06/11/2024
जिस आवाज़ से छठ की शुरूआत हुआ करती थी, वही आवाज़ छठ के शुरू होते ही ख़ामोश हो गई। शारदा सिन्हा जी अब हमारे बीच नहीं हैं। शारदा सिन्हा ने अपनी गायकी से ऐसी सामूहिकता का सृजन किया जिसे पहचानने के लिए ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना नहीं पड़ता है बल्कि चुपचाप अपने भीतर महसूस करना होता है। उनके गीत छठ का हिस्सा हैं। कहते हैं छठ में कुछ भी बाहरी परिवर्तन नहीं हुआ, जो पुराना है वही चला आ रहा है सिवाय शारदा सिन्हा के छठ गीतों के। क्या कोई छठ को शारदा सिन्ही की आवाज़ से अलग कर सकता है? इन्हीं दिनों लाउड स्पीकर बजने लगते हैं। खेत खलिहानों और नदी किनारे बने घाटों से आ रही उनकी आवाज़ गांव-घर बुलाने लग जाती है।शारदा सिन्हा की आवाज़ बिहार जैसे ग़रीब राज्य की सबसे बड़ी समृद्धी थी। आज बिहार थोड़ा ग़रीब हो गया। हम आपको अपनी यादों में रखेंगे। जब रोएँगे अपनों की याद में, आपको भी याद करेंगे। अलविदा शारदा जी।