Arya Samaj Siliguri

Arya Samaj Siliguri संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना.

29/03/2025
30/04/2021

1950 के दशक में हावर्ड यूनिवर्सिटी के विख्यात साइंटिस्ट कर्ट रिचट्टर ने चूहों पर एक अजीबोगरीब शोध किया था।

कर्ड ने एक जार को पानी से भर दिया और उसमें एक चूहे को फेंक दिया।

पानी से भरे जार में गिरते ही चूहा हड़बड़ाने लगा।
जार से बाहर निकलने के लिये ज़ोर लगाने लगा।

चंद मिनट फड़फड़ाने के पश्चात चूहे ने हथियार डाल दिये और वह उस जार में डूब गया।

कर्ट ने उस समय अपने शोध में थोड़ा सा बदलाव किया।

उन्होंने एक चूहे को पानी से भरे जार में डाला। चूहा जार से बाहर आने के लिये ज़ोर लगाने लगा।

जिस समय चूहे ने ज़ोर लगाना बन्द कर दिया और वह डूबने को था......

उसी समय कर्ड ने उस चूहे को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया।

कर्ड ने चूहे को ठीक उसी क्षण जार से बाहर निकाल लिया जब वह डूबने की कगार पर था।
चूहे को बाहर निकाल कर कर्ट ने उसे सहलाया ......
कुछ समय तक उसे जार से दूर रखा और फिर एक दम से उसे पुनः जार में फेंक दिया।

पानी से भरे जार में दोबारा फेंके गये चूहे ने फिर जार से बाहर निकलने की जद्दोजेहद शुरू कर दी।

लेकिन पानी में पुनः फेंके जाने के पश्चात उस चूहे में कुछ ऐसे बदलाव देखने को मिले जिन्हें देख कर स्वयं कर्ट भी हैरान रह गये।

कर्ट सोच रहे थे के चूहा बमुश्किल 15 - 20 मिनट संघर्ष करेगा और फिर उसकी शारीरिक क्षमता जवाब दे देगी और वह जार में डूब जायेगा।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

चूहा जार में तैरता रहा।
जीवन बचाने के लिये सँघर्ष करता रहा।

60 घँटे .......
जी हाँ .....60 घँटे तक चूहा पानी के जार में अपने जीवन को बचाने के लिये सँघर्ष करता रहा।

कर्ट यह देख कर आश्चर्यचकित रह गये।
जो चूहा 15 मिनट में परिस्थितियों के समक्ष हथियार डाल चुका था ........

वही चूहा 60 घँटे से परिस्थितियों से जूझ रहा था और हार मानने को तैयार नहीं था।

कर्ट ने अपने इस शोध को एक नाम दिया और वह नाम था.......

" The HOPE experiment".....!

Hope........यानि आशा।

कर्ट ने शोध का निष्कर्ष बताते हुये कहा के जब चूहे को पहली बार जार में फेंका गया .....
वह डूबने की कगार पर पहुंच गया .....
उसी समय उसे मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया गया। उसे नवजीवन प्रदान किया गया।

उस समय चूहे के मन मस्तिष्क में "आशा" का संचार हो गया। उसे महसूस हुआ के एक हाथ है जो विकटतम परिस्थिति से उसे निकाल सकता है।

जब पुनः उसे जार में फेंका गया तो चूहा 60 घँटे तक सँघर्ष करता रहा.......
वजह था वह हाथ......
वजह थी वह आशा ......
वजह थी वह उम्मीद।

इस परीक्षा की घड़ी में उम्मीद बनाये रखिये।
सँघर्षरत रहिये।
सांसे टूटने मत दीजिये।
मन को हारने मत दीजिये।

जिसने हाथ ने हमें इस पानी के जार में फेंका है वही हाथ हमें इस पानी के जार से सकुशल वापिस निकाल लेगा।

उस हाथ पर विश्वास रखिये।
साभार

11/03/2021
आर्य समाज जिस कृष्ण को मानता है, वे आप्त पुरुष है. इस विषय में महर्षि दयानंद ने जो विचार भगवान् कृष्ण के लिए प्रस्तुत कि...
10/08/2020

आर्य समाज जिस कृष्ण को मानता है, वे आप्त पुरुष है. इस विषय में महर्षि दयानंद ने जो विचार भगवान् कृष्ण के लिए प्रस्तुत किये है वह देखने योग्य है. सत्यार्थ प्रकाश के एकादश समुल्लास में वे लिखते है – “ देखो! श्रीकृष्ण जी का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है। उन का गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश है। जिस में कोई अधर्म का आचरण श्रीकृष्ण जी ने जन्म से मरणपर्य्यन्त बुरा काम कुछ भी किया हो ऐसा नहीं लिखा। ” आप्त पुरुष महर्षि दयानंद उन्हे मानते है जो यथार्थवक्ता हो और सब के सुख के लिए प्रयत्न करता हो. एक दूसरा वक्तव्य स्वाधीनता सेनानी लाला लाजपतराय ने अपने ग्रन्थ कृष्ण चरित्र में दिया है – “ संसार के महापुरुषों पर दोषारोपण करने वाले उनके विरोधी ही रहे है किन्तु श्री कृष्ण ही ऐसे अकेले महापुरुष है जिनके चरित्र को कलंकित करने वाले उनके भक्त ही है ”
भगवान् श्री कृष्ण का जन्म ऐसे समय में हुआ था जब कंस के अत्याचारों से सभी पीड़ित थे और उससे छुटकारा पाने के उपाय सोचते रहते थे. भगवान् कृष्ण ने कंस का वध करके उसके पिता को ही राज्य दे दिया. कौरव – पाण्डवों के युद्ध में भी उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया और युधिष्ठिर के सार्वभौम राज्य की स्थापना के लिए सफल प्रयत्न किया. महाभारत के अनुसार श्री कृष्ण योगिराज थे, उनकी एक पत्नी रुक्मिणी थी और एक ही पुत्र प्रध्युम्न था. उनके जीवन में किसी अन्य स्त्री का प्रेमिका रूप से प्रवेश नहीं था. इसी रूप में आर्य समाज उनके पावन चरित्र का गुणगान करता है. संसार की कुटिल गति देखिये की ऐसे पावन चरित्र को कलंकित करने का कार्य कवियों और गल्प रचयिताओ के द्वारा सारी मर्यादाओं को पार करके किया गया. उनके चरित्र को इतना कलंकित कर दिया की अन्य देशीय लोग ऐसे महापुरुषों पर ऊँगली उठाते है. भारतीय संस्कृति तो अपमानित होती ही है, इतिहास पर भी आंच आती है ।

ऋषि दयानंद के सभी ग्रन्थ pdf में इस लिंक में उपलब्ध हैं अत्यधिक शेयर करें इस पोस्ट को http://www.vedicgranth.org/home/th...
04/08/2020

ऋषि दयानंद के सभी ग्रन्थ pdf में इस लिंक में उपलब्ध हैं अत्यधिक शेयर करें इस पोस्ट को http://www.vedicgranth.org/home/the-great-authors/maharshi

सभी पुस्तकों की भाषा हिंदी है
इसमें ऋषि के सारे वेद भाष्य ,
सत्यार्थ प्रकाश ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका संस्कारविधि आर्याभिविनय आर्योद्देश्य रत्नमाला समस्त शास्त्रार्थ --- काशी जबलपुर चांदपुर आदि अष्टाध्यायी भाष्य निघंटु आदि आज तक की सभी ऋषि दयानंद की पुस्तकें हैं 😊🙏

Indology

03/08/2020

3.8.2020
*सूर्य तो है ही। आप सूर्य को मानें, या न मानें, आपकी इच्छा है। आपके न मानने पर भी, सूर्य तो रहेगा ही। इसी प्रकार से ईश्वर तो है ही। आप ईश्वर को मानें, या न मानें, आपकी इच्छा है। आपके ईश्वर को न मानने पर भी, ईश्वर तो रहेगा ही।*
*बहुत से नास्तिक लोग इस संसार में हैं, जो खुलेआम घोषणा करते हैं कि "मैं ईश्वर को नहीं मानता."*
बेचारे! वे लोग इतना भी नहीं जानते कि जिस वाणी मुख शरीर आदि की सहायता से वे ईश्वर का खंडन कर रहे हैं, वे वाणी आदि साधन भी ईश्वर ने ही उनको दिए हुए हैं। इन वाणी आदि साधनों के बिना तो वे इस वाक्य को भी नहीं बोल पाएंगे, कि "मैं ईश्वर को नहीं मानता."
आप सोचते होंगे कि "वाणी आदि देकर भी, क्या ईश्वर कहता है कि तुम मेरा खंडन करो।" मेरा उत्तर है कि "नहीं। ईश्वर ऐसा तो नहीं कहता कि तुम मेरा खंडन करो। फिर भी व्यक्ति कर्म करने में स्वतंत्र होने के कारण, वाणी आदि साधनों का दुरुपयोग कर के, वह ईश्वर का खंडन कर ही लेता है। जैसे किसी अधिकारी को सरकारी संपत्ति दुरुपयोग करने के लिए नहीं दी गई थी, फिर भी वह अपनी दुष्टता आदि दोषों के कारण उस संपत्ति का दुरुपयोग कर ही लेता है। ऐसे ही ईश्वर ने शरीर मन बुद्धि इंद्रियां वाणी आदि पदार्थ दिए तो थे अच्छे काम के लिए। फिर भी व्यक्ति अपनी दुष्टता आदि दोषों के कारण इनका दुरुपयोग कर ही लेता है। इसमें ईश्वर दोषी नहीं है। जैसे सरकार, अधिकारी को संपत्ति, सदुपयोग करने के लिए देती है, और अधिकारी जब उसका दुरुपयोग करता है, तब सरकार दोषी नहीं होती।*
अब सोचिये, जब नास्तिक व्यक्ति ईश्वर का खंडन करता है, तो जिस शरीर मन बुद्धि वाणी आदि इंद्रियों के द्वारा वह ईश्वर का खंडन करता है, वे सारे साधन क्या उसने स्वयं बनाए थे? क्या वह इन शरीर आदि साधनों को बनाना, इन को सुरक्षित रखना जानता है? *जब इन शरीर आदि साधनों को वह बना नहीं सकता, इनकी रक्षा नहीं कर सकता, तो फिर वह कौन है जिसने ये सारे साधन उसको और सबको बना कर दिए? इतना भी वह नास्तिक व्यक्ति ठीक से विचार कर लेवे, तो उसे समझ में आ जाएगा, कि ईश्वर है अथवा नहीं है।*
जड़ वस्तु स्वयं तो किसी पदार्थ की रचना कर नहीं सकती, जैसे लोहा लकड़ी स्वयं तो रेलगाड़ी बन नहीं सकती। कोई चेतन बुद्धिमान इंजीनियर चाहिए, जो लोहे लकड़ी से रेलगाड़ी को बनाएगा।
इसी प्रकार से जो शरीर मन बुद्धि इंद्रियां वाणी आदि पदार्थ नास्तिक के पास हैं, वे भी स्वयं तो बन नहीं सकते, क्योंकि वे सब जड़ पदार्थ हैं। और वह नास्तिक व्यक्ति स्वयं बनाने में समर्थ नहीं है। तो वह नास्तिक व्यक्ति इस प्रश्न का उत्तर देवे, कि किसने उसके लिए ये सारे साधन बनाए?
*जिसने बनाए, वही तो ईश्वर है। ईश्वर के बनाए हुए पदार्थों का उपयोग ले रहा है, ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि में, ईश्वर के नियमों का पालन करते हुए सुखपूर्वक जी रहा है, फिर भी कहता है कि मैं ईश्वर को नहीं मानता। इससे बड़ा अज्ञानी और कृतघ्न कौन होगा?*
इसलिए नास्तिक बनना कोई बुद्धिमत्ता नहीं है। प्रमाण एवं तर्क सेे सत्य असत्य का विचार करना चाहिए। और जो सत्य सिद्ध हो उसे, स्वीकार करना चाहिए, यही बुद्धिमत्ता है।
जरा सोचिए, *यदि कोई आप के होते हुए भी यह कहे कि मैं आप को नहीं मानता, तो उसके न मानने से आप रहेंगे या नहीं रहेंगे?* यदि फिर भी आप रहेंगे। तो बताइए उसका बोलना व्यर्थ हुआ या सार्थक हुआ? सीधी सी बात है, कि व्यर्थ हुआ।
ऐसा ही इन नास्तिकों का वचन भी व्यर्थ है, जो ईश्वर के होते हुए भी यह कहते हैं कि मैं ईश्वर को नहीं मानता। उनके कहने से क्या ईश्वर नहीं रहेगा? यदि उनके न मानने से ईश्वर नष्ट नहीं होगा, तो उनका बोलना भी व्यर्थ है। *इसलिए अपनी वाणी को व्यर्थ न बनाएं। बल्कि सत्य बोलकर सार्थक बनाएँ। ईश्वर और उसकी कर्म फल व्यवस्था को स्वीकार करें, आस्तिक बनें, ईश्वर को साक्षी मान कर सब अच्छे अच्छे कर्म करें। अपना और सबका कल्याण करें। यही बुद्धिमत्ता और मनुष्यता है।*
- *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

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