08/01/2026
माशाअल्लाह
केवल चार महीने सत्रह दिनों में पवित्र क़ुरआन हिफ़्ज़ — सहारनपुर की बेटी ने क़ुरआनी इतिहास रच दिया
अल्लाह तआला का फ़ रमान है:
“और निश्चय ही हमने क़ुरआन को नसीहत के लिए आसान बना दिया है, तो क्या कोई है जो नसीहत हासिल करे?”(सूरह अल-क़मर)
इसी इलाही वादे की एक उजली और अमलन तस्वीर उत्तर प्रदेश के जनपद सहारनपुर के गाँव सीकरी खुर्द, चिलकाना रोड़ पर स्थित अज़ीम दीनी व तालीमी इदारा जामिया बाक़ियातुस्सालिहात लिल-बनात में देखने को मिली, जहाँ अल्लाह के ख़ास फ़ज़्ल व करम से एक नन्ही छात्रा ने ऐसा कारनामा अंजाम दिया जो पूरे इलाके के लिए फ़ख़्र और खुशी का कारण बन गया।
जामिया बाक़ियातुस्सालिहात लिल-बनात एक ऐसा दीनी मदरसा है जहाँ लड़कियों को दीनी तालीम के साथ-साथ असरी (आधुनिक) शिक्षा भी मुकम्मल फ़रागत तक दी जाती है। इसके साथ ही यहाँ हिफ़्ज़ व नाज़िरा क़ुरआन का एक मज़बूत, मुनज़्ज़म और बाअदब विभाग क़ायम है, जहाँ बच्चियों की दीनी तरबियत इख़लास, मेहनत और सुन्नत के मुताबिक की जाती है।
इसी इदारे की होनहार छात्रा कारी अब्दुल हसीब पैरागपुरी की भांजी अज़ीज़ा मरियम बिन्त हाजी जमशेद साहब सीकरी खुर्द ने अल्लाह के ख़ास फ़ज़्ल से मात्र चार महीने सत्रह दिनों की बहुत ही कम अवधि में न केवल आलिमा बनने की मंज़िल तय की, बल्कि पवित्र क़ुरआन को पूरा हिफ़्ज़ कर के इस आयत की अमली तफ़्सीर पेश कर दी कि जब क़ुरआन किसी के लिए आसान कर दिया जाए तो वक़्त की क़ैद बे-मानी हो जाती है।
नबी करीम ﷺ का इरशाद है:
“तुम में सबसे बेहतर वह है जो क़ुरआन सीखे और सिखाए।”(सहीह बुख़ारी)
यह अज़ीम सआदत सिर्फ़ छात्रा तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनकी उस्तानिया व मुरब्बिया मोहतरमा बिन्त शब्बीर मरहूम को भी नसीब हुई, जिन्होंने बेहद इख़लास, सब्र और लगातार मेहनत के साथ इस बच्ची को क़ुरआन हिफ़्ज़ कराया। उनकी इल्मी क़ाबिलियत, दीनी ज़ौक़ और मुख़लिसाना रहनुमाई इस शानदार कामयाबी की मज़बूत बुनियाद बनी, जो यक़ीनन हदीस-ए-नबवी ﷺ का ज़िंदा नमूना है।
हाफ़िज़-ए-क़ुरआन के बारे में रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“क़ुरआन वाले अल्लाह के ख़ास बंदे और उसके मुक़र्रब होते हैं।”(सुनन इब्न माजा)
इस शानदार कामयाबी पर जामिया के मुहतमिम जनाब मौलाना उबैदुर्रहमान साहब जामिई मज़ाहिरी, नाज़िम-ए-तालीमात जनाब क़ारी मुहम्मद शाहवेज़ साहब, तथा इदारे के तमाम उस्ताद व उस्तानियों ने अल्लाह तआला का शुक्र अदा किया और इस अज़्म का इज़हार किया कि यह इदारा आगे भी बच्चियों को दीनी व असरी तालीम से आरास्ता कर समाज को सालेह, बाअख़लाक़ और बाअिल्म नस्ल प्रदान करता रहेगा।
वास्तव में जामिया बाक़ियातुस्सालिहात लिल-बनात की यह अज़ीम कामयाबी इस हक़ीक़त की गवाही है कि जब नीयत ख़ालिस हो, मेहनत सुन्नत के मुताबिक हो और तालीम क़ुरआनी माहौल में दी जाए, तो कम समय में भी बड़े-बड़े करिश्मे सामने आते हैं। यह इदारा न केवल सहारनपुर बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए दीनी तालीम का एक रोशन मीनार बनता जा रहा l
मरगूब हसन AIMIM
उपाध्यक्ष
पश्चिम उत्तर प्रदेश
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