श्री जानकी जन्म भूमि, सीतामढ़ी धाम

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श्री जानकी जन्म भूमि, सीतामढ़ी धाम श्री जानकी जन्म भूमि, सीतामढ़ी धाम एक विश्व प्रसिद्ध धार्मिक केंद्र, सार्वजनिक तथ्य एवं समाज सेवा का

छुआछूत सत्यता या षड्यंत्र बच्चे की नाभि कौन काटता था... मतलब पिता से भी पहले कौन सी जाति बच्चे को स्पर्श करती थी ?आपका म...
18/05/2026

छुआछूत सत्यता या षड्यंत्र
बच्चे की नाभि कौन काटता था... मतलब पिता से भी पहले कौन सी जाति बच्चे को स्पर्श करती थी ?

आपका मुंडन करते वक्त कौन आपको स्पर्श करता था ?

शादी के मंडप में नाईं और धोबन भी होती थी।
जो लड़की का पिता, लड़के के पिता से इन दोनों के लिए साड़ी की मांग करता थी।

वाल्मीकियनो के बनाये हुए सूप से ही छठ व्रत होता हैं ।

आपके घर में कुँए से पानी कौन लाता था?

भोज के लिए पत्तल कौन सी जाति बनाती थी?

किसने आपके कपडे धोये?

डोली अपने कंधे पर कौन मीलो मीलो दूर से लाता था? और उनके जिन्दा रहते किसी की मजाल न थी की आपकी बिटिया को छू भी दे।

किसके हाथो से बनाये मिटटी की सुराही से पानी पीकर जेठ के महीने में आपकी आत्मा तृप्त हो जाती थी ?

कौन आपकी झोपड़ियां बनाता था?

कौन फसल लाता था?

कौन आपकी चिता जलाने में सहायक सिद्ध होता हैं?

जीवन से लेकर मरण तक सब सबको कभी न कभी स्पर्श करते थे। और कहते है की छुआछूत था ।

यह छुआ छूत की बीमारी मुघलो और अंग्रेजों ने सनातन धर्म को तोड़ने के लिए एक षड्यंत्र के रूप में डाली थी।
अपवाद में कुछ लोग सभी जातियों में है, जो हर दूसरे जाती में भेद भाव करते है। और ऐसे लोग आज भी है।

जातियाँ थी, पर उनके मध्य एक प्रेम की धारा भी बहती थी, जिसका कभी कोई उल्लेख नहीं करता।

अगर जातिवाद होता तो राम कभी सबरी के झूठे बेर ना खाते। निषादराज, केवट, आदिवासी, वनवासी उनके सहायक न होते।

जाति में मत टूटीये, धर्म से जुड़िये . . . देश को जोड़िये।
सभी को अवगत कराएं।

सभी जातियाँ सम्माननीय हैं।

सत्य सनातन धर्म की जय

एक कीड़े का इंसानी सफर और महर्षि व्यास की कृपाएक बार महर्षि वेदव्यास ने एक छोटे से कीड़े को बहुत तेजी से सड़क पार करते दे...
18/05/2026

एक कीड़े का इंसानी सफर और महर्षि व्यास की कृपा
एक बार महर्षि वेदव्यास ने एक छोटे से कीड़े को बहुत तेजी से सड़क पार करते देखा। पूछने पर कीड़े ने बताया कि वह सामने से आने वाली बैलगाड़ी से अपनी जान बचा रहा है। तब व्यास जी ने कहा कि कीट योनि में इतना कष्ट भोगने से तो अच्छा है कि तुम इस जीवन का त्याग कर दो।
कीड़े के सहमत होने पर व्यास जी ने अपनी योग विद्या से उसे आने वाली कई निकृष्ट (नीच) योनियों से मुक्त करा दिया। वह कीड़ा बैलगाड़ी से कुचलकर मर गया और फिर अपनी साधना के प्रभाव से कौआ, सियार, मृग आदि योनियों से होते हुए अंततः मनुष्य योनि में जन्मा।
मनुष्य जीवन में उसने क्रमशः शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय के रूप में जन्म लिया और अंततः अपने सत्कर्मों के कारण ब्राह्मण कुल में जन्म प्राप्त किया। महर्षि व्यास ने उसे मात्र 5 वर्ष की आयु में ही सारस्वत मंत्र की दीक्षा दी। जब वह बालक 7 वर्ष का हुआ, तो व्यास जी के कहने पर उसने नंद भद्र नामक प्रकांड ब्राह्मण की शंकाओं का समाधान किया। इसके बाद उस बालक ने सूर्य मंत्र का जाप करते हुए योग द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया।

दुर्योधन का अहंकार और ऋषि मैत्रेय का महाश्राप
वही दिव्य बालक अगले जन्म में पुनः ब्राह्मण वर्ण में कुशराम और मित्रा के पुत्र के रूप में जन्मा, जिनका नाम मैत्रेय रखा गया। व्यास जी ने उन्हें आगे की शिक्षा के लिए पराशर मुनि के पास भेजा।
जब दुर्योधन ने कपट से पांडवों को जुए में हराकर वनवास भेज दिया, तब ऋषि मैत्रेय हस्तिनापुर पहुंचे। वहां भीष्म, विदुर और धृतराष्ट्र ने उनका बड़ा आदर-सत्कार किया। ऋषि मैत्रेय ने दुर्योधन को अपने पास बुलाकर बड़े प्रेम से समझाया कि भाइयों के साथ ऐसा वैर ठीक नहीं है और उसे पांडवों का राज्य ससम्मान लौटा देना चाहिए।
परंतु, जब ऋषि मैत्रेय उसे धर्म का उपदेश दे रहे थे, तब अहंकारी दुर्योधन लगातार हंसते हुए अपनी जंघा (जांघ) को ठोक रहा था।
दुर्योधन की इस उद्दंडता और घोर अपमानजनक व्यवहार से क्रोधित होकर ऋषि मैत्रेय ने उसे श्राप दे दिया:
"जिस जंघा को ठोक कर तू एक सिद्ध पुरुष का अपमान कर रहा है, महाभारत के युद्ध में उसी जंघा के टूटने से तेरी मृत्यु होगी!"
इसी श्राप के कारण महाभारत के युद्ध के अंतिम दिन भीमसेन ने गदा युद्ध के दौरान नियमों से परे जाकर दुर्योधन की जंघा तोड़कर उसका वध किया था।

महात्मा विदुर को आत्मज्ञान देना
महाभारत युद्ध के भयंकर महाविनाश को देखकर महात्मा विदुर अत्यंत दुखी और विक्षिप्त से हो गए थे। जब भगवान श्रीकृष्ण धरा धाम से अपनी लीला समाप्त कर रहे थे, तब उन्होंने ऋषि मैत्रेय से विशेष प्रार्थना की कि वे विदुर जी को सांत्वना और आत्मज्ञान दें।
श्रीकृष्ण की इच्छा के अनुसार ऋषि मैत्रेय गंगा तट पर विदुर जी से मिले। उन्होंने विदुर जी को विभिन्न आध्यात्मिक उपदेश देकर उनके मन का सारा संताप दूर किया, उन्हें आत्मज्ञान दिया और हरि प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर किया। इस परम उपदेश को ग्रहण करने के बाद ही महात्मा विदुर ने शांतिपूर्वक अपने नश्वर शरीर का त्याग किया।
राधे राधे! ।
यदि आपको यह दिव्य और ज्ञानवर्धक कथा पसंद आई हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ अवश्य शेयर करें।

साभार

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित धारी देवी मंदिर आस्था, रहस्य और चमत्कार का अद्भुत संगम माना जा...
17/05/2026

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित धारी देवी मंदिर आस्था, रहस्य और चमत्कार का अद्भुत संगम माना जाता है। मान्यता है कि यहां विराजमान माता धारी देवी दिन में तीन बार अपना रूप बदलती हैं। सुबह कन्या, दोपहर में युवती और शाम को वृद्धा स्वरूप में भक्तों को दर्शन देती हैं। यही वजह है कि इस मंदिर को बेहद रहस्यमयी और चमत्कारी माना जाता है।

धारी देवी को चारधाम की रक्षक देवी भी कहा जाता है और बिना उनके दर्शन के चारधाम यात्रा अधूरी मानी जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक भीषण बाढ़ के बाद माता की मूर्ति धारो गांव के पास एक चट्टान पर आकर रुक गई थी, जिसके बाद गांववालों ने देवी के निर्देश पर उसी स्थान पर मंदिर की स्थापना की। वहीं 2013 की केदारनाथ आपदा से पहले मंदिर को स्थानांतरित किए जाने की घटना को भी स्थानीय लोग देवी के प्रकोप से जोड़ते हैं। आज यह मंदिर देशभर के श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है।
जय मां धारी देवी ।

साभार -

विराजमान भगवान जगन्नाथ हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं। उन्हें भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का रूप माना जाता है...
16/05/2026

विराजमान भगवान जगन्नाथ हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं। उन्हें भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का रूप माना जाता है। जगन्नाथ जी अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ पूजे जाते हैं।

यह मंदिर भारत के चार धामों में से एक माना जाता है और लाखों श्रद्धालु हर वर्ष दर्शन करने आते जगन्नाथ हिन्दू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माने जाते हैं।
जगन्नाथ शब्द का अर्थ है — “जगत के नाथ” अर्थात पूरे संसार के स्वामी।

भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ पूजे जाते हैं। पुरी का जगन्नाथ मंदिर भारत के चार धामों में से एक है और यह श्रद्धा तथा भक्ति का प्रमुख केंद्र माना जाता

साभार

पाटलिपुत्र का पहला जैन मंदिर: जब राजा उदायिन ने मगध की नई राजधानी में स्थापित किया जैन धर्म का ध्वज! बिहार की राजधानी पट...
15/05/2026

पाटलिपुत्र का पहला जैन मंदिर: जब राजा उदायिन ने मगध की नई राजधानी में स्थापित किया जैन धर्म का ध्वज!

बिहार की राजधानी पटना (प्राचीन पाटलिपुत्र) का इतिहास पूरी दुनिया जानती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब इस विशाल नगर की शुरुआत हुई थी, तब उसके हृदय में सबसे पहले गूँजा था — जैन धर्म का जयघोष!

आज “देव दर्शन” में बात मगध के उस महान सम्राट की, जिन्होंने पाटलिपुत्र बसाया और वहाँ जैन धर्म की ऐसी नींव रखी जो सदियों तक अमर हो गई!

सम्राट उदायिन: अजातशत्रु के पुत्र और पाटलिपुत्र के संस्थापक

बिंबिसार और अजातशत्रु के बाद मगध की गद्दी पर बैठे सम्राट उदायिन। उन्होंने मगध की राजधानी को राजगृह (राजगीर) से हटाकर गंगा नदी के किनारे बसे एक नए और सुरक्षित नगर ‘पाटलिपुत्र’ में स्थापित किया। लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान केवल एक नया नगर बसाना नहीं था।

लकड़ी का ‘चैत्यगृह’ (जैन मंदिर)
उदायिन ने शहर में एक विशाल जैन मंदिर (चैत्यगृह) बनवाया। प्राचीन पाटलिपुत्र की विशेषता यह थी कि उस समय राजा के महल हों या मंदिर—अधिकतर निर्माण लकड़ी से ही किए जाते थे। यह विशाल मंदिर सुगंधित लकड़ियों से निर्मित था। इसके ऊँचे-ऊँचे लकड़ी के स्तंभों पर तीर्थंकरों के प्रतीक और अहिंसा के संदेश अत्यंत बारीकी से उकेरे गए थे। संध्या के समय जब गर्भगृह में सैकड़ों घी के दीपक जलते थे, तब उनकी रोशनी लकड़ी की नक्काशी और स्वर्णिम अलंकरणों से टकराकर एक अलौकिक वातावरण उत्पन्न करती थी।

कोई भी महान नगर केवल ईंटों और महलों से महान नहीं बनता, बल्कि उसकी धार्मिक और आध्यात्मिक नींव उसे अमर बनाती है। राजा उदायिन ने पाटलिपुत्र को केवल शक्ति ही नहीं दी, बल्कि उस पवित्र लकड़ी के मंदिर के माध्यम से त्याग, अहिंसा और शांति की पहचान भी दी।

क्या आप जानते थे कि आज के पटना (पाटलिपुत्र) का सबसे प्राचीन धार्मिक स्थल एक विशाल लकड़ी का जैन मंदिर था?

अगर आपको भी जैनधर्म के गौरवशाली विरासत पर गर्व हें तो इस पोस्ट को अभी अपने दोस्तों व व्हाट्सऐप समूहों में साझा करें, ताकि अधिक से अधिक लोग इस अद्भुत इतिहास से जुड़ सकें!

एक लालची राजा ने विष्णु मंदिर का धन लूटना चाहा और उसका राज्य संकट में पड़ गया---प्रस्तावना: सोना, सत्ता और श्रापचंदेरी र...
15/05/2026

एक लालची राजा ने विष्णु मंदिर का धन लूटना चाहा और उसका राज्य संकट में पड़ गया

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प्रस्तावना: सोना, सत्ता और श्राप
चंदेरी राज्य। 300 साल पुराना साम्राज्य। नाम था राजा विक्रमसेन। वीर, प्रतापी, पर एक रोग था — **लालच**।

खजाना भरा था, पर मन खाली। हीरे-मोती गिनते-गिनते आँखें थक जातीं, पर तृप्ति नहीं होती। मंत्री कहते: "महाराज, प्रजा सुखी है, लगान समय पर आ रहा है।"
राजा हँसता: "सुखी? जब तक पड़ोसी राज्य अवंती से ज्यादा धन न हो, मैं सुखी कैसे?"

राज्य के बीच में था "अनंत केशव मंदिर"। 1000 साल पुराना। कहते हैं, स्वयं ब्रह्मा ने यहाँ विष्णु की मूर्ति स्थापित की थी। मंदिर का गर्भगृह सोने का। कलश हीरे का। दान-पात्र में रोज मनों सोना चढ़ता।

पर नियम था: "मंदिर का धन विष्णु का है। राजा भी छूए तो कुष्ठ रोगी हो जाए।"

विक्रमसेन को यह नियम चुभता था। "मेरे राज्य में, मेरी जमीन पर, मेरा धन कैसे नहीं?"

और एक अमावस्या की रात, लालच ने बुद्धि खा ली। राजा ने फैसला किया: "कल सूर्योदय से पहले अनंत केशव का खजाना राजकोष में होगा।"

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अध्याय 1: मंदिर का वैभव और राजा की ईर्ष्या
अनंत केशव मंदिर सिर्फ पत्थर नहीं था, आस्था का आकाश था।

गर्भगृह: 20 फुट ऊँची काले शालिग्राम की मूर्ति। आँखें ऐसी कि जिधर जाओ, उधर देखें। छाती पर कौस्तुभ मणि — कहते हैं, रात में खुद प्रकाश करती है।
खजाना: 7 तहखाने। पहले में चाँदी, दूसरे में सोना, तीसरे में हीरे, सातवें में "कुछ" था जो पुजारी के सिवा किसी ने नहीं देखा।
मान्यता: हर साल कार्तिक पूर्णिमा को भगवान की मूर्ति पसीजती है। उस पसीने को "विष्णु अमृत" कहते हैं। जो लगाए, रोग मुक्त।

प्रजा का नियम: खेत में पहली फसल, व्यापार में पहला मुनाफा, बेटे की पहली तनख्वाह — सबका दसवाँ हिस्सा मंदिर में।

राजा विक्रमसेन हर पूर्णिमा को दर्शन करने जाता। मुकुट उतारकर, सिर झुकाकर। पर आँखें मूर्ति पर नहीं, कलश के हीरों पर रहतीं।

एक दिन दीवान ने हिसाब दिया: "महाराज, इस साल अकाल के कारण राजकोष खाली है। पर अनंत केशव के खजाने में 1000 करोड़ स्वर्ण मुद्रा हैं।"

राजा की आँख चमकी: "1000 करोड़? मेरे 10 साल के लगान के बराबर!"
दीवान डरा: "पर महाराज, वह देव-द्रव्य है। पुराणों में लिखा है..."
राजा गरजा: "चुप! मैं राजा हूँ। देवता मेरे राज्य में रहते हैं, मैं देवता के राज्य में नहीं। कल सेना तैयार रखो।"

अध्याय 2: अमावस्या की रात — पाप का पहला कदम
अमावस्या। घोर अंधेरी रात। मंदिर में सिर्फ एक दीया। मुख्य पुजारी आचार्य विष्णुदत्त, उम्र 80, सो रहे थे।

आधी रात को 100 सैनिकों के साथ राजा पहुँचा। फाटक तोड़ा। आवाज से कबूतर उड़ गए।

आचार्य जागे। दौड़कर गर्भगृह के आगे खड़े हो गए। सूखा शरीर, पर आवाज में वज्र:
"रुक जाओ राजन! यह विष्णु का घर है। यहाँ चोर बनकर नहीं, भक्त बनकर आओ।"

विक्रमसेन हँसा: "ऐ बूढ़े, हट जा। मुझे मेरा धन चाहिए। राज्य भूखा है।"
आचार्य बोले: "राज्य भूखा नहीं, तुम्हारा मन भूखा है। देव-द्रव्य छूओगे तो वंश समेत मिट जाओगे। शास्त्र साक्षी हैं — लंकापति रावण ने शिव का धन लूटा था, क्या हुआ?"

राजा ने तलवार निकाली: "शास्त्र मुझे मत सिखा। मैं शस्त्र जानता हूँ। तहखाने की चाबी दे।"

आचार्य ने चाबी छाती से लगाई: "चाबी नहीं दूँगा। जान चाहिए तो ले लो। पर याद रखना — अनंत केशव जागते हैं।"

राजा ने सैनिकों को इशारा किया। दो सैनिकों ने आचार्य को पकड़ा। तभी...

गर्भगृह का दीया बुझ गया। बिना हवा। बिना कारण।

और मूर्ति की आँखों से पानी की बूँद गिरी। मिट्टी पर टपकी।

आचार्य चीखे: "देखो राजन! ठाकुर जी रो रहे हैं। अब भी रुक जाओ!"

पर लालच जब आँख पर चढ़ता है, तो आँसू भी मोती लगते हैं। राजा ने चाबी छीनी। तहखाने का ताला खोला।

अध्याय 3: सातवाँ तहखाना और पहला श्राप
6 तहखाने लूटे गए। सोना, हीरे, मोती — 200 ऊँट लद गए। सैनिकों की आँखें चौंधिया गईं।

पर राजा को चैन नहीं। "सातवाँ तहखाना कहाँ है? सबसे बड़ा धन वहीं होगा।"

आचार्य बँधे हुए थे। थूककर बोले: "पापी! सातवाँ तहखाना मत खोलना। उसमें धन नहीं, धर्म है। उसमें विष्णु का सुदर्शन है।"

राजा ने फर्श तोड़ा। नीचे सीढ़ी। 100 दीप जल रहे थे — बिना तेल, बिना बाती।

सातवें तहखाने में न सोना था, न हीरा। बीच में एक संगमरमर की चौकी। उस पर एक छोटा सा शंख रखा था। पंचजन्य जैसा सफेद, पर उससे निकली ध्वनि साँस जैसी चल रही थी — सोहम... सोहम...

चौकी के चारों ओर तुलसी के पौधे। बिना मिट्टी, हवा में उग रहे थे।

राजा ने शंख उठाना चाहा। उंगली लगते ही शंख गरम हो गया। राजा चीखा। हाथ पर ॐ का निशान जल गया।

तभी तहखाने की दीवारों से आवाज आई। हजारों लोगों की — "हाय... हाय... हाय..."
वह उन राजाओं की आवाज थी जिन्होंने पहले देव-द्रव्य चुराया था।

आचार्य बोले: "भाग राजन! यह शंख नहीं, काल है। इसे छूआ तो तेरा काल शुरू।"

पर राजा ने अहंकार में शंख कपड़े में लपेटा। "यह मेरे अजायबघर में लगेगा।"

जैसे ही शंख तहखाने से बाहर निकला, मंदिर का कलश चटक गया। हीरा टूटकर गिर पड़ा। और गर्भगृह से एक आवाज आई — शंख जैसी नहीं, सिंह जैसी दहाड़:

"जिसने मेरा धन चुराया, उसका धर्म, धन, धरती — सब हर लूँगा।"

अध्याय 4: राज्य पर टूटे 7 संकट
सूर्योदय हुआ। राजा महल पहुँचा। सोचा — अब मैं अवंती से भी अमीर।

पर उसी दिन से चंदेरी का बुरा वक्त शुरू हुआ।

संकट 1: खजाना मिट्टी बना
राजकोष में रखा मंदिर का सोना अगले दिन मिट्टी बन गया। 200 ऊँटों पर लदी मिट्टी। मंत्री बेहोश। राजा पागल-सा मिट्टी चाटने लगा: "सोना कहाँ गया? मेरा सोना?"

संकट 2: यमुना सूखी
चंदेरी की जीवन-रेखा यमुना थी। एक हफ्ते में नदी सूख गई। मछलियाँ तड़प कर मर गईं। कुएँ में खारा पानी। प्रजा प्यास से त्राहि-त्राहि।

संकट 3: महामारी
लोगों के शरीर पर काले चकत्ते। कुष्ठ जैसा। वैद्य बोले: "यह धर्म-कुष्ठ है। दवा नहीं, दुआ चाहिए।" राजा के दाहिने हाथ पर भी वही निशान — ॐ जला था, वहाँ से सड़न शुरू।

संकट 4: टिड्डी दल
आसमान काला हो गया। करोड़ों टिड्डियाँ। 1 दिन में सारी फसल चट। अनाज का एक दाना नहीं बचा।

संकट 5: विद्रोह
भूखी प्रजा ने महल घेर लिया। "हमारा धन लौटाओ! हमारे भगवान लौटाओ!" सेना भी टूट गई। सैनिक बोले: "हम देवता से नहीं लड़ेंगे।"

संकट 6: पुत्र की मृत्यु
राजा का इकलौता बेटा, युवराज अजय, 20 साल का। घोड़े से गिरा। सिर पर वही चोट जहाँ राजा ने मुकुट पहना था। मरते-मरते बोला: "बाबा, वह शंख... वह रो रहा है..."

संकट 7: शत्रु का हमला
अवंती के राजा ने मौका देखा। 50,000 सेना लेकर चढ़ आया। चंदेरी के दरवाजे खुद-ब-खुद खुल गए। जैसे नगर कह रहा हो — "इस पापी को सजा दो।"

7 दिन। 7 संकट। चंदेरी श्मशान बन गया।

अध्याय 5: पश्चाताप और शेषनाग का फन
राजा विक्रमसेन भागा। कहाँ? अनंत केशव मंदिर।

मंदिर वीरान। आचार्य विष्णुदत्त अभी भी बँधे थे — 7 दिन से भूखे-प्यासे, पर जीवित।

राजा उनके पैरों में गिर पड़ा। कुष्ठ वाला हाथ दिखाया: "गुरु, मेरा हाथ सड़ रहा है... मेरा राज्य जल रहा है... मेरा बेटा..."

आचार्य हँसे नहीं, रोए: "राजन, मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं। तुमने विष्णु का नहीं, अपना धन लूटा। मंदिर का सोना तो मिट्टी था। असली धन था — प्रजा का विश्वास। तुमने वही लूटा।"

"अब एक ही उपाय। सातवें तहखाने का शंख जहाँ से उठाया था, वहीं रखो। और सच्चे मन से माफी माँगो। शायद..."

आधी रात। राजा नंगे पाँव, फटे कपड़े, कुष्ठ लेकर तहखाने में गया। शंख को सिर पर रखा। आँसू से पाँव धोए।

जैसे ही शंख चौकी पर रखा, तुलसी के पौधे हरे हो गए। दीवारों से "हाय" की जगह "नारायण" की ध्वनि आने लगी।

तभी गर्भगृह से प्रकाश फूटा। राजा दौड़ा।

देखा: काले शालिग्राम की मूर्ति अब शेष-शय्या बन गई थी। और उस पर महाविष्णु लेटे थे। नीलवर्ण, चतुर्भुज, मुस्कुराते हुए।

पर उनके नीचे शेषनाग नहीं थे। शेषनाग का एक फन उठा हुआ था — फूँफकार मारता।

फन से आवाज आई: "विक्रमसेन, तूने मेरे स्वामी का धन नहीं, मेरा धैर्य चुराया। मैं शेष हूँ। सृष्टि के बाद भी मैं बचता हूँ। पर अधर्म के बाद मैं डँसता हूँ।"

राजा काँप गया: "प्रभु, माफ कर दो। राज्य ले लो, प्राण ले लो, पर प्रजा को बख्श दो।"

तभी विष्णु हँसे। उनकी हँसी से मंदिर का कलश फिर जुड़ गया। हीरा अपने आप लग गया।

बोले: "विक्रम, राजा प्रजा का सेवक होता है, मालिक नहीं। तूने सेवक बनकर नहीं, लुटेरा बनकर ताला खोला।"

"जा। तेरा कुष्ठ मिटेगा। पर निशान रहेगा — ताकि याद रहे। राज्य वापस मिलेगा। पर खजाना नहीं। तू अब भिक्षा माँगकर मंदिर का दीप जलाएगा। जब 1000 दिन तक भिक्षा से घी लाएगा, तभी तेरा पाप धुलेगा।"

अध्याय 6: भिक्षुक राजा और राज्य का पुनर्जन्म
अगली सुबह चमत्कार। यमुना में पानी आ गया। टिड्डियाँ मिट्टी बन गईं। कुष्ठ रुका, पर राजा का दाहिना हाथ सफेद बना रहा — निशान।

अवंती की सेना लौट गई। उनका सेनापति बोला: "रात सपने में शेषनाग दिखे। कहा — इस राज्य को हाथ लगाया तो वंश मिटा दूँगा।"

विक्रमसेन ने राजपाट छोड़ दिया। फटे कपड़े पहने। हाथ में खप्पर। गली-गली "नारायण के नाम पर घी दे दो माई" कहकर भीख माँगी।

जिस प्रजा को लूटा था, उसी से भीख। पहले लोग थूकते। फिर रोते। फिर घी देते।

1000 दिन। 1000 दीप। जिस दिन आखिरी दीप जला, मंदिर के कलश से अमृत टपका। राजा ने पिया। हाथ का सफेद निशान मिट गया।

उसी दिन प्रजा ने उसे कंधे पर बैठाकर फिर राजा बनाया। पर अब वह सिंहासन पर नहीं, मंदिर की सीढ़ी पर बैठता। फैसला वहीं देता।

खजाना फिर भरा — पर प्रजा के दान से। सातवाँ तहखाना अब खुला रहता। कोई भी दुखी वहाँ जाए, शंख से "सोहम" की ध्वनि सुनता, और दुख हल्का हो जाता।

उपसंहार: लालच और लूट का धर्मशास्त्र
विक्रमसेन ने मरने से पहले शिलालेख लिखवाया:

"राजा का पहला धन प्रजा का सुख है। जो इसे लूटे, उसका राजपाट मिट्टी है।"
"देव-द्रव्य विष है। शिव का हो या विष्णु का। रावण ने शिव का लूटा, लंका जली। मैंने विष्णु का छुआ, चंदेरी जली।"
"शेषनाग का फन हर मंदिर में है। दिखता नहीं, पर जब अधर्म बढ़ता है, तो फूँफकारता है।"
"माफी मंदिर में नहीं, प्रजा की आँखों में मिलती है। जब तक उनका आँसू न पोंछो, विष्णु नहीं पोंछते।"

आज भी चंदेरी के अनंत केशव मंदिर में एकादशी को दीप जलता है। घी लाता है वहाँ का राजा — अब मुख्यमंत्री — खुद भिक्षा माँगकर। परंपरा है।

और सातवें तहखाने के बाहर लिखा है: "जो लेने आए, वह लुटेरा। जो देने आए, वह विष्णु।"

तो याद रखना — ताला टूट सकता है, पर धर्म का ताला तोड़ोगे तो शेषनाग का फन तुम्हारा इंतजार कर रहा है।

क्योंकि धन लूटने से राज्य नहीं मिलता, श्राप मिलता है। और श्राप से बचने का एक ही रास्ता — भिक्षा का खप्पर और माफी के आँसू।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

साभार

मृत्यु से पहले मिलने वाले संकेतसनातन धर्म और गरुड़ पुराण के अनुसारसनातन धर्म में जीवन और मृत्यु को एक अनंत चक्र माना गया...
13/05/2026

मृत्यु से पहले मिलने वाले संकेत
सनातन धर्म और गरुड़ पुराण के अनुसार

सनातन धर्म में जीवन और मृत्यु को एक अनंत चक्र माना गया है। शरीर नश्वर है, पर आत्मा अमर मानी जाती है। गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु ने अपने वाहन गरुड़ को मृत्यु, आत्मा, कर्म और परलोक से जुड़े अनेक रहस्य बताए हैं।

गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु अचानक नहीं आती। उससे पहले प्रकृति, शरीर और मन कुछ संकेत देने लगते हैं। इन संकेतों का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, बल्कि मनुष्य को धर्म, भक्ति और आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करना है।

🌑 मृत्यु से पहले मिलने वाले संकेत
1. छाया का धुंधला दिखना
गरुड़ पुराण में कहा गया है कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु निकट आती है, तो उसे अपनी परछाई अस्पष्ट या टूटी हुई दिखाई देने लगती है।
कभी-कभी जल या दर्पण में चेहरा भी विचित्र दिखाई देता है।

2. स्वप्न में अशुभ दृश्य दिखना
यदि बार-बार ऐसे स्वप्न आने लगें:
* सूखे पेड़
* अंधेरा रास्ता
* दक्षिण दिशा की यात्रा
* काले वस्त्र पहने लोग
* नदी या गहरे जल में डूबना
तो इसे अशुभ संकेत माना गया है।

3. शरीर की आभा कम होना
कहा जाता है कि मृत्यु निकट आने पर व्यक्ति के चेहरे का तेज धीरे-धीरे कम होने लगता है।
आंखों की चमक फीकी पड़ जाती है और मन संसार से हटने लगता है।

4. कान और आंखों की शक्ति कमजोर होना
गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु से कुछ समय पहले:
* सुनने की क्षमता कम हो सकती है
* आंखों के सामने धुंध छाने लगती है
* व्यक्ति को परिचित लोग भी स्पष्ट नहीं दिखते

5. पितरों या दिवंगत लोगों का दिखना
सनातन मान्यता के अनुसार कुछ लोगों को मृत्यु से पहले:
* अपने पूर्वज
* दिवंगत रिश्तेदार
* या अदृश्य शक्तियों का आभास होने लगता है।
ऐसा माना जाता है कि आत्मा को लेने के लिए सूक्ष्म शक्तियां आने लगती हैं।

6. सांसों का बदलता स्वरूप
कई धार्मिक ग्रंथों में वर्णन है कि मृत्यु निकट होने पर:
* सांस भारी होने लगती है
* सांसों की गति असामान्य हो जाती है
* व्यक्ति अत्यधिक थकान महसूस करता है

7. संसार से मोह कम होना
जब आत्मा शरीर छोड़ने के निकट होती है, तो व्यक्ति का मन धीरे-धीरे:
* धन
* परिवार
* भोग-विलास
से हटने लगता है।
उसे एक अजीब वैराग्य अनुभव होने लगता है।

गरुड़ पुराण का आध्यात्मिक संदेश
गरुड़ पुराण केवल मृत्यु का वर्णन नहीं करता, बल्कि यह भी सिखाता है कि मनुष्य को जीवन कैसे जीना चाहिए।

इसमें कहा गया है:

* सत्य बोलो
* धर्म का पालन करो
* माता-पिता और गुरु का सम्मान करो
* दान-पुण्य करो
* भगवान का स्मरण करो
क्योंकि अंत समय में केवल कर्म ही आत्मा के साथ जाते हैं।

मृत्यु के समय क्या करना चाहिए?

सनातन धर्म के अनुसार अंतिम समय में:
* भगवान का नाम लेना चाहिए
* भगवद गीता का पाठ सुनना शुभ माना जाता है
* “राम नाम” या “ॐ नमो नारायणाय” का जाप करना चाहिए
* मन को शांत और ईश्वर में स्थिर रखना चाहिए ।

महत्वपूर्ण बात
इन बातों को अंधविश्वास या भय के रूप में नहीं देखना चाहिए।
धार्मिक ग्रंथों का उद्देश्य मनुष्य को डराना नहीं, बल्कि यह समझाना है कि जीवन अनमोल है और हर क्षण का सदुपयोग करना चाहिए।
मृत्यु सनातन धर्म में अंत नहीं, बल्कि आत्मा की नई यात्रा की शुरुआत मानी गई है।

अंतिम संदेश
जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है।
पर जिसने धर्म, भक्ति और सत्य का मार्ग अपनाया, उसकी आत्मा सदैव प्रकाश की ओर जाती है ।
हरि ॐ तत्सत

शास्त्र कहते हैं कि अठारह दिनों के महाभारत युद्ध में उस समय की पुरुष जनसंख्या का 80% सफाया हो गया था। युद्ध के अंत में, ...
13/05/2026

शास्त्र कहते हैं कि अठारह दिनों के महाभारत युद्ध में उस समय की पुरुष जनसंख्या का 80% सफाया हो गया था। युद्ध के अंत में, संजय कुरुक्षेत्र के उस स्थान पर गए जहां संसार का सबसे महानतम युद्ध हुआ था।

उसने इधर-उधर देखा और सोचने लगा कि क्या वास्तव में यहीं युद्ध हुआ था? यदि यहां युद्ध हुआ था तो जहां वो खड़ा है, वहां की जमीन रक्त से सराबोर होनी चाहिए। क्या वो आज उसी जगह पर खड़ा है जहां महान पांडव और कृष्ण खड़े थे?

तभी एक वृद्ध व्यक्ति ने वहां आकर धीमे और शांत स्वर में कहा, "आप उस बारे में सच्चाई कभी नहीं जान पाएंगे!"

संजय ने धूल के बड़े से गुबार के बीच दिखाई देने वाले भगवा वस्त्रधारी एक वृद्ध व्यक्ति को देखने के लिए उस ओर सिर को घुमाया।

"मुझे पता है कि आप कुरुक्षेत्र युद्ध के बारे में पता लगाने के लिए यहां हैं, लेकिन आप उस युद्ध के बारे में तब तक नहीं जान सकते, जब तक आप ये नहीं जान लेते हैं कि असली युद्ध है क्या?" बूढ़े आदमी ने रहस्यमय ढंग से कहा।

"तुम महाभारत का क्या अर्थ जानते हो?" तब संजय ने उस रहस्यमय व्यक्ति से पूछा।

वह कहने लगा, *"महाभारत एक महाकाव्य है, एक गाथा है, एक वास्तविकता भी है, लेकिन निश्चित रूप से एक दर्शन भी है।"*

वृद्ध व्यक्ति संजय को और अधिक सवालों के चक्कर में फसा कर मुस्कुरा रहा था।

"क्या आप मुझे बता सकते हैं कि दर्शन क्या है?" संजय ने निवेदन किया।

अवश्य जानता हूं, बूढ़े आदमी ने कहना शुरू किया। *पांडव कुछ और नहीं, बल्कि आपकी पाँच इंद्रियाँ हैं -* दृष्टि, गंध, स्वाद, स्पर्श और श्रवण - और क्या आप जानते हैं कि *कौरव क्या हैं?* उसने अपनी आँखें संकीर्ण करते हुए पूछा।

*कौरव ऐसे सौ तरह के विकार हैं, जो आपकी इंद्रियों पर प्रतिदिन हमला करते हैं लेकिन आप उनसे लड़ सकते हैं और जीत भी सकते है।* पर क्या आप जानते हैं कैसे?

संजय ने फिर से न में सर हिला दिया।

"जब कृष्ण आपके रथ की सवारी करते हैं!" यह कह वह वृद्ध व्यक्ति बड़े प्यार से मुस्कुराया और संजय अंतर्दृष्टि खुलने पर जो नवीन रत्न प्राप्त हुआ उस पर विचार करने लगा..

"कृष्ण आपकी आंतरिक आवाज, आपकी आत्मा, आपका मार्गदर्शक प्रकाश हैं और यदि आप अपने जीवन को उनके हाथों में सौप देते हैं तो आपको फिर चिंता करने की कोई आवश्कता नहीं है।" वृद्ध आदमी ने कहा।

संजय अब तक लगभग चेतन अवस्था में पहुंच गया था, लेकिन जल्दी से एक और सवाल लेकर आया।

फिर कौरवों के लिए द्रोणाचार्य और भीष्म क्यों लड़ रहे हैं?

भीष्म हमारे अहंकार का प्रतीक हैं, अश्वत्थामा हमारी वासनाएं, इच्छाएं हैं, जो कि जल्दी नहीं मरतीं। दुर्योधन हमारी सांसारिक वासनाओं, इच्छाओं का प्रतीक है। द्रोणाचार्य हमारे संस्कार हैं। जयद्रथ हमारे शरीर के प्रति राग का प्रतीक है कि 'मैं ये देह हूं' का भाव। द्रुपद वैराग्य का प्रतीक हैं। अर्जुन मेरी आत्मा हैं, मैं ही अर्जुन हूं और स्वनियंत्रित भी हूं। कृष्ण हमारे परमात्मा हैं। पांच पांडव पांच नीचे वाले चक्र भी हैं, मूलाधार से विशुद्ध चक्र तक। द्रोपदी कुंडलिनी शक्ति है, वह जागृत शक्ति है, जिसके ५ पति ५ चक्र हैं। ओम शब्द ही कृष्ण का पांचजन्य शंखनाद है, जो मुझ और आप आत्मा को ढ़ाढ़स बंधाता है कि चिंता मत कर मैं तेरे साथ हूं, अपनी बुराइयों पर विजय पा, अपने निम्न विचारों, निम्न इच्छाओं, सांसारिक इच्छाओं, अपने आंतरिक शत्रुओं यानि कौरवों से लड़ाई कर अर्थात अपनी मेटेरियलिस्टिक वासनाओं को त्याग कर और चैतन्य पाठ पर आरूढ़ हो जा, विकार रूपी कौरव अधर्मी एवं दुष्ट प्रकृति के हैं।

श्री कृष्ण का साथ होते ही ७२००० नाड़ियों में भगवान की चैतन्य शक्ति भर जाती है, और हमें पता चल जाता है कि मैं चैतन्यता, आत्मा, जागृति हूं, मैं अन्न से बना शरीर नहीं हूं, इसलिए उठो जागो और अपने आपको, अपनी आत्मा को, अपने स्वयं सच को जानो, भगवान को पाओ, यही भगवद प्राप्ति या आत्म साक्षात्कार है, यही इस मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।

ये शरीर ही धर्म क्षेत्र, कुरुक्षेत्र है। धृतराष्ट्र अज्ञान से अंधा हुआ मन है। अर्जुन आप हो, संजय आपके आध्यात्मिक गुरु हैं।

वृद्ध आदमी ने दुःखी भाव के साथ सिर हिलाया और कहा, "जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं, अपने बड़ों के प्रति आपकी धारणा बदल जाती है। जिन बुजुर्गों के बारे में आपने सोचा था कि आपके बढ़ते वर्षों में वे संपूर्ण थे, अब आपको लगता है वे सभी परिपूर्ण नहीं हैं। उनमें दोष हैं। और एक दिन आपको यह तय करना होगा कि उनका व्यवहार आपके लिए अच्छा या बुरा है। तब आपको यह भी अहसास हो सकता है कि आपको अपनी भलाई के लिए उनका विरोध करना या लड़ना भी पड़ सकता है। यह बड़ा होने का सबसे कठिन हिस्सा है और यही वजह है कि गीता महत्वपूर्ण है।"

संजय धरती पर बैठ गया, इसलिए नहीं कि वह थका हुआ था, तक गया था, बल्कि इसलिए कि वह जो समझ लेकर यहां आया था, वो एक-एक कर धराशाई हो रही थी। लेकिन फिर भी उसने लगभग फुसफुसाते हुए एक और प्रश्न पूछा, *तब कर्ण के बारे में आपका क्या कहना है?*

"आह!" वृद्ध ने कहा। आपने अंत के लिए सबसे अच्छा प्रश्न बचाकर रखा हुआ है।

"कर्ण आपकी इंद्रियों का भाई है। वह इच्छा है। वह सांसारिक सुख के प्रति आपके राग का प्रतीक है। वह आप का ही एक हिस्सा है, लेकिन वह अपने प्रति अन्याय महसूस करता है और आपके विरोधी विकारों के साथ खड़ा दिखता है। और हर समय विकारों के विचारों के साथ खड़े रहने के कोई न कोई कारण और बहाना बनाता रहता है।"

"क्या आपकी इच्छा; आपको विकारों के वशीभूत होकर उनमें बह जाने या अपनाने के लिए प्रेरित नहीं करती रहती है?" वृद्ध ने संजय से पूछा।

संजय ने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया और भूमि की तरफ सिर करके सारी विचार श्रंखलाओं को क्रमबद्ध कर मस्तिष्क में बैठाने का प्रयास करने लगा। और जब उसने अपने सिर को ऊपर उठाया, वह वृद्ध व्यक्ति धूल के गुबारों के मध्य कहीं विलीन हो चुका था। लेकिन जाने से पहले वह जीवन की वो दिशा एवं दर्शन दे गया था, जिसे आत्मसात करने के अतिरिक्त संजय के सामने अब कोई अन्य मार्ग नहीं बचा था।

🙏 *!! जय श्रीकृष्ण !!* 🙏

साभार

भगवान शिव ने काशी क्यों बसाई.*अविमुक्तं न जहामि कदाचिदपि सत्तम।  तस्मिन्मम स्थितिर्नित्यं क्षेत्राणामुत्तमं च तत् ॥*  (स...
12/05/2026

भगवान शिव ने काशी क्यों बसाई.

*अविमुक्तं न जहामि कदाचिदपि सत्तम।
तस्मिन्मम स्थितिर्नित्यं क्षेत्राणामुत्तमं च तत् ॥*
(स्कंद पुराण, काशी खंड)

शिव स्वयं कहते हैं, मैं इस अविमुक्त क्षेत्र को कभी नहीं छोड़ता। यहाँ मेरा नित्य वास है। प्रश्न यह है, कैलाश के स्वामी को पृथ्वी पर एक नगरी क्यों चाहिए थी। उत्तर केवल भूगोल में नहीं, मनोविज्ञान, धर्म और मोक्ष के रहस्य में है।

1. कैलाश पर एक घर की चाह

कथा आरंभ होती है कैलाश से। शिव वैरागी, भस्म रमे, व्याघ्र चर्म पर बैठे। पार्वती राजकुमारी से तपस्विनी बनीं, फिर अर्धांगिनी।

विवाह के बाद एक दिन पार्वती ने धीरे से कहा, नाथ, हर स्त्री का एक घर होता है जहाँ वह दीप जलाती है, अन्न पकाती है, अतिथि को आसन देती है। आप तो आकाश हैं, पर मैं धरती की बेटी हूँ। मुझे एक ऐसा घर चाहिए जो मेरा भी हो, आपका भी हो।

शिव मुस्कुराए। उन्होंने कहा, मेरा घर तो श्मशान है, मेरा आभूषण सर्प है। पर तुम्हारी इच्छा मेरा धर्म है।

पार्वती की यह इच्छा कोई विलास नहीं थी। यह सृष्टि का संतुलन माँग रही थी। शिव यदि केवल कैलाश पर रहें, तो वे देवताओं के रहेंगे, मनुष्यों के नहीं। मनुष्य को ऐसा स्थान चाहिए जहाँ वह बिना हिमालय चढ़े शिव को छू सके।

शिव ने आँखें मूँदीं। त्रिकालदर्शी ने देखा, पृथ्वी पर एक बिंदु है जो प्रलय में भी नहीं डूबता।

2. अविमुक्त — जो कभी छूटता नहीं

पुराण कहते हैं, जब सृष्टि जलमग्न होती है, तब भी काशी सुरक्षित रहती है। शास्त्रों के अनुसार, जब प्रलय काल में पृथ्वी डूबने लगती है, तब महादेव काशी को अपने त्रिशूल की नोक पर उठा लेते हैं। सृष्टि का पुनरुद्धार होने पर इसे वापस पृथ्वी पर स्थापित कर दिया जाता है। इसी कारण इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है।

अविमुक्त का अर्थ है, जो शिव से कभी वियुक्त न हो। यह केवल भौगोलिक ऊँचाई नहीं, चेतना की ऊँचाई है। शिव ने पार्वती से कहा, मैं तुम्हें महल नहीं दूँगा, मैं तुम्हें एक ऐसा क्षेत्र दूँगा जहाँ मृत्यु भी मुक्ति बन जाए।

उन्होंने त्रिशूल उठाया। उसके तीन शूल — सत्व, रज, तम — के बीच एक सूक्ष्म भूमि प्रकट हुई। वह न स्वर्ग थी, न पाताल। वह मध्य में थी, मनुष्य के हृदय जैसी। शिव ने उसे अपने त्रिशूल पर धारण किया और कहा, यही हमारा घर होगा।

3. ब्रह्महत्या और कपाल मोचन

काशी बसाने का दूसरा कारण शिव के अपने अतीत में छिपा है। कथा प्रसिद्ध है, ब्रह्मा के पाँच मुख थे। एक मुख अहंकार में शिव की निंदा कर बैठा। शिव ने कालभैरव रूप में उस पाँचवें सिर को काट दिया।

वेद कहता है, ब्राह्मण की हत्या महापाप है, ब्रह्मा की तो परम। वह कटा हुआ कपाल शिव के हाथ से चिपक गया। कपाल लेकर महादेव तीनों लोकों में भटके, लेकिन कहीं भी उन्हें शांति नहीं मिली।

वे जहाँ जाते,कपाल रक्त टपकाता रहता तीर्थों में स्नान किया, यज्ञ किए, पर वो पाप नहीं छूटा। अंततः वे एक अज्ञात वन में पहुँचे जहाँ गंगा की एक धारा आकाश से नहीं, पाताल से निकल रही थी। जैसे ही महादेव ने इस नगरी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्मा जी का वह कपाल उनके हाथ से गिर गया और वे दोषमुक्त हो गए।

वही स्थान काशी था। शिव ने समझा, यह भूमि पाप को नहीं धोती, पाप को जला देती है। क्योंकि यहाँ मैं स्वयं अग्नि हूँ।

शिव ने घोषणा की, यह नगरी मेरा शरीर है और मैं यहाँ सदा निवास करूँगा।

4. विश्वकर्मा का शिल्प — सूक्ष्म को स्थूल बनाना

संकल्प हो गया, अब रूप चाहिए था। देवशिल्पी विश्वकर्मा को बुलाया गया। उन्होंने ही यहाँ दिव्य मंदिरों, मणिकर्णिका जैसे घाटों और सोने जैसी चमकती इमारतों का निर्माण किया।

विश्वकर्मा ने पहले गंगा को आमंत्रित किया। गंगा स्वर्ग से उतरीं, पर काशी में वे उत्तरवाहिनी हो गईं, दक्षिण से उत्तर की ओर बहीं। यह उल्टी धारा प्रतीक है, यहाँ समय उल्टा चलता है, मृत्यु जीवन की ओर लौटती है।

फिर उन्होंने मणिकर्णिका घाट बनाया। कथा है, पार्वती का कर्णफूल यहाँ गिरा था, शिव ने उसे खोजने के लिए काल को भी रोक दिया। इसलिए यहाँ दाह संस्कार रुकता नहीं, पर आत्मा रुकती नहीं।

नगरी इतनी सुंदर थी कि स्वयं देवताओं ने भी यहाँ निवास करने की इच्छा प्रकट की। इंद्र ने कहा, मुझे स्वर्ग नहीं, काशी का एक कोना दो। विष्णु ने बिंदु माधव रूप में वास किया।

5. पार्वती को मिला घर, जीव को मिला मोक्ष

शिव ने पार्वती से कहा, देखो, यह घर तुम्हारा है। यहाँ तुम अन्नपूर्णा बन कर सबको भोजन दोगी। मैं यहाँ विश्वनाथ बन कर सबको अभय दूँगा।

काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है क्योंकि यहाँ मृत्यु दंड नहीं, दीक्षा है। शिव पुराण कहता है, काशी में प्राण छोड़ने वाले के कान में स्वयं शिव तारक मंत्र देते हैं — राम नाम। वह मंत्र सुनते ही जीव जन्म मरण के चक्र से छूट जाता है।

यह वरदान केवल मनुष्य को नहीं, पशु, पक्षी, चांडाल, पापी सबको है। क्योंकि काशी शिव का शरीर है, और शरीर में कोई भेद नहीं होता।

6. त्रिशूल पर टिकी नगरी का विज्ञान

लोग पूछते हैं, क्या सच में काशी त्रिशूल पर है। शास्त्र रूपक में बोलता है। त्रिशूल के तीन शूल तीन नाड़ियाँ हैं — इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना। काशी इन्हीं के संगम पर बसी है। गंगा इड़ा, यमुना पिंगला, सरस्वती सुषुम्ना। जहाँ तीनों मिलें, वहाँ कुंडलिनी जागती है।

भौगोलिक रूप से भी काशी एक ऊँचे कगार पर है, जो बाढ़ में भी नहीं डूबता। प्राचीन ग्रंथों में इसे वाराणसी कहा गया, वरणा और असी नदियों के बीच। यह प्राकृतिक त्रिशूल है।

इसीलिए कहा जाता है, प्रलय में भी काशी नहीं डूबती। क्योंकि चेतना का केंद्र कभी नष्ट नहीं होता।

7. आज काशी क्यों प्रासंगिक है

काशी केवल शहर नहीं, महादेव का साक्षात स्वरूप है। आज जब हम भागते हैं, काशी ठहरना सिखाती है। जब हम जोड़ते हैं, काशी छोड़ना सिखाती है।

यहाँ आ कर राजा हरिश्चंद्र डोम बने, तुलसी ने रामचरितमानस लिखा, कबीर ने कपड़ा बुना, रैदास ने जूते सिए। सबने एक ही बात कही, काशी में रहना मतलब शिव की गोद में रहना।

शिव ने काशी इसलिए बसाई क्योंकि पार्वती को घर चाहिए था, और जीव को माँ चाहिए थी। कैलाश दूर है, काशी पास है। कैलाश पर जाना पड़ता है, काशी बुला लेती है।

8. निष्कर्ष — घर का अर्थ

तो उत्तर सरल है। भगवान शिव ने काशी इसलिए बसाई —

अपनी अर्धांगिनी की इच्छा पूरी करने के लिए, गृहस्थ धर्म निभाने के लिए।
अपने ब्रह्महत्या दोष से मुक्त होने के लिए, क्योंकि केवल अविमुक्त क्षेत्र ही पाप को जला सकता था।
जीवों को मोक्ष देने के लिए, जहाँ मृत्यु भी मुक्ति बने।
सृष्टि को एक ऐसा केंद्र देने के लिए जो प्रलय में भी न छूटे, जो त्रिशूल पर टिका रहे।

शिव आज भी कहते हैं, अविमुक्तं न जहामि। मैं काशी नहीं छोड़ता। इसका अर्थ है, मैं तुम्हें नहीं छोड़ता। तुम जहाँ भी हो, यदि मन में काशी बसा लो — अर्थात् स्थिरता, करुणा, वैराग्य — तो शिव वहीं वास करते हैं।

काशी जाना तीर्थ है, काशी होना साधना है।

हर हर महादेव ....

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