The Democratic Socialists of India

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Organization accelerating new world order towards Humanitarian, Inclusive, Fiduciary, Participatory, Democratic and Socialist one world through Socio-Political Interventions for People Centric Development.

12/01/2026

युद्ध कभी-भी मान्यताओं कि लड़ाई नहीं होती। वह पुंजी बनाम मानव समाज संसाधन कि लड़ाई है। यह आम लोगों को समझ आए तो लड़ाई में पुंजीसत्ता का समर्थन कोई नहीं करेगा। यही कारण है कि पुंजीसत्ता द्वारा मानव समाज को मान्यताओं के मानसभेद में जकड़ कर आपस में लड़ाने का प्रयास होता रहा है।

मान्यताओं पर आधारित कट्टरपंथी बनते रहे और लड़ते रहे यह पुंजीसत्ता के हित में है। इसलिए पुंजीसत्ता राष्ट्रों का सरताज अमेरिका दुनिया के हर राष्ट्र में माइंड गेम खेलता रहा है। हर धर्म में कट्टरपंथी गुटों को छुपी मदत करता रहा है। भारत में भी यह खेल खेला जा रहा है *पीछले १०० वर्ष से।*

भारत कि आजादी कि गाथाएं भारत बनाम ब्रिटिश यही संघर्ष बताती है। परंतु इतिहासकारों ने इस कि दुसरी परत भी खोल दी। अमेरिकन्स मुलत: ब्रिटिश व्यापारी है जिन्होंने अमेरिका को ब्रिटेन कि कॉलोनी बनाने कि बजाय अपने हि देश ब्रिटेन से बगावत कर वहां पुंजीधारी ब्रिटिशर्स का अलग देश बना लिया। फिर दुनियाभर से ब्रिटिश कॉलोनीयों को कमजोर कर नया वर्ल्ड आर्डर निर्माण किया। लेकिन नये वर्ल्ड आर्डर में अनेक देश ऐसे थे जो वर्ल्ड आर्डर में आ तो गए पर पुरी तरह से अमेरिकी अर्थ मुल्य श्रृंखला का हिस्सा नहीं बने। उन्हें अपनी मुल्य श्रृंखला का हिस्सा बनाने अमेरिका ने हमेशा व्यापार और छुपी युद्ध रणनीति का सहारा लिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया भर में जो युद्ध अस्थिरताएं देखने को मिलती है उसके पीछे अमेरिका कि वह रणनीति रही है जिसके चलते उसने हर देश में अंतर-मान्यताओं के भेद पर हिंसा को फंडिंग कि। यह फंडिंग पैसे देकर नहीं बल्कि व्यापार में मुनाफा और फायदा पहुंचाकर कि गई ताकि अमेरिकी रणनीति गुप्त रहे और मतभेद, द्वंद्व और हिंसा के लिए आवश्यक संसाधन जुटते रहे।

03/08/2023

Is our TV News Media making the common citizens *psychopath* by spreading hate, anger, dubious debates, fake news, misleading propoganda and showing one sided half history?

The psychic attack by Railway Police Constable followed by hate speech is the unique example. When number of individual Psychopaths resulted out of political hate narratives increases, it gets converted into communal psychology. The burning Manipur, Hariyana, West Bengal are the example.

Can Supreme court take action against such TV News Channels for destroying the mental health of people?

03/08/2023

Actions and Reactions. Both matters. Silent actions are equally brutal as the violent reactions.

To stop violence there is need to understand and punish silent and standalone trivial actions along with violent reactions. Both are equally culprits of humanity.

12/10/2022

शोध खामगाव च्या लोकनीतिकारांचा !!

खामगाव च्या लोकनीति नियोजनात सहभागी व्हा,
व्हा खामगाव चे लोकनीतिकार

तुम्ही होऊ शकता खामगाव चे लोकनीतिकार!!!
फक्त खालील प्रश्नाची उत्तरे वाचा आणि लोकनीतिकार पुरस्काराचे मानकरी होण्यासाठी स्पर्धेत सहभागी व्हा ...

लोकनीतिकार पुरस्कारासाथी काय करावे लागेल?

- खामगाव च्या विकासा साथी तुमच्या कडे काही सूचना, कल्पना, विचार, योजना आहेत का? जर असतील तर आम्हाला कळवा. आम्ही तुमची मुलाखत व लेखी विचार प्रकाशित करू.
तुमचा विचार छोटा असो का मोठा, प्रत्येक विचार महत्वाचा. म्हणून निसंकोचपणे व्यक्त व्हा व खामगाव चा विकास आराखडा कसा असावा हे ठरविण्यासाठी सहभागी व्हा.

हे कोण्या राजकीय पक्षाशी निगडीत आहे का?

- नाही. सर्व राजकीय पक्षाचे सदस्य, सर्व सामान्य जनता, सामाजिक संस्था, व्यवसायिक संस्था, कोणीही व्यक्ति यात सहभागी होऊ शकते. याचा राजकारणाशी काहीही संबंध नाही. खामगावकरांनी खामगाव च्या विकासासाठी केलेला प्रयत्न. राष्ट्रीय लोकनीति विचार मंच च्या माध्यमाने.

या मागील उद्देश काय?

- खामगावचा विकास सर्वांच्या सहभागातून आणि अभ्यासपूर्ण पद्धतीने व्हावा, शाश्वत व समावेशक व्हावा या करिता हा जनतेचा सहकार्यातून केलेला लोकहिताचा प्रयोग. आपण यात सहभागी व्हा आणि खामगाव च्या विकासात योगदान द्या. याच फेसबुक पेज वर संदेश पाठवून आम्हाला कळवा. आम्ही तुम्हाला संपर्क करू.

14/09/2022
24/06/2022

*Is only one Hindutwawadi party good for Hindus?*

The current political tussle in Maharashtra has raised one more question that if BJP is Nation wide Hindutwawadi party, shall there be any other party in the Nation following Hindutwa. Almost two and half years ago this question separated BJP and ShivSena from each other. There is a long history how these two parties have complemented each other and strengthen Bhagwa Nishan movement in the politics of Maharashtra. But with the sudden rise of BJP at National Level changed the political dynamics of Maharashtra. Both the parties wanted more stake in Maharashtra and started bargaining with each other. Shiv Sena claimed that they are local party who helped BJP to grow in Maharashtra on the agenda of Hindutva hence there should be respectful division of power. BJP claimed that they are National Party and main proponent of Hindutva hence they should dictate the terms. The leaders of BJP on the other hand lured the voters emotionally by asking them to elect double engine of development means BJP in state and Centre. The leaders directly appealed the voters and politicians to join BJP on the agenda of Hindutva which created sentiments of single Hindutva claim under one banner only. This was like a su***de for Shiv Sena if they admit to BJP's hidden agenda of Single Hindutva Banner. This triggered the conflict between BJP and ShivSena and to tackle this Shiv Sena asked support from Rashtrawadi and Congress to form Government. The objective of Shiv Sena was to stop encroachment of BJP on Shiv Sena's land.

BJP had its own explanation and justification to build single banner Hindutva that it will stop division of votes and will unite Hindus. But, Shiv Sena had an another explanation that collaboration between different Hindutva Banner will be more democratic and will help to preserve Hindutva from getting diluted or loosing controll in any single hand.

BJP's operation Lotus is actually a mission to create single banner Hindutva and that's why it is offering membership in BJP to the leaders of other parties. This infact challenged the existence of other Hindutvawadi parties.

Today, when BJP succeeded to pull in their side the leaders of Shiv Sena on Hindutva agenda, this question is again got a whisper in political discussion. Some opine that giving Hindutva leadership in single hand will lead to china like socio political structure in India which will destroy democracy.

JCS Ravikant reports for-
KJC News
_The Society of Freelance Journalist of India_

01/05/2022

लोकतंत्रात्मक क्रियान्वयन कि अनेक पद्धतियां हो सकती है। "एक देश अनेक राष्ट्र", "एक राष्ट्र अनेक देश", "एक देश एक राष्ट्र" यह कुछ प्रचलित पद्धतियां है जो दुनिया भर के लोकतंत्रों मे अधिकतर देखीं गई है।

राष्ट्र और देश अलग अलग संज्ञाएं है। भारत मे राष्ट्र और देश की परिभाषाओं में भ्रमित राजनीतिक दल सत्ता कि राजनीति में लोकतंत्र को राजतंत्र बना रहे हैं। यह लोकतंत्रात्मक क्रियान्वयन तथा राष्ट्र निर्माण की निरंतर प्रक्रिया मे बाधक है। अगर ऐसा हि चलता रहा तो एक दिन हमारा प्रजासत्ताक लोकतंत्र फिर से पूंजीसत्ताक राजतंत्र में बदल जाएगा।

इतिहास गवाह है, भारत मे लोकतंत्र चलने देने के एवज में राजा महाराजाओं को तथा उनके वंशजों को सालाना राशि देनी पड़ती थी जिसे बंद करने के अनेक प्रयास हुए। आखिरकार १९७१ में इसे बंद करने के प्रस्ताव पर लोकसभा में बहुमत मिल पाया। इसके बाद क्रोधित राजवंशज भारत की राजनीति में सक्रिय होकर राष्ट्र को फिर से पूंजीसत्ताक राजतंत्र में ले जाने का प्रयास करने लगे। इससे राष्ट्रीय लोकनीति पर वैचारिक और भावनात्मक असर दिखाई दिया, जिससे भारत में राजनीतिक उथला-पुतल देखने को मिलीं। प्रांतवाद, भाषावाद, जाती वाद, पंथ वाद, धर्म वाद जिन्होने बारंबार भारत को खोखला किया है वह १९७१ के बाद सक्रिय राजनीति का अभिन्न अंग बन गये। पूंजीसत्ताक राजतांत्रिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने राजवंशी और उनके हस्तक हर राजनीतिक दल में घुस कर समाजवादी राष्ट्र कि नींव कमजोर करने लगे। इसमें हिंदू शासकों और मुस्लिम शासकों के वंशज तथा उनके जमिनदार और जागीरदार बड़े तौर पर सक्रिय होकर देश में पहले भ्रष्टाचार के नाम पर समाजवाद समाप्त करने और फिर धर्म के नाम पर लोकतंत्र को मर्यादित करने में सफल रहे। लोगों में समाजवाद और लोकतंत्र को लेकर जो भ्रम फैलाया गया उससे भारत की "एक देश एक राष्ट्र" की सोच इस राजतांत्रिक मंशा के आगे खंडित होती गई। इतिहास के रोमांचक किस्से कहानियों ने जनता को राजनिष्ठ प्रजा कि भुमिका से बाहर आने हि न दिया जिससे प्रजासत्ताक लोकतांत्रिक राष्ट्र कि प्रक्रिया धीमी पड़ गई।

आज खुलेआम धर्म के नाम पर राजनीतिक प्रयोग हो रहे हैं जो प्रजासत्ता को निरस्त कर प्रजा को मानसिक रूप से कमजोर बना रहे है। प्रजा कि यह कमजोरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधक है। आज भारत में कल्याणकारी प्रजासत्ताक समाजवादी राष्ट्र कि नींव फिर से गढ़ने कि जरूरत है।

- ज.छ.सि. रविकांत

28/03/2022

सरकार की मानें तो पढे लिखे सरकारी बाबू देश के बडे उद्योग संभाल नही सकते। फिर देश इस बात पर भी क्युं विश्वास करे की देश के अधपढे नेता राष्ट्र विकास के बडे कार्य संभाल सकेंगे?
ज.छ.सि. रविकांत
भारतीय प्रजासत्ताक समाजतत्वी

19/09/2021

॥ क्या इस अप्रत्यक्ष आरक्षण पर भी कोई बात करेगा??॥

एक किलो अच्छा सेब २०० रू किलो बिकता है और छोटा खराब सेब १०० रू किलो से बिकता है।

कोई एकसाथ ५ किलो अच्छा सेब ले तो वह ८०० रू मे मिल जाता है। याने २०० रू किलो वाला १६० रू किलो मे मतलब ४० रू पाव का हिसाब लगा।

जिसकी ५ तो क्या १ किलो भी लेने की ताकत नही वह कम भाव का याने १०० रू किलो वाला सेब १ पाव किलो हि खरिदेगा। लेकिन बाजार नियमों के हिसाब से कम खरिदने पर भाव बदल जाता है । छोटा खराब सेब १ किलो लोगे तो १०० रू देने होगे और १ पाव किलो लोगे तो २५ रू नही ३० रू देने होगे। मतलब १०० रू किलो का माल १२० रू किलो के दाम से खरिदना होगा।

वही ५० रू पाव किलो वाली सेब ६० रू पाव मे खरिदनी होगी। मतलब २०० रू वाली सेब अमिर को १६० रू मे और गरिब को २४० रू मे।

ईसे इस तरह समझिये-

आपके पास पैसा है तो आप महिने भर का १ किलो सेब खरिद लोगे १६० रू किलो के दाम से। मतलब आपका महीने का खर्चा हुआ १६० रू मात्र। वही अगर आप देहाडी कमाकर हर हफ्ते पाव किलो सेब लेते हो तो महिने भर मे आप उतना ही १ किलो सेब खरिदोगे लेकिन दाम आपको लगेगा ६० रू पाव हर हफ्ते के हिसाब से १ किलो का २४० रू। आपका महिने का उसी सेब का खर्चा हुआ २४० रू।

दोनों उदाहरण मे देखोगे की अगर आप के पास क्रय शक्ति नही है तो आप या तो खराब कम भाव वाला सेब ज्यादा मुल्य पर खरिदोगे और खराब सेब खाकर बिमार पडोगे। या फिर आप अच्छा सेब बहोत ज्यादा मुल्य पर खरिदोगे। दोनों परिस्थितियों में नुकसान आप ही का होगा।

यह बाजार प्रणाली के माध्यम से लगाया गया अप्रत्यक्ष आरक्षण है जो जीवनावश्यक चीजों पर विशिष्ट लोगों को प्रथम अधिकार देता है।

इसलिए देश को पुंजीवादी अर्थव्यवस्था और नीजीकरण का विरोध करना चाहिए। राष्ट्रियकरण और समाजवादी अर्थव्यवस्था को बरकरार रखने वाली सरकार देश मे लाना चाहिए।

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