06/11/2024
एक नज़्म :
जिस देश में ...!
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जिस देश में जनपथ पर कीलों के तार लगाए जाते हों
जिस देश में बैरीकेड लगा शहरी धकिआए जाते हों
जिस देश में मज़लूमों को आँसू-गैस सुंघाया जाता हो
हक़ की उठती आवाजों को गोली से दबाया जाता हो
प्ले-कार्ड दिखाने पर भी जहाँ पैलेट के छर्रे चलते हों
जिस देश में जन अधिकारों पर लाठी और हुर्रे चलते हों
जिस देश में पानी की बौछारें ठंड में छोड़ी जाती हों
जिस देश में सच कहनेवालों की हड्डी तोड़ी जाती हों
जिस देश में हर सू नफ़रत की दीवार उठाई जाती हो
जिस देश में धर्म , भाषा , जाति की आग लगाई जाती हो
जिस देश का थाना खुलेआम गुंडागर्दी का अड्डा हो
जिस देश की संसद की बहसें खालिस मजाक एक भद्दा हो
जिस देश के मज़दूरों से खुलकर हकमारी की जाती हो
जिस देश के दहकनों की हड्डी-हड्डी दिखती छाती हो
जिस देश में पैसे के बल पर कानून खरीदा जाता हो
जिस देश के ' जनप्रतिनिधियों' का सारे चोरों से नाता हो
जिस देश के बच्चों का बचपन कचरा चुनते सड़ जाता हो
जिस देश का यौवन हो हताश रस्सी से लटक मर जाता हो
जिस देश में बेटी नंगी कर सड़कों पे घुमाई जाती हो
जिस देश का शासक जालिम हो,और खुद शासन उत्पाती हो
उस देश के जालिम शासक को गद्दी से हटाना वाजिब है
उस देश के सड़ते सिस्टम में अब आग लगाना वाजिब है ।
--- आदित्य कमल