लौकुशानंद शर्मा वशिष्ठ

  • Home
  • India
  • Satna
  • लौकुशानंद शर्मा वशिष्ठ

लौकुशानंद शर्मा वशिष्ठ जय अंगिरा जय परशुराम

परम पूज्य जगतगुरू महाराज श्री के श्रीचरणों में कोटिशः प्रणाम 🙏आपके पावन अवतरण दिवस के शुभ अवसर पर मैं, आपका अति लघु शिष्...
12/04/2026

परम पूज्य जगतगुरू महाराज श्री के श्रीचरणों में कोटिशः प्रणाम 🙏

आपके पावन अवतरण दिवस के शुभ अवसर पर मैं, आपका अति लघु शिष्य कोटि-कोटि वंदन एवं हार्दिक शुभकामनाएं अर्पित करता हूँ।

शास्त्रों में गुरु की महिमा का वर्णन इस प्रकार है—

“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥”

“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥”

“न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः।
तत्त्वज्ञानात् परं नास्ति तस्मै श्री गुरवे नमः॥”

हे गुरुदेव! आपकी कृपा से ही मुझे गुरुमंत्र प्राप्त हुआ और जीवन को सही दिशा मिली। आपके श्रीचरणों का आश्रय ही मेरे लिए सबसे बड़ा सौभाग्य है। मैं सदा आपके बताये मार्ग पर चलने का संकल्प लेता हूँ।

ईश्वर से प्रार्थना है कि आप सदैव स्वस्थ, प्रसन्न एवं दीर्घायु रहें तथा हम जैसे अज्ञानी शिष्यों पर अपनी अनंत कृपा दृष्टि बनाए रखें।

आपके श्रीचरणों में बारंबार प्रणाम

12/03/2026

...

अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के प्रबुद्ध समागम में विशेष आमंत्रित अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा है।
27/02/2026

अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के प्रबुद्ध समागम में विशेष आमंत्रित अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा है।

26/02/2026
◆गुरुकुलों में दी जाने वाली प्रमुख विद्याएँ...◆ अग्नि विद्या — धातु विज्ञान ◆ वायु विद्या — उड़ान विज्ञान ◆ जल विद्या — ...
25/02/2026

◆गुरुकुलों में दी जाने वाली प्रमुख विद्याएँ...

◆ अग्नि विद्या — धातु विज्ञान
◆ वायु विद्या — उड़ान विज्ञान
◆ जल विद्या — नौपरिवहन
◆ अंतरिक्ष विद्या — अंतरिक्ष विज्ञान
◆ पृथ्वी विद्या — पर्यावरण और भूविज्ञान
◆ सूर्य विद्या — सौर अध्ययन
◆ चन्द्र व लोक विद्या — चन्द्र और ग्रहों का अध्ययन
◆ मेघ विद्या — मौसम विज्ञान
◆ पदार्थ विद्युत विद्या —ऊर्जाविज्ञान
◆ विमान विद्या — विमान निर्माण
◆ आकर्षण विद्या — गुरुत्वाकर्षण
◆ खगोल विद्या — ज्योतिर्विज्ञान
◆ काल विद्या — समय मापन
◆ यंत्र विद्या — यांत्रिक विज्ञान
◆ रत्न व धातु विद्या — रसायन और धातु अध्ययन
◆ कृषि, पशुपालन, वस्त्र निर्माण, वास्तु, पाक विद्या, औषधि विज्ञान।
ये सभी ज्ञान गुरुकुलों में व्यवहारिक रूप से सिखाए जाते थे। भारत में अंग्रेजों से बहुत पहले, 1811 से पूर्व ही।
7 लाख 32 हज़ार से अधिक गुरुकुल थे। वहीं इंग्लैंड में पहला स्कूल 1811 में खुला। यही भारत को विश्वगुरु बनाता था।
वेद = विज्ञान + शिल्प + आत्मज्ञान वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं,बल्कि सृष्टि-विज्ञान के शुद्धतम सूत्र हैं।

◆वेद कहते है:-("विज्ञानं ब्रह्म” )
अर्थात विज्ञान ही ब्रह्म है।

◆तैत्तिरीयोपनिषद में कहा गया है:-
“विज्ञानाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।”
“समस्त प्राणी विज्ञान से उत्पन्न होते हैं।विज्ञान से ही जीवन जीते हैं और विज्ञान में ही लीन हो जाते हैं।” विज्ञान को ब्रह्मस्वरूप माना गया है यज्ञ और कर्म की वृद्धि भी विज्ञान से ही होती है।

◆इसलिए ऋषि कहते हैं:-
“विज्ञानं देवा: सर्वे ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते।” समस्त देवता विज्ञान को श्रेष्ठ ब्रह्म के रूप में उपासते हैं।
शिल्प = यज्ञ कर्म

◆वास्तुसूत्रोपनिषद में कहा गया है:-
“शुल्वं यज्ञस्य साधनं, शिल्पं रूपस्य साधनम्।”
अर्थात। शुल्ब सूत्र (विज्ञान) यज्ञ का साधन है, और शिल्प (रचना) उसका रूप है।
“आत्मा संस्कृतिर्वै शिल्पानि”
अर्थात शिल्प वह कर्म है जो आत्मा को शुद्ध करता है।
इसलिए शिल्प और विज्ञान दोनों ही ईश्वर की आराधना हैं। विश्वकर्मा ऋषि सृष्टि के शिल्पी हैं।

◆ऋग्वेद कहता है:-
“त्रिधातु शर्म वहतं शुभस्पती”
हे शिल्पियों! लोहे, ताँबे और पीतल से यान बनाओ और देश-देशांतरों में उपयोग करो। विश्वकर्मा वंश श्रेष्ठ कहलाया ।
“धर्मज्ञो वेद पारगः, ज्योतिष शास्त्र च पारगः।”
वे गणित, खगोल, भूगोल, धातु विज्ञान और वास्तु के पारंगत थे। यही कारण है कि शिल्पी ब्राह्मणों को पाँचाल कहा गया। “पंचभिः शिल्पैः भूषयन्ति जगत् इति पञ्चालाः।”
जो पाँच प्रकार के शिल्पों से जगत को सजाते हैं, वे पाँचाल कहलाते हैं।
अतः वेद ज्ञान है, शिल्प विज्ञान है, यही राष्ट्र निर्माण का आधार है। बिना शिल्प विज्ञान के सृष्टि विज्ञान की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
विज्ञान जब धर्म से जुड़ता है तो सृजन होता है, और जब धर्म विज्ञान से अलग होता है तो विनाश होता है। इसलिए भारत को पुनः विश्वगुरु बनाना है तो वेद, विज्ञान और शिल्प तीनों का समन्वय आवश्यक है।वेद = विज्ञान = ब्रह्म।
विज्ञान ही ब्रह्म है, और शिल्प उसी का ही रूप। इस कथन का आशय यह है कि गुरुकुल शिक्षा पद्धति, जो वैदिक काल से चली आ रही है, समग्र शिक्षा का केंद्र थी,इसलिए इसे विज्ञान की जननी कहना इस प्रणाली के व्यापक योगदान को रेखांकित करता है।
जयति जयति जय पुण्य सनातन संस्कृति, जयति जयति

10/02/2026

पुराणों के अनुसार, भगवान शिव एक योगी हैं और इस कारण अधिकतर समय वह तपस्या में लीन रहते हैं। ऐसे में भक्तों की आवाज और उनकी मनोकामना उन तक पहुंचने पर उनके ध्यान में विघ्न पहुंचा सकती है। इसलिए, नंदी वहां तैनात रहते हैं ताकि महादेव की तपस्या में किसी प्रकार का विघ्न न आए और भगवान शिव तक अपनी मनोकामना पहुंचाने के लिए लोग नंदी का सहारा लेते हैं और उनके काम में अपनी मनोकामना कहते हैं। कथाओं के अनुसार, स्वयं भगवान शिव ने नंदी को वरदान दिया था कि जो तुम्हारे कान में आकर अपनी मनोकामना कहेगा, उसकी हर इच्छा जरूर पूरी होगी। मनोकामना जाहिर करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि यह अन्य लोगों को सुनाई ना दे, इसलिए इसे फुसफुसाकर कहा जाता है।

नंदी केवल एक वाहन नहीं, बल्कि भगवान शिव के परम भक्त, सचिव, और शिष्य हैं। शिवपुराण, स्कंदपुराण और अन्य ग्रंथों में नंदी की महानता का वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि नंदी हर पल शिव की सेवा में लगे रहते हैं, और वे हर उस बात को सुनते हैं जो भक्त शिव से कहना चाहता है।

यह परंपरा भारत के कई शिव मंदिरों में सदियों से चली आ रही है। इसके पीछे गहन आस्था और धार्मिक विश्वास जुड़ा हुआ है।

जो बात भक्त नंदी के कान में कहता है, वह सीधी शिवजी तक पहुँचती है और जल्द फलित होती है।”

यह मान्यता इतनी लोकप्रिय है कि देशभर के हजारों शिव मंदिरों में भक्त नंदी के कान में धीरे से अपनी बात कहते हैं। इसे गुप्त प्रार्थना भी कहा जाता है।

शिवलिंग के दर्शन करें और मन में भगवान शिव का ध्यान करें।

नंदी की मूर्ति आमतौर पर शिवलिंग के सामने होती है, उनका मुख शिवलिंग की ओर होता है।

नंदी के पास जाएं और धीरे से उनके दाहिने कान के पास झुकें।
अब अपने मन की बात कहें – मनोकामना, प्रार्थना, दुःख, इच्छा जो भी हो।

बहुत शुद्ध भाव और विश्वास से कहें – जैसे आप भगवान से आमने-सामने बात कर रहे हों।

एक बार बात कहने के बाद चुपचाप शिवलिंग की ओर देखें और मन ही मन प्रार्थना करें।

यदि श्रद्धा और विश्वास न हो, तो यह परंपरा केवल एक क्रिया बनकर रह जाती है।

नंदी के कान में बात धीरे और एकांत में की जाती है, ताकि वह केवल शिव और भक्त के बीच की रह सके।

धार्मिक रूप से कहा जाता है कि एक ही बार नंदी को कहो, बाकी शिवजी पर छोड़ दो।

यह एक आंतरिक और आत्मिक क्रिया है, इसे दिखावे में न करें।

शिव पुराण में बताया गया है कि नंदी को शिव की बातों का सबसे अच्छा ज्ञाता माना गया है।

स्कंद पुराण में नंदी को “शिव के द्वारपाल” कहा गया है, और वह भक्तों और शिव के बीच संवाद सेतु हैं।

नंदी के कान में बात कहना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक आत्मिक संवाद है। यह वह पल होता है जब भक्त अपने हृदय की सबसे गुप्त बात शिव तक पहुँचाने के लिए नंदी को माध्यम बनाता है। जब यह श्रद्धा और विश्वास से किया जाता है, तो शिवजी जरूर सुनते हैं और भक्त की प्रार्थना का उत्तर देते हैं।

19/01/2026

🚩*कर्मकांडों में कुशल श्रेष्ठ ब्राह्मण देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा जी की देवताओं द्वारा पूजन एवं सूर्य के तेज से अस्त्रों का निर्माण*🚩

ब्रह्मोवाच
*ज्ञात्वा तेषामभिप्रायमुवाच भगवान्वचः ।*
*लब्ध्वानुज्ञां ततः सर्वे सुराः संहृष्टचेतसः ॥* ५३
*त्वष्टारं पूजयामासुर्मनोवाक्कायकर्मभिः ।*
*विश्वकर्मा तवादेशात्करोतु तव सौम्यताम् ॥* ५४
*ततस्तु तेजसो राशिं सर्वकर्मविधानवित् ।*
*भ्रमिमारोपयामास विश्वकर्मा विभावसुम् ॥* ५५
*यच्चास्य शातितं तेजस्तेन चक्रं विनिर्मितम् ।*
*येन विष्णुर्जघानोग्रान्सदा वै दैत्यदानवान् ॥* ५९
*शूलशक्तिगदावज्रशरासनपरश्वधान् ।*
*देवतानां ददौ कृत्वा विश्वकर्मा महामतिः ॥*६०
(भविष्यपुराण/पर्व १ (ब्राह्मपर्व)/अध्यायः १२३/श्लोक ५३-५४-५५-५९-६०)
अर्थात - ब्रह्मा बोले- इस प्रकार उन (देवताओं) के अभिप्राय को समझकर भगवान् (सूर्य) कुछ बोले । उनकी आज्ञा प्राप्त कर अत्यन्त हर्षित होकर सभी देवताओं ने मन, वाणी, एवं शारीरिक कर्मों द्वारा भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा की और सूर्य से कहा कि आपके ही आदेश प्राप्त कर विश्वकर्मा जी आप को सौम्य (सौन्दर्यपूर्ण) बनाएंगे। तदुपरांत, सभी कर्मकांड कार्य-विधानों में कुशल विश्वकर्मा जी ने तेज पुञ्ज सूर्य को खरादने वाले चक्के पर स्थित किया । खरादते समय जो तेज कट कर गिर गया था विश्वकर्मा जी ने उसी का चक्र (अस्त्र) बनाया। जिसके द्वारा भगवान् विष्णु ने भयंकर दैत्य एवं दानवों का अनेकों बार वध किया है। महाबुद्धिमान् विश्वकर्मा जी ने शूल, शक्ति, गदा, वज्र, धनुष एवं फरसा नामक अस्त्रों को उसी तेज से बनाकर उन्हीं देवताओं को वितरण कर दिया।

*शातनं तेजसो मेऽद्य क्रियतामिति भास्करः।*
*तञ्चाह विश्वकर्माणं संज्ञायाः पितरं द्विज॥*
*संवत्सरभ्रमेस्तस्य विश्वकर्मा करवेस्ततः।*
*तेजसः शातनञ्चक्रे स्तूयमानश्च दैवतैः॥*
- (मार्कण्डेयपुराणम्/अध्यायः- ७७/४१-४२)
अर्थात - संज्ञा के पिता भगवान विश्वकर्मा जी से सूर्य ने कहा - हे ब्राह्मण , आप मेरा तेज घटा दीजिये। फिर विश्वकर्मा जी ने सम्वत्सर चक्र वाले सूर्य के तेज को घटा दिया और देवताओं ने वहाँ आकर सूर्य भगवान की स्तुति की।

*उपर्युक्त , भविष्यपुराण एवं मार्कण्डेयपुराण के श्लोकों से प्रमाणित होता हैं कि देवाचार्य भगवान विश्वकर्मा जी एक ब्राह्मण कुल के हैं और सभी कर्मकांडों में कुशल के साथ देवताओं द्वारा पूज्यनीय भी हैं।*

- पं.संतोष आचार्य
अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा®(संपूर्ण भारत)

मेरे वृन्दावनबिहारी...मैं दूर देश की रहने वाली कैसे तुमको पाऊँ कहाँ तुम त्रिगुणातीत, मायापति और मैं मायाजाल में फँसी, ते...
19/01/2026

मेरे वृन्दावनबिहारी...
मैं दूर देश की रहने वाली कैसे तुमको पाऊँ
कहाँ तुम त्रिगुणातीत, मायापति और
मैं मायाजाल में फँसी, तेरा मेरा संगम कैसे हो,
मैं इस दुखी मन की व्यथा कथा किसको सुनाऊँ
मेरे प्राण साँवरे, प्रीतम मेरे, मैं पल-पल तेरी आस लगाउँ
कब आओगे मेरे जीवननाथ, मैं बलिहारी जाऊँ
हम अल्प से जुड़ कर अल्प ही रहेंगे
लेकिन जब तुम असीम से जुड़ेंगे तो बात कुछ और होगी
सच कहूँ तुमसे मिलने से पहले मैं एक बुझा हुआ दीया थी
जैसे एक खाली सिप होती...लेकिन
तेरी करुणा ने भर दिये है मुझमें मोती 👏🏻
तेरे मिलने के कैसे कैसे सपने सजाती रहती हूँ
तुम क्या जानो बाँकेबिहारी, और जानते भी होंगे,
हो तो अंतर्यामी लेकिन फिर भी कोई रिस्पॉन्स नही
अब क्या ही बताऊँ, ठीक है जो है सो.. लेकिन..
मेरी कल्पनाएँ.. मेरे ख्वाब.. मेरी सोच.. मेरे काश में..
मेरे ध्यान में.. तो तुम ही तुम हो.. तेरी ही पुकार है..
तेरा ही इंतजार है.. तुमसे मिलने की उम्मीदें है आशाएँ है
और प्यारे साक्षात् मिलो ना मिलो..
लेकिन मेरी सोच में तुम ही तुम हो "बाँकेबिहारी"
जब तुम नही मिलते, मन मिलने को आतुर हो जाता है,
कैसे कैसे इस दिल को मनाती हूँ समझाती हूँ
तुम क्या जानो कैसे तुम्हारे अंग संग होने को जीती हूँ...
काश मै होती मयूर पंख, सजती रहती तेरे मुकुट के संग
अगर मै होती काली कमली,लिपटी रहती तेरे अंग संग
काश मै होती तेरी मुरलियां, लगी रहती तेरे अधरों संग
जो मै होती ब्रज की बाला,रास रचाते मुझ संग नंदलाला
जो मै बन जाती ब्रज की माटी,तेरे चरणों से लिपटी रहती
मेरे वृन्दावन बाँकेबिहारी...
नहीं और कोई विशेष कामना है..
बस तन-मन जीवन दूँ तुझ पर वार,
निज प्राणों का "प्राण" बना लूँ तुम्हें,
उर अंतर्मन में "बसा" लूँ तुम्हें,
कुछ तो अरमान मिटे दिल का,
"मेरे बाँकेबिहारी" "मोपे कृपा करों"

19/01/2026

#विश्वकर्मा_वैदिक_ब्राह्मण_
#अथर्वेदी_ब्राह्मण

(Lota) (Palota) Brahman

Address

Satna
Satna
485001

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when लौकुशानंद शर्मा वशिष्ठ posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share

Category