28/01/2025
"अक्षरहीन"
शाम की ट्रेन से लौट रहा हूँ। पांशकुड़ा लोकल। चूंकि मैं पांशकुड़ा से ही ट्रेन पकड़ता हूँ, इसलिए मनचाही सीट भी मिल जाती है। आज ट्रेन खाली है। कोई शोर-शराबा नहीं, बस इक्का-दुक्का फेरीवाले। शांत माहौल; मैं अपने मोबाइल पर टाइप कर रहा हूँ। दरअसल, कल मैंने एक कहानी लिखना शुरू किया था, लेकिन पूरी नहीं कर पाया। सोचा, आज थोड़ा आगे बढ़ा दूँ।
लिखते-लिखते तीन स्टेशन पार कर चुका था, जब मेरी ट्रेन मेचेदा की ओर बढ़ने लगी। मेचेदा स्टेशन पर भीड़ थोड़ी बढ़ जाती है।
मेचेदा स्टेशन आते ही मेरी लिखने की लय टूट गई। एक वृद्ध सज्जन मेरे बगल में आकर बैठ गए। उम्र करीब साठ से थोड़ा ऊपर होगी। मैं लिखने में व्यस्त था कि उन्होंने मेरे कंधे से कंधा टिका लिया और मोबाइल की स्क्रीन पर झाँकने लगे। बेचैनी से पूछ बैठे –
"क्या लिख रहे हो इतने ध्यान से?"
कोई बात करना चाहे तो चुप रहा नहीं जाता, चाहे मैं कितना भी व्यस्त क्यों न रहूँ। जवाब देना पड़ा – "कहानी।"
"कहानी? कैसी कहानी?"
उन्होंने जिस तरह से सवाल करना शुरू किया, मुझे लगा कि अब मुझे लिखने नहीं देंगे। मुस्कुराकर जवाब दिया – "प्रेम कहानी।"
"प्रेम कहानी? यानी तुम लिखते हो? कैसा प्रेम?"
"कैसा प्रेम" वाले सवाल का क्या जवाब दूँ, यह सोच ही रहा था कि उन्होंने दूसरा सवाल दाग दिया –
"क्या करते हो? देखकर लग रहा है कि ऑफिस से लौट रहे हो, सही कहा न?"
मोबाइल जेब में रखना पड़ा। मुझे लग रहा था कि जब तक मेरी पूरी कुंडली न निकाल लें, तब तक नहीं छोड़ेंगे। मुस्कुराकर जवाब दिया – "सही पकड़ा आपने।"
"अरे भई, सही तो बोलूँगा ही। इतने लोगों से मिलता हूँ, सबको समझना पड़ता है। तो, कहाँ नौकरी करते हो?"
मन में खयाल आया कि कहीं ये जासूस तो नहीं? फिर जवाब दिया – "स्कूल में।"
"स्कूल में? प्राइमरी या हाई?"
"हाई स्कूल।"
"देखकर तो लगता है कि उम्र ज्यादा नहीं है।"
मैं हँस पड़ा। हँसते हुए पूछा –
"तो बताइए, मेरी उम्र कितनी होगी?"
उन्होंने थोड़ा झुककर मेरे चेहरे को गौर से देखा और बोले –
"तुमने टोपी और मफलर से चेहरा ढका हुआ है, इसलिए अंदाजा लगाना मुश्किल है। लेकिन मेरे हिसाब से तुम उन्नतीस के होंगे। शादी नहीं हुई, है न?"
इतने सारे सवाल सुनकर मुझे थोड़ा शक हुआ। कहीं ये कोई शादी कराने वाले बिचौलिए तो नहीं? फिर उन्होंने पूछ ही लिया –
"शादी करोगे या नहीं?"
"क्यों?"
"नहीं, बस यूँ ही! देखो, तुम लिख रहे थे, अगर शादीशुदा होते तो ये सब दिमाग में नहीं आता। मैं भी कभी कविताएँ लिखता था, वो भी प्रेम कविताएँ। फिर..."
वो अचानक चुप हो गए। मैंने पूछा –
"फिर क्या हुआ?"
"फिर शादी हो गई... और कविता चली गई।"
उनकी बात समझ नहीं आई, तो मैं हैरान होकर देखने लगा। उन्होंने हँसते हुए पूछा –
"समझे नहीं?"
"नहीं।"
वो हँस पड़े –
"मेरी पत्नी का नाम 'कविता' है। जब से 'कविता' आई, तब से मेरी ज़िंदगी से असली कविता चली गई। लेकिन मुझे इसका अफसोस नहीं। शादी के बाद से वही (पत्नी) लिखती है, और मैं पढ़ता हूँ।"
"ओह! आपकी पत्नी भी लिखती हैं?"
"अरे नहीं! उसे कविता की 'क' भी नहीं आती। लेकिन पिछले तीस सालों से लिख रही है – राशन की लिस्ट, सब्जियों की लिस्ट, घर की जरूरतों की लिस्ट। मेरा भुलक्कड़ दिमाग, इसलिए वो लिस्ट लिखकर मेरे हाथ में पकड़ा देती है और कहती है – जोर से पढ़ो! अब मैं ज़ोर से पढ़ता हूँ, यानी मजबूरन पढ़ता हूँ।"
"लेकिन ज़ोर से पढ़ने को क्यों कहती हैं?"
"वो भी एक कहानी है! उसकी लिखावट बहुत खराब है, ऊपर से ढेरों गलतियाँ। लेकिन हाँ, हाथ का खाना बहुत अच्छा बनाती है। एक दिन लिस्ट लिखकर बोली – पाँच चीजें लिखी हैं, ध्यान से पढ़कर ही खरीदना। मैंने सामान ला दिया, और फिर झगड़ा शुरू। गुस्से में बोली – 'मैंने कैसी अनपढ़ से शादी कर ली जो मेरी लिखाई तक नहीं पढ़ सकता!'
अनपढ़ कहने पर मुझे भी गुस्सा आ गया – 'अनपढ़? क्या मतलब?'
"मैंने 'मूढ़ी' (मुरमुरा) एक किलो लिखा था, और तुम 'मौरी' (सौंफ) एक किलो ले आए। अब समझो मेरी हालत!"
मैं हँसते-हँसते पागल हो गया। मुझे हँसता देख उन्होंने कहा –
"शादी नहीं की है न? करोगे तो समझोगे! फिर ये प्रेम कहानियाँ लिखने की फुर्सत नहीं मिलेगी। एक किलो मौरी लाने के बाद जो हाल हुआ, वो मैं ही जानता हूँ। फिर भी शादी करोगे?"
मैं सोच में पड़ गया। आदमी तो बड़ा मज़ाकिया निकला! आखिर में मैंने कह ही दिया – "नहीं, अब शादी नहीं करनी! पहले ही एक शादी कर चुका हूँ।"
उन्होंने चौंककर पूछा –
"ओहो! मैं डाल-डाल चलता हूँ, और तुम पात-पात? शादी कर भी ली? फिर भी लिख रहे हो? कैसे?"
"दरअसल, शादी के बाद ही मैं लिखने लगा हूँ। पहले मेरे अंदर लिखने का हुनर ही नहीं था।"
वो और उत्सुक हो गए –
"शादी के बाद लिखने की प्रेरणा कैसे मिली?"
मैं हँसकर बोला –
"मेरी पत्नी का नाम 'लेखा' है। जिसकी पत्नी 'लेखा' हो, उसे लिखना ही पड़ता है। इसलिए लिख भी रहा हूँ और पढ़ भी रहा हूँ। हम पुरुष लोग शादी से पहले कितना पढ़े-लिखे हैं, यह मायने नहीं रखता, लेकिन शादी के बाद हर पत्नी 'लेखा' बन जाती है। फिर हमें उसे पढ़ना ही पड़ता है। पढ़ना चाहो या न चाहो, पढ़ना मजबूरी है। और न पढ़ने का अंजाम क्या होता है, वो आपसे बेहतर कौन समझ सकता है? इसलिए कितने भी पढ़े-लिखे बनो, अगर अपनी पत्नी को नहीं पढ़ सके, तो ज़िंदगी भर अनपढ़ ही रहोगे!"
#संरक्षित ゚ #लघुकथा