्रम सामने आ रहा है, वह एक सुनियोजित साजिश की ओर इशारा कर रहा है. जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश चुनाव की ओर बढ़ रहा है, इस्लामाबाद, बीजिंग ही नहीं, इनके फंड पर जीने वाली देशव्यापी विध्वंसक शक्तियां बेचैन हो उठी हैं. असल में उत्तर प्रदेश पिछले साढ़े चार साल में कायाकल्प से गुजरा है. अब यह निवेश का सबसे पसंदीदा लक्ष्य हो गया है. प्रदेश की अर्थव्यवस्था देश के शीर्ष पर पहुंचने की ओर लपक रही है. एक्सप्रेस वे और हाईवे के जाल ने प्रदेश के सुदूर कोनों में विकास की लौ पहुंचा दी है. माफिया पर या तो पुलिस टूट पड़ी है या फिर बुलडोजर गरज रहा है. कुल मिलाकर साढ़े चार साल का सुशासन योगी आदित्यनाथ को एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की पहली पसंद बना चुका है. देश को सबसे ज्यादा सांसद देने वाला उत्तर प्रदेश अगर इसी रफ्तार से आगे बढ़ा, तो विभाजनकारी ताकतों का अस्तित्व यहां समाप्त हो जाएगा. अंतिम सांसें ले रही कांग्रेस, पार्टी जिंदा रखने के लिए फड़ाफड़ा रही समाजवादी पार्टी, अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ती बहुजन समाज पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश का अमन और विकास जहर का काम कर रहा है. ऐसे में उत्तर प्रदेश में आग लगाने के लिए प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, मायावती, असद्दुदीन औवेसी और इनके पीछे छिपे जिहादी, नक्सली और आंदोलनजीवी पेट्रोल का केन लिए घूम रहे हैं.

पहले जरा लखीमपुर खीरी के घटनाक्रम पर गौर कीजिए. सांसद अजय मिश्र टेनी के पिता की जयंती पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया. यह खेल संबंधित कार्यक्रम था. उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को इस कार्यक्रम में आना था. लेकिन बीच में कुछ तत्व घुस आए. ये कौन हैं. ये किसान हैं. जी नहीं. तराई का ये इलाका पंजाब आतंकवाद के समय भी सुलगा था. इस पूरे इलाके में बड़े जमीदारों के हाथ में सारी फसलें, मंडियां और कृषि उत्पादों के रेट हैं. पंजाब में अगर धुआं उठता है, तो तराई का ये इलाका बेवजह गर्माहट महसूस करने लगता है. नेपाल सीमा से सटे इस इलाके में न तो हथियारों की कमी है और न ही ड्रग्स की. दिल्ली बॉर्डर को जिस समय खालिस्तानियों ने घेरा, उस समय से लखीमपुर खीरी सुलग रहा है. भिंडरावाला के पोस्टर लेकर रैलियां यहां भी निकलीं. जाम यहां भी लगाए गए. लेकिन दिल्ली बार्डर की नौटंकी के चलते न तो इऩ्हें ज्यादा एक्सपोजर मिला और न ही ये लाल किले पर कब्जे जैसी किसी बड़ी हरकत को अंजाम दे पाए. पाकिस्तान, कनाडा में बैठे इस इलाके के कथित किसानों पर पिछले कुछ समय से भारी दबाव था. बस ये मौके की तलाश में थे. मौका इन्हें सांसद के कार्यक्रम के रूप में मिला.

हैलीपेड से कार्यक्रम स्थल का जो रूट था, उस पर मौजूद एक गुरुद्वारे के पास ये कथित किसान और इनकी मदद के लिए नेपाल से लेकर दिल्ली बॉर्डर तक से विध्वंसक तत्व पहुंचे हुए थे. वीडियो साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक घटना की शुरुआत उस समय हुई, जब यहां से गुजरती भाजपा कार्यकर्ताओं की एक जीप पर हमला किया गया. प्रदर्शनकारी इस जीप पर जा चढ़े और हमला बोल दिया. घबराहट में जीप बेकाबू हुई और कुछ लोग इसकी चपेट में आए. इसके बाद इन कथित भोले-भाले किसान प्रदर्शनकारियों ने ढूंढकर भाजपा से जुड़े लोगों की लिंचिंग की. लिंचिंग के इतने डरावने वीडियो मौजूद हैं कि तमाम सोशल साइट्स इन्हें बिना चेतावनी के आपको देखने की इजाजत नहीं देंगी. एक ड्राइवर को तो जबरन सांसद के बेटे का नाम लेने के लिए पीटा जा रहा था. जब इसने नाम नहीं लिया, तो इसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. एक पत्रकार चपेट में आया, क्योंकि उसने इस लिंचिंग और घटनाक्रम की शुरुआत के कुछ वीडियो बना लिए थे.

इस रक्तपात में कुल आठ लोगों की मौत हुई है. और मौत विध्वंसक और विभाजनकारियों के लिए उत्सव का अवसर होती है. कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी रात में ही लखीमपुर खीरी जाने के लिए बेताब हो उठीं. अखिलेश यादव को सुबह होने का इंतजार न हो सका. होड़ लग गई. औवेसी निकल पड़े. तेजस्वी यादव को नेपाल सीमा की तराई पर इस इलाके में जाने की न जाने क्या ललक पैदा हुई. इसे भारत की राजनीति का शव पर्यटन कह सकते हैं. ये विभाजक मंडली लाशों के इंतजार में बैठी रहती है. इन रक्त पिपासा सिलेक्टिव (स्वादानुसार) है. भाजपा शासित और इस समय तो उत्तर प्रदेश में ये किसी भी घटना को लपकने के लिए स्लिप (क्रिकेट में विकेटकीपर के बराबर वाली पोजिशन) के फील्डर की तैयार खड़े हैं.

2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने से इन्हें सदमा लगा. फिर उत्तर प्रदेश में 2017 में प्रचंड बहुमत के साथ योगी आदित्यनाथ के हाथ में कमान आई, तो ये अवाक रह गए. 2019 में जब दोबारा केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार और ज्यादा बहुमत के साथ सत्तासीन हुई, तो ये कोमा में चले गए. इनकी बेचैनी इसलिए ज्यादा है कि उत्तर प्रदेश में फिर योगी आदित्यनाथ सुशासन की नैया पर सवार होकर दूसरी पारी खेलने की तैयारी कर रहे हैं. एनआरसी और सीएए के नाम पर इन्होंने मुसलमानों को भड़काया कि उनकी नागरिकता जाने वाली है. शाहीन बाग और जामिया से शुरू होकर आखिरकार इन्होंने दिल्ली में आग लगा दी. उत्तर प्रदेश तब भी इनकी तमाम कोशिशों के बावजूद योगी की सख्ती के चलते न सुलग सका. अनुसूचित समुदाय को भड़काने की कोशिश की कि एससी—एसटी एक्ट खत्म किया जा रहा है. लेकिन केंद्र सरकार की प्रोएक्टिव पॉलिसी के कारण इसमें भी नाकाम रहे. फिर कृषि सुधारों के लिए बनाए गए तीन कानूनों के नाम पर इन्होंने किसानों को डराने की कोशिश की कि उनकी जमीन छीन ली जाएगी. इस खेल में खालिस्तानी, जिहादी, नक्सली ताकतों ने पूरा जोर लगाया. 26 जनवरी, 2021 को देश ने इन दंगाइयों का असली रूप देखा. दिल्ली को रौंदा, लाल किले की गरिमा को तार-तार किया गया. पंजाब के चंद आढ़तियों और राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव जैसे फुंके हुए कारतूसों के अलावा यह आंदोलन कहीं न पहुंच सका.

किसानों के बीच आंदोलन की आंच न पहुंच सकी. वजह मोदी पर भरोसा. किसान कैसे मान लें कि जो प्रधानमंत्री सीधे उनके खाते में सम्मान निधि पहुंचा रहा है, वह उनकी जमीन छीन लेगा. किसानों के नाम पर शोर मचाने वाले इस तथ्य को कैसे झुठला सकते हैं कि किसान सम्मान निधि का सालाना खर्च 75 हजार करोड़ रुपये है. साढ़े 11 करोड़ से ज्यादा किसानों के खाते में सीधे सालाना छह हजार रुपये पहुंचते हैं. दिल्ली बॉर्डर पर धरने के नाम पर मानसिक और भौतिक अय्याशी कर रहे इन कथित किसानों के लिए ये 6000 रुपये एक शाम का खर्च हो सकते हैं, लेकिन लघु और सीमांत किसानों के लिए यह बहुत बड़ी मदद है. फिलहाल उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने लखीमपुर खीरी में मारे जाने वालों को तमाम किस्म की मदद का ऐलान किया है. किसानों और सरकार के बीच समझौता हो गया है. लेकिन आग लगाने वाली ताकतें इस बुझती आग को हवा देने की कोशिश जारी रखेंगी.

किसानों पर मेहरबान मोदी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के मुताबिक देश के किसानों के लिए 75,100 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. सरकार ने वित्त वर्ष 2021-22 में कृषि ऋृण लक्ष्य को बढ़ाकर 16.5 लाख करोड़ रुपये करने की भी घोषणा की. गेहूं की खरीद पर 2013-14 में किसानों को 33,874 करोड़ रुपये दिये गये थे, जो बढ़कर 2019-20 में 62,802 करोड़ रुपये पर पहुंच गया.2020-21 में किसानों को 75 हजार करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया है. जिन किसानों को लाभ हुआ है, उनकी संख्या भी 2019-20 के 35.57 लाख से बढ़कर 2020-21 में 43.36 लाख पर पहुंच गयी.धान की खरीद पर किसानों को 2013-14 में 63,928 करोड़ रुपये दिये गये थे. यह मोदीराज में बढ़कर 2019-20 में 1,41,930 करोड़ रुपये हो गया.2020-21 में यह और बेहतर हुआ तथा इसके बढ़कर 1,72,752 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है.लाभ पाने वाले धान किसानों की संख्या 2019-20 के 1.2 करोड़ से बढ़कर 2020-21 में 1.54 करोड़ पर पहुंच गयी.दालों के मामले में किसानों को 2013-14 में 236 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था. यह बढ़कर 2019-20 में 8,285 करोड़ रुपये और 2020-21 में 10,530 करोड़ रुपये पर पहुंच गया.यह 2013-14 की तुलना में 40 गुना से अधिक की वृद्धि है. इसी तरह कपास के किसानों को भुगतान 2013-14 में 90 करोड़ रुपये रहा था, जो 2020-21 में 27 जनवरी तक बढ़कर 25,974 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है ।

जैसे जैसे मेरी उम्र में वृद्धि होती गई, मुझे समझ आती गई कि अगर मैं Rs. 300 की घड़ी पहनूं या Rs. 30000 की, दोनों समय एक ज...
15/09/2021

जैसे जैसे मेरी उम्र में वृद्धि होती गई, मुझे समझ आती गई कि अगर मैं Rs. 300 की घड़ी पहनूं या Rs. 30000 की, दोनों समय एक जैसा ही बताएंगी।

मेरे पास Rs. 300 का बैग हो या Rs. 30000 का, इसके अंदर के सामान में कोई परिवर्तन नहीं होंगा।

मैं 300 गज के मकान में रहूं या 3000 गज के मकान में, तन्हाई का एहसास एक जैसा ही होगा।

आख़िर में मुझे यह भी पता चला कि यदि मैं बिजनेस क्लास में यात्रा करूं या इक्नामी क्लास में, अपनी मंजिल पर उसी नियत समय पर ही पहुँचूँगा।

इसीलिए, अपने बच्चों को बहुत ज्यादा अमीर होने के लिए प्रोत्साहित मत करो बल्कि उन्हें यह सिखाओ कि वे खुश कैसे रह सकते हैं और जब बड़े हों, तो चीजों के महत्व को देखें, उसकी कीमत को नहीं।

फ्रांस के एक वाणिज्य मंत्री का कहना था -

ब्रांडेड चीजें व्यापारिक दुनिया का सबसे बड़ा झूठ होती हैं, जिनका असल उद्देश्य तो अमीरों की जेब से पैसा निकालना होता है, लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग लोग इससे बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं।

क्या यह आवश्यक है कि मैं Iphone लेकर चलूं फिरू, ताकि लोग मुझे बुद्धिमान और समझदार मानें??

क्या यह आवश्यक है कि मैं रोजाना Mac'd या KFC में खाऊँ ताकि लोग यह न समझें कि मैं कंजूस हूँ??

क्या यह आवश्यक है कि मैं प्रतिदिन Friends के साथ उठक-बैठक Downtown Cafe पर जाकर लगाया करूँ, ताकि लोग यह समझें कि मैं एक रईस परिवार से हूँ??

क्या यह आवश्यक है कि मैं Gucci, Lacoste, Adidas या Nike का ही पहनूं ताकि High Status वाला कहलाया जाऊँ??

क्या यह आवश्यक है कि मैं अपनी हर बात में दो चार अंग्रेजी शब्द शामिल करूँ ताकि सभ्य कहलाऊं??

क्या यह आवश्यक है कि मैं Adele या Rihanna को सुनूँ ताकि साबित कर सकूँ कि मैं विकसित हो चुका हूँ??

नहीं दोस्तों !!!

मेरे कपड़े तो आम दुकानों से खरीदे हुए होते हैं।
Friends के साथ किसी ढाबे पर भी बैठ जाता हूँ।

भूख लगे तो किसी ठेले से ले कर खाने में भी कोई अपमान नहीं समझता।

अपनी सीधी सादी भाषा में बोलता हूँ।

चाहूँ तो वह सब कर सकता हूँ जो ऊपर लिखा है।

लेकिन,

मैंने ऐसे लोग भी देखे हैं जो एक Branded जूतों की जोड़ी की कीमत में पूरे सप्ताह भर का राशन ले सकते हैं।

मैंने ऐसे परिवार भी देखे हैं जो मेरे एक Mac'd के बर्गर की कीमत में सारे घर का खाना बना सकते हैं।

बस मैंने यहाँ यह रहस्य पाया है कि बहुत सारा पैसा ही सब कुछ नहीं है, जो लोग किसी की बाहरी हालत से उसकी कीमत लगाते हैं, वह तुरंत अपना इलाज करवाएं।

मानव मूल की असली कीमत उसकी नैतिकता, व्यवहार, मेलजोल का तरीका, सहानुभूति और भाईचारा है, ना कि उसकी मौजूदा शक्ल और सूरत।

सूर्यास्त के समय एक बार सूर्य ने सबसे पूछा, मेरी अनुपस्थिति में मेरी जगह कौन कार्य करेगा??

समस्त विश्व में सन्नाटा छा गया। किसी के पास कोई उत्तर नहीं था। तभी कोने से एक आवाज आई।

दिये ने कहा - "मै हूं ना" मैं अपना पूरा प्रयास करुंगा।

आपकी सोच में ताकत और चमक होनी चाहिए। छोटा-बड़ा होने से फर्क नहीं पड़ता, सोच बड़ी होनी चाहिए। मन के भीतर एक दीप जलाएं और सदा मुस्कुराते रहें।

साभार

गुरुजी गोलवरकर जी की स्वयंसेवकों के साथ एक दुर्लभ तस्वीर..😍कभी थे अकेले हुए आज इतनेनही तब डरे तो भला अब डरेंगेविरोधों के...
31/08/2021

गुरुजी गोलवरकर जी की स्वयंसेवकों के साथ एक दुर्लभ तस्वीर..😍

कभी थे अकेले हुए आज इतने
नही तब डरे तो भला अब डरेंगे
विरोधों के सागर में चट्टान है हम
जो टकराएंगे मौत अपनी मरेंगे
लिया हाथ में ध्वज कभी न झुकेगा..🚩

संघ शक्ति युगे युगे..

जैसे हालात  #अफगानिस्तान में हैं हिंदुस्तान के इतिहास में कई दफा ऐसी ही स्थिति बनी, लेकिन हमारे पूर्वज कहीं भागे नहीं, व...
27/08/2021

जैसे हालात #अफगानिस्तान में हैं हिंदुस्तान के इतिहास में कई दफा ऐसी ही स्थिति बनी, लेकिन हमारे पूर्वज कहीं भागे नहीं, वो खूब लड़े और अपनी मातृभूमि के साथ ही रहे, इसकी वजह यही है कि समय-समय पर भारत में महाबली योद्धओं का निर्माण हुआ, जिनके दम पर हम लड़े भी और जीते भी। चाहे वो महाराणा प्रताप हों, शिवाजी महाराज हो, महारानी लक्ष्मी बाई या महाराज छत्रसाल और ना जाने ऐसे कितने अनगिनत नाम हैं जो भुला दिए गए।

जब कंधार के तत्तकालीन शासक अमीर अली खान पठान को  मजबूर हो कर जैसलमेर राज्य में शरण लेनी पड़ी। तब यहां के महारावल लूणकरण ...
26/08/2021

जब कंधार के तत्तकालीन शासक अमीर अली खान पठान को मजबूर हो कर जैसलमेर राज्य में शरण लेनी पड़ी। तब यहां के महारावल लूणकरण थे। वे महारावल जैतसिंह के जेष्ठ पुत्र होने के कारण उनके बाद यहां के शासक बने। वैसे उनकी कंधार के शासक अमीर अली खान पठान से पहले से ही मित्रता थी और विपत्ति के समय मित्र ही के काम आता है ये सोचते हुए उन्होंने सहर्ष अमीर अली खान पठान को जैसलमेर का राजकीय अतिथि स्वीकार कर लिया।

लम्बें समय से दुर्ग में रहते हुए अमीर अली खान पठान को किले की व्यवस्था और गुप्त मार्ग की सारी जानकारी मिल चुकी थी।उस के मन में किले को जीत कर जैसलमेर राज्य पर अधिकार करने का लालच आने लगा और वह षड्यंत्र रचते हुए सही समय की प्रतीक्षा करने लगा।इधर महारावल लूणकरण भाटी अपने मित्र अमीर अली खान पठान पर आंख मूंद कर पूरा विश्वास करते थे। वो स्वप्न में भी ये सोच नहीं सकते थे कि उनका मित्र कभी ऐसा कुछ करेगा।इधर राजकुमार मालदेव अपने कुछ मित्रों और सामंतों के साथ शिकार पर निकल पड़े।अमीर अली खान पठान बस इस मौके की ताक में ही था। उसने महारावल लूणकरण भाटी को संदेश भिजवाया की वो आज्ञा दे तो उनकी पर्दा नवीन बेगमें रानिवास में जाकर उनकी रानियों और राजपरिवार की महिलाओं से मिलना चाहती है।

फिर क्या होना था? वही जिसका अनुमान पूर्व से ही अमीर अली खान पठान को था। महारावल ने सहर्ष बेगमों को रानिवास में जाने की आज्ञा दे दी।इधर बहुत सारी पर्दे वाली पालकी दुर्ग के महल में प्रवेश करने लगी किन्तु अचानक महल के प्रहरियों को पालकियों के अंदर से भारी भरकम आवाजें सुनाई दीं तो उन्हें थोड़ा सा शक हुआ। उन्होंने एक पालकी का पर्दा हटा कर देखा तो वहां बेगमों की जगह दो-तीन सैनिक छिपे हुए थे।जब अचानक षड्यंत्र का भांडा फूटते ही वही पर आपस में मार-काट शुरू हो गई। दुर्ग में जिसके भी पास जो हथियार था वो लेकर महल की ओर महारावल और उनके परिवार की रक्षा के लिए दौड़ पडा। चारों ओर अफरा -तफरी मच गई किसी को भी अमीर अली खान पठान के इस विश्वासघात की पहले भनक तक नहीं थी।

कोलाहल सुनकर दुर्ग के सबसे ऊंचे बुर्ज पर बैठे प्रहरियों ने संकट के ढोल-नगाड़े बजाने शुरू कर दिए जिसकी घुर्राने की आवाज दस-दस कोश तक सुनाई देने लगी। महारावल ने रानिवास की सब महिलाओं को बुला कर अचानक आए हुए संकट के बारे में बताया। अब अमीर अली खान पठान से आमने-सामने युद्ध करने के सिवाय और कोई उपाय नहीं था। राजकुमार मालदेव और सांमत पता नहीं कब तक लौटेंगे। दुर्ग से बाहर निकलने के सारे मार्ग पहले ही बंद किए जा चुके थे। राजपरिवार की स्त्रियों को अपनी इज्जत बचाने के लिए जौहर के सिवाय कुछ और उपाय नहीं दिखाई दे रहा था। अचानक से किया गया आक्रमण बहुत ही भंयकर था और महल में जौहर के लिए लकड़ियां भी बहुत कम थी। इसलिए सब महिलाओं ने महारावल के सामने अपने अपने सिर आगे कर दियें और सदा सदा के लिए बलिदान हो गई।

महारावल केसरिया बाना पहन कर युद्ध करते हुए रणभूमि में बलिदान हो गए । महारावल लूणकरण भाटी को अपने परिवार सहित चार भाई, तीन पुत्रों के साथ को कई विश्वास पात्र वीरों को खो कर मित्रता की कीमत चुकानी पड़ी। इधर रण दुंन्दुभियों की आवाज सुनकर राजकुमार मालदेव दुर्ग की तरफ दौड़ पड़े।वे अपने सामंतों और सैनिकों को लेकर महल के गुप्त द्वार से किले में प्रवेश कर गए और अमीर अली खान पठान पर प्रचंड आक्रमण कर दिया।अमीर अली खान पठान को इस आक्रमण की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। अंत में उसे पकड़ लिया गया और चमड़े के बने कुड़िए में बंद करके दुर्ग के दक्षिणी बुर्ज पर तोप के मुंह पर बांध कर उड़ा दिया गया।

इतिहास की कई सैकड़ों ऐसी घटनाएं है जिससे हम वर्तमान में बहुत कुछ सीख सकते है। आज अफगान संकट को देखते हुए कई लोग ये कह रहे हैं हमें इन्हें यहां शरण देनी चाहिए, पर उससे क्या होगा? कल ये ही अगर यहां कहते हुए हमें दिखाई दे कि हिन्दुस्तान तुम्हारे बाप का नहीं तो हमे कोई आश्चर्य नहीं होना।

यह चित्र उन लोगों को देखना चाहिये जिन्हें लगता है धर्म कुछ नहीं। जो कहते हैं कि राममंदिर बनने से नौकरी मिलेगी क्या...? ह...
23/08/2021

यह चित्र उन लोगों को देखना चाहिये जिन्हें लगता है धर्म कुछ नहीं। जो कहते हैं कि राममंदिर बनने से नौकरी मिलेगी क्या...?
हिन्दु संस्कृति को बढ़ावा देने से हमें क्या फायदा होगा....?
यह तस्वीर उन लोगों को भी देखना चाहिये जो विदेशी एन.जी.ओ. और वामपंथी मीडिया के बहकावे में आकर CAA का विरोध कर रहे थे...

तस्वीर में दिखाई दे रहे सरदार जी अफगानिस्तान के सांसद नरिंदर सिंह खालसा हैं.....।
इनके पास किसी चीज की कमी नहीं थी...। धन-दौलत, इज्जत, रुतबा सबकुछ था। जितना चाहे प्याज खा सकते थे जितना चाहे पेट्रोल पी सकते थे फिर भी अपनी धरती छोड़कर भारत आ गए.... ऐसा क्यों किया इन्होंने...?

इसलिये कि वहाँ अब इनके लिये अपने धर्म के साथ जीना सम्भव नहीं था...।
मतलब जब दौलत और धर्म में से एक का चुनाव करना था, इन्होंने दौलत-शोहरत को ठोकर मार दिया।
चाहते तो बड़े आराम से कलमा पढ़कर, धर्म बदलकर, वहाँ रह सकते थे। पर इन्होंने ऐसा नहीं किया।
और हाँ, जिस नियम के तहत इन्हें भारत लाया गया उसे CAA कहते हैं।

सरदार नरिंदर सिंह और इनके जैसे दर्जनों परिवारों के लिए तो भारत है पर अगर भारत में भी ऐसी स्थिति बनी तो यहां के हिन्दू-सिखों के लिये कौन है.....?
सोंचियेगा जरूर...

19/08/2021
आप भी इन प्रश्नों पर विचार करें!१. जिस सम्राट के नाम के साथ संसार भर के इतिहासकार “महान” शब्द लगाते हैं;**२. जिस सम्राट ...
14/08/2021

आप भी इन प्रश्नों पर विचार करें!

१. जिस सम्राट के नाम के साथ संसार भर के इतिहासकार “महान” शब्द लगाते हैं;*

*२. जिस सम्राट का राज चिन्ह "अशोक चक्र" भारतीय अपने ध्वज में लगते हैंं;*

*३. जिस सम्राट का राज चिन्ह "चारमुखी शेर" को भारतीय राष्ट्रीय प्रतीक मानकर सरकार चलाते हैं, और "सत्यमेव जयते" को अपनाया है;*

*४. जिस देश में सेना का सबसे बड़ा युद्ध सम्मान सम्राट अशोक के नाम पर "अशोक चक्र" दिया जाता है;*

*५. जिस सम्राट से पहले या बाद में कभी कोई ऐसा राजा या सम्राट नहीं हुआ, जिसने अखंड भारत (आज का नेपाल, बांग्लादेश, पूरा भारत, पाकिस्तान, और अफगानिस्तान) जितने बड़े भूभाग पर एक-छत्र राज किया हो;*

*६. सम्राट अशोक के ही समय में २३ विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई, जिसमें तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला, कंधार आदि विश्वविद्यालय प्रमुख थे! इन्हीं विश्वविद्यालयों में विदेश से कई छात्र शिक्षा पाने भारत आया करते थे;*

*७. जिस सम्राट के शासन काल को विश्व के बुद्धिजीवी और इतिहासकार भारतीय इतिहास का सबसे स्वर्णिम काल मानते हैं;*

*८. जिस सम्राट के शासन काल में भारत विश्व गुरु था, सोने की चिड़िया था, जनता खुशहाल और भेदभाव-रहित थी;*

*९. जिस सम्राट के शासन काल में सबसे प्रख्यात महामार्ग "ग्रेड ट्रंक रोड" जैसे कई हाईवे बने, २,००० किलोमीटर लंबी पूरी सडक पर दोनों ओर पेड़ लगाये गए, सरायें बनायीं गईं, मानव तो मानव, पशुओं के लिए भी प्रथम बार चिकित्सा घर (हॉस्पिटल) खोले गए, पशुओं को मारना बंद करा दिया गया;*

*१०. ऐसे महान सम्राट अशोक, जिनकी जयंती उनके अपने देश भारत में क्यों नहीं मनायी जाती, न ही कोई छुट्टी घोषित की गई है? अफ़सोस जिन नागरिकों को ये जयंती मनानी चाहिए, वो नागरिक अपना इतिहास ही भुला बैठे हैं, और जो जानते हैं वो ना जाने क्यों मनाना नहीं चाहते;*

*१४ अप्रैल*
*जन्म वर्ष - ३०२ ई पू*
*राजतिलक - २६८ ई पू*
*देहावसान - २३२ ई पू*
*पिताजी का नाम - बिन्दुसार*
*माताजी का नाम - सुभद्राणी*

*११. "जो जीता वही चंद्रगुप्त" ना होकर "जो जीता वही सिकन्दर" कैसे हो गया…?*

*जबकि ये बात सभी जानते हैं कि सिकन्दर की सेना ने चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रभाव को देखते हुए ही लड़ने से मना कर दिया था! बहुत ही बुरी तरह से मनोबल टूट गया था! जिस कारण, सिकंदर ने मित्रता के तौर पर अपने सेनापति सेल्यूकस की पुत्री का विवाह चन्द्रगुप्त से रचाया था;*

*१२. महाराणा प्रताप ”महान” ना होकर ... अकबर ”महान” कैसे हो गया? जब महाराणा प्रताप ने अकेले अपने दम पर उस अकबर की लाखों की सेना को घुटनों पर ला दिया था;*

*१३. सवाई जय सिंह को “महान वास्तुप्रिय” राजा ना कहकर, शाहजहाँ को यह उपाधि किस आधार पर मिली?*

*१४. जो स्थान महान मराठा क्षत्रीय वीर शिवाजी को मिलना चाहिये, वो क्रूर और आतंकी औरंगज़ेब को क्यों और कैसे मिल गया?*

*१५. स्वामी विवेकानंद और आचार्य चाणक्य की जगह विदेशियों को भारत पर क्यों थोंप दी गई?*

*१६. यहाँ तक कि भारत का राष्ट्रीय गान भी संस्कृत के "वन्दे मातरम" की जगह "जन-गण-मन" हो गया! कब, कैसे और क्यों हो गया?*

*१७. और तो और, हमारे आराध्य भगवान् श्री राम, श्री कृष्ण तो इतिहास से कहाँ और कब गायब हो गये पता ही नहीं चला! आखिर कैसे?*

*१८. एक बानगी …. हमारे आराध्य भगवान श्री राम की जन्मभूमि पावन अयोध्या भी कब और कैसे विवादित बना दी गई, हमें पता तक नहीं चला;*

*१९. "गुरुकुल प्रथा" समाप्त कर, "जेहादी मदरसे" कब और क्यों कर आरंभ हो गए?*

*२०. ब्राह्मणों, पंडितों का तिरस्कार कर मौलवी कब प्रमुख हो गए, और हिन्दु मंदिरों का चढ़ावा उनको खैरात में बांट दिया गया! क्यों और किस के कहने पर!

पत्रकार आदिल फारूक को श्रीनगर के प्रेस एन्क्लेव के पास से दो हैंड ग्रेनेड के साथ रंगेहाथ गिरफ्तार किया गया है। ये टखनों ...
13/08/2021

पत्रकार आदिल फारूक को श्रीनगर के प्रेस एन्क्लेव के पास से दो हैंड ग्रेनेड के साथ रंगेहाथ गिरफ्तार किया गया है। ये टखनों से 4 इंच ऊपर जीन्स पहनता है। #विस्फोटक_पत्रकारिता

मुगल काल का सत्य जानना चाहते हो तो अफ़ग़ानिस्तान का वर्तमान देख लो ।मादर्च- मुगल
13/08/2021

मुगल काल का सत्य जानना चाहते हो
तो अफ़ग़ानिस्तान का वर्तमान देख लो ।
मादर्च- मुगल

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