18/02/2026
"तरावीह की रकअत: 8 या 20?"
उम्मुल मोमिनीन Aisha (रज़ि.) से रिवायत है: “नबी ﷺ रमज़ान और गैर-रमज़ान में 11 रकअत से ज़्यादा नहीं पढ़ते थे।” [Sahih al-Bukhari (हदीस 1147, 2013 के आसपास, Sahih Muslim]
और यह भी साबित है कि नबी ﷺ ने रमज़ान में 3 रातें मस्जिद में जमाअत से क़ियाम (तरावीह) पढ़ाई, फिर चौथी रात बाहर नहीं आए और फ़रमाया कि मुझे डर हुआ कि कहीं यह तुम पर फ़र्ज़ न कर दी जाए। [Sahih al- , Sahih Muslim]
इससे यह बात साफ़ होती है कि: जमाअत से क़ियाम करना साबित है। 11 रकअत का अमल नबी ﷺ से मज़बूती से साबित है। फ़र्ज़ होने के डर से आपने मस्जिद में लगातार जमाअत नहीं कराई।
2) हज़रत उमर (रज़ि.) का दौर खिलाफ़त में Umar ibn al-Khattab (रज़ि.) ने देखा कि लोग अलग-अलग इमामों के पीछे पढ़ रहे हैं। उन्होंने सबको एक इमाम (उबय्य बिन कअब रज़ि.) के पीछे जमा कर दिया और कहा: “यह अच्छी बिदअत है।” [Sahih al-Bukhari (किताबुत-तरावीह)]
यहाँ दो बातें ध्यान में रखें: उमर (रज़ि.) ने जमाअत को व्यवस्थित किया; अस्ल क़ियाम तो नबी ﷺ से ही साबित था। कुछ रिवायतों में 11 रकअत (8+3) का ज़िक्र है; Muwatta Imam Malik में 20 रकअत का भी ज़िक्र मिलता है वो हदीस ज़ईफ़ व कमजोर है।
3) 8 रकअत बनाम 20 रकअत अस्ल मसला क्या है? 11 रकअत (8+3) नबी ﷺ से सहीह हदीसों में मज़बूती से साबित है। 20 रकअत का अमल बहुत से फुक़हा (ख़ासकर हनफ़ी, शाफ़ई, हम्बली) के यहाँ मशहूर है, और कई शहरों में सहाबा/ताबिईन के दौर से 40 तक पढ़ना चला आ रहा है।
मसला “जायज़ या नाजायज़” का नहीं, बल्कि “अफ़ज़ल क्या है” और “किस पर अमल किया जाए” का है। कई बड़े उलेमा ने लिखा है: अगर कोई 8 रकअत पढ़े और वित्र मिलाकर 11 करे तो यह सुन्नत के क़रीब है।
अगर कोई 20 रकअत पढ़े तो भी क़ियामुल्लैल है और नफ़्ल है, जायज़ है; क्योंकि नबी ﷺ ने क़ियाम की रकअत को सीमित नहीं किया, बल्कि लंबी क़िराअत और ख़ुशू’ की तरतीब दी।
4) घर की नमाज़ बेहतर? नबी ﷺ का इरशाद है: “फ़र्ज़ के अलावा आदमी की सबसे बेहतर नमाज़ उसके घर में है।” [ ] क्योंकि उन्होंने सबको एक इमाम (उबय्य बिन कअब रज़ि.) के पीछे जमा कर दिया और खुद घर जा कर तरावीह पढ़ी।
इसलिए: मस्जिद में जमाअत से भी पढ़ सकते हैं। और तरावीह घर में भी पढ़ सकते हैं। मगर अफ़ज़ल घर मे पढ़ना है। दोनों तरीके सही हैं।
5) फ़ैसला कैसे करें? कौन सी बात सही है।” इंसाफ़ के साथ कहें तो: नबी ﷺ से 11 रकअत मज़बूत सहीह हदीस से साबित है। 20 रकअत का अमल भी सहाबा/ताबिईन के दौर में मशहूर रहा और बहुत से इमामों ने उसे अपनाया। इसलिए: जो 8 (और वित्र मिलाकर 11) पढ़े उस पर ऐतराज़ नहीं। जो 20 पढ़े उसे बिदअत या गुमराही कहना सही नहीं।
#अस्ल_मक़सद: क़ियाम, तिलावत, ख़ुशू’, और रमज़ान की इबादत है। नतीजा (ख़ुलासा) तरावीह नफ़्ल/क़ियामुल्लैल है, फ़र्ज़ नहीं। 11 रकअत सुन्नत से मज़बूत तौर पर साबित है। 20 रकअत पर भी सदियों से अमल होता आया है। इस मसले में तशद्दुद (सख़्ती) और एक-दूसरे को ग़लत कहना मुनासिब नहीं।