परम पूज्य श्री भगवती नवदुर्गा सन्तोषी महारानी माता जी का दरबार

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धर्म की जय हो ...अधर्म का विनाश हो प्राणीयों में सद्दभावना हो ...विश्व का कल्याण हो हर हर महादेव ....हर हर महादेव...हर हर महादेव सनातन धर्म की जय हो ...गोऊ माता की जय पुज्जेय माता -पिता की जय ....बोल सच्चे दरबार की जय श्री भगवती सन्तोषी माँ जी की जय भगवान गणपति को प्रथम पूज्य माना जाता है। संसार में भौतिक सफलता के लिए वे ही सबसे ज्यादा पूजे जाने वाले देवता है। अकेले भगवान गणपति की पूजन से हमें हर

तरह की सिद्धि मिल सकती है। गणपति का पूजन करते हैं तो हमें बुद्धि, शक्ति, कार्यकुशलता, धन लाभ आदि चीजें मिलती हैं जो संसार में सबसे ज्यादा आवश्यक हैं। गणपति के परिवार में दो पत्नियां और दो बेटों का जिक्र मिलता है। लेकिन एक और सदस्य भी, वे हैं गणपति की पुत्री संतोषी माता। क्या वाकई भगवान गणोश की कोई पुत्री भी थी। कई विद्वानों का मानना है कि संतोषी माता का अस्तित्व काल्पनिक है। पुराणों में कहीं भी संतोषी माता का जिक्र नहीं किया गया है, अगर कहीं कोई उल्लेख है तो वह भी बाद में शामिल किया जान पड़ता है। सवाल यह है कि अगर गणपति की कोई पुत्री नहीं थी तो फिर संतोषी माता कौन हैं? दरअसल इसके लिए हमें भगवान गणपति के पूरे परिवार को समझना होगा। भगवान गणपति बुद्धि, शक्ति और विद्या के दाता हैं, उनकी पत्नी हैं रिद्धि और सिद्धि। बल, बुद्धि और विद्या मिले तो हमें हर कार्य में सिद्धि मिलना आसान होती है, गणपति की पत्नी सिद्धि हमें कार्य में यही सिद्धि प्रदान करती हैं। रिद्धि का अर्थ है कुशलता को कायम रखना, मतलब सिद्धि से जो कुशलता हमें मिली है, उसे रिद्धि हमेशा सुरक्षित रखती है। मतलब गणपति की दोनों पत्नियां हमें जीवनभर के लिए कार्यकुशल बनाती हैं। दो पुत्र योग और क्षेम हैं। योग हमें आर्थिक लाभ देता है और क्षेम उस लाभ को हमेशा संरक्षित रखता है। इस तरह अगर हमारे पास आजीवन धन, कुशलता, बुद्धि और बल रहे तो फिर हम संतोषपूर्ण जीवन जी सकते हैं। गणपति के आराधकों को जीवन में ऐसे ही संतुष्टि मिलती है। बस इसी संतोष को गणपति की तीसरी संतान संतोषी माता माना गया है क्योंकि यह हमें संतुष्टि देती है। कुछ विद्वान इसे काल्पनिक तो कुछ इसे दार्शनिक मानते हैं।जिन श्री आदिपराशक्ति महाशक्ति श्रीराजराजेश्वरी भगवती पराम्बा से अनंत कोटी ब्रह्माण्ड प्रकट हुए हैं, जिन देवी से
महाकाली-महालक्ष्मी महासरस्वती प्रकट हुईं हैं, तथा जिन देवी ने ब्रह्मा, विष्णु व शिव को भी शरीर धारण कराया है, तथा जो आदिभगवती सभी कारणों की भी कारण हैं, उन्हीं आदिकुमारी श्री महादेवी को हम नमस्कार करते है 🙏🙏बालक अगर माँ की गोदी में जाय तो उसके लिये किसी विधि की जरुरत नहीं है वह तो अपनेपन के सम्बन्ध से ही माँ की गोदी में जाता है ऐसे ही परम पूज्य श्री भगवती नवदुर्गा सन्तोषी महारानी माता जी की प्राप्ति के लिये विधि, मन्त्र आदि की आवश्यकता नहीं है केवल अपनेपन के दृढ़ भाव की आवश्यकता है
परम पूज्य श्री भगवती नवदुर्गा सन्तोषी महारानी माता जीअपने भक्तों से बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाती है 🙏🙏मां भगवती का दरबार लाखो में एक इस जगत में जहा सुबह और शाम जय माता दी के जयकारे गूंजते है नसीबो ओर पीछे जन्म के अच्छे कर्म वाले ही इस स्वर्ग के दर्शन पाते है. मां भगवती सबको एक मौका दे इस स्वर्ग में आने का मेरी महारानी से यही अर्जी है🙏🏻नसीब का लिखा कोई मोड़ नही सकता अगर हो * माँ * पर भरोसा तो तुम्हारी तक़दीर का फल कोई तोड़ नहीं सकता... इस जहाँ में मिलती है * माँ * भक्ति तक़दीर से वर्ना हर कोई ये रिश्ता जोड़ नहीं सकता माता रानी सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करे बोलो सांचे दरबार की जय .*बोल सच्चे दरबार की जय*प्रेम से बोलो ~●~भगवती सन्तोषी माँ जी की जय जैसे मछली जल के बिना व्याकुल हो जाती है, ऐसे ही हम यदि जगत जननी जगदम्बा परम्बा भगवती माता के बिना व्याकुल हो जाये तो करूणामयी माँ दुर्गा शक्ति अपने भक्तों पर कृपा अवश्य करती है..जय माता दी 🌺🌺🙏🙏संतोषी माता व्रत फल संतोषी माता की अनुकम्पा से व्रत करने वाले स्त्री-पुरुषों की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। परीक्षा में सफलता, न्यायालय में विजय, व्यवसाय में लाभ और घर में सुख-समृद्धि का पुण्यफल प्राप्त होता है। अविवाहित लड़कियों को सुयोग्य वर शीघ्र मिलता है।परम पूज्य श्री आदि शक्ति राज राजेश्वरीश्री भगवती नवदुर्गा सन्तोषी महारानी माता जी का दरबार गांव ठाणा(मोहि) पोस्ट ऑफिस गोपालपुर तहसील सरकाघाट जिला मंडी हिमाचल प्रदेश बोलो जय जय श्री भगवती गौरी संतोषी मां देवभूमि हिमाचल प्रदेश *🇮🇳🙏🙏🙏🙏 🌹🌹🌹🌹ॐ श्री संतोषी महामाया गजानंदम दायिनी शुक्रवार प्रिये देवी नारायणी नमोस्तुते || 🌹🌹🌹🌹 🌼 मां संतोषी आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें आप सभी के जीवन में सुख शांति समृद्धि प्रदान करें II 🌹🌹🌹🌹🌹🌹

कज्जली (कजरी, सातुड़ी) तृतीया (तीज) 31 अगस्त विशेषभाद्र कृष्ण तृतीया तिथि को देश के कई भागों में कज्जली तीज का व्रत किया ...
31/08/2026

कज्जली (कजरी, सातुड़ी) तृतीया (तीज) 31 अगस्त विशेष
भाद्र कृष्ण तृतीया तिथि को देश के कई भागों में कज्जली तीज का व्रत किया जाता है। इस वर्ष कज्जली तीज 31 अगस्त सोमवार को है। अन्य तीज त्यौहारो की तरह इस तीज का भी अलग महत्त्व है. तीज एक ऐसा त्यौहार है जो शादीशुदा लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है. हमारे देश में शादी का बंधन सबसे अटूट माना जाता है. पति पत्नी के रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए तीज का व्रत रखा जाता है. दूसरी तीज की तरह यह भी हर सुहागन के लिए महत्वपूर्ण है. इस दिन भी पत्नी अपने पति की लम्बी उम्र के लिए व्रत रखती है, व कुआरी लड़की अच्छा वर पाने के लिए यह व्रत रखती है।
भविष्य पुराण में तृतीया तिथि की देवी माता पार्वती को बताया गया है। पुराण के तृतीया कल्प में बताया गया है कि यह व्रत महिलाओं को सौभाग्य, संतान एवं गृहस्थ जीवन का सुख प्रदान करने वाला है। इस व्रत को देवराज इंद्र की पत्नी शचि ने भी किया था जिससे उन्हें संतान सुख मिला। युधिष्ठिर को भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि भाद्र मास की कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को देवी पार्वती की पूजा सप्तधान्य से उनकी मूर्ति बनाकर करनी चाहिए। इस दिन देवी की पूजा दुर्गा रूप में होती है जो महिलाओं को सौंदर्य एवं पुरुषों को धन और बल प्रदान करने वाला है। देवी पार्वती को इस दिन गुड़ और आटे से मालपुआ बनाकर भोग लगाना चाहिए। इस व्रत में देवी पार्वती को शहद अर्पित करने का भी विधान है।
व्रत करने वाले को रात्रि में देवी पार्वती की तस्वीर अथवा मूर्ति के सामने की शयन करना चाहिए। अगले दिन अपनी इच्छा और क्षमता के अनुसार ब्राह्मण को दान दक्षिणा देना चाहिए। इस तरह कज्जली तीज करने से सदावर्त एवं बाजपेयी यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है। इस पुण्य से वर्षों तक स्वर्ग में आनंद पूर्वक रहने का अवसर प्राप्त होता है। अगले जन्म में व्रत से प्रभाव से संपन्न परिवार में जन्म मिलता है और जीवनसाथी का वियोग नहीं मिलता है।
कज्जली तीज व्रत मुहूर्त 2026
तृतीया तिथि प्रारम्भ - अगस्त 30 को 09:35 बजे
तृतीया तिथि समाप्त - अगस्त 31, को 08:49 बजे
कजली तीज नाम क्यों पड़ा?
पुराणों के अनुसार मध्य भारत में कजली नाम का एक वन था. इस जगह का राजा दादुरै था. इस जगह में रहने वाले लोग अपने स्थान कजली के नाम पर गीत गाते थे जिससे उनकी इस जगह का नाम चारों और फैले और सब इसे जाने. कुछ समय बाद राजा की म्रत्यु हो गई और उनकी रानी नागमती सती हो गई. जिससे वहां के लोग बहुत दुखी हुए और इसके बाद से कजली के गाने पति – पत्नी के जनम – जनम के साथ के लिए गाये जाने लगे।
इसके अलावा एक और कथा इस तीज से जुडी है. माता पार्वती शिव से शादी करना चाहती थी लेकिन शिव ने उनके सामने शर्त रख दी व बोला की अपनी भक्ति और प्यार को सिद्ध कर के दिखाओ. तब पार्वती ने 108 साल तक कठिन तपस्या की और शिव को प्रसन्न किया. शिव ने पार्वती से खुश होकर इसी तीज को उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकारा था. इसलिए इसे कजरी तीज कहते है. कहते है बड़ी तीज को सभी देवी देवता शिव पार्वती की पूजा करते है.
कजली तीज को निम्न तरह से मनाया जाता है।
इस दिन हर घर में झूला डाला जाता है. और औरतें इस में झूल कर अपनी ख़ुशी व्यक्त करती है।
इस दिन औरतें अपनी सहेलियों के साथ एक जगह इकट्ठी होती है और पूरा दिन नाच गाने मस्ती में बिताती है।
औरतें अपने पति के लिए व कुआरी लड़की अच्छे पति के लिए व्रत रखती है।
तीज का यह व्रत कजली गानों के बिना अधूरा है. गाँव में लोग इन गानों को ढोलक मंजीरे के साथ गाते है।
इस दिन गेहूं, जौ, चना और चावल के सत्तू में घी मिलाकर तरह तरह के पकवान बनाते है।
व्रत शाम को चंद्रोदय के बाद तोड़ते है, और ये पकवान खाकर ही व्रत तोड़ा जाता है
विशेषतौर पर गाय की पूजा होती है।
आटे की 7 रोटियां बनाकर उस पर गुड़ चना रखकर गाय को खिलाया जाता है. इसके बाद ही व्रत तोड़ते है।
कजरी कजली तीज पूजा सामग्री और विधि
सामग्री कजली तीज के लिए कुमकुम, काजल, मेहंदी, मौली, अगरबत्ती, दीपक, माचिस, चावल, कलश, फल, नीम की एक डाली, दूध, ओढ़नी, सत्तू, घी, तीज व्रत कथा बुक, तीज गीत बुक और कुछ सिक्के आदि पूजा सामग्री की आवश्यकता होती है।
तीज की पूजा विधि इस प्रकार हैं
पहले कुछ रेत जमा करें और उससे एक तालाब बनाये. यह ठीक से बना हुआ होना चाहिए ताकि इसमें डाला गया जाल लीक ना हो।
अब तालाब के किनारे मध्य में नीम की एक डाली को लगा दीजिये, और इसके ऊपर लाल रंग की ओढ़नी डाल दीजिये।
इसके बाद इसके पास गणेश जी और लक्ष्मी जी की प्रतिमा विराजमान कीजिये, जैसे की आप सभी जानते हैं इनके बिना कोई भी पूजा नहीं की जा सकती।
अब कलश के ऊपरी सिरे में मौली बाँध दीजिये और कलश पर स्वास्तिक बना लीजिये. कलश में कुमकुम और चावल के साथ सत्तू और गुड़ भी चढ़ाइए, साथ ही एक सिक्का भी चढ़ा दीजिये।
इसी तरह गणेश जी और लक्ष्मी जी को भी कुमकुम, चावल, सत्तू, गुड़, सिक्का और फल अर्पित कीजिये।
इसी तरह तीज पूजा अर्थात नीम की पूजा कीजिये, और सत्तू तीज माता को अर्पित कीजिये. इसके बाद दूध और पानी तालाब में डालिए।
विवाहित महिलाओं को तालाब के पास कुमकुम, मेंहदी और कजल के सात राउंड डॉट्स देना पड़ता है. साथ ही अविवाहित स्त्रियों को यह 16 बार देना होता है।
अब व्रत कथा शुरू करने से पहले अगरबत्ती और दीपक जला लीजिये. व्रत कथा को पूरा करने के बाद महिलाओं को तालाब में सभी चीजों जैसे सत्तू, फल, सिक्के और ओढ़नी का प्रतिबिंब देखने की जरूरत होती है, जोकि तीज माता को चढ़ाया गया था. इसके साथ ही वे उस तालाब में दीपक और अपने गहनों का भी प्रतिबिंब देखती हैं।
व्रत कथा खत्म हो जाने के बाद के कजरी गीत गाती हैं, और सभी माता तीज से प्रार्थना करती है. अब वे खड़े होकर तीज माता के चारों ओर तीन बार परिक्रमा करती हैं।
कजरी तीज की कथा
यहाँ बहुत सी कथाएं प्रचलित है. अलग- अलग स्थान में इसे अलग तरह से मनाते है इसलिए वहां की कथाएं भी अलग है. मै आपको कुछ प्रचलित कथाएं बता रहे है।
सात बेटों की कहानी
एक साहूकार था उसके सात बेटे थे. सतुदी तीज के दिन उसकी बड़ी बहु नीम के पेड़ की पूजा कर रही होती है तभी उसका पति मर जाता है. कुछ समय बाद उसके दुसरे बेटे की शादी होती है, उसकी बहु भी सतुदी तीज के नीम के पेड़ की पूजा कर रही होती है तभी उसका पति मर जाता है. इस तरह उस साहूकार के 6 बेटे मर जाते है. फिर सातवें बेटे की शादी होती है और सतुदी तीज के दिन उसकी पत्नी अपनी सास से कहती है कि वह आज नीम के पेड़ की जगह उसकी टहनी तोड़ कर उसकी पूजा करेगी. तब वह पूजा कर ही रही होती है कि साहूकार के सभी 6 बेटे अचानक वापस आ जाते है लेकिन वे किसी को दिखते नहीं है. तब वह अपनी सभी जेठानियों को बुला कर कहती है कि नीम के पेड़ की पूजा करो और पिंडा को काटो. तब वे सब बोलती है कि वे पूजा कैसे कर सकती है जबकि उनके पति यहाँ नहीं है. तब छोटी बहुत बताती है कि उन सब के पति जिंदा है. तब वे प्रसन्न होती है और नीम की टहनी की पूजा अपने पति के साथ मिल कर करती है. इसके बाद से सब जगह बात फ़ैल गई की इस तीज पर नीम के पेड़ की नहीं बल्कि उसकी टहनी की पूजा करनी चाहिए।
सत्तू की कहानी
एक किसान के 4 बेटे और बहुएं थी. उनमें से तीन बहुएं बहुत संपन्न परिवार से थी. लेकिन सबसे छोटी वाली गरीब थी और उसके मायके में कोई था भी नहीं . तीज का त्यौहार आया, और परंपरा के अनुसार तीनों बड़ी बहुओं के मायके से सत्तू आया लेकिन छोटी बहु के यहाँ से कुछ ना आया. तब वह इससे उदास हो गई और अपने पति के पास गई. पति ने उससे उदासी का कारण पुछा. उसने सब बताया और पति को सत्तू लेन के लिए कहा. उसका पति पूरा दिन भटकता रहा लेकिन उसे कहीं सफलता नहीं मिली. वह शाम को थक हार के घर आ गया. उसकी पत्नी को जब यह पता चला कि उसका पति कुछ ना लाया तब वह बहुत उदास हुई. अपनी पत्नी का उदास चेहरा देख चोंथा बेटा रात भर सो ना सका।
अगले दिन तीज थी जिस वजह से सत्तू लाना अभी जरुरी हो गया था. वह अपने बिस्तर से उठा और एक किरणे की दुकान में चोरी करने के इरादे से घुस गया. वहां वह चने की दाल लेकर उसे पीसने लागा, जिससे आवाज हुई और उस दुकान का मालिक उठ गया. उन्होंने उससे पुछा यहाँ क्या कर रहे हो? तब उसने अपनी पूरी गाथा उसे सुना दी. यह सुन बनिए का मन पलट गया और वह उससे कहने लगा कि तू अब घर जा, आज से तेरी पत्नी का मायका मेरा घर होगा. वह घर आकर सो गया।
अगले दिन सुबह सुबह ही बनिए ने अपने नौकर के हाथ 4 तरह के सत्तू, श्रृंगार व पूजा का सामान भेजा. यह देख छोटी बहुत खुश हो गई. उसकी सब जेठानी उससे पूछने लगी की उसे यह सब किसने भेजा. तब उसने उन्हें बताया की उसके धर्म पिता ने यह भिजवाया है. इस तरह भगवान ने उसकी सुनी और पूजा पूरी करवाई।

चाक्षुषी विद्या प्रयोग〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️नेत्ररोग होने पर भगवान सूर्यदेव की रामबाण उपासना है।इस अदभुत मंत्र से सभी नेत्ररोग आश्...
31/08/2026

चाक्षुषी विद्या प्रयोग
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नेत्ररोग होने पर भगवान सूर्यदेव की रामबाण उपासना है।
इस अदभुत मंत्र से सभी नेत्ररोग आश्चर्यजनक रीति से अत्यंत शीघ्रता से ठीक होते हैं। सैंकड़ों साधकों ने इसका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया है।
सभी नेत्र रोगियों के लिए चाक्षुषोपनिषद् प्राचीन ऋषि मुनियों का अमूल्य उपहार है। इस गुप्त धन का स्वतंत्र रूप से उपयोग करके अपना कल्याण करें।
शुभ तिथि के शुभ नक्षत्रवाले रविवार को इस उपनिषद् का पठन करना प्रारंभ करें। पुष्य नक्षत्र सहित रविवार हो तो वह रविवार कामनापूर्ति हेतु पठन करने के लिए सर्वोत्तम समझें। प्रत्येक दिन चाक्षुषोपनिषद् का कम से कम बारह बार पाठ करें। बारह रविवार (लगभग तीन महीने) पूर्ण होने तक यह पाठ करना होता है। रविवार के दिन भोजन में नमक नहीं लेना चाहिए।
प्रातःकाल उठें। स्नान आदि करके शुद्ध होवें। आँखें बन्द करके सूर्यदेव के सामने खड़े होकर भावना करें कि ‘मेरे सभी प्रकार के नेत्ररोग भी सूर्यदेव की कृपा से ठीक हो रहे हैं।’ लाल चन्दनमिश्रित जल ताँबे के पात्र में भरकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। संभव हो तो षोडशोपचार विधि से पूजा करें। श्रद्धा-भक्तियुक्त अन्तःकरण से नमस्कार करके ‘चाक्षुषोपनिषद्’ का पठन प्रारंभ करें।

ॐ अस्याश्चाक्क्षुषी विद्यायाः अहिर्बुधन्य ऋषिः। गायत्री छंद। सूर्यो देवता। चक्षुरोगनिवृत्तये जपे विनियोगः।

ॐ इस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुधन्य हैं। गायत्री छंद है। सूर्यनारायण देवता है। नेत्ररोग की निवृत्ति के लिए इसका जप किया जाता है। यही इसका विनियोग है।

मंत्र इस प्रकार से है
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ॐ चक्षुः चक्षुः तेज स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरित चक्षुरोगान् शमय शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय। यथा अहं अन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय। कल्याणं कुरु करु।
याति मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूल्य निर्मूलय। ॐ नम: चक्षुस्तेजोरत्रे दिव्व्याय भास्कराय। ॐ नमः करुणाकराय अमृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमः भगवते सूर्यायाक्षि तेजसे नमः।खेचराय नमः। महते नमः। रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवांछुचिरूपः। हंसो भगवान शुचिरप्रति-प्रतिरूप:।ये इमां चाक्षुष्मती विद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति।
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग् ग्राहयित्वा विद्या-सिद्धिर्भवति। ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।

ॐ हे सूर्यदेव ! आप मेरे नेत्रों में नेत्रतेज के रूप में स्थिर हों। आप मेरा रक्षण करो, रक्षण करो। शीघ्र मेरे नेत्ररोग का नाश करो, नाश करो। मुझे आपका स्वर्ण जैसा तेज दिखा दो, दिखा दो। मैं अन्धा न होऊँ, इस प्रकार का उपाय करो, उपाय करो। मेरा कल्याण करो, कल्याण करो। मेरी नेत्र-दृष्टि के आड़े आने वाले मेरे पूर्वजन्मों के सर्व पापों को नष्ट करो, नष्ट करो। ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले, दिव्यस्वरूप भगवान भास्कर को नमस्कार है। ॐ करुणा करने वाले अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ॐ भगवान सूर्य को नमस्कार है। ॐ नेत्रों का प्रकाश होने वाले भगवान सूर्यदेव को नमस्कार है। ॐ आकाश में विहार करने वाले भगवान सूर्यदेव को नमस्कार है। ॐ रजोगुणरूप सूर्यदेव को नमस्कार है। अन्धकार को अपने अन्दर समा लेने वाले तमोगुण के आश्रयभूत सूर्यदेव को मेरा नमस्कार है।
हे भगवान ! आप मुझे असत्य की ओर से सत्य की ओर ले चलो। अन्धकार की ओर से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु की ओर से अमृत की ओर ले चलो।
उष्णस्वरूप भगवान सूर्य शुचिस्वरूप हैं। हंसस्वरूप भगवान सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं। उनके तेजोमय रूप की समानता करने वाला दूसरा कोई नहीं है।
जो कोई इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है उसको नेत्ररोग नहीं होते हैं, उसके कुल में कोई अन्धा नहीं होता है। आठ ब्राह्मणों को इस विद्या का दान करने पर यह विद्या सिद्ध हो जाती है।
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56 (छप्पन) भोग क्यों लगाते है?〰️〰️🌸〰️🌸〰️🌸〰️〰️भगवान को लगाए जाने वाले भोग की बड़ी महिमा है।इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन प...
31/08/2026

56 (छप्पन) भोग क्यों लगाते है?
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भगवान को लगाए जाने वाले भोग की बड़ी महिमा है।
इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे
छप्पन भोग कहा जाता है।
यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी,पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है। अष्ट पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण भगवान को अर्पित किए जाने वाले
छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं।
ऐसा भी कहा जाता है कि यशोदाजी बालकृष्ण
को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी।
अर्थात्...बालकृष्ण आठ बार भोजन करते थे।
जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए
भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया।
आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र
की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को
गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा,
तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के
नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और मया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ. भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56 व्यंजनो का भोग बालकृष्ण को लगाया।
गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग...
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श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह
तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया,
अपितु कुलदेवी जगदम्बा कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया
छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां
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ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान
श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर
विराजते हैं। उस कमल की तीन परतें होती हैं।
प्रथम परत में "आठ",दूसरी में "सोलह"और
तीसरी में "बत्तीस पंखुड़िया" होती हैं।
प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में
भगवान विराजते हैं। इस तरह कुल पंखुड़ियों
संख्या छप्पन होती है। 56 संख्या का यही अर्थ है।
छप्पन भोग इस प्रकार है
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1. भक्त (भात),
2. सूप्पिका (दाल),
3. प्रलेह (चटनी),
4. सदिका (कढ़ी),
5. दधिशाकजा (दही
शाक की कढ़ी),
6. सिखरिणी (श्रीखंड),
7. अवलेह (चटनिया ),
8. बालका (बाटी),
9. इक्षु खेरिणी (मुरब्बा),
10. त्रिकोण (शरक्करपारा),
11. बटक (बड़ा),
12. मधु शीर्षक (मख्खन बडा),
13. फेणिका (फेनी),
14. परिष्टïश्च (पूरी),
15. शतपत्र (खाजा),
16. सधिद्रक (घेवर),
17. चक्राम (मालपुआ),
18. चिल्डिका (चिलडे ),
19. सुधाकुंडलिका (जलेबी),
20. धृतपूर (मेसूर पाक ),
21. वायुपूर (रसगुल्ला),
22. चन्द्रकला (चांदी की बरक वाली मिठाई ),
23. दधि (महारायता),
24. स्थूली (थूली),
25. कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी),
26. खंड मंडल (खुरमा),
27. गोधूम (दलिया),
28. परिखा, ( रोट )
29. सुफलाढय़ा (सौंफ युक्त),
30. दधिरूप (फलो से बना रायता ),
31. मोदक (लड्डू),
32. शाक (साग),
33. सौधान (अधानौ अचार),
34. मंडका (मोठ),
35. पायस (खीर)
36. दधि (दही),
37. गोघृत,
38. हैयंगपीनम (मक्खन),
39. मंडूरी (मलाई),
40. कूपिका (रबड़ी)
41. पर्पट (पापड़),
42. शक्तिका (बादाम का सीरा),
43. लसिका (लस्सी),
44. सुवत,( शरबत)
45. संघाय (मोहन),
46. सुफला (सुपारी),
47. सिता (इलायची),
48. फल,
49. तांबूल, (पान)
50. मोहन भोग, (मूंग दाल की चक्कि)
51. लवण, (नमकीन व्यंजन)
🌼मुखवास🌼
52. कषाय, (आंवला )
53. मधुर, ( गुलुकंद)
54. तिक्त, (अदरक )
55. कटु, (मैथी दाना )
56. अम्ल ( निम्बू )
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बहुला चतुर्थी 31 अगस्त विशेष〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को बहुला चौथ या बहुला चतुर्थी के ना...
31/08/2026

बहुला चतुर्थी 31 अगस्त विशेष
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भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को बहुला चौथ या बहुला चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। 2026 में यह व्रत 31 अगस्त दिन सोमवार को है। मान्यता है की इस व्रत को करने से संतान के ऊपर आने वाला कष्ट शीघ्र ही समाप्त हो जाता है। तथा यह तिथि भगवान गणेश जी को अत्यंत प्रिय है। ज्योतिष में भी श्रीगणेश को चतुर्थी का स्वामी कहा गया है। इसे संतान की रक्षा का व्रत भी कहा जाता है। भाद्रपद चतुर्थी तिथि को पुत्रवती स्त्रिया अपने संतान की रक्षा के लिए उपवास रखती है। इस दिन चन्द्रमा के उदय होने तक बहुला चतुर्थी का व्रत करने का बहुत ही महत्त्व है। वस्तुतः इस व्रत में गौ तथा सिंह की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा करने का विधान प्रचलित है। इस व्रत को गौ पूजा व्रत भी कहा जाता है।

जिस प्रकार गौ माता अपना दूध पिलाकर अपनी संतान के साथ-साथ, सम्पूर्ण मानव जाति की रक्षा करती है, उसी प्रकार स्त्रियाँ अपनी संतान को दूध पिलाकर रक्षा करती है। यह व्रत निःसंतान को संतान तथा संतान को मान-सम्मान एवं ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है।

चतुर्थी व्रत विधि
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इस दिन प्रातः काल स्नानादि नित्य क्रिया से निवृत्त होकर शुद्ध वा नया परिधान ( कपड़ा) पहनना चाहिए। इस दिन पुरे दिन उपवास रखने के बाद संध्या के समय गणेश गौरी, योगेश्वर श्रीकृष्ण एवं सवत्सा गौ माता का विधिवत पूजन करना चाहिए । पूजा से पूर्व हाथ में गंध, अक्षत (चावल), पुष्प, दूर्वा, द्रव्य, पुंगीफल और जल लेकर गोत्र, वंशादि के नाम का का उच्चारण कर विधिपूर्वक संकल्प अवश्य ही लेना चाहिए अन्यथा पूजा का पूर्ण फल नहीं मिलता है।

स्थान विशेष के अनुसार विधि विधान में अंतर हो जाता है अतः क्षेत्र विशेष में जिस विधि से पूजा प्रचलित है उसी विधि के अनुसार पूजा करनी चाहिए। कई स्थानों पर शंख में दूध, सुपारी, गंध तथा अक्षत (चावल) से भगवान श्रीगणेश और चतुर्थी तिथि को भी अर्ध्य दिया जाता है। रात्रि में चन्द्रमा के उदय होने पर भी अर्ध्य दिया जाता है।

पूजा के समय निम्न मंत्र का शुद्धोच्चारण करना चाहिए।

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने नमः
प्रणतः क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः ।।
कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च।
नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः।।
त्वं माता सर्वदेवानां त्वं च यज्ञस्य कारणम्।
त्वं तीर्थं सर्वतीर्थानां नमस्तेऽस्तु सदानघे।।
उपर्युक्त मंत्र का शुद्धोच्चारण के बाद निम्न मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।
याः पालयन्त्यनाथांश्च परपुत्रान् स्वपुत्रवत्।
ता धन्यास्ताः कृतार्थश्च तास्त्रियो लोकमातरः ।।

इस दिन पुखे (कुल्हड़) पर पपड़ी आदि रखकर भोग लगाकर पूजन के बाद ब्राह्मण भोजन कराकर उसी प्रसाद में से स्वयं भी भोजन करना चाहिए। बहुला चतुर्थी व्रत की कथा अवश्य ही पढ़ना या सुनना चाहिए। कथा सुनने के बाद ब्राह्मण को भोजन करानी चाहिए तथा उसके बाद स्वयं भोजन करनी चाहिए।

बहुला चतुर्थी व्रत के लाभ
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सकट चतुर्थी व्रत करने व्यक्ति को इच्छित सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

इस व्रत को करने से शारीरिक तथा मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।

यह व्रत निःसंतान को संतान का सुख देता है।

इस व्रत को करने से धन धन्य की वृद्धि होती है।

व्रत करने से व्यावहारिक तथा मानसिक जीवन से सम्बन्धित सभी संकट दूर हो जाते हैं।

व्रती स्त्री को पुत्र, धन, सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

संतान के ऊपर आने वाले कष्ट दूर हो जाते है।

बहुला चौथ के दिन क्या नही करना चाहिए

इस दिन गाय के दूध से बनी हुई कोई भी खाद्य सामग्री नहीं खानी चाहिए।

गाय के साथ साथ उसके बछड़े का भी पूजन करना चाहिए।

भगवान श्रीकृष्ण और गाय की वंदना करना चाहिए।

श्री कृष्ण के सिंह रूप में वंदन करना चाहिए।

प्रचलित कथा
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बहुला चतुर्थी व्रत से संबंधित एक बड़ी ही रोचक कथा प्रचलित है। जब भगवान विष्णु का कृष्ण रूप में अवतार हुआ तब इनकी लीला में शामिल होने के लिए देवी-देवताओं ने भी गोप-गोपियों का रूप लेकर अवतार लिया। कामधेनु नाम की गाय के मन में भी कृष्ण की सेवा का विचार आया और अपने अंश से बहुला नाम की गाय बनकर नंद बाबा की गौशाला में आ गई।

भगवान श्रीकृष्ण का बहुला गाय से बड़ा स्नेह था। एक बार श्रीकृष्ण के मन में बहुला की परीक्षा लेने का विचार आया। जब बहुला वन में चर रही थी तब भगवान सिंह रूप में प्रकट हो गए। मौत बनकर सामने खड़े सिंह को देखकर बहुला भयभीत हो गई। लेकिन हिम्मत करके सिंह से बोली, 'हे वनराज मेरा बछड़ा भूखा है। बछड़े को दूध पिलाकर मैं आपका आहार बनने वापस आ जाऊंगी।'

सिंह ने कहा कि सामने आए आहार को कैसे जाने दूं, तुम वापस नहीं आई तो मैं भूखा ही रह जाऊंगा। बहुला ने सत्य और धर्म की शपथ लेकर कहा कि मैं अवश्य वापस आऊंगी। बहुला की शपथ से प्रभावित होकर सिंह बने श्रीकृष्ण ने बहुला को जाने दिया। बहुला अपने बछड़े को दूध पिलाकर वापस वन में आ गई।

बहुला की सत्यनिष्ठा देखकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर कहा कि 'हे बहुला, तुम परीक्षा में सफल हुई। अब से भाद्रपद चतुर्थी के दिन गौ-माता के रूप में तुम्हारी पूजा होगी। तुम्हारी पूजा करने वाले को धन और संतान का सुख मिलेगा।

श्रीगणेश अवतरण कथा
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शिवपुराण अनुसार भगवान गणेश जी के जन्म लेने की कथा का वर्णन प्राप्त होता है जिसके अनुसार देवी पार्वती जब स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक बालक का निर्माण करती हैं और उसे अपना द्वारपाल बनाती हैं वह उनसे कहती हैं 'हे पुत्र तुम द्वार पर पहरा दो मैं भीतर जाकर स्नान कर रही हूँ अत: जब तक मैं स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर नहीं आने देना।

जब भगवान शिवजी आए तो गणेशजी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया और उन्हें भितर न जाने दिया इससे शिवजी बहुत क्रोधित हुए और बालक गणेश का सिर धड़ से अलग कर देते हैं, इससे भगवती दुखी व क्रुद्ध हो उठीं अत: उनके दुख को दूर करने के लिए शिवजी के निर्देश अनुसार उनके गण उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आते हैं और शिव भगवान ने गज के उस मस्तक को बालक के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर देते हैं.
पार्वती जी हर्षातिरेक हो कर पुत्र गणेश को हृदय से लगा लेती हैं तथा उन्हें सभी देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद देती हैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्य होने का वरदान देते हैं. चतुर्थी को व्रत करने वाले के सभी विघ्न दूर हो जाते हैं सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

भगवान गणेश जी की आरती
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जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा
माता जाकी पारवती, पिता महादेवा…।

एकदन्त, दयावन्त, चारभुजाधारी,
माथे पर सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी।

पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा,
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा,
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश, देवा
माता जाकी पारवती, पिता महादेवा…।

अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया,
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया

‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा,
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा…
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश, देवा…
माता जाकी पारवती, पिता महादेवा…।
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दक्ष प्रजापति भगवान शिव से क्यों चिढ़ते थे〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️दक्ष प्रजापति सृष्टि निर्माता भगवान ब्रह्मा के मानस पुत...
31/08/2026

दक्ष प्रजापति भगवान शिव से क्यों चिढ़ते थे
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दक्ष प्रजापति सृष्टि निर्माता भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। राजा दक्ष के दो पुत्र, 84 पुत्रियाँ थी. दक्ष प्रजापति ने पानी 27 कन्याओं का विवाह चंद्रदेव के साथ किया था. इन 27 कन्याओं में रोहिणी सबसे अधिक सुन्दर थीं. चन्द्रमा रोहिणी से सर्वाधिक प्रेम करते थे और अन्य 26 पत्नियों की अनदेखी करते थे. उन कन्याओं ने यह बात अपने पिता दक्ष को बताई. दक्ष बहुत दुखी हुए, उन्होंने चन्द्रमा को आमंत्रित किया. उन्होंने चन्द्रमा से इस अनुचित व्यवहार के लिए सावधान किया. चन्द्रमा ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और वचन दिया कि वो भविष्य में ऐसा भेदभाव नहीं करेंगे।

परन्तु ऐसा हुआ नहीं, चन्द्रमा ने अपना भेदभावपूर्ण व्यवहार जारी रखा. दक्ष की कन्यायें क्या करती, उन्होंने पुनः अपने पिता को इस सम्बन्ध में सूचित किया. इस बार दक्ष ने चंद्रलोक जाकर चन्द्रदेव को समझाने का निर्णय लिया. दक्ष प्रजापति और चन्द्रमा की बात इतना बढ़ गयी कि अंत में क्रोधित दक्ष ने चन्द्रदेव को कुरूप होने का श्राप दे दिया।

श्राप का असर दिखने लगा और दिन-प्रतिदिन चन्द्रमा की सुन्दरता और तेज घटने लगा. एक दिन नारद मुनि चन्द्रलोक पहुंचे तो चन्द्रमा ने उनसे इस श्राप से मुक्ति का उपाय पूंछा. नारदमुनि ने चन्द्रमा से कहा कि वो श्राप मुक्ति के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करें।

चन्द्रमा यह बात जानते थे कि भगवान शिव का विवाह सती से होने वाला है. उन्हें लगा कि शिव उनकी सहायता क्यों ही करेंगे. नारद मुनि चतुर तो थे ही, उन्होंने उपाय बताया कि पहले शिव जी से कहना कि आप मेरी रक्षा करने का वचन दें. जब शिव हाँ कर दें तो दक्ष के श्राप की बात बताना, शिव अपने वचन की रक्षा करते हुए तुम्हारा कल्याण अवश्य करेंगे. नारद मुनि के कहे अनुसार चंद्रदेव ने किया और शिव ने उन्हें श्रापमुक्त किया।

कुछ दिन बाद नारद घूमते हुए दक्ष के दरबार में पहुंचे और उन्होंने चन्द्रमा की श्रापमुक्ति के बारे में उन्हें बताया. दक्ष को बड़ा क्रोध आया कि उनके श्राप को किसने विफल कर दिया. नारदजी से जानकर दक्ष शिव से युद्ध करने कैलाश पर्वत पहुँच गये. शिव और दक्ष का युद्ध होने लगा. इस युद्ध को रोकने के लिए ब्रह्मा और भगवान शिव वहां पहुंचे. भगवान ब्रह्मा ने चन्द्रमा के शरीर से एक नए चन्द्रमा की उत्पत्ति कर दी।

भगवान विष्णु ने कहा कि – दक्ष के श्राप अनुसार पहले चंद्रमा की सुन्दरता कुछ दिन घटेगी और कुछ दिन बढ़ेगी, साथ ही चन्द्रमा को अपनी पत्नियों से समानता का व्यवहार करना होगा . शिव जी के वरदान प्राप्त दूसरे चन्द्रमा को शिव के साथ रहना होगा।

यह प्रकरण तो समाप्त हुआ पर दक्ष ने मन ही मन निर्णय ले लिया कि वो सती का विवाह शिव से नहीं करेंगे।

दक्ष प्रजापति भगवान शिव – दूसरी कहानी

चूंकि दक्ष सती का विवाह शिव से न करने का निश्चय कर चुके थे अतः उन्होंने सती का स्वयंवर करने का निर्णय लिया. एक शुभ दिन सती का स्वयंवर निश्चित हुआ और जिसमें दक्ष ने सभी गंधर्व, यक्ष, देव को आमंत्रित किया. परन्तु शिव को आमंत्रित नहीं किया. शिव का अपमान करने के लिए उन्होंने शिवजी की मूर्ति बनाकर द्वार के निकट लगा दी थी।

स्वयंवर के समय जब यह बात सती को पता चली तो उन्होंने जाकर उसी शिवमूर्ति के गले में वरमाला डाल दी. इसे प्रभु की लीला ही समझिये, शिव तत्क्षण वहीँ प्रकट हो गये. भगवान शिव ने सती को पत्नी रूप में स्वीकार किया और कैलासधाम चले गए. दक्ष कुपित तो हुए पर कुछ कर न सके।

इसी घटना के कुछ दिन बाद भगवान ब्रह्मा ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया. इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवताओं, महान राजाओं, प्रजापतियों को बुलाया. इसके अतिरिक्त शिव, सती को भी आमंत्रित किया. सभी लोग यज्ञस्थल पर आये और अपने आसन पर विराजमान हुए. दक्ष प्रजापति सबसे अंत में वहां पहुंचे।

जब दक्ष प्रजापति वहाँ पहुंचे तो ब्रह्मा, शिव, सती के अतिरिक्त सभी लोग उनके सम्मान में उठ खड़े हुए. ब्रह्मा दक्ष के पिता थे और शिव दक्ष के दामाद थे, इन दोनों का स्थान रीति के अनुसार बड़ा माना जाता है. दक्ष ने बात पर ध्यान नहीं दिया और उन्हें लगा शिव उन्हें अपमानित करने के लिए खड़े नहीं हुए. दक्ष ने निर्णय लिया कि वो भी इसी प्रकार शिव का अपमान करेंगे।

कुछ दिनों बाद दक्ष ने ठीक उसी प्रकार एक यज्ञ का आयोजन किया परन्तु शिव, सती को निमंत्रित ही नहीं किया. जब सती को यह पता चला तो उन्होंने पितृप्रेम वश यज्ञ में जाने का निश्चय किया. शिव ने सती से कहा कि बिना निमंत्रण के जाना उचित नहीं, पर सती को लगा कि वो तो दक्ष की प्रिय पुत्री हैं अतः किसी औपचारिकता की क्या आवश्यकता।

विधि का विधान, सती यज्ञ में पहुँच तो गयी पर उनके पिता ने उनसे उचित व्यवहार नहीं किया और सभा में शिव का अपमान भी किया. फलस्वरूप अपने और अपने पति के अपमान से दुखी सती ने यज्ञ कुंड में कूदकर प्राणों की आहुति दे दी. मरने के पूर्व सती ने अपने पिता दक्ष को श्राप दिया कि उनके झूठे घमंड और दम्भी व्यव्हार का परिणाम उनको भुगतना पड़ेगा और शिव के कोप से दक्ष और उनके साम्राज्य का विनाश हो जायेगा. बाद में सती का श्राप अक्षरशः सत्य भी हुआ।
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शिवजी बन गये रामकथा वाचक..?〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️एक बार अयोध्या में राघवेंद्र भगवान श्रीराम ने अपने पितरों का श्राद्ध करने ...
31/08/2026

शिवजी बन गये रामकथा वाचक..?
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एक बार अयोध्या में राघवेंद्र भगवान श्रीराम ने अपने पितरों का श्राद्ध करने के लिए ब्राह्मण-भोजन का आयोजन किया। ब्राह्मण-भोजन में सम्मिलित होने के लिए दूर-दूर से ब्राह्मणों की टोलियां आने लगीं । भगवान शंकर को जब यह मालूम हुआ तो वे कौतुहलवश एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धर कर ब्राह्मणों की टोली में शामिल होकर वहां पहुंच गए और श्रीरामजी से बोले—‘मुझे भी भोजन करना है।’
अन्तर्यामी भगवान श्रीराम बूढ़े ब्राह्मण को पहचान गए और समझ गए कि भगवान शंकर ही मेरी परीक्षा करने यहां पधारे हैं । ब्राह्मण-भोजन के लिए जैसे ही पंगत पड़ी, भगवान श्रीराम ने स्वयं उस वृद्ध ब्राह्मण के चरणों को अपने करकमलों से धोया और आसन पर बिठाकर भोजन-सामग्री परोसना शुरु कर दिया । छोटे भाई लक्ष्मणजी भगवान शंकर को जो भी वस्तु परोसते, शंकरजी उसे एक ही ग्रास में खत्म कर देते । उनकी पत्तल पर कोई सामान बचता ही नहीं था । सभी परोसने वाले उस बूढ़े ब्राह्मण की पत्तल में सामग्री भरने में लग गए, पर पत्तल तो खाली-की-खाली ही नजर आती। श्रीरामजी मन-ही-मन मुस्कराते हुए शंकरजी की यह लीला देख रहे थे।
भोजन समाप्त होते देख महल में चिंता होने लगी गयी । माता सीता के पास भी यह समाचार पहुंचा कि श्राद्ध में एक ऐसे वृद्ध ब्राह्मण पधारे हैं, जिनकी पत्तल पर सामग्री परोसते ही साफ हो जाती है। श्राद्ध में आमन्त्रित सभी ब्राह्मणों को भोजन कराना भगवान श्रीराम की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया। माता सीता भी चिन्तित होने लगीं।
जब बनाया गया सारा भोजन समाप्त हो गया फिर भी शंकरजी तृप्त नहीं हुए तो श्रीराम ने माता अन्नपूर्णा का स्मरण कर उनका आह्वान किया । सभी परोसने वाले व्यक्ति वहां से हटा दिये गये । माता अन्नपूर्णा वहां प्रकट हो गयीं ।
शंकरजी की क्षुधा केवल माता अन्नपूर्णा ही कर सकती हैं शान्त!!!!!!
श्रीरामजी ने माता अन्नपूर्णा से कहा—‘अपने स्वामी को आप ही भोजन कराइए, इन्हें आपके अतिरिक्त और कोई तृप्त नहीं कर सकता है ।’
मां अन्नपूर्णा ने जब अपने हाथ में भोजन पात्र लिया तो उसमें भोजन अक्षय हो गया । अब वे स्वयं विश्वनाथ को भोजन कराने लगीं । मां अन्नपूर्णा ने पत्तल में एक लड्डू परोसा । भगवान विश्वनाथ खाते-खाते थक गये पर वह समाप्त ही नहीं होता था । मां ने दोबारा परोसना चाहा तो भगवान शंकर ने मना कर दिया । शंकरजी हंसते हुए डकार लेने लगे और बोले—‘तुम्हें आना पड़ा, अब तो मैं तृप्त हो गया ।’
मां अन्नपूर्णा काशी की अधीश्वरी हैं इसलिए वहां एक कहावत प्रचलित है—
‘बाबा-बाबा सब कहै, माई कहे न कोय।
बाबा के दरबार में माई कहैं सो होय ।।
अब शंकरजी भगवान श्रीराम-सीता की मर्यादा की परीक्षा लेने लगे।
शंकरजी श्रीरामजी से बोले—‘मैं इतना खा गया हूँ कि मुझसे अपने आप उठा नहीं जा रहा है । मुझे जरा उठाओ ।’ हनुमानजी अपने स्वामी का कार्य करने के लिए आगे बढ़े और शंकरजी को उठाने लगे परन्तु वे उन्हें उठा नहीं सके । श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से शंकरजी को उठाने के लिए कहा ।
अनन्त के अवतार की शक्ति भी अनन्त होती है। लक्ष्मणजी ने शंकरजी को उठाकर एक पलंग पर लिटा दिया । अब शंकरजी ने कहा—‘मेरा मुख और हाथ धो दो ।’
माता सीता ने जैसे ही मुख धोने के लिए जल दिया, शंकरजी ने मुख में पानी भरकर माता सीता पर कुल्ला कर दिया । माता सीता क्रुद्ध होने के बजाय हाथ जोड़कर शंकरजी से बोली—‘आपके उच्छिष्ट जल के मेरे ऊपर गिरने से मेरा शरीर पवित्र हो गया, मैं आपकी बहुत आभारी हूँ ।’
अब भगवान शंकर ने श्रीराम को चरण दबाने की आज्ञा दी । श्रीराम और लक्ष्मण दोनों शंकरजी के चरण दबाने लगे और माता सीता पंखा झलने लगीं।
प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने कहा—‘मैंने तुम्हारी मर्यादा की परीक्षा ली जिसमें तुम सफल रहे । तुम्हारी जो इच्छा हो मुझसे मांग लो ।’
श्रीराम ने कहा—‘यद्यपि आपके पास जो चीजें हैं (विष का भोजन, विषधर सर्प, गजचर्म, बूढ़ा बैल, भूत-प्रेत पिशाच) वे हमारे किसी काम की नहीं हैं, इसलिए आप अपने चरणों की भक्ति दें और मेरी सभा में कथा सुनाया करें।’
तब से शंकरजी राम सभा के कथावाचक बन गए और पूर्व कल्पों की कथाएं सुनाया करते थे।।
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यशोदा की ममताकान्हा की ममता में इतनी मग्न हुईं कि छठ पूजने की परंपरा भूल गईं। भला हो सबसे बुजुर्ग गोपी चंद्रावली की, जिस...
31/08/2026

यशोदा की ममता

कान्हा की ममता में इतनी मग्न हुईं कि छठ पूजने की परंपरा भूल गईं। भला हो सबसे बुजुर्ग गोपी चंद्रावली की, जिसके ध्यान दिलाने पर लाला का छठ पूजन उनके जन्म लेने के 364वें दिन मां यशोदा ने किया।
घरों में शिशु के जन्म लेने के छठवें दिन छठ पूजने की परंपरा है। छठ पूजन के पश्चात संबंधित घर से सोबर समाप्त हो जाती है और इसके बाद जच्चा दैनिक कामकाज में जुट जाती है, लेकिन जगतपालक होने के बाद भी कन्हैया का छठ पूजन उनके पहले बर्थडे के एक दिन पहले यानि जन्म लेने के 364वें दिन हुआ था।
प्राचीन नंद किला मंदिर गोकुल के पुजारी नटवर जय भगवान बताते हैं, कान्हा के जन्म दिन के बाद यशोदा जी छठ पूजन की तैयारी में जुटी थीं कि इसी बीच राक्षसी पूतना गोकुल में कान्हा को मारने के उद्देश्य से आ धमकी। पूतना पूरे गोकुल में छह दिन के जितने भी शिशु मिले सबको मारने लगी। यह खबर मिलने के बाद मां यशोदा लाला को इस तरह दुबकाये-दुबकाये रहने लगीं कि लाला की भनक उनकी सखी-सहेलियों को भी नहीं लग पायी। वक्त गुजरने के साथ ही यशोदा जी छठ पूजन की बात भी भूल गयीं। कान्हा के जन्म दिन के एक साल पूर्ण होने के दो दिन पहले यशोदा जी ने गोकुल की सबसे बुजुर्ग गोपी चंद्रावली को बुलाया और लाला के जन्म दिन पर भोज का निमंत्रण सभी विप्रों को देने के लिये कहा। चालाक चंद्रावली ने कहा, यशोदा मैया लाला का छठ पूजन न होने की वजह से अभी तुम्हारे घर से सोबर नहीं निकली है। लिहाजा, विप्र कान्हा के जन्म दिन की खुशी में भोजन करने नहीं आएंगे। इस बुजुर्ग गोपी ने ही यशोदा जी को लाला के जन्म दिन के एक दिन पहले छठ पूजन करने का उपाय बताया। छठ पूजन के बाद कान्हा का पहला जन्म दिन मां यशोदा और नंद बाबा ने मनाया था।
प्रभु भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की धूम मथुरा में तो नंदोत्सव की जबर्दस्त धूम इसके एक दिन बाद गोकुल में मचती है। गोकुल जैसी नंदोत्सव की धूम शायद ही पूरी दुनिया में कहीं मचती हो। जन्माष्टमी की मध्य रात्रि मथुरा में कान्हा के जन्म की खबर दूसरे दिन सुबह पाकर गोकुल के नर-नारी और बच्चे फूले नहीं समाते। प्रात: से ही गोकुल नगर के हर घर को बंदनवार और तोरणद्वारों से सजाया जाता है। नर हो या नारी या फिर बच्चे, खुशी से पागल हो, सब झूमते हैं। सबके मुख से '.यशोदा जायो लल्ला' और 'हाथी-घोड़ा, पालकी, जय कन्हैया लाल की' की गूंज निकलती है। नंद के आनंद भये जय कन्हैया लाल का गायन करते हैं। नंद किला मंदिर गोकुल के पुजारी छगन लाल बताते हैं, नंदोत्सव के मौके पर नंदबाबा माखन-मिश्री, लड्डू, पेड़ा, मेवा, चांदी आदि के सिक्के आदि का खजाना लुटाते हैं। वैसे तो नंदोत्सव गोकुल के सभी मंदिरों में मनता है लेकिन नंद भवन, गोकुल नाथ मंदिर, राजा ठाकुर मंदिर, यशोदा भवन और दाऊ जी मंदिर में इस अवसर पर छटा देखते ही बनती है।
पुजारी छगन लाल बताते हैं, नंदोत्सव के दिन पूर्वान्ह 11 से दो बजे तक गोकुल और आसपास के गांवों के लोग नंद चौक में एकत्रित होते हैं, यहां खजाना लुटाया जाता है। खजाना लूटने के लिये विदेशी श्रद्धालु भी आते हैं। और उनमें खजाना लूटने की होड़ मची रहती है। उनके हाथ में जो भी आता है वह उसे कान्हा का आशीर्वाद मानते है ॥

Address

Sarkaghat Distt Mandi
Sarkaghat
577

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