Mahuawa

Mahuawa بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ.
★ ▁ ▂ ▄ ?

"तरावीह की रकअत: 8 या 20?"उम्मुल मोमिनीन Aisha (रज़ि.) से रिवायत है: “नबी ﷺ रमज़ान और गैर-रमज़ान में 11 रकअत से ज़्यादा ...
18/02/2026

"तरावीह की रकअत: 8 या 20?"

उम्मुल मोमिनीन Aisha (रज़ि.) से रिवायत है: “नबी ﷺ रमज़ान और गैर-रमज़ान में 11 रकअत से ज़्यादा नहीं पढ़ते थे।” [Sahih al-Bukhari (हदीस 1147, 2013 के आसपास, Sahih Muslim]

और यह भी साबित है कि नबी ﷺ ने रमज़ान में 3 रातें मस्जिद में जमाअत से क़ियाम (तरावीह) पढ़ाई, फिर चौथी रात बाहर नहीं आए और फ़रमाया कि मुझे डर हुआ कि कहीं यह तुम पर फ़र्ज़ न कर दी जाए। [Sahih al- , Sahih Muslim]

इससे यह बात साफ़ होती है कि: जमाअत से क़ियाम करना साबित है। 11 रकअत का अमल नबी ﷺ से मज़बूती से साबित है। फ़र्ज़ होने के डर से आपने मस्जिद में लगातार जमाअत नहीं कराई।

2) हज़रत उमर (रज़ि.) का दौर खिलाफ़त में Umar ibn al-Khattab (रज़ि.) ने देखा कि लोग अलग-अलग इमामों के पीछे पढ़ रहे हैं। उन्होंने सबको एक इमाम (उबय्य बिन कअब रज़ि.) के पीछे जमा कर दिया और कहा: “यह अच्छी बिदअत है।” [Sahih al-Bukhari (किताबुत-तरावीह)]

यहाँ दो बातें ध्यान में रखें: उमर (रज़ि.) ने जमाअत को व्यवस्थित किया; अस्ल क़ियाम तो नबी ﷺ से ही साबित था। कुछ रिवायतों में 11 रकअत (8+3) का ज़िक्र है; Muwatta Imam Malik में 20 रकअत का भी ज़िक्र मिलता है वो हदीस ज़ईफ़ व कमजोर है।

3) 8 रकअत बनाम 20 रकअत अस्ल मसला क्या है? 11 रकअत (8+3) नबी ﷺ से सहीह हदीसों में मज़बूती से साबित है। 20 रकअत का अमल बहुत से फुक़हा (ख़ासकर हनफ़ी, शाफ़ई, हम्बली) के यहाँ मशहूर है, और कई शहरों में सहाबा/ताबिईन के दौर से 40 तक पढ़ना चला आ रहा है।

मसला “जायज़ या नाजायज़” का नहीं, बल्कि “अफ़ज़ल क्या है” और “किस पर अमल किया जाए” का है। कई बड़े उलेमा ने लिखा है: अगर कोई 8 रकअत पढ़े और वित्र मिलाकर 11 करे तो यह सुन्नत के क़रीब है।

अगर कोई 20 रकअत पढ़े तो भी क़ियामुल्लैल है और नफ़्ल है, जायज़ है; क्योंकि नबी ﷺ ने क़ियाम की रकअत को सीमित नहीं किया, बल्कि लंबी क़िराअत और ख़ुशू’ की तरतीब दी।

4) घर की नमाज़ बेहतर? नबी ﷺ का इरशाद है: “फ़र्ज़ के अलावा आदमी की सबसे बेहतर नमाज़ उसके घर में है।” [ ] क्योंकि उन्होंने सबको एक इमाम (उबय्य बिन कअब रज़ि.) के पीछे जमा कर दिया और खुद घर जा कर तरावीह पढ़ी।

इसलिए: मस्जिद में जमाअत से भी पढ़ सकते हैं। और तरावीह घर में भी पढ़ सकते हैं। मगर अफ़ज़ल घर मे पढ़ना है। दोनों तरीके सही हैं।

5) फ़ैसला कैसे करें? कौन सी बात सही है।” इंसाफ़ के साथ कहें तो: नबी ﷺ से 11 रकअत मज़बूत सहीह हदीस से साबित है। 20 रकअत का अमल भी सहाबा/ताबिईन के दौर में मशहूर रहा और बहुत से इमामों ने उसे अपनाया। इसलिए: जो 8 (और वित्र मिलाकर 11) पढ़े उस पर ऐतराज़ नहीं। जो 20 पढ़े उसे बिदअत या गुमराही कहना सही नहीं।

#अस्ल_मक़सद: क़ियाम, तिलावत, ख़ुशू’, और रमज़ान की इबादत है। नतीजा (ख़ुलासा) तरावीह नफ़्ल/क़ियामुल्लैल है, फ़र्ज़ नहीं। 11 रकअत सुन्नत से मज़बूत तौर पर साबित है। 20 रकअत पर भी सदियों से अमल होता आया है। इस मसले में तशद्दुद (सख़्ती) और एक-दूसरे को ग़लत कहना मुनासिब नहीं।

23/12/2025
*इतना भी आसान नहीं है मो॰ सर्फ़ुद्दीन होना*राजनीति में जीत-हार आती-जाती रहती है, लेकिन कुछ लोग अपनी पहचान केवल जीत से नह...
15/11/2025

*इतना भी आसान नहीं है मो॰ सर्फ़ुद्दीन होना*

राजनीति में जीत-हार आती-जाती रहती है, लेकिन कुछ लोग अपनी पहचान केवल जीत से नहीं, बल्कि संघर्ष, सेवा और जनता से जुड़े रिश्तों से बनाते हैं।
मो. सर्फ़ुद्दीन ऐसा ही एक नाम है।

दो बार विधायक रहकर उन्होंने न सिर्फ़ काम किया, बल्कि हर हाल में जनता के साथ खड़े रहे। यही वजह है कि लोग उन्हें सिर्फ़ एक नेता नहीं, अपने सच्चे प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं।

इस बार का चुनाव परिणाम भले उनके पक्ष में नहीं रहा, मगर हार कभी मेहनत, नीयत या लोकप्रियता को कम नहीं करती। लोकतंत्र में जनता का फ़ैसला सर्वोपरि है—और मो सर्फ़ुद्दीन ने हमेशा इसे सिर झुकाकर स्वीकार किया है।

राजनीति कुर्सी का खेल नहीं, यह एक लंबी सेवा-यात्रा है, जिसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं।
लेकिन जो नेता जनता की नब्ज़ समझता हो, उनके सुख-दुख में शामिल रहता हो—उसे एक चुनावी हार रोक नहीं सकती।

कुछ लोग सिर्फ़ चुनावी मौसम में दिखते हैं और परिणाम खत्म होते ही वापस वहीं लौट जाते हैं, जहाँ से आए थे।
जो लोग मो सर्फ़ुद्दीन के खिलाफ थे, क्या वो अपने नेता से प्रश्न कर सकते है ?—
“जिसे हमने वोट दिया… वो आज हमें छोड़कर कहाँ जा रहा है?”

भरोसा लौटकर आता है।
चुनौतियाँ नए अवसर बनाती हैं।
और जो नेता जमीन से जुड़े रहते हैं—वे और मजबूत होकर वापसी करते हैं।

गलतियाँ हुई होंगी, कमियाँ रह गई होंगी…
लेकिन उन्हें सुधारकर अगली बार दोगुनी ताक़त से लड़ेंगे—ये भरोसा जनता को भी है और मो सर्फ़ुद्दीन को भी।

सर्फ़ुद्दीन की कहानी खत्म नहीं हुई है—अब एक नया अध्याय शुरू हो रहा है।

10/11/2025

शिवहर जिला अधिकारी की अपील

चंदा बाबू और उमा देवी कृष्णैया:-आपने चंदा बाबू और उनके दो बेटों का नाम बार बार सुना होगा , हां वही , तेज़ाब से नहला दिया...
02/11/2025

चंदा बाबू और उमा देवी कृष्णैया:-

आपने चंदा बाबू और उनके दो बेटों का नाम बार बार सुना होगा , हां वही , तेज़ाब से नहला दिया, ब्ला ब्ला ब्ला। मगर क्या आपने जी कृष्णैया का नाम उस तरह सुना ? नहीं सुना होगा।

चलिए मैं डिटेल के साथ बताता हूं

जी. कृष्णैया का जन्म तत्कालीन आंध्र प्रदेश और अब के तेलंगाना के महबूबनगर जिले के एक बेहद गरीब दलित परिवार में हुआ था , उनके पिता रेलवे में गैंगमैन (कुली) की नौकरी करते थे।

कृष्णैया ने बहुत गरीबी और मुश्किल हालात में अपनी पढ़ाई की , पिता के साथ कुली का काम किया और साथ में पढ़ाई भी की और मेहनत करके UPSC परीक्षा पास कर 1985 बैच के IAS अधिकारी बने और कैडर मिला बिहार।

बिहार कैडर में आने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग पश्चिम चंपारण में हुई। अपनी पोस्टिंग के बाद ही वह सादगीपूर्ण जीवन जीने और गरीबों के मसीहा के रूप में चर्चित होने लगे क्योंकि वह रोजाना सैकड़ों लोगों से मिलते थे, उनकी समस्याएं सुनते और समाधान करते।

इसके बाद लालू प्रसाद यादव की सरकार में मात्र 37 साल की उम्र में वह गोपालगंज के जिलाधिकारी बने और डकैतों के गढ़ में भी उन्होंने भूमि सुधार जैसे कठिन कार्यों को बखूबी निभाया और उनके इस काम में उन्हें जमींदारों का भारी विरोध झेलना पड़ा।

इस सबके बावजूद उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि जिले का आम आदमी उन्हें "डीएम साहब" कहकर प्यार से पुकारता था कोई भी सीधे जिलाधिकारी के पास अपनी समस्याएं लेकर पहुंच जाता मगर इसी कारण वह जमींदारों की आंखों की किरकिरी थे।

यह वही दौर था जब लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री काल में बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई चरम पर थी और वह तबका जो समाज में अछूत था वह सत्ता के शीर्ष पर आने लगा‌, मंत्री विधायक बनने लगा था। और स्वर्ण जातियां इस कारण उग्र हो रहीं थीं।

इसी बीच दिसंबर 1994‌ को मुजफ्फरपुर में स्थानीय गैंगस्टर छोटन शुक्ला की हत्या हो गई। जानते हैं कि छोटन शुक्ला कौन थे ? बाहुबली गैंग्स्टर मुन्ना शुक्ला के छोटे भाई और लालगंज विधानसभा क्षेत्र से राजद के टिकट पर चुनाव लड़ रही शिवानी शुक्ला के सगे चाचा।

छोटन शुक्ला के समर्थक और तत्कालीन विधायक आनंद मोहन सिंह के नेतृत्व में हजारों की उग्र भीड़ छोटन शुक्ला की शवयात्रा के बहाने सड़क जाम कर प्रदर्शन कर रही थी। और उग्र भीड़ शुक्ला की मौत का बदला लेने के नारे लगा रही थी।

5 दिसंबर 1994 को दोपहर में गोपालगंज जिले के खाबरा गांव के पास मुजफ्फरपुर-गोपालगंज हाईवे से गोपालगंज के जिलाधिकारी कृष्णैया एक आधिकारिक बैठक से सफेद अंबेसडर में बैठे लौट रहे थे और उनके साथ में थे ड्राइवर दीपक कुमार और गनर।

हाईवे पर सड़क जाम के कारण गाड़ी रुक गई। उग्र भीड़ ने गाड़ी को मुज़फ्फरपुर जिलाधिकारी की कार समझ लिया और भीड़ ने गाड़ी पर हमला कर दिया, टायर फोड़े, शीशे तोड़े और जी कृष्णैया को कार से बाहर खींच लिया।

कृष्णैया चिल्लाते रहे कि "मैं गोपालगंज का DM हूं, मुजफ्फरपुर का नहीं", लेकिन गुस्सैल भीड़ ने उन्हें पीटना शुरू कर दिया और वह घायल होकर ज़मीन पर गिर गये। इस पिटाई के दौरान आनंद मोहन ने जिलाधिकारी कृष्णैया के सिर में दो गोलियां मार दी।

बाहुबली नेता आनंद मोहन सिंह को भीड़ का नेतृत्व करने और गोली चलाने का दोषी ठहराया गया और 2007 में पटना की निचली अदालत ने आनंद मोहन को फांसी की सजा सुनाई जिसे बाद में पटना हाईकोर्ट ने इसे उम्रकैद में बदल दिया।

फांसी की सज़ा पा चुके ऐसे आनंद मोहन सिंह को 2023 में नितीश कुमार की बिहार सरकार के जेल मैनुअल संशोधन के कारण उन्हें रिहा कर दिया गया।

30 साल से संघर्ष कर रही उमा कृष्णेय्या आज भी न्याय के लिए संघर्षरत हैं और कहती हैं कि "मैं अपने पति के न्याय के लिए आखिरी सांस तक लड़ूंगी"

अब आनंद मोहन सिंह नितीश कुमार के करीबी हैं और उनकी पत्नी लवली आनंद जदयू से सांसद और बड़ा बेटा विधायक है और दूसरे बेटे को भाजपा में सेट करने में लगे हुए हैं....उस पर सब चुप हैं और ओसामा शहाब पर तमाम मुख्यमंत्री और गृहमंत्री आक्रमण कर रहे हैं।

यही फर्क है शहाबुद्दीन और आनंद मोहन सिंह का

साभार: मोहम्मद ज़ाहिद

हम एक हैं और रहेंगे, इंशाअल्लाह। हमारी मोहब्बत और इत्तेहाद को कोई तोड़ नहीं सकता—यही हमारी सबसे बड़ी जीत है।
30/10/2025

हम एक हैं और रहेंगे, इंशाअल्लाह। हमारी मोहब्बत और इत्तेहाद को कोई तोड़ नहीं सकता—यही हमारी सबसे बड़ी जीत है।

NDA का हर तीसरा उम्मीदवार सवर्ण हिंदू है!आखिर क्या कारण है कि 10.56% आबादी वाले सवर्ण हिंदू को NDA ने 35% टिकट दिया है?N...
20/10/2025

NDA का हर तीसरा उम्मीदवार सवर्ण हिंदू है!
आखिर क्या कारण है कि 10.56% आबादी वाले
सवर्ण हिंदू को NDA ने 35% टिकट दिया है?
NDA ने 5 मुस्लिम कैंडिडेट दिए हैं,
JDU की तरफ से 4
और चिराग पासवान की तरफ से एक…
BJP, HAM और RLM ने
एक भी मुस्लिम कैंडिडेट को टिकट नहीं दिया है!

20% का लुकमा :-एक लुकमा‌ दिया जा रहा है कि 14% यादव मुख्यमंत्री बन सकता है तो 20% मुसलमान क्यों नहीं ? ब्राह्मण 3.66% हो...
17/10/2025

20% का लुकमा :-

एक लुकमा‌ दिया जा रहा है कि 14% यादव मुख्यमंत्री बन सकता है तो 20% मुसलमान क्यों नहीं ?

ब्राह्मण 3.66% होकर मुख्यमंत्री बन सकता है तो 20% मुसलमान क्यों नहीं?

कोईरी कुशवाहा दलित 10%-12% होकर मुख्यमंत्री बन सकता है तो 20% मुसलमान क्यों नहीं ?

बता दूं कि यही देश के सारे हिन्दू सोचने लगें तो भारत में मुसलमान दोयम दर्जे का नागरिक बन जाएगा और मुख्यमंत्री बनना तो छोड़िए वोट देने लायक नहीं रहेंगे।

और लगभग 40-50% हिन्दू सोचने लगा है .. यही इस देश में मुसलमानों के लिए ख़तरे की घंटी है... क्योंकि यादव , ब्राह्मण, कोईरी , कुशवाहा और दलित भी अंततः हिंदू ही है जैसे आप मुसलमान हैं।

फिर कोई कपिल सिब्बल, कोई अभिषेक मनु सिंघवी , राजीव धवन और प्रशांत भूषण ना बाबरी मस्जिद का मुकदमा लड़ेगा ना वक्फ़ बोर्ड का ना अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का.. क्यों लड़ेगा? वह भी हिन्दू ही हैं...

कहने का मतलब यह है कि जो कोशिश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मोहन भागवत कर रहे हैं वही कोशिश सदर साहब कर रहे हैं... दोनों एक ही हैं,...बस रंग अलग अलग है‌।

जम्मू-कश्मीर जैसा मुस्लिम बहुल राज्य छोड़ दें तो इस देश में हिंदुओं ने ही तमाम मुसलमानों को मुख्यमंत्री भी बनाया है और ऐसे राज्यों का मुख्यमंत्री मुसलमान को बनाया है जहां मुस्लिम जनसंख्या 5-6% है।

असम मे सैयदा अनवरा तैमूर को तो देश की पहली मुस्लिम महिला मुख्यमंत्री बनाया।

बिहार में अब्दुल गफूर को मुख्यमंत्री बनाया।

केरल में सी.एच. मोहम्मद कोया को मुख्यमंत्री बनाया।

महाराष्ट्र में अब्दुल रहमान अंतुले को मुख्यमंत्री बनाया।

मणिपुर में मोहम्मद अलिमुद्दीन को मुख्यमंत्री बनाया।

राजस्थान में बरकतुल्लाह खान को मुख्यमंत्री बनाया।

और यह सब 20% मुस्लिम जनसंख्या के बल पर मुख्यमंत्री नहीं बने बल्कि हिन्दू भाईयों ने आपसी मुहब्बत में इन्हें स्वीकार किया इसलिए मुख्यमंत्री बने...

इसलिए 20% की धौंस मत दीजिए नहीं तो एक मुस्लिम विधायक देखने को तरस जाएंगे, थाने पुलिस और सरकारी विभागों में आप एक सिफारिश कराने के लिए तरस जाएंगे, जैसे हम उत्तर प्रदेश वाले तरस रहे हैं..

दरअसल आपकी बोली वही है जो उत्तर प्रदेश में 80:20 करके चुनाव जीतने वालों की है , दोनों अपने अपने हिस्से की राजनीति कर रहे हैं।

आप 20 को एक कर रहे हैं मगर कर नहीं पाएंगे, ख़लीफा पर अपना 1400 का इतिहास पढ़ लीजिए, मगर आपकी इस राजनीति का सहारा लेकर वह 80% को एक कर लेंगे...

40% अर्थात आधा कर ही लिया...

बिहार में सिर्फ जहानाबाद में आधार सैचुरेशन 97% है। बाक़ी सभी जिलों में 100% से ज्यादा है। लेकिन गोदी मीडिया सिर्फ मुस्लि...
11/07/2025

बिहार में सिर्फ जहानाबाद में आधार सैचुरेशन 97% है।
बाक़ी सभी जिलों में 100% से ज्यादा है।
लेकिन गोदी मीडिया सिर्फ मुस्लिम संख्या वाले जिलों किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार का डाटा दिखा रही है।
गोदी मीडिया ना सिर्फ सांप्रदायिक है, बल्कि झूठी भी है।

वक्फ बचाओ आंदोलन पहचान, हिस्सेदारी और इंकलाब की सदा 29 जून 2025 — तारीख़ की पेशानी पर आज का दिन इंकलाब की रोशनाई से लिखा...
29/06/2025

वक्फ बचाओ आंदोलन पहचान, हिस्सेदारी और इंकलाब की सदा


29 जून 2025 — तारीख़ की पेशानी पर आज का दिन इंकलाब की रोशनाई से लिखा जाएगा। पटना का ऐतिहासिक गांधी मैदान आज नारा बन चुका है वक्फ बचाओ, संविधान बचाओ, वजूद बचाओ रात लाखों लोग दूर-दराज़ के गांव-कस्बों, शहरों और ग़रीब बस्तियों से पटना की सरज़मीन पर उतर चुके हैं। जैसे कोई क़ौम अपने माजी से, अपने हक़ से और अपने अस्तित्व से मिलने निकली हो।
पटना का चप्पा-चप्पा गवाही दे रहा है कि ये सिर्फ़ एक आंदोलन नहीं ये एहसास की सच्चाई है, ये ज़ुल्म के ख़िलाफ़ उठता हुआ लहजा है, ये इंसाफ़ की आख़िरी पुकार है।

✊ सब्र अब हद पार कर चुका है… कभी वक्फ की ज़मीनें बेची जाती हैं, कभी हमारी मस्जिदें ढहाई जाती हैं, कभी अज़ान को ‘शोर’ बताया जाता है, तो कभी हमारे बुर्के, दाढ़ी, टोपी और नाम से नफ़रत की जाती है। क्या अब हमारा खाना, हमारा पहनावा, हमारी इबादत सब सियासत का मुद्दा बन जाएंगे? क्या हम अपने ही मुल्क़ में अपने नाम से डरकर जीएंगे? नहीं अब नहीं अब खामोशी गुनाह है अब झुकना मौत है।
अब वक्त है इंकलाब का। मस्जिदों से सिर्फ़ अज़ान ही नहीं, इंकलाब की आवाज़ भी बुलंद होनी चाहिए। मदरसों में सिर्फ़ किताबें ही नहीं, क़ौमी हिफ़ाज़त की बात भी होनी चाहिए। हर गली, हर चौक, हर पंचायत इस जुल्म के खिलाफ़ आवाज़ बन जाए।जो आज खामोश हैं, कल वो भी इस आग की लपट में आएंगे। अब वक़्त है एक साथ, एक आवाज़ बनकर उठने का।
अब हम सिर झुकाकर नहीं, सीना तानकर जिएंगे।अब हम सिर्फ़ सवाल नहीं, जवाब भी मांगेंगे। अब हम किसी के वोट बैंक नहीं, इस देश के बराबर के नागरिक हैं। अब हम न डरेंगे, न झुकेंगे — इंकलाब लाएंगे। वक्फ बचाओ आंदोलन – अब वक्त है इंकलाब का! जहां वक्फ की मिट्टी गवाही दे, वहां खामोशी गुनाह है। #वक़्फ़ बचाओ - संविधान बचाओ

आयोजक: इमारत-ए-शरिया
📍 स्थान: ऐतिहासिक गांधी मैदान, पटना
📅 तारीख: 29 जून 2025
🕚 समय: दोपहर 11 बजे

⚖️ आइए! वक़्फ़ की हिफाज़त और संविधान की हिफाज़त के लिए एक मज़बूत क़दम मिलकर उठाएं।🧕🏽👳🏽‍♂️ बिहार ही नहीं, पूरे देश को दिखा दीजिए हम जाग चुके हैं, और अब चुप नहीं बैठेंगे! 📢 हर साथी, हर तबक़ा — गांधी मैदान में नज़र आना चाहिए!🤝 आपकी मौजूदगी, हमारी ताक़त — हमारी आवाज़!

अमरीका ने ईरान के परमाणु संस्थानों पर प्रतीकात्मक हमले किए थे, वो चाहता तो हमले और भीषण हो सकते थे।ठीक वैसे ही ईरान ने क...
24/06/2025

अमरीका ने ईरान के परमाणु संस्थानों पर प्रतीकात्मक हमले किए थे, वो चाहता तो हमले और भीषण हो सकते थे।

ठीक वैसे ही ईरान ने क़तर में अमरीकी ठिकानों पर भी प्रतीकात्मक हमला ही किया है वो भी आम मिसाइलों से जो आराम से इंटरसेप्ट कर ली गई थीं।

मुल्क में घरों में सोफ़ो पर बैठकर ईरान द्वारा खाड़ी देशों की तबाही की उम्मीदें लगाए क्रांतिकारियों से गुज़ारिश है कि तैश में नहीं आएं, थोड़ी देर मोबाइल साइड में रखकर खाड़ी देशों में भारतीय कामगारों के बारे सोचें।

मोटे तौर पर खाड़ी देशों में भारतीय कामगारों और प्रोफेशनल की संख्या 90 लाख से लेकर 1 करोड़ है।

सोचें कि खाड़ी देशों में मुल्क के लाखों लोग, किसी के बेटे, किसी के भाई, किसी के बाप, किसी के शौहर वहां कमाने गए हुए हैं, लाखों घरों के चूल्हे उनकी वजह से जल रहे हैं, बच्चे पढ़ रहे हैं, बहन बेटियों की शादियां हो रही हैं।

लाखों हज ज़ायरीन सऊदी अरब में मौजूद हैं, आने वाले दिनों में उनकी वापसी भी होना है।

ऐसे में अगर इस जंग ने रफ्तार पकड़ ली और ईरान ने खाड़ी देशों पर इजरायल जैसे हमले कर दिए तो लोगों के कलेजे भले ही ठंडे हो जाएं मगर लाखों भारतीयों की नौकरी धंधे खत्म हो जाएंगे। दुनिया में सबसे ज्यादा बेरोजगारों के देश में आकर खाड़ी देशों से लौटने वाले क्या करेंगे ?

ईरान इज़राईल युद्ध सीधी लाइन पर रहे तो ठीक है, खाड़ी देशों की ओर स्टीयरिंग घूम गया तो भारत के लाखों लोगों की रोजी-रोटी संकट में पड़ जाएगी।

अमरीका चाहता भी यही है कि ईरान खाड़ी देशों से उलझ जाए, शिया सुन्नी बखेड़ा खड़ा हो जाए और ईरान का ध्यान इज़राईल से हट जाए, इस तरह से ईरान की ताक़त आधी रह जाएगी, साथ ही खाड़ी देशों को बचाने के लिए फिर से ट्रंप सुपरमैन बनकर ईरान को खदेड़ कर वहां अपनी जड़ें ओर ज्यादा मजबूत कर लेगा।

Address

Sheohar

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Mahuawa posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share